विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ आनन्द मन्दिर
शास्त्र कोकशास्त्र सम्बन्धी पुस्तको में आसन बतलाये गये हैं,
पुरुष मैथुन करता है उससे जो गर्भ रहे और कन्या उत्पन्न हो
तो वह नपु सक होती है। पुरुष के समान चेष्टा वाली होती है।
उसके गर्भाशय नही होता, यदि हो भी तो गर्भधारण करने योग्य
नहीं होता। वह स्त्री प्रसंग के योग्य नहीं होती। उसकी इच्छा
तो होती है परन्तु प्रसंग का कुछ फल नही होता।
दूसरी प्रकार की नपुंसक
एक तो वह स्त्री नपुसक होती है जो पुरुष स्वयं स्त्री को
ऊपर चढ़ा कर प्रसंग करे और उससे गर्भ रहकर कन्या उत्पन्न
हो। दूसरी इसप्रकार होती है कि स्त्री की ही इच्छा पुरुष के
ऊपर होकर सम्भोग करने की हो और अपनी इच्छा से पुरुष
के ऊपर होकर स्वयं प्रसंग करे। पुरुष स्त्री की समान नीचे पड़ा
हो। इस प्रकार जो गर्भ रह जावे उससे जो कन्या उत्पन्न हो वह
कन्या इसप्रकार की नपुसक होती है कि पुरुष से प्रसंग मे
कभी रति नही होती। वह स्वयं पुरुष की समान पुरुष के ऊपर
होकर प्रसंग करने की इच्छा रखती है। इसप्रकार की इच्छा
बनी रहने से उसके गर्भ नही रहता और प्रसंग से उसकी इच्छा
भी नही भरती। वह अन्य स्त्रियो के साथ भी ऐसा ही करती है।
उसकी संगति से अन्य स्त्रियां भी उसी स्वभाव की होजाती
हैं आपस मे इस प्रकार प्रसंग करती हैं। इस प्रकार नपुंसको
की वृद्धि होती जाती है।