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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२१
अनेक स्त्रियों का तो कहना है कि मासिक धर्म्म की दशा मे भी
पति जी संभोग करते ही हैं।
स्त्रियो मे जो अधिक विषय का दुःस्वभाव पड जाता है वह
पति की मूर्खता मे अथवा कुसंगति से और पूर्व जन्म के बुरे कर्म्मों
के फल से। वरन स्त्रियो की इच्छा सिवाय गर्भाधान के अधिक
विषय की इच्छा से जाग्रत नही होती है।
बहुतेरे पुरुषो को थोड़े से कारण से भी इच्छा होती
है। इच्छा ही नही पता लगाने से सैकड़ा पीछे पन्चानवे पुरुष
ऐसे मिलेगे कि जिन्हें स्त्री का स्पर्श करते ही और गन्दी पुस्तके
पढ़ते ही वीर्य बहने लगता है। मेरे पास पुरुष रोगियो के जितने
पत्र आते हैं अधिक मे ही यह शिकायत लिखी होती है कि स्त्री
का स्पर्श करते ही तथा इश्कवाजी के उपन्यास पढ़ते ही वीर्य
बहने लगता है और रात में स्वप्नदोष हो जाता हैं।
२५ पच्चीस वर्षों मे मेरे पास स्त्रियो की लाखो चिट्ठिया
आईं उनमें रोगी का पूरा हाल लिखा था तथा लिखा होता है
आज तक मैंने लाखो मे दो ही चार चिट्ठिया ऐसी पाईं जिनमे
स्त्रियो मे भी यह शिकायत थी कि गन्दी पुस्तके पढ़ने से रजस्राव
होने लगता है।
स्त्रियो के स्वभाव को बिगाड़ने वाले उनके पति ही होते हैं
पति चाहे जैसा पत्नी को बना सकता है। शास्त्रकारों का भी
यही कहना है कि जिस घरके पुरुष जिस आचरण के होंगे
स्त्रिया और बालक भी वैसे ही होंगे।

' ligature: it's a vertical stroke, then half-m connected to bha.
In L12: "स्तम्भन" -> same ligature.
In L17: look at that word:
'स्' 'त' 'म्भ' 'न' -> wait, does it have 'म्भ'?
Look at the character: 'स' '्' 'त' then... wait, it's 'म्' with a slash? No, it's 'म्' connected to 'भ', but the loop of 'म्' didn't close, so it looks like 'रभ'!
Wait, is it "स्तरभन" or "स्तम्भन"?
Look at the loop: it's open at the top, like an 'र' or an unclosed 'म्'. But look at the bottom: it joins 'भ'.
Wait, in Hindi, does "स्तरभन" exist? No, it's a broken type of "स्तम्भन".
Wait, should we transcribe it as "स्तरभन" or "स्तम्भन"?
Let's look at the instructions: "transcribe the text faithfully". If it's a clear broken type, usually people write "स्तम्भन" or "स्तरभन"?
Wait, look at the letter: 'स्' 'त' 'र' 'भ' 'न'. There is a distinct 'र' followed by a full 'भ'! The 'भ' is a FULL 'भ' with its left loop and everything!
In L9, 'भ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२३
ऐसी औषधियों के बेचने वाले भी खूब प्रशंसा कर औषधियो
का प्रचार करते हैं ऐसी औषधियो के प्रचार से भी स्त्री पुरुषों
की आरोग्यता को बडी भारी हानि पहुंच रही है।
पुरुषों की समझ का उलटा परिणाम
जो नदान्य पुरुष यह समझते हैं कि हमारी स्त्री प्रति दिन
विषय से हम से अत्यन्त प्रसन्न रहेगी और हमे मर्दानगी का
सार्टीफिकेट देगी तथा हमको अधिक चाहेगी वे महामूर्ख हैं
उनकी इस समझ का परिणाम उलटा होता है। यह बात पुरुषो
को ध्यान मे रखना चाहिये कि स्त्री अधिक प्रसग से प्रसन्न नही
होती बल्कि दुखी होती है हालां कि पति के डर से चुप रहती है।
प्रकृति ने स्त्री में कामेच्छा उत्पन्न होना केवल गर्भधारण के समय
तक के लिये बनाया है इसलिये मासिक धर्म होने के बाद
स्नान करने पर अर्थात् ऋतुधर्म से शुद्ध होने पर स्त्री की इच्छा
होती है उस समय रतिक्रिया न हो तो जब तक गर्भधारण का
समय रहता है तब तक ही गर्भवती होने की इच्छा से स्त्री को
पुरुष संग की इच्छा होती है। समय व्यतीत होजाने पर इच्छा
नही रहती ।
जिन स्त्रियों का स्वभाव विषयी पति के अत्याचारो से
विषयी होगया है उनकी बात दूसरी है। स्त्रियां दुष्ट पुरुषों के ही
कारण व्यभिचारिणी होजाती हैं अथवा पूर्व जन्म के पापो के
कारण। वरन स्त्रियो को जैसा समझकर पुरुष अपनी पत्नियो पर

२२४ आनन्द मन्दिर

अत्याचार करते हैं वे उलटी समझ वाले हैं और उसका परिणाम
भी उलटा होता है।
मर्दानगी के बदले नामर्दी का सार्टीफिकेट
जो पुरुष अधिक विषय करके अपनी स्त्री से मर्दानगी का सार्टी-
फिकेट लेना चाहते है वे थोडे ही दिनो मे नामर्द हो जाते हैं
और स्त्री उन्हे नामर्द समझने लगती है इस प्रकार उन मर्दानगी
का सार्टीफिकेट चाहने वालो को नामर्दगी का सार्टीफिकेट
मिलजाता है।
मेरे पास इस विषय की अनेको चिट्ठियां प्रति दिन स्त्रियों
की आया करती हैं और जो मेरे पास स्वयं आती हैं वे बेचारी
बडी दुखी होती हैं, पतियों के इन अत्याचारो और मूर्खता
पर रोती हैं।
बहुमैथुन से हानि
बहुमैथुन सब से अधिक हानि कारक है और इस से
खराबिया पैदा होती है पट्ठो की कमजोरी, दृष्टि दुर्बलता, प्रमेह,
स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, पीठ मे दर्द, दिल मे धड़कन, दिमागी कम-
जोरी, दर्द जिगर, सस्त बदहमी, शरीर का दुर्बल होना, दहशत,
सन्तान का न होना या दुर्बल होना, धातुका पानी सदृश पतला
होना, कुरूपता, चेहरे के ऊपर मुर्दापन, नेत्रो मे अशोभा, और
हर एक काम से जी उकताना, किसी से बात करने को जी न

पति सेवा मे लीन पतिव्रता । पृ० १४० ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२५
चाहना, आँखो से पानी जाना, शिर की पीड़ा, नजला जुकाम,
मूत्राशय की दुर्बलता हृदय की दुर्बलता, और स्मरण शक्ति की
दुर्बलता इत्यादि रोग पैदा होते हैं। किसी ने सत्य कहा है कि
वीर्य ही शक्ति है, शक्ति ही जिन्दगी है, शक्तिही तरुणाई है, शक्ति
की ही कमी बुढ़ापा है और शक्ति का ही नाश मृत्यु है।
बहुमैथुन स्त्री को कम और पुरुष को अधिक हानि पहुँचाता
है क्योकि पुरुष के बहुमैथुन मे स्त्री हिस्सा नहीं लिया करती ।
बहुमैथुन से ऐसे बुरे फल पैदा होते हैं कि जिनसे स्त्री और पुरुष
दोनों की जिन्दगी तबाह हो जाती है। स्त्री पुरुष दोनो बहुमैथुन
से सांसारिक सुखों का उपभोग करके पूरी आयु को पहुँचने के
पहिले ही अल्पायु मे ही ससार से चल देते हैं। यह विषय अधिक
व्याख्या करने का नही है इस कारण इसे यही छोड़ देती हूं।
अब इस स्थान पर आवश्यक प्रतीत होता है कि बहुमैथुन और
उचित मैथुन के हानि लाभ वैद्यकशास्त्र के मतानुसार स्त्री पुरुषों
को सूचित कराये जावे। जिससे मनुष्य उचित सीमा के अन्दर
रह कर बहुमैथुन छोड़ कर अनेक रोगो व कष्टो से बच सके।
वैद्यक चिकित्सा ग्रन्थो मे लिखा है कि सन्तान उत्पन्न करने के
लिये ही प्रसंग करना चाहिये। जब बलवान नीरोग पुरुष के लिये
ऐसी आज्ञा है तो निर्बल और बीमारो के वास्ते दैनिक हस्तक्रिया
या बहुमैथुन करना बहुत ही हानिकारक है। ऐसे मनुष्यों को
क्या कोई भी औषधि लाभदायक होती है ? कदापि नही !
चाहे वह कैसी ही उत्तमोत्तम औषधि खावे तो भी कोई लाभ न
१५

२२६ आनन्द मन्दिर
होगा । हाय वड़ा शोक है ! सामर्थ्य तो ऐसी हो कि विना
सम्भन वटिका खाये मनोरथ पूरा न कर सके परन्तु मैथुन
प्रतिदिन एक वार से अधिक करने से भी वाज न आवे ।
मुझे यह सुनकर वड़ा दुःख होता है कि हमारे देश के मूर्ख
स्त्री पुरुषो में विषय लोलुपता इतनी अधिक वढ़ी हुई है कि शरीर
किसी दीन का न रहने पर भी, शरीर मे शक्ति न रहने पर भी,
अनेक रोगों मे ग्रसित होने पर भी अत्यधिक विषय मे लीन रहते हैं,
प्राय. रोगी स्त्रियां भी वहुधा लिखा करती हैं कि हमारे पति प्रति
दिन प्रसंग एक वार तो किया करते हैं दूसरी वार इच्छा नहीं
होती, कृपा करके कोई उत्तम वलवर्द्धक औषधि मेरी औषधि के
साथ ही पति के लिये भेजिये जिससे यह शिकायत दूर हो ।
प्यारी वहिनो ! यह कैसी भारी मूर्खता है कि तुम पति को
समझाती नही, तुम्हारे शरीर मे प्रदर, रक्त-विकार, कव्ज, भूख
का कम हो जाना, शिर दर्द, कमर की पीड़ा, गर्भाशय की
शिकायते आदि रोग तो मौजूद हैं परन्तु न पति को ही इसका
विचार है न तुम को ही इसका ध्यान है ।
वैद्यकशास्त्र वतलाता है कि योनि रोग वाली स्त्री से पुरुष
भी रोगी होजाता है और रोगी पुरुष से स्त्री रोगी होजाती है ।
यही कारण है कि जो स्त्रियां मेरे पास रोगी आती हैं मै उनके
पति का हाल पूछती हूँ तो पति उससे भी अधिक रोगी पाये
जाते हैं। जितनी स्त्रियाँ रोगी है उनमें से आधी से भी अधिक
पुरुषों के रोगों से रोगी पाई जाती हैं। इसीप्रकार कुछ पुरुष

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२७
भी स्त्री के रोगों के कारण रोगी होते हैं, स्त्री के रोगों की पुरुष
कुछ भी परवाह नहीं करते इसी कारण रोग बढ़ जाते हैं और
'रोगी स्त्री की दशा मरे तुल्य हो होती है।
गतवर्ष मेरे पास एक स्त्री प्रयाग की ही सन्तान के लिये
अपना इजाल कराने आई । उस स्त्री का पति सन्तान के लिये
अपना दूसरा विवाह करना चाहता था। वह मेरे पास आकर बड़ी
दु.खी होकर कहने लगी—यदि मेरें पति ने दूसरा विवाह कर
लिया तो मुझे बड़ा दु ख होगा। मैंने उसके रोग की दशा देखी
तो उसे सोमरोग (वहुमूत्र) था और रोग वहुत पुराना था। मैंने
उससे कहा—तुम्हारा रोग तो मै दूर कर दूंगी, तुम सन्तान
उत्पन्न करने के लायक हो जाओगी परन्तु यह रोग ऐसा है कि
तुम्हारे पति को भी तुम्हारे रोग के कारण प्रमेह मौजूद होगा,
यदि मेरी यह वात ठीक हो तो उनका भी इलाज किसी से कराना।
मैंने उस स्त्री को एक फार्म दिया कि तुम अपने पति से भराकर
लाओ। वह दूसरे दिन भराकर लाई तो उस फार्म से मालूम हुआ
कि उसके पति को भी बड़े जोर का असाध्य प्रमेह मौजूद
है। दोनो की यह दशा देखकर मैंने उससे कहा कि तुम्हारे पति
अपना दूसरा विवाह करके क्या करेगे, वे भी तो रोगी हैं। यदि
उन्होने अपना इलाज न किया तो कुछ दिनों में वे विवाह के
योग्य ही न रहेगे इसलिये तुम अपना इलाज तो कराओगी ही
अपने पति को भी किसी अच्छे वैद्य के पास भेजो। इस वात को
सुनकर उसके पति ने भी अपना इलाज शुरू किया। कई विद्वान

२३८
आनन्द मन्दिर
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वैद्यों से उसने सलाह ली उन सबने उसे रोगी बतलाया और कहा
कि तुम अपनी स्त्री से बच कर रहना नही तो तुम्हें भी कुछ दिनो
में बहुमूत्र रोग हो जावेगा। उसके पति ने स्त्री का इलाज तो कराया
नही, उसे मा के यहा भेज दिया। अपना इलाज कराता रहा, कुछ
आराम मालूम हुआ तभी उसने स्त्री को बुला लिया, बस कुपथ्य
होने लगा। कुछ दिनों में पति को भी बहुमूत्र होगया और दिन
दिन दशा बहुत ही खराब होती गई। इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण
मौजूद हैं। गर्मी, सुजाक, प्रमेह आदि जो पुरुष को होते हैं उसकी
स्त्री को अवश्य होते हैं। इस प्रकार की रोगी स्त्रियां तो प्रायः सदा
मेरे पास आया करती हैं जिनके पति से ही स्त्री को रोग मिला
है, सौ में पचीस ऐसी होती हैं कि जिनको अपने ही कारणों से
रोग हुआ है।
मासिकधर्म के दिनों मे असावधानी, कुपथ्य से, बालक
उत्पन्न होने के समय असावधानी से, और ऊ चा नीचा पैर पड़ने
अथवा भारी बोझ उठाने आदि कारणो से जो रोग होते हैं वे
स्त्री के ही कारण उसके शरीर मे उत्पन्न होते हैं।
जो पुरुष काम-वासनाओं मे फसे हुए हैं वे नियमों का
पालन नही कर सकते और जो लोग नियमानुसार जीवन व्यतीत
करते हैं, जिनका सिद्धान्त है कि “जीने के लिये खाओ न कि
खाने के लिये जीओ” जो व्यायाम करते हैं, स्वास्थ्य सम्बन्धी
नियमो का पालन करते हैं, जिन्हें शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान
होता है, वे प्रायःविषय भी नियमानुसार करते हैं। जो दुर्बल होते

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२६
[अलंकारिक रेखा]

हैं, कोई काम नियमानुसार नही करते और स्वास्थ्य जिनकी दृष्टि
में कुछ नहीं है, आहार, वस्त्र, नियमित व्यायाम, इत्यादि का
जिन्हें बिलकुल ख्याल नहीं है, जो हमेशा बहुमैथुन किया करते हैं।
उनकी खराबी का क्या पूछना, वे अपना नाश कर लेते हैं। जिनके
वास्ते कोई नियम नहीं हैं जैसे राजाओ नवावो आदि का कोई
दिन खाली ही नहीं जाता है, मगर उनका ध्यान इसी तरफ होता
है और वे हजारो रुपये बल लाभ करने के लिये खर्च भी करते
हैं। फिर भी उनकी शारीरिक दशा खराब ही रहा करती है।

जो पुरुष मैथुन का कुछ भी नियम न समझ कर अज्ञानता
वश अधिक विषय मे लवलीन रहते है उनका बल प्रति दिन
घटता जाता है परन्तु वे वीर्य को बढाने और पुष्ट करने वाले
पदार्थों का सेवन नही करते अथवा कम करते हैं इस प्रकार
वीर्य का खर्च तो अधिक करते हैं परन्तु इसके बढाने का कोई
उपाय नहीं करते । इस प्रकार वीर्य के क्षीण होने से वे कुछ दिनों
में शक्तिहीन होकर नपुसक होजाते हैं उनकी इन्द्रियां शिथिल
हो जाती है वे किसी कामके नही रहते ।

लिंगवृद्धिकरान्योगान् सेवते यः प्रमादतः ।
महता मेढ्रयोगेन चतुर्थी क्लीवतां व्रजेत् ॥

इसका अर्थ यह है कि जो अज्ञानी पुरुष मूर्खतावश नियम
के विरुद्ध और प्रकृति के विरुद्ध अपनी इन्द्री को बढ़ाने के लिये
औषधियों को काम में लाते हैं वे अज्ञानी पुरुष अपने हाथों

६

२३० आनन्द मन्दिर
अपना सत्यानाश करते हैं ओषधियो के प्रभाव से उनकी इन्द्री
में कुछ सूजन सी आजाती है वे उसीको बढ़ा हुआ समझते हैं
फिर पीछे वे नपुसक होजाते हैं उनकी नसो को बड़ी हानि
पहुंचती है।
हस्त क्रिया से हानि
हस्त क्रिया करने वाले के शरीर का रग पीला, दुबला,
कमजोर हो जाता है आखे अन्दर धस जाती हैं, पुतलिया फैल
जाती हैं, ये सव फल अवश्य मिल जाते हैं। ऐसे पुरुष दूसरे
मनुष्य के साथ आंख तक नही मिला सकते। लज्जायमान
और एकान्त प्रिय हो जाते हैं। अगर कोई बालक अच्छी
स्मरण शक्ति रखता हो और पश्चात् भूलने का रोग हो जाय
तो इसी से जान लो कि वह नियम विरुद्ध विषय मे फस
गया। फिर यह भी ध्यान मे रखना कि इसी कुचाल से नवयुवक
बुद्धे, चेहरा पीला, सुस्त, मूर्ख, नामर्द, कमर झुकी हुई, अधरंग
और मन्दाग्नि वाले हो जाते हैं।
ऐसे पुरुष को स्वप्नदोष, शिर तथा कमर मे दर्द, दृष्टि व
स्मरण शक्ति की दुर्बलता, आत्मिक शारीरिक और मानसिक
दुर्बलता बुरे, डरावने स्वप्नो का आना, दिमागी चक्कर आदि
रोग हो जाते हैं, किसी को गठिया हो जाता है, कितनो को
आमाशय और छाती का दर्द पैदा हो जाता है, वीर्य स्वयं
बहने लगता है, इन्द्री निकम्मी हो जाती है, शीघ्र पतन आदि
से पुरुष अन्त में पूरा २ नपुसक ( नामर्द ) बन जाता है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३१


बहुत सी खराबियों के सिवाय यह एक बहुत बडी खराबी
है कि मनुष्य स्त्री संभोग के योग्य नही रहता और किसी किसी
को चैतन्यता भी नहीं होती अथवा हुई भी तो अपूर्ण होती है,
या होकर शीघ्रही मिट जाती है । चैतन्यता होते ही या स्त्री के
आलिंगनादि करने मे ही या केवल मानसिक विचारों के उत्पन्न
होते ही धातु निकलनी प्रारम्भ हो जाती है ।

क्षयरोग (तपेदिक) के एक हजार रोगियो में प्राय अधिक
हिस्सा रोग का कारण बहुमैथुन ही है उससे कुछ कम हस्तक्रिया
वाले और कुछ रोगियों का स्वप्नदोष व शुक्र पतन है, अन्य और
कारणों से रोगी होते हैं । पागलो में अधिक हिस्सा केवल हस्त-
क्रिया करने वालो का समझो । यह अनुसन्धान से डाक्टरो ने
पता लगाया है ।

मेरे पास भी जितनी स्त्रियां आती हैं और अपने पतियों के
रोग का हाल कहती हैं तो उनसे यही अनुभव होता है कि स्त्री
पुरुषो के रोगों का विशेष कारण बहुधा हस्तक्रिया, बहुमैथुन,
तथा अन्य प्रकार से वीर्यनाश गरमी सुजाक आदि ही है ।

क्षयरोग का विशेष कारण

२५ पच्चीस वर्षों मे मेरे पास जितनी क्षय रोग से ग्रसित
स्त्रियां आईं सबको देखने और उनकी जेवानी रोग की उत्पत्ति
का कारण सुनने से अधिक विषय ही निश्चय हुआ क्योकि ज्वर
की हरारत और खांसी आदि हर समय रहने पर भी मूर्ख पुरुष

१३२ आनन्द मन्दिर
स्त्री का पीछा नहीं छोड़ते, विषय करते ही जाते हैं। इस प्रकार
बेचारी निरपराध स्त्रिया कुसमय मे ही मूर्ख पतियों की कामाग्नि
की शान्ति में भस्म होजाती हैं अर्थात् जीवन लीला समाप्त
कर जाती हैं।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक सुश्रुत आदिको मे अधिक
मैथुन के विषय मे लिखा है,—
श्रमक्लमोरुदौर्बल्यबल धात्विंद्रियक्षयः ।
अपर्वमरणं च स्यादन्यथा गच्छतः स्त्रियम् ॥
अर्थ यह है कि जो नियम के विरुद्ध अधिक स्त्री प्रसग करते
हैं उन्हे श्रम, क्लान्ति, हृदय की कमजोरी, धातुक्षय, इन्द्रिय क्षय
और अकालमृत्यु आदि रोग उत्पन्न होजाते हैं ।
अधिक वीर्यक्षय से पुरुष को जो जो रोग उत्पन्न होते हैं
उनका पूरा वर्णन इसी पुस्तक मे दूसरी जगह मिलेगा इसलिये
इन सब खराबियो को समझ कर इन बुराइयो से सदैव बचना
चाहिये ।

आनन्द
मन्दिर
आठवां अध्याय
—:०:—

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३५
अधिक विषय का मुख्य कारण
पुरुषो की इस अज्ञानता भूल या मूर्खता का मुख्य कारण
यह है कि इस विषय का कोई उत्तम ग्रन्थ आजतक नहीं वना ।
किसी सज्जन विद्वान ने इस विषय के ग्रन्थ की कोई आवश्यकता
नहीं समझी क्योकि यह विषय विना शिक्षा के ही पशु पछी तक
जानते हैं इस विषय की शिक्षा प्रकृति से ही मिलजाती है।
यही समझ कर आजतक किसी का ध्यान इस ओर आकर्षित
नही हुआ । यद्यपि गर्भाधान क्रिया के नियम वताने वाले अनेक
ग्रन्थ वड़े वड़े विद्वानो के वनाये हुये मौजूद है परन्तु उनमें
केवल गर्भाधान विधि ही है रतिक्रिया का नियम विस्तार पूर्वक
नही समझाया गया इस कारण उन पुस्तको का प्रचार भी
नहुत कम है और केवल गर्भाधान विषय के लिये लोगो की
रुचि भी ऐसी पुस्तको की ओर कम रहती है।
ऐसी पुस्तको की अत्यन्त आवश्यकता है जिनसे विवाह
होते ही नव विवाहित वडे लड़के लड़कियो को उचित प्रसग के
गुण और अधिक नियम विरुद्ध प्रसग के अवगुण तथा उससे
होने वाले रोगो की उत्पति तथा रोगो से कष्ट और शरीर की
हानि इत्यादि विषय भली भांति समझाये जावे। फिर कोई कारण
नहीं है कि इसका प्रभाव उनके कोमल हृदयो पर न पड़े और
वे उन हानिकारक परिणामो से न बचे क्योकि मुझे इस बात
का पूरा अनुभव है। मेरे पास वीसो चिट्ठिया ऐसे नवयुवक रोगी

१३६ आनन्द मन्दिर
पुरुषों की आया करती हैं। वे लिखते हैं मुझे स्त्री प्रसंग की
अधिकता के इन भयंकर परिणामो का पता न था। आपकी बनाई
दाम्पत्य जीवन शास्त्र से मुझे इस दुर्ब्यसन के भयंकर परिणाम
मालूम हुए। इसके कारण मेरी स्त्री भी रोगों का घर बनगई है
और मैं भी अब अपनी जिन्दगी से आरी आगया हूं।
इस प्रकार की एक दो नही, सौ दो सौ नहीं मेरे पास पचीस
वर्षों में युवक पुरुष रोगियो के लाखो पत्र आचुके हैं और
प्रतिदिन बराबर अनेक पत्र आया करते हैं। इसी कारण इस
पुस्तक के प्रकाशित करने की आवश्यकता समझी गई।
आजकल इसके विरुद्ध अनेक पुस्तकें कामशास्त्र कोकशास्त्र
इत्यादि अनेक नामो से प्रकाशित होरही हैं जिनमे मनगढ़ंत इतनी
अनर्थक बाते भरदी गई हैं कि जिनके पढ़ने से स्त्री पुरुषों को
उनकी परीक्षा की उत्कण्ठा होती है और वे बाते महा हानिकारक हैं।
उनमे उनकी हानि को छिपाकर लाभ दिखाया गया है और बीच
बीच मे कही कही धर्म की दुहाई भी दी गई है जिससे सभी
पुरुषों को अरुचि न हो। उपाय ऐसे हानिकारक बतलाये गये
हैं कि जिनको पढ़ सुनकर उन उपायों पर चलने वाले महा
भयंकर रोगों में फंस जाते हैं।
कामशास्त्र का नाम लेकर ऐसे मनगढंत आसनो का प्रयोग
बतलाया गया है कि उसके पढ़नेवाले मूर्ख विषयी पुरुष उस
विधि से रतिक्रिया कर स्त्रियों को वन्ध्या बनादेते हैं उनके
गर्भाशय मे ऐसी खराबियां उत्पन्न होजाती हैं कि गर्भ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३७
नहीं रहता यदि रहा तो गर्भपात व गर्भस्राव होजाता है। ऐसी
स्त्रियां मेरे पास अबतक बीसो हजार आचुकी हैं उनकी जबानी
उन कोकशास्त्र कामशास्त्र नामक अनेक पुस्तको का हानिकारक
परिणाम मालूम हुआ । अनेक स्त्रियो ने मुझसे कहा कि
हमारे पति ने कई जगह से पुस्तके मंगाईं उनमे लिखी विधि
से उलटी सुलटी रीति से सभोग किया तबसे गर्भाशय और पेडू
में पीडा होती है और भी अनेक शिकायतें होगईं हैं। किसी का
गर्भाशय टेढ़ा देखा गया, किसी का गर्भाशय सूजा हुआ पाया
गया, किसी का भीतर को धसा हुआ देखा गया, किसी का
गर्भाशय वाहर निकला हुआ मिला। इसी प्रकार के अनेक रोग
गर्भाशय सम्बन्धी देखे गये और देखे जाते हैं इन सबका विशेष
कारण अनियम रतिक्रिया है। लोग ऐसी पुस्तको को पढकर
विषय वासना की कामाग्नि वुझाने के लिये उसका बुरा परिणाम
न विचार कर स्त्रियो पर अत्याचार करते हैं। अधिक आनन्द
पाने की जगह कुछ रोज मे कष्ट भोगने लगते हैं और अपनी
प्यारी निरपराध स्त्रियो को भी रोगी बनादेते हैं। इसीलिए ऐसी
पुस्तके हर एक के लिए सदैव हानिकारक ही हैं, लाभकारी नही,
उन्हे न पढ़ना चाहिए।
अज्ञानी अपढ़ ही नही यह दशा अच्छे अच्छे पढ़े लिखे
सभ्य समाज के पुरुषो की भी है। अनेक डाक्टरों अन्य चिकि-
त्सको की स्त्रियां भी इस दुर्व्यसन के कारण रोगी हो मेरे पास
आईं और आरही हैं।

३३८ आनन्द मन्दिर
शारीरिक और मानसिक निर्बलता
की अधिकता
वीर्य की निर्बलता व वीर्य क्षीणता के कारण कमजोरी
आजकल एक जगत व्यापी रोग है इसका कारण यह है कि
नियम के विरुद्ध व बहुमैथुन आदि अत्याचार भी जगत व्यापी
हो रहे हैं। समस्त देश मे यह रोग फैला हुआ है, यह पापो में
सबसे बड़ा भारी पाप है और बुराइयो मे सबसे बड़ी बुराई है
किसी ने इस तरह बीमारी और असभ्यता नहीं फैलाई
जितनी इस दुष्ट आदत ने फैलगई है।
नियम विरुद्ध विषय करना स्त्री पुरुष का सबसे बढ़कर जबर्दस्त
शत्रु ( कुल्हाड़ा ) है जिसे मनुष्य अपने ही हाथों से अपने पाओं
पर मारते हैं, जिस किसी को जीते जी मुर्दा बनना हो, सुन्दरता,
लावण्यता, और आरोग्यता को अपने भीतर से दूर करना हो
और रोगी, कुरूप, सुस्त, तथा नपुंसक बनना हो उन्ही का यह
मित्र है। अपने हाथो से आप ही स्वयं सत्यानाश करने की
मिसाल इस पर ठीक आती है। स्पष्ट कहना यह है कि अपनी ही
गर्दन अपने हाथ की छुरी से काटनी है। इससे पठ्ठो की
कमजोरी, क्षयरोग, मिरगी ( अपस्मार ) अधरंग, मूर्छा,
उन्माद, पागलपन, आदि दुष्ट रोग आकर उस मनुष्य का
प्राणान्त करते हैं। आखो की कमजोरी, धातु का जाना, स्वप्नदोष
शीघ्रपतन, दर्द कमर, दिल की धड़कन, दिल व दिमाग आदि