विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 704 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०७
आरोग्यता
शास्त्रकारों ने बतलाया है:—
शरीरे सर्वधातूनां सारं वीर्य प्रकीर्तितम् ।
तदेव चौजस्तेजश्च बलं कांतिःपराक्रमः ॥
यस्मिञ्छुद्धे शरीरस्य गतिः शुद्धा भवेत्तदा ।
ब्रह्मचर्यदशायां हि क्षीणे क्षीण पराक्रमः ॥
धैर्य तेजो विरहितः रोगग्रस्त कलेवरः ।
सारहीनं यथा वस्तु तथैव स नरः स्मृतः ॥
ऊपर लिखे श्लोको का अर्थ यह है कि मनुष्य के शरीर में सब
धातुओ का सार वीर्य ही माना जाता है। वही वीर्य तेज, वल,
कान्ति, पराक्रम और पुरुषत्व रूप से शरीर में विराजमान रहता
है, जिसके शुद्ध रहने से शरीर की सब प्रकार से शुद्धि रहती है,
ब्रह्मचर्य अवस्था में वीर्य के क्षीण होने से मनुष्य का शरीर परा-
क्रम, तेज, बल, धैर्य और पुरुषार्थ से हीन होकर अनेक रोगों
का घर बन जाता है, जैसे सारहीन पदार्थ रद्दी ( बेकाम ) हो
जाता है वैसे ही वीर्य से हीन पुरुष का पुरुषार्थ है। इसीलिये
महात्माओं ने मनुष्य के हित के लिये कहा है कि:—
आहारस्य परं धाम वीर्य तद्रक्ष्यमात्मनः ।
क्षयोयस्य बहून् रोगान्मरणं च नियच्छति ॥