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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

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पृष्ठ 356

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२५
चाहना, आँखो से पानी जाना, शिर की पीड़ा, नजला जुकाम,
मूत्राशय की दुर्बलता हृदय की दुर्बलता, और स्मरण शक्ति की
दुर्बलता इत्यादि रोग पैदा होते हैं। किसी ने सत्य कहा है कि
वीर्य ही शक्ति है, शक्ति ही जिन्दगी है, शक्तिही तरुणाई है, शक्ति
की ही कमी बुढ़ापा है और शक्ति का ही नाश मृत्यु है।
बहुमैथुन स्त्री को कम और पुरुष को अधिक हानि पहुँचाता
है क्योकि पुरुष के बहुमैथुन मे स्त्री हिस्सा नहीं लिया करती ।
बहुमैथुन से ऐसे बुरे फल पैदा होते हैं कि जिनसे स्त्री और पुरुष
दोनों की जिन्दगी तबाह हो जाती है। स्त्री पुरुष दोनो बहुमैथुन
से सांसारिक सुखों का उपभोग करके पूरी आयु को पहुँचने के
पहिले ही अल्पायु मे ही ससार से चल देते हैं। यह विषय अधिक
व्याख्या करने का नही है इस कारण इसे यही छोड़ देती हूं।
अब इस स्थान पर आवश्यक प्रतीत होता है कि बहुमैथुन और
उचित मैथुन के हानि लाभ वैद्यकशास्त्र के मतानुसार स्त्री पुरुषों
को सूचित कराये जावे। जिससे मनुष्य उचित सीमा के अन्दर
रह कर बहुमैथुन छोड़ कर अनेक रोगो व कष्टो से बच सके।
वैद्यक चिकित्सा ग्रन्थो मे लिखा है कि सन्तान उत्पन्न करने के
लिये ही प्रसंग करना चाहिये। जब बलवान नीरोग पुरुष के लिये
ऐसी आज्ञा है तो निर्बल और बीमारो के वास्ते दैनिक हस्तक्रिया
या बहुमैथुन करना बहुत ही हानिकारक है। ऐसे मनुष्यों को
क्या कोई भी औषधि लाभदायक होती है ? कदापि नही !
चाहे वह कैसी ही उत्तमोत्तम औषधि खावे तो भी कोई लाभ न
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