विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० आनन्द मन्दिर
में दुख रूपी शत्रु अशान्ति फैला देते हैं) का अपरिमित व्यय
पाया जाता है।
यह प्रथम ही लिखा गया है कि दोष अग्नि आदि मे दृढ
संबन्ध होने के कारण एक के न्यूनाधिक होने से प्रायः सब ही
असमान हो जाते हैं और इनकी असमानता ही को रोग कहा
जाता है। बहुत दुःख के साथ लिखना पडता है कि ऐसे अमूल्य
पदार्थ का जो सम्पूर्ण पुरुषार्थों का देने वाला है, उसको क्षणिक
सुख (जिसका परिणाम दुःख ही दुख है) के लिये हमारी
धर्म माता व वहिने व पुरुष आदि स्वभाव विरुद्ध कर्मों मे व्यय
करते हैं। हाय, हाय वे लोग नहीं जानते कि किया हुआ
आहार क्रिया विशेष द्वारा परिपक होकर रस से रक्त, रक्त से
मास, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा होता है और
पुनः पचकर ४० दिनो मे शुक्र (वीर्य) रूप धारण करता है।
इसलिये मनुष्य मात्र को वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। देखो पशु
पक्षी भी नियमित काल मे शुक्र का पतन करते हैं। क्या आप उन
से भी अज्ञान हैं जो अपने आपही अपने पैर में कुल्हाड़ी मार
कर जीवन नष्ट करते हैं।
यही शुक्र अन्य छहों धातुओं का अन्तिम परिणाम है और
इसी के अधिक व्यय से शरीर नाना प्रकार के रोगो से रुग्ण
रहता है और मनुष्य पुरुषार्थहीन हो जीवन पर्यन्त रोगी रह
कर तथा रोगी निर्बल दुर्बल सन्तान उत्पन्न कर दुःखमय जीवन
व्यतीत करता है।