विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
३८४ आनन्द मन्दिर
से नाना प्रकार के प्रमेह स्वप्नदोष शीघ्रपात आदि रोग हैं। ऐसे
निर्बल वीर्य के द्वारा विपरीत रति से गर्भ रहने पर भी कुम्भिक
नपुंसक उत्पन्न होता है ।
स्वेगुदे ऽब्रह्मचर्याद्यःस्त्रीपुपुंवत्प्रवर्तते,
कुम्भिकः सतुविज्ञेयः ॥
कुम्भिक नपुंसक सम्भोग नहीं कर सकता जब वह पुरुष
किसी पुरुष से अपनी गुदा मे मैथुन करावे तब उसकी इन्द्री में
चैतन्यता आवे तब वह पुरुष के समान स्त्री के साथ प्रसंग कर
सकता है । ये कुम्भिक नपुंसक के लक्षण हैं ।
ईर्ष्यक नपुंसक
ईर्ष्याभितापावपिमन्दहर्षा-
दीर्ष्याह्वयस्यापिवदन्तिहेतुम् ॥
सम्भोग के समय पति पत्नी दोनों चित्त मे किसी से ईर्ष्या
द्वेष का भाव रक्खे हो और चित्त मे इसी विषय की चिन्ता हो
उस दशा मे जो गर्भ रह जावे उससे ईर्ष्यक नपुंसक उत्पन्न
होता है ।
दृष्ट्वाव्यवायमन्येषांव्यवाये यः प्रवर्त्तते ।
ईर्ष्यकः सतुविज्ञेयो दृग्योनिरयमीर्ष्यकः ॥
इसका अर्थ यह है कि जो पुरुष अन्य पुरुष को स्त्री प्रसंग
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २८५
करते देखे तब उसकी इन्द्री में चैतन्यता हो और वह स्त्री प्रसंग
करने के योग्य हो अर्थात् जब तक दूसरे को मैथुन करते न
देखे तब तक वह स्वयं मैथुन नहीं कर सकता । इसका कोई
इलाज आयुर्वेद में नही बतलाया। इसका यही इलाज है कि वह
पुरुष दूसरे पुरुष को स्त्री प्रसंग करते देखे तब उसकी इन्द्री मे
चैतन्यता उत्पन्न हो ।
पाठक पाठिकाओ ! देखिये किसी से ईर्ष्या द्वेप करना कितना
बुरा है । थोड़ी ही सी भूल में इसका प्रभाव सन्तान पर कैसा
बुरा पड़ता है। इसीलिये आयुर्वेदाचार्यों ने बतलाया है कि
संभोग के समय स्त्री पुरुष दोनो प्रसन्न चित्त हों । पुरुष को
चाहिये स्त्री को अनेक प्रकार से आलिंगन चुम्बन आदि प्यार करके
प्रसन्न करे और आप भी प्रसन्न चित्त हो । सब चिंता शोक
क्रोध आदि भुला देना चाहिये, ऐसी आयुर्वेद की आज्ञा है ।
स्त्री के नपुंसक होने का कारण
जिस प्रकार पुरुष माता पिता की अज्ञानता से नपुंसक
होता है उसी प्रकार स्त्री भी नपुसक होती है । स्त्रियों मे दो
प्रकार की नपुंसक होती हैं, एक तो वह जिसकी इच्छा ही संभोग
की न हो इस लिये उसके कभी गर्भ नही रहता । यह नपुंसक
स्त्री मासिक धर्म्म से भी नही होती । यह नपुंसक स्त्री इस
प्रकार उत्पन्न होती है कि संभोग के समय मूर्खता वश पुरुष
स्त्री को अपने ऊपर करके जैसा कि आजकल के अनेक काम-
३८६ आनन्द मन्दिर
शास्त्र कोकशास्त्र सम्बन्धी पुस्तको में आसन बतलाये गये हैं,
पुरुष मैथुन करता है उससे जो गर्भ रहे और कन्या उत्पन्न हो
तो वह नपु सक होती है। पुरुष के समान चेष्टा वाली होती है।
उसके गर्भाशय नही होता, यदि हो भी तो गर्भधारण करने योग्य
नहीं होता। वह स्त्री प्रसंग के योग्य नहीं होती। उसकी इच्छा
तो होती है परन्तु प्रसंग का कुछ फल नही होता।
दूसरी प्रकार की नपुंसक
एक तो वह स्त्री नपुसक होती है जो पुरुष स्वयं स्त्री को
ऊपर चढ़ा कर प्रसंग करे और उससे गर्भ रहकर कन्या उत्पन्न
हो। दूसरी इसप्रकार होती है कि स्त्री की ही इच्छा पुरुष के
ऊपर होकर सम्भोग करने की हो और अपनी इच्छा से पुरुष
के ऊपर होकर स्वयं प्रसंग करे। पुरुष स्त्री की समान नीचे पड़ा
हो। इस प्रकार जो गर्भ रह जावे उससे जो कन्या उत्पन्न हो वह
कन्या इसप्रकार की नपुसक होती है कि पुरुष से प्रसंग मे
कभी रति नही होती। वह स्वयं पुरुष की समान पुरुष के ऊपर
होकर प्रसंग करने की इच्छा रखती है। इसप्रकार की इच्छा
बनी रहने से उसके गर्भ नही रहता और प्रसंग से उसकी इच्छा
भी नही भरती। वह अन्य स्त्रियो के साथ भी ऐसा ही करती है।
उसकी संगति से अन्य स्त्रियां भी उसी स्वभाव की होजाती
हैं आपस मे इस प्रकार प्रसंग करती हैं। इस प्रकार नपुंसको
की वृद्धि होती जाती है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६१
बालकों के रोगों और मृत्यु की
अधिकता का कारण
सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष बाल्यावस्था के दुर्व्यसनों हस्त-
क्रिया आदि के कारण और विवाह होने पर अपनी स्त्री से रात
दिन विषय भोग तथा तिसपर भी इच्छा की शान्ति न होने पर
वेश्यागमन से गरमी सुजाक आदि भयंकर रोगों से जीवन भर
के लिये रोगी बन जाते हैं और स्त्री को भी रोगी बना देते हैं
इस प्रकार दोनों रोगी हो रोगी सन्तान उत्पन्न करते हैं पहिला
कारण बालकों की अधिक रोगी तथा मृत्यु संख्या का यह है।
दूसरा कारण
सैकड़ा पीछे एक ही दो पुरुष गर्भाधान क्रिया नियम पूर्वक
करते हैं वरन सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष ऐसे हैं जो केवल विषय
वासना की तृप्ति के लिये सम्भोग करते हैं। सन्तान तो धोखेधड़ी
में होजाती है। नियम विरुद्ध गर्भ रहने से बालक रोगी और
अल्पायु होते हैं।
तीसरा कारण
पति पत्नी से जैसा चाहिये प्रेम नहीं करते। प्रेम न करने
से और केवल विषय वासना की तृप्ति के समय ही ऊपरी दिखा-
वटी प्रेम करके अपना मतलब गांठ लेते हैं फिर पति पत्नी में
has two slants. Compare toहोतीin : ह+ोhas that slant. So aboveल, there is definitively an ेmatra! Wait, whyमुर्दा दिले? Could it be "मुर्दा-दिली" where the 'ी' was miscast as 'े'? Or "मुर्दा दिले"? Yes, it is literally दिले`.
-
Let's check every single line carefully:
३६२ आनन्द मन्दिर
(Note: line 1 has page number on left, title in center).प्रायः अनबन ही बनी रहती है इसलिये सन्तान निर्बल दुर्बल
Wait, is there a space between "निर्बल" and "दुर्बल"? Yes: "निर्बल दुर्बल".
Is it "इसलिये" or "इसलिए"?
Look at :इ स ल ि य े->इसलिये. Exactlyइसलिये.होती है और असावधानी से अल्पायु भी होती है ।
"होती है और असावधानी से अल्पायु भी होती है ।" - perfectly clear.चौथा कारण
Centered heading: "चौथा कारण".गर्भाधान के समय स्त्री पुरुप में दिली प्रेम न होने मे उसका
Wait, let's re-verify
rounded belly to the right
- tail extending down to the right, ending below the baseline!
Now look at line 13: - top bar
- short vertical stem? No, it goes down, curves left, loops, goes down, scoops UP to a full vertical bar with an 'ा' matra!
Wait, 'य' with 'ा' has a vertical bar!
Does the letter in L13 have TWO vertical bars?
"म" + "ा" = मा (one bar).
Then: "य" + "ा" = या (one bar for the body of य? No, य has a right vertical stem, and ा has another stem, OR it's just 'दा'?).
WAIT!
How many vertical stems are in that word?
Count them in L13:
Stem 1: part of 'म'
Stem 2: the 'ा' of 'मा'
Then: curve... then a stem with a tail?
WAIT! It only has THREE stems total in the whole word!
Wait: म (stem 1), ा (stem 2)... and then ONE stem?
If it were "माया", it would have FOUR stems: म (1), ा (2), य's stem (3), ा (4)!
Does it have four stems?
NO! It only has THREE stems!
Wait, let me look REALLY closely at L13:
३६४ आनन्द मन्दिर
है चक्कर लगाता है। जब कबूतरी प्रसन्न होकर गर्भाधान क्रिया के
लिये तय्यार होती है तब सभोग करता है । इस प्रकार कभी
खाली नहीं जाता उसकी गर्भाधान क्रिया व्यर्थ नही जाती ।
इसीप्रकार सब पशु पक्षी मादा की इच्छा उत्पन्न करके गर्भाधान
क्रिया करते है । खरगोश घंटों मादा के साथ किलोलें करता है तब
वह गर्भाधान क्रिया के योग्य होती है फिर रतिक्रिया करता है ।
ऊपर लिखा प्रकृति का नियम है इस नियम के विरुद्ध जो
रतिक्रिया करता है वह पशु पक्षियो से भी कम बुद्धिवाला है ।
यही कारण है जो सन्तान जन्म से ही रोगी निर्बल और दुर्बल
होती है क्योकि स्त्री की इच्छा के विरुद्ध गर्भाधान क्रिया होती है।
आठवां कारण
पुरुष अपनी विषय वासना की पूर्ति के लिये नाना प्रकार
से उलटे सुलटे टेढे तिरछे होकर रतिक्रिया करते हैं और समझते
हैं कि इस प्रकार करने से और भी अधिक आनन्द मिलेगा, परन्तु
यह उनकी मूर्खता है। इस प्रकार करने से स्त्री के गर्भाशय को बडी
भारी हानि पहुँचती है, गर्भाशय मे सूजन टेढापन तिरछापन हो
जाता है, गर्भाशय बाहर निकल आता है। गर्भाशय के बन्धन ढीले
होकर अनेक प्रकार की खराबिया आजाती हैं। उनसे स्त्रियो को बडा
कष्ट होता है । यदि इस दशा मे गर्भ रहगया तो बालक रोगी
निर्बल दुर्बल और कम आयु वाला होता है । यही कारण हमारे
देश के बालकों की रोगी तथा मृत्यु संख्या अधिक होने का है ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६५
नवाँ कारण
सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुषो को शीघ्रपात और सुस्ती की
बीमारी है। पुरुष तो गर्भाधान क्रिया के समय शीघ्रही शक्तिहीन
होजाते हैं। स्त्री की इच्छा रहजाती है वह तय्यार तक नही होने
पाती। पती जी की नानी मर जाती है, फिर भला सन्तान आरोग्य
कैसे हो। ऐसी दशा में गर्भ रहता ही नहीं, यदि वर्षों गर्भाधान
क्रिया करते रहने से कभी धोखे में स्त्री की इच्छा पूरी हुई और
वह भी स्खलित हुई और रज तथा वीर्य मिलकर गर्भ रह गया
तो ऐसी दशा मे सन्तान रोगी निर्वल दुर्बल और कम आयु
वाली होती है।
दसवां कारण
पुरुषों को शीघ्रपात की शिकायत है ओर वे स्तम्भन वटी
खाकर सिथिलता के लिये तिला आदि का सेवन कर किसी
प्रकार गर्भाधान क्रिया के लिये तय्यार हुए और बडे उद्योग से
कुछ देरी तक ठहरे उसी समय स्त्री की भी इच्छा धोखे से होगई
तो गर्भ रह गया। उस समय की गर्भाधान क्रिया से यदि गर्भ
रहा तो गर्भस्राव व गर्भपात होजाता है,। यदि भाग्यवश बालक
हुआ भी तो रोगी निर्वल और दुर्बल होता है। मेरे पास
ऐसी स्त्रियों और पुरुषो की चिट्ठियां महीने मे सैकड़ो हजारों
आया करती हैं। जिनके पति को शीघ्रपात की तथा सुस्ती
२६६ आनन्द मन्दिर
की शिकायत है ऐसे पतियों की स्त्रियों की भी सन्तान सदा रोगी
निर्बल और दुर्बल होती है।
ग्यारहवां कारण
गर्भ रहजाने पर भी पुरुष अपनी इच्छाओं को काबू मे नहीं
करते। रात दिन सम्भोग करके स्त्री को निर्बल बनादेते हैं। गर्भ
रहजाने पर प्रसंग करने से गर्भस्राव व गर्भपात होजाता है
यदि किसी को न भी हुआ तो सन्तान होने पर रोगी निर्बल
और अल्पायु होती है। पशु पक्षियो को इस बात का ज्ञान है वे
मादा को देखते ही समझ लेते हैं कि मादा गर्भवती है, परन्तु
जानते हुये भी वे बाज नही आते।
बारहवां कारण
मासिकधर्म्म के दिनो मे भी बहुधा पुरुष रतिक्रिया करते हैं
मेरे पास ऐसी हजारो स्त्रियां आईं और आती हैं जो अपने
पतियों के इस अत्याचार का हाल कहती हैं। मासिकधर्म्म के
दिनो मे गर्भाधान क्रिया करने से गर्भ नही रहता। गर्भाशय में
गया हुआ वीर्य ऋतु के रक्त के साथ बाहर निकल आता है।
स्त्री के अनेक प्रकार के गर्भाशय के रोग होजाते हैं। मासिक-
धर्म के दिनो मे रतिक्रिया करने से पुरुषो को भी अनेक प्रकार
के रोग उत्पन्न हो जाते है। मासिकधर्म के रोग भी होजाते हैं।
रज दूषित होजाता है उस स्त्री के जब गर्भ रहता है तो ऋतुदोष के
B K Mitra
पति दाहिने पैर से पलंग पर चढे । पृ० ३५२ (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६७
कारण बालक रोगी निर्बल और दुर्बल होता है। यह भी कारण
हमारे देश के बालकों की रोगी तथा मृत्यु संख्या की अधिकता
का है।
तेरहवां कारण
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियो को प्रदर प्रसूत और मासिक-
धर्म्म की खराबी है। मेरे पास २५ वर्षों में कई लाख स्त्रियां
अपना इलाज कराने आईं । सब की ही रोग परीक्षा से मालूम
हुआ कि प्रदर प्रसूत और मासिकधर्म की ही खराबी अधिक है।
इनमें मे कुछ गर्मी और सुजाक रोग से भी ग्रसित पाई गईं। इनमे
जिनके सन्तान मौजूद थी वह भी निर्बल दुर्बल और रोगी थी
बहुतों के गर्भस्राव व गर्भपात की शिकायत थी। ऊपर लिखे
रोगों के कारण स्त्रियो के रोगी ही सन्तान उत्पन्न होती है और
वह दुर्बल रहती है।
चौदहवां कारण
वेश्यागामी और अधिक विषयी पुरुष शराब अफीम भांग
इत्यादि नशो का सेवन अधिक स्तम्भन के लिये किया करते हैं।
नशीली वस्तुओं का अधिक सेवन करने से वीर्य दूषित होजाता
है, उस वीर्य से जो सन्तान उत्पन्न होती है वह रोगी निर्बल
दुर्बल और कम आयु वाली होती है तथा सुस्त और दुर्बुद्धि
होती है।
२६८ आनन्द मन्दिर
पन्द्रहवां कारण
पुरुष विषय वासना की तृप्ति के लिये अधिक से अधिक
आनन्द की इच्छा से रतिक्रिया की अनेक विधियों की खोज में
रहते हैं इसलिये इसी विषय की व्यर्थ की अनेक पुस्तके
भी तैयार हुई हैं और वे कुछ पाश्चात्य ढंग को लेकर लिखी
गई हैं।
विलायती विषय-ढंग के अधार पर ही अपनी समझ मे
लेखको ने उन्हे अधिक उपयोगी बनाया है। मेरे सामने इस
विषय की अनेक पुस्तके हैं, इनमें जो विषय लिखे गये हैं उनको
पढ़ सुनकर स्त्री पुरुषों के मन मे और भी अधिक घृणित विचार
उत्पन्न हो सकते हैं। किसी किसी पुस्तक मे वेश्यागमन तथा
मादक वस्तुओ के सेवन और परस्त्रीगमन की भी शिक्षा दीगई
है क्योकि योरुप में इस विषय को बुरा नही समझते इसी आधार
पर पुस्तको की रचना हुई है। ऐसी पुस्तकों मे भारतवासियो
को विशेष शारीरिक और आर्थिक हानि पहुँच रही है और
पहुँचेगी।
स्त्रियो और बालिकाओ के विषय मे ऐसी घृणित बाते
उदाहरण देकर लिखी गई है कि वे पुस्तके हमारे देश की स्त्रियों
बालिकाओं तथा पुरुषो के हाथों मे जाने योग्य भी नही हैं ऐसी
पुस्तको से जो हानि होरही है तथा होगी वह लिखकर नही
समझाई जा सकती।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६६
इस विषय मे मुझे इतना ही कहना है कि ऐसी पुस्तकों ने
और भी अधिक विषय की ओर स्त्री पुरुषों का ध्यान आकर्षित
किया है। अतएव हमारे देश के विषयी स्त्री पुरुषों की विषय
वासना और भी अधिक बढ़ती जाती है यह कारण भी देश के
बालको की रोगी तथा मृत्यु संख्या अन्य देशो के बालको की
रोगी तथा मृत्यु संख्या से अधिक होने का है।
सोलहवां कारण
जब स्त्री की इच्छा रतिक्रिया की नही है तब रतिक्रिया
करने से जो गर्भरहता है उससे गर्भस्राव व गर्भपात होजाता
है और यदि सन्तान हुई भी तो रोगी निर्बल दुर्बल होती है।
अधिक रतिक्रिया से स्त्री का रज क्षीण तथा निर्बल पड़जाता है।
तथा गर्भाशय के बधन ढीले पड़जाते हैं ऐसी दशा मे यदि गर्भ-
स्राव व गर्भपात हो गया और यदि सन्तान हुई तो रोगी
निर्बल तथा अल्पायु होती है। यह भी कारण हमारे देश की
बालकों की रोगी तथा मृत्यु सख्या की अधिकता का है।
सत्तरहवां कारण
उत्तम सन्तान उत्पन्न होने की इच्छा से पुरुष रतिक्रिया
करते ही नही, केवल इन्द्रियो की वासना की पूर्ति के लिये रति
क्रिया करते हैं, इसी कारण विधि का विचार भी नही करते
अतएव सन्तान रोगी और अल्पायु होती है।
३०० आनन्द मन्दिर
अठारहवां कारण
गर्भ रहजाने पर गर्भवती नियम पूर्वक नहीं रहती। आहार
विहार का नियम ठीक नही रखती इस कारण सन्तान होते
समय कष्ट भी अधिक होता है और सन्तान भी रोगी होती है तथा
कम अवस्था मे ही मरजाती है।
उन्नीसवां कारण
बालक होते समय मूर्खा दाइयों की असावधानी से बालक
की ठीक सम्हाल नहीं होतो इस कारण बहुधा जच्चा और बच्चा
दोनों के प्राण संकट मे पड जाते हैं। बहुततेरे बालक सोवर मे ही
काल का कलेवा बनजाते हैं और जच्चा को भी बडा कष्ट होता है
दाई की असावधानी और मूर्खता से प्राय जच्चा को प्रसूत रोग
होजाता है और भी अनेक प्रकार के गर्भाशय के रोग उत्पन्न
होजाते हैं। प्रसूत रोगवाली स्त्री के सन्तान तो बराबर होती
जाती है परन्तु वह रोगी और निर्बल दुर्बल होती है।
प्रसूत रोग अधिक दिन का होजाने से तपेदिक का रूपधा-
रण करती है और ठीक इलाज न होने से वह स्त्री जीवन लीला
समाप्त करजाती है। तपेदिक वाली रोगी स्त्री के भी सन्तान
होती है परन्तु वह भी इसी प्रकार के रोगों से ग्रसित रहती है।
और अन्त को तपेदिक के रोग से ही मरती है। विषयी पुरुष
इस बातकी कुछ भी परवाह नही करते। स्त्री को कुछ भी रोग हो
वे अपनी विषय वासना की तृप्ति करने में मस्त रहते हैं।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०१
बीसवां कारण
पति पत्नी मे सच्चा प्रेम नही होता। मेरे पास जितनी स्त्रियां
इलाज के लिये अब तक आईं और आया करती हैं सब की ही
प्रायः यह शिकायत रहती है। सैकड़ा पीछे पांच ही ऐसी मिलेंगी
जिनमे इस विषय की शिकायत न हो कि हमारे पति जैसा
चाहिये मुझसे वैसा स्नेह रखते हैं। हमारी इच्छा हो या न हो इसकी
कुछ परवाह नहीं। हमारी बीमारी की कुछ भी परवाह नही। केवल
विषय ही करना जानते हैं, सो भी शीघ्रपात के कारण इच्छा
पूरी नही हो पाती। पुरुषों के शीघ्रपात के कारण स्त्रियों को हिस्ट्रिया,
रज विकार, प्रदर आदि अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं इसी कारण
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी पाई जाती हैं ।
इसी प्रकार के और भी कारण बालकों की अधिक रोगी
तथा मृत्यु संख्या के है क्योकि माता पिता दोनो का रजवीर्य
दूषित होने के कारण सन्तान रोगी होती है, जो स्त्री पुरुष अपनी
आरोग्यता का नियम ठीक रखते हैं और अहार विहार का नियम
ठीक तरह से पालन करते हैं उनकी सन्तान आरोग्य हृष्ट पुष्ट
और दीर्घ जीवी होती है ।
इक्कीसवां मुख्य कारण
स्त्री पुरुषों की अधिक रोगी संख्या तथा रोगी माता पिता से
रोगी सन्तान उत्पन्न होने का विशेष और मुख्य कारण यह है कि
३०२ आनन्द मन्दिर
स्त्री पुरुषों को विषय की ओर अधिकता से लेजाने वाले अनेक
उपन्यास और कामशास्त्र की पुस्तकें अनेक चटपटे नामों से बड़ी
तेजी के साथ तय्यार हो रही हैं उनमें विषय वासना की ओर
स्त्री पुरुषों को ले जाने के अनेक मनगढत उपाय बतलाये गये हैं।
शास्त्रों का उदाहरण देकर लोगों को विश्वास दिलाया गया है कि
यह शास्त्रकारो ने आज्ञा दी है।
शास्त्रकार कभी इस प्रकार का उपदेश कर ही नही सकते
कि जिससे व्यभिचार का प्रचार हो और स्त्री पुरुष अधिक विषय
वासना में पड़कर रोगी हो रोगी सन्तान उत्पन्न करे। इसप्रकार
के शास्त्रकारों के उपदेश परमात्मा की सृष्टि में बाधा पहुँ-
चाते हैं। अतएव शास्त्रकारों का नाम लेकर ऐसी विषय की पुस्तकों
को लिखने वाले केवल अपने स्वार्थ के लिये ऐसा कर रहे हैं, मनुष्यों
का उनसे कुछ लाभ नही बल्कि हानि हो रही है। अज्ञानी विषयी
लोग उन पुस्तको से उपदेश ग्रहण कर अपने पैरों मे आपही
कुल्हाड़ा मार रहे हैं और अपने जीवन को मृत्यु के मुह में लिये
जारहे हैं। मान लीजिये किसी विषयी पुरुष ने कोई ऐसा विषय
लिख भी दिया तो बुद्धिमान विद्वान लोगो को उससे बचना ही
चाहिये, प्रचार करके जीवन शक्ति को नष्ट न करना चाहिये।
पाश्चात्य देशों मे पर स्त्रीगमन मादक द्रव्यों का अधिक
सेवन सब प्रकार के जीवो का मांस आदि खाना हितकारी और
उचित समझा गया है। वहा तो चित्त को प्रसन्न रखना स्त्री पुरुष
दोनों की स्वास्थ्य रक्षा का पहिला नियम है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०३
पाश्चात्य देशो मे कोई पुरुष बिना स्त्री की इच्छा के सभोग
सम्बन्धी कोई बात तक नही कर सकता । यदि स्त्री की इच्छा के
विरुद्ध कोई काम पति करता है तो वह पति को तलाक दे देती
है । इसीप्रकार के केस योरुप मे प्रति दिन बीसों हुआ करते
हैं । बीबी तलाक देकर दूसरी जगह चैन करती है । मियां मुंह
ताकते रहजाते हैं। बहुत छोटी छोटी बातों मे योरुप की स्त्रियां पति
को तलाक दे देती हैं। योरुप मे विवाह का कोई महत्व नही है, वहाँ
स्त्रियो या पुरुषों को सन्तान होने की भी अधिक लालसा यहां
की भांति नही रहती । वहां का विवाह बन्धन, बन्धन नही समझा
जाता, जब चाहे स्त्री पति को छोड़ सकती है ।
योरुप की स्त्रियो के विषय मे कुछ लिखना व्यर्थ है । सभी
भारतवासी जानते हैं उनका उदाहरण यहां की स्त्रियों से नहीं
दिया जासकता । रतिक्रिया के विषय मे योरुप की स्त्रियों का
उद्धारण देना तथा योरुप के विद्वानो के मत का उदाहरण देना
बड़ी भारी भूल है । वहां के स्त्री पुरुषो का खान पान रहन सहन
आचार विचार सामाजिक रीति व्यवहार वहां के जल वायु और
प्रकृति तथा रीति रिवाज पर निर्भर है । अतएव जितनी पुस्तके
रतिक्रिया विषय की अबतक बनी हैं, प्रायः योरुप की ही स्त्रियो
और पुरुषो के ग्रन्थो के आधार पर लिखी गई हैं । इसीलिये ऐसी
पुस्तको से हमारे देश के स्त्री पुरुषो को हानि के सिवाय लाभ
कभी नही हो सकता ।
इस विषय की पुस्तको मे जो विषय होना चाहिये जिसके
३०४ आनन्द मन्दिर
न जानने से रतिक्रिया सम्बन्धी बड़ा भारी अज्ञान फैला हुआ है
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी होरही हैं और पुरुषों की भी
रोगी संख्या कम नहीं है। इसी कारण हमारे देशके बालकों की
रोगी तथा मृत्यु संख्या अधिक है। इसलिये रतिक्रिया और गर्भा-
धानक्रिया की विधि धर्म शास्त्र और वैद्यक शास्त्र तथा काम
शास्त्र के अनुसार विस्तार पूर्वक लिखी जाती है। आशा है पाठक
इसी के अनुसार गर्भाधान क्रिया कर आरोग्य, और हृष्ट पुष्ट तथा
मनमानी सुन्दर सन्तान उत्पन्न करेंगे और पति पत्नी स्वयं
आरोग्यता प्राप्त करेंगे।
माता पिता के व्यभिचार और अधिक विषय तथा अनियम
रतिक्रिया का प्रभाव जो सन्तान की आत्मा और शरीर पर पड़ता
है और उसका जो भयंकर परिणाम समाज को भी भोगना पड़ता
है वह बड़ा दुखदाई होता है। बेचारे अनाथ बेकसूर बालक माता
पित के अपराधों के शिकार होकर जन्म भर दुख भोगते हैं और
माता पिता की अच्छी याद करते हैं। इसका विशेष वर्णन आगे
किया जावेगा।
स्त्री बाये पैर से पलंग पर चढ़े। पृ० ३५२ (सर्वाधिकार सुरक्षित)