विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 704 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० आनन्द मन्दिर
अपना सत्यानाश करते हैं ओषधियो के प्रभाव से उनकी इन्द्री
में कुछ सूजन सी आजाती है वे उसीको बढ़ा हुआ समझते हैं
फिर पीछे वे नपुसक होजाते हैं उनकी नसो को बड़ी हानि
पहुंचती है।
हस्त क्रिया से हानि
हस्त क्रिया करने वाले के शरीर का रग पीला, दुबला,
कमजोर हो जाता है आखे अन्दर धस जाती हैं, पुतलिया फैल
जाती हैं, ये सव फल अवश्य मिल जाते हैं। ऐसे पुरुष दूसरे
मनुष्य के साथ आंख तक नही मिला सकते। लज्जायमान
और एकान्त प्रिय हो जाते हैं। अगर कोई बालक अच्छी
स्मरण शक्ति रखता हो और पश्चात् भूलने का रोग हो जाय
तो इसी से जान लो कि वह नियम विरुद्ध विषय मे फस
गया। फिर यह भी ध्यान मे रखना कि इसी कुचाल से नवयुवक
बुद्धे, चेहरा पीला, सुस्त, मूर्ख, नामर्द, कमर झुकी हुई, अधरंग
और मन्दाग्नि वाले हो जाते हैं।
ऐसे पुरुष को स्वप्नदोष, शिर तथा कमर मे दर्द, दृष्टि व
स्मरण शक्ति की दुर्बलता, आत्मिक शारीरिक और मानसिक
दुर्बलता बुरे, डरावने स्वप्नो का आना, दिमागी चक्कर आदि
रोग हो जाते हैं, किसी को गठिया हो जाता है, कितनो को
आमाशय और छाती का दर्द पैदा हो जाता है, वीर्य स्वयं
बहने लगता है, इन्द्री निकम्मी हो जाती है, शीघ्र पतन आदि
से पुरुष अन्त में पूरा २ नपुसक ( नामर्द ) बन जाता है।