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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

और चिपचिपा रहता है, इसमे जठराग्नि मन्द होकर पाचन शक्ति
घटने से भूख कम हो जाती है, थोडा भी अधिक भोजन करने
से अजीर्ण हो जाता है ( ऐसी बीसों चिट्ठियां प्रतिदिन
मेरे पास आया करती हैं) इसी कारण से कोष्ठ भी परिष्कृत
नही होता और प्रदर मे शूल होने लगती है। इसके निवारण
के लिये किसी तीक्ष्ण पाचक अथवा विरेचन (दस्तावर) औषधि
के सेवन मे यद्यपि एक दो दिन के लिये कष्ट दूर हो जाता है
परन्तु इससे कोष्ठ परिष्कृत होने के बदले और भी कोष्ठबद्ध होने
लगता है और थोड़ी ही अवस्था मे बूढो की भाति मुंह पर झांई,
खाल का लटक जाना तथा झुर्रियां पडने लगती हैं, स्वर
भी बिगड़ जाता है। अर्थात सब तरह से जवानी मे ही बुढ़ापा
आघेरता है।
बहुतेरे पुरुष उपरोक्त शारीरिक अवनति को अनान्य कारणों
से होना समझ कर चिकित्सा करवाते हैं और जब किसी प्रकार
की चिकित्सा से लाभ नही होता तो निराश होकर मृत्यु के दिन
गिनने लगते हैं।
उन्हें यह ससार दु खमय विदित

२०६ आनन्द मन्दिर
जिसके कारण उनकी औषधि कुछ भी फायदा नही करती इसी
कारण से रोग के मूल कारण को न जानकर उपस्थित उपद्रव
के प्रतिकार करने की चेष्टा करते हैं; परन्तु उससे क्या हो
सकता है, जब तक कारण का नाश न हो, कार्य का नाश होना
असम्भव है। रोगी और भी हताश हो जाता है। इसी कारण मैं
सबके समझने के लिये और सावधान करने के लिये इस विषय
को यहां विस्तार से लिखती हूँ।
यदि वैद्य रोगी से इस अवस्था का कारण पूछता है तो रोगी
लज्जित हो अपनी मूर्खता से लम्पटता की कथा न कहकर अत्यन्त
दुःख और दीनता प्रकट करते है तथा प्रत्यक्ष भी कहते हैं कि इस
“जिन्दगी से मर जाना ही अच्छा है”।
बुरे कर्मों से पुरुषेन्द्री की खराबियां
अण्डकोष लटक जाते हैं, कभी कभी उनमे पीड़ा होती है,
इन्द्री मे सुरसुराहट प्रतीत होती है, उत्तेजना कम, वीर्यपात
जल्दी, बिना आनन्द स्वप्नदोष, २१ प्रकार के प्रमेह, नामर्दी होती
है, रुचि बिलकुल नही होती, यदि कुछ होती भी है

' or 'खु'?
Wait, look at "सूखा": 'सू' 'खा' ','
Next word:
First letter: 'कु' or 'खु' or 'सु'?
It has a loop at bottom left: 'कु' or 'कृ'? "कृशता"? No.
Wait, look at: 'सु' 'क' 'ड़' 'ना'?
Wait, look at line 16:
"झड़ते हैं। सूखा, सुकड़ना, आंखों का धंसना, उन्माद और"
Wait, look at the letter after "सूखा,":
It has: 'कु' or 'सु' or 'धु'?
Wait, could it be "खुजली"?
Wait, let's look at:
"सूखा" (emaciation / rickets)
Then: "____, आंखों का धंसना, उन्माद और"
Wait, could it be "कमजोरी"?
Let's look at the letters:
1: looks like 'कु' or 'सु'
2: looks like 'क' or 'प' or 'च'
3: 'ना'
Wait, could it be "सुपना"? (सपना / स्वप्नदोष)?
Wait, could it be "कांपना"?
LOOK AT IT:
'कां' 'प' 'ना' (KAMPANA - trembling)!
Look at the first letter: 'कां' (ka with dot and aa matra)!
Wait, does it have an 'aa'

।
"त्याग न सका निदान": 'त्या', 'ग', space, 'न', space, 'स', 'का', space, 'नि', 'दा', 'न'.

Let's check line 5:
पागलखाने भेजा गया और वही मरगया ।
Wait, "वही" or "वहीं"?
No dot above 'ही'. It's "वही".
"मरगया": 'म', 'र', 'ग', 'या' (one word, or "मर गया"?).
It is printed together: "मरगया" !
Then a space and a danda: "।"

Now Heading:
सस्तिष्क की खराबियां
Wait, let's re-verify every letter of the heading:

  1. First word:
    "सस्तिष्क"
    Let's check letter 3: 'ष्क'.
    Is it 'ष्क' or 'स्फ' or 'स्क'?
    It is 'ष्' with 'क' below: 'ष्क'.
    Letter 2: 'स्' + 'ति' = 'स्ति'.
    Letter 1: 'स'.
    So: "सस्तिष्क".
  2. Second word: "की".
  3. Third word:
    Look at the characters:
  • 'ख'
  • 'रा'
  • 'वि' or 'बि'?
    Wait, let's look at the belly of this letter:
    It is a circle. Does it have a slash?
    Wait, in this font, does 'ब

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०६

जाय तो एक भारी ग्रंथ बनेगा और हर एक पढ़ने वाला एक
एक पत्र को पढ़ कर हैरान हो जायगा। एक नवयुवक की स्त्री मेरे
पास आई और उसने अपने पति का हाल मुझ से कहा । उसके
पति का रोगी फार्म देखकर मुझे मालूम हुआ कि वह २०
कदम भी न चल सकता था, चलने में श्वांस चढ़ने लगती थी
उसकी दुर्बलता इतनी बढ़ी हुई थी कि उसका जीना आश्चर्य
मालूम होता था। उसने बताया कि आठ वर्ष की आयु में विवाह
हुआ। १९ वर्ष की आयु में पक्षाघात हुआ। २२ साल की आयु में
‘फिर अधरंग ( पक्षाघात ) का आक्रमण हुआ। २६ साल में फिर
दौरा हुआ, पश्चात पेचिस आरम्भ हुई। २९ साल की आयु में
दिलकी धड़कन प्रारम्भ हुई और इस वक्त उसको श्वासरोग,
कलेजे की वृद्धि, मन्दाग्नि, पेट में भारीपन और दर्द जिगर, दर्द
कमर, गुर्दों की पिछली तरफ दर्द, पिंडलियों में दर्द, पेट में दर्द,
याद्दाश्त कमजोर, दुर्बलता इत्यादि रोग हैं।

आज कल ऐसा समय आगया है कि सैकड़ा पीछे ९० इसी
बुरी आदत के शिकार हैं, फिर क्यों न प्रत्येक व्यक्ति धातु पुष्टि
की औषधियां ढूंढ़ता फिरे। पुरुषों की इस प्रकार दुर्दशा के ही
कारण विज्ञापन बाजों की बन आई है। आजकल जिसे देखिए
वही नया औषधालय खोल कर धातु पुष्टि की दवाओं के नोटिस
देने लगते हैं और भोली भाली जनता को लूटते हैं। ऐसे नोटिस-
बाजों से जिन्हें वैद्यक का कुछ भी ज्ञान नहीं है, कभी कभी
बड़ा नुक्सान होता है।

१४

३१० आनन्द मन्दिर
बहु मैथुन
हमारे शास्त्रो मे लिखा है कि तरुण पुरुष और स्त्री का जब
विवाह हो और स्त्री रजोधर्म से शुद्ध हो तो पुरुष केवल एक
वार गर्भाधान करे और गर्भस्थित होने के पश्चात जब तक बालक
उत्पन्न होकर माता का दूध पीना न छोडे तब तक दोनो प्रसग
करने से बचे रहे। इस विधि से मानो ढाई वर्ष मे एक वार नौवत
पहुँचती है। खैर यह तो हुई धर्म्मशास्त्र की आज्ञा। मुझे अपने
पाठको को यह कर्णगोचर कराना है कि कितने दिनो के पीछे
गर्भाधान किया जाय जिसमे स्वास्थ्य मे कोई फर्क न पड़े। उपरोक्त
नियम बहुत उत्तम है परन्तु मनुष्यो की दशा आज कल बहुत
गिरी हुई है।
बहु मैथुन का परिणाम
बहु मैथुन इस प्रकार बढ़ा हुआ है कि जिसका वर्णन करना
असम्भव है। एक समय मैने एक पुरुष रोगी के पत्र को पढ़ कर
आश्चर्य किया उस पत्र मे लिखा था कि विवाह होते ही सात आठ
साल तक मैं लगातार २ से ६ बार तक प्रति दिन प्रसंग करता रहा।
इस दुष्कर्म ने भारतवासियों का सत्यानाश कर दिया है।
स्त्री के मासिक रजोधर्म के दिनो मे या बीमारी, प्रसूत के दिनो मे
भी अज्ञानी मूर्ख लोग स्त्री को चैन नही लेने देते, मुह काला
करते हैं और प्राय. रजस्वला की भी परवाह नही करते।
इसका भी सोच नही करते हैं कि इतने अधिक प्रसंग से महा

[विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २११]


व्याधी खड़ी होगी। वे स्त्रियो को रोगी बना देते हैं। धिक्कार है ऐसे
मनुष्यत्व को, पशु पक्षी भी उचित समय पर रति सुख लेते हैं।
शोक है कितनेही विवाहित जोडे है जिनका, स्वास्थ्य भोग के
नियमो की अज्ञानता से वरवाद हो चुका है विना कुछ भी सोचे
विचारे वे अपनी मूर्खता और अज्ञानता से अपनी रुचियों की
बागडोर ढीली छोड़ देते हैं और पागलपन से दुख तथा शोक
की ओर दौड़े जाते हैं।
कोई कोई घमंडी लोग इस मूर्खता के कारण बहुमैथुन
करते हैं कि कही स्त्री यह न खयाल करे कि इसमें वल नहीं है।
वे मूर्ख यह नहीं जानते कि जब बहुमैथुन के कारण हम वेकाम
हो जावेंगे तो उस समय बिलकुल ही इच्छा पूरी न कर सकेंगे !
फिर क्या होगा !! यह लिखना जरूरी है कि स्त्री बहुमैथुन से
कभी प्रसन्न नहीं होती है, किन्तु बहुमैथुन से वह घृणा करती
है। नियम पूर्वक गर्भाधान होना ही स्त्री के लिये प्रसन्नता और
आनन्द की बात है और इसी मे अत्यन्त खुशी है। रोजाना
कोई स्त्री स्खलित होती ही नहीं, अगर हो तो थोडे काल मे
ही मुरदा होजाती है। इस विषय को विस्तार पूर्वक यहां लिखने
की आवश्यकता नहीं है। दोनो ही स्त्री पुरुष क्षय व राजदमा के
रोगी होजाते हैं। शरीर का सार वीर्य है। रुधिर की सौ बूदों के
समान वीर्य की एक बूद होती है यह बूद एक अनमोल मोती है
इससे शरीर उत्पन्न होता है इसको वरवाद करना अत्यन्त
मूर्खता का काम है।

२१२ आनन्द मन्दिर
इससे रोगी की कमजोरी बराबर होते रहने से स्वास्थ्य को
हानि पहुचने वाले फल पैदा होते है । मैथुन का प्रभाव अवश्य
पट्ठो द्वारा दिमाग तक पहुँचता है और दुर्बल व्यक्ति प्राय
इस आघात से मर भी जाते है । खरगोश स्खलित होने के
पश्चात एक तरफ को गिर पडता है । मैथुन से बल नष्ट होता
है और पट्ठो को आघात पहुचता है। बहु मैथुन से शारीरिक और
आत्मिक बल ओज निकल जाते है इससे आप समझ सकते हैं
कि बहु मैथुन से कैसी हानि होती है, जीवन दायक रत्न का अधि-
कता से निकलते रहना ओर प्रसंग से पैदा हुये पट्ठो की कमजोरी
शरीर का नाश करने वाली है । प्राय सयम से रहने वाले स्त्री
पुरुष भी विवाह होते ही दैनिक मैथुन आरम्भ कर देते हैं और
उस समय तक करते हैं जब तक बीमारी उन्हे विवश नही
कर देती है । वे इलाज करवाते है । वैद्य उनके साधारण रोग का
इलाज करता है बहुमैथुन के विषय मे एक प्रश्न भी नहीं
पूछता और न रोकने के लिये सूचना देता है, रोग प्रतिदिन
बढ़ता ही जाता है । मन्दाग्नि पट्ठो की दुर्बलता, इत्यादि रोग
आराम नही होते है । यदि रोगी किसी ऐसे डाक्टर के पास
जावे जो उसको बता दे कि यह समस्त रोग बहुमैथुन के द्वारा
होगये है तो वह विस्मित होता है । मजबूत आदमी को पहले
पहल बडी भारी खराबी नही होती इस लिये वे समझते हैं कि
इसमे कोई हानि न होगी परन्तु शीघ्र नही तो कुछ दिनो मे
उसको इसका फल जरूर भुगतना पडता है ।

B. K. Mitra
दुग्ध पान आदि । पृ० १२७ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१३

संभोग के लिये अयोग्य पुरुष
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्वान्सव्यथाङ्गः पिपासितः ।
बालो वृद्धोन्यरोगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ॥
जिसने अत्यन्त भोजन किया हो, धैर्य रहित, भूखा, जिसके
शरीर मे किसी प्रकार का रोग हो प्यासा हो, बालक, बुड्ढा
या रोगी हो ऐसे पुरुष को मैथुन कदापि नही करना चाहिये ।
इसी सम्बन्ध मे दूसरे ऋषि की राय है —
क्षुधितः क्षुब्धचित्तश्च मध्यान्हे तृषितोऽबलः ।
स्थितश्च हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ॥
व्याधितस्यरुजा प्लीहा मूर्छा मृत्युश्च जायते ॥
अर्थात्—जो पुरुष भूखा, क्षोभित चित्त वाला, प्यासा,
बलहीन अर्थात् निर्बल दुर्बल हो उसे तथा मध्यान्ह के समय,
संभोग नही करना चाहिये । यदि करे तो शुक्र की हानि अर्थात्
वीर्य नाश हो, वायु का कोप हो और रोग बढ़े तथा रोग में
कष्ट बढ़े, पीडा अधिक हो । तापतिल्ली तथा मूर्छा रोग हो और
( मृत्युश्च जायते ) मृत्यु भी हो ।
इससे पाठक समझ सकते हैं कि नियम विरुद्ध रतिक्रिया
करने से स्त्री पुरुष दोनो को कितनी हानि पहुँचती है और
सन्तान रोगी निर्बल होती है। महर्षियो के बताए हुए इन नियमों

११४ आनन्द मन्दिर
पर न चलने से ही सैकडा पीछे निन्नानवे पुरुषो मे एक न एक
थोड़ा या बहुत रोग अवश्य होता है ।
आवश्यक सूचना
शास्त्रकारो ने वतलाया है कि विवाह के समय स्त्री की
अवस्था से पुरुष की अवस्था ड्योढी होनी चाहिये इसका उद्देश्य
यह है कि पुरुष की अवस्था अधिक और स्त्री की कम होने से
संभोग मे पुरुष की शक्ति क्षीण नही होती । पुरुष की शक्ति को
पुरुष से कम अवस्था वाली स्त्री खींच नही सकती । यदि स्त्री की
अवस्था पुरुष से अधिक हो तो अधिक अवस्था वाली स्त्री रति-
क्रिया के समय पुरुष की शक्ति को खीच लेती है इसका परिणाम
यह होता है कि पुरुष थोडे ही दिनो मे शक्तिहीन हो जाता है
और स्त्री वलवान है इस कारण उसके कन्याए ही अधिक
उत्पन्न होती हैं क्योकि पुरुष वलवान होने से पुत्र, और स्त्री
वलवान होने से कन्याएं उत्पन्न होती हैं ।
यदि कोई शका करें कि पुरुष की अवस्था अधिक और
स्त्री की कम होते हुए भी कन्याए अधिक होती हैं ? उसका कारण
यह है कि मासिकधर्म होने के वाद सम बिसम दिनों मे
गर्भाधान का विचार न रखने का यह कारण है । स्त्री पुरुषो
के वलावल के साथ समविसम रात्रियो का भी प्रभाव पडता है ।
इसीलिये आयुर्वेद और वेदो तथा धर्मशास्त्रों मे सव मे ही
स्त्री की अवस्था से पुरुष की ड्योढ़ी अवस्था विवाह के समय होनी

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २१५
बतलाई है और इसी लिये अधिक अवस्था वाली स्त्री से प्रसंग
करना हानिकारक बतलाया है।
पुरुषों को इन किन्हीं बातों का ध्यान नहीं है बाल विवाह
और वृद्ध विवाह के कारण लाखों स्त्री पुरुष रोगी हो रहे हैं और
सन्तान भी रोगी उत्पन्न होती है। १६ वर्ष से कम अवस्था में
सम्भोग करने से पुरुष निर्बल दुर्बल और रोगी तथा कम उम्र-
वाला होता है।
इसी प्रकार बूढ़ा पुरुष सम्भोग करे तो वह भी अनेक रोगों
से ग्रसित होजाता है श्वास खांसी दमा इत्यादि रोग घेर लेते हैं
और वह शीघ्रही जीवन यात्रा पूरी कर जाता है।
पेट भर भोजन किये हो उस समय सम्भोग करे तो पाचन
शक्ति को हानि पहुँच कर अजीर्ण रोग उत्पन्न होजाता है, यदि
भूखा पुरुष सम्भोग करे तो निर्बलता और अनेक रोगों की उत्पत्ति
तथा मन्दाग्नि रोग उत्पन्न होजाता है।
रोगी मनुष्य सम्भोग करे तो रोग अधिक बढ़ जाते हैं और
क्षय आदि भयानक रोग उत्पन्न होजाते हैं तथा वह पुरुष शीघ्र
ही शरीर से क्षीण होकर कुछ दिनों में यमपुर की यात्रा करता है।
शीघ्रपात का कारण
शीघ्रपात के कारण की ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता।
शीघ्रपात का कारण वीर्य की निर्बलता है और वीर्य की निर्बलता
का कारण अनियम रतिक्रिया है। ऐसी दशा में शीघ्रपात को रोकने

२१६ आनन्द मन्दिर

के लिये औषधिया खाना और वीर्य दोष का उपाय न करना
यदि उपाय भी करना तो ब्रह्मचर्य से न रहना यह कितनी भारी
अज्ञानता है। इससे कभी लाभ नही होता।
मेरे पास प्राय विद्यार्थियों के स्त्रियो की चिट्ठियाँ औषधियो
के लिये आया करती है। औषधिया भेजकर जब मै उन्हे ब्रह्मचर्य
से रहने को लिखती हू तब वे औषधिया लौटा देने को तैय्यार होती
हैं और लिखती है कि महीने दो महीने मे जब कभी दो तीन
दिन की कालेज की छुट्टी होती है तब हमारे पति घर आते है ऐसी
दशा मे वे हमे ब्रह्मचर्य से कैसे रहने देगे। हाल मे ही दशहरा
दिवाली इत्यादि जो छुट्टी का समय हों, लिखती है कि आने
वाले हैं इस लियं आपकी औषधिया रक्खी रहेगी जब पति जी
कालेज की छुट्टी मे घर हो जावेगे तब आपकी औषधियां सेवन
करूंगी क्योकि पतिजी दो चार दिन को घर आवेगे और मैं
ब्रह्मचर्य लेकर बैठू तो वे क्या कहेगे और वे मानेगे भी नही।
उस प्रकार पुरुष रोगियो के भी पत्र आया करते हैं पुरुष
लिखते हैं कि आपकी औषधि मगाकर ले तो ली है परन्तु हमे पहिले
से यह बात मालूम न थी कि औषधिया सेवन करते समय तक
ब्रह्मचर्य से रहना पडेगा यह बात तो बड़ी कठिन मालूम होती है।
पाठको! अब बतलाइये स्त्री पुरुष रोगी न हो यह असम्भव
बात है। पति पत्नी दोनो रोगी हैं पत्नी को किसी को प्रदर,
किसी को प्रसूत, किसी को रजदोष, किसी को रक्त प्रदर, किसी
को हिस्ट्रिया, किसी को जीर्ण ज्वर, इत्यादि रोग तो मौजूद हैं

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २१७
और पति को प्रमेह शीघ्रपात सिथिलता और गरमी सुजाक
आदि रोग है परन्तु वे औषधि सेवन करते समय तक ब्रह्मचर्य
से नहीं रह सकते ।
कोई कोई पुरुष तो लिखते हैं कि यदि मै प्रतिदिन सभोग
न करू ता स्वप्नदोष होजाता है इसलिये करना ही पड़ता है। स्त्रिया
जो यहा आकर अपने पति का हाल कहकर औषधियां लेजाती हैं
उनमे कुछ का यही कहना होता है कि यदि हमारे पति एक दिन
को भी ब्रह्मचर्य से रहे तो दूसरे दिन स्वप्नदोष होजाता है । स्वप्नदोष
से अधिक कमजोरी होजाती है और व्यर्थ होता है इसलिये वे
मानते नही, मना करने पर भी प्रतिदिन सभोग करते है ।
ऐसे अज्ञानी पुरुष शीघ्रही मनुष्य जीवन से हाथ धो बैठते
हैं और अपनी निरपराध स्त्रियो को सदैव के लिये दुःख भोगने
को छोड़ जाते हैं। यदि जीवित रहे तो पति पत्नी दोनो दुःखमय
जीवन व्यतीत करते हैं ।
जब से मैंने “स्त्री चिकित्सक” मासिक पत्र निकाला है उसमे
प्रतिमास उपरोक्त खराबियों और उनके उत्पन्न होने के कारण
प्रकाशित करना आरम्भ किये हैं तब से बीसो हजार स्त्री पुरुष
अधिक प्रसग की खराबियो को समझकर इससे बचने लगे हैं ।
पुरुषों का भ्रम
बहुतेरे पुरुषों की मेरे पास ऐसी चिट्ठियां औषधियों के लिये
आया करती है जिनमे वे लिखते है कि “ऐसी औषधि भेजिये कि

२१८ आनन्द मन्दिर
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प्रतिदिन संभोग करने पर भी शक्ति कम न हो" उनकी स्त्रिया उसी
पत्र मे लिखती हैं कि हमारे पति की इच्छा नही भरती वे कई
बार प्रतिदिन संभोग करना चाहते हैं परन्तु शक्ति न रहने के
कारण नही कर सकते, लिखते सकोच मालूम होता है परन्तु
पति जी के अनेक वार आग्रह पर लिख रही हूँ कृपा करके कोई
औषधि भेजिये ।
मैं उन स्त्रियो और पुरुषो को साफ लिख देती हू कि आप
क्यो अपने और अपनी स्त्री के मौत के सामान की खोज मे
हैं । तारीफ यह है कि उनके पत्र मे प्रमेह सुस्ती शीघ्रपात की
भी शिकायत लिखी होती है फिर भी ऐसी औषधि चाहते हैं यह
कितनी भारी अज्ञानता है ।
बहुतेरे पुरुष लिखते हैं कि आपकी औषधि मगाकर हमने
रखली है परन्तु हम छुट्टी लेकर घर जाने वाले हैं एक महीने
घर पर रहकर जब लौटकर नौकरी पर आवेगे तब औषधि का
सेवन करेंगे क्योकि अभी से सेवन करने से आपके विधानपत्र
मे ब्रह्मचर्य से रहना लिखा है ऐसी दशा मे हम ब्रह्मचर्य से नही
रह सकते । कई महीने से स्त्री हमारे पास नही थी घर भेज दिया
था । हम इतने दिन बाद स्त्री से मिलेगे अगर ब्रह्मचर्य धारण
किये रहे तो हमारी स्त्री कही अपने मन मे यह न समझे कि मेरा
पति शक्तिहीन होगया और यह विचार कर दुःखी हो ।
पाठको ! यह कितनी बड़ी अज्ञानता है कि कुछ लोग इस
भ्रम के कारण भी ब्रह्मचर्य से थोड़े दिन नही रह सकते ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २१६
शरीर में वीर्यदोष सम्बन्धी अनेक रोग मौजूद हैं, शीघ्रपात के
कारण सुस्ती आ गई है, औषधियां सेवन कर रहे हैं परन्तु
ब्रह्मचर्य से दो चार महीने भी नहीं रह सकते। यही कारण
है कि सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां और पुरुष रोगी हैं और इसी
कारण हमारे देश के बालकों की रोगी तथा मृत्यु संख्या अन्य
देशों से अधिक है।
स्त्री की इच्छा न होते हुए भी पुरुष स्त्रियों पर अत्याचार
करते हैं। अन्य देशों में स्त्रियों की विना इच्छा के पुरुष कुछ भी
नहीं कर सकते, यदि करें तो स्त्री पति का त्याग करदें। दूसरी
बात यह है कि वहां के पुरुष भी उतना ज्ञान रखते हैं कि विना
स्त्री की इच्छा के रतिक्रिया करने से दोनों रोगी हो जाते हैं।
पुरुषों की बड़ी भारी भूल
विषयी पुरुषों की यह बड़ी भारी भूल है कि स्त्री अनेक
प्रकार से भांति भांति के उपायों से रतिक्रिया करने में प्रसन्न
होगी और हमें अधिक रतिसुख प्राप्त होगा। ऐसे विषयी पुरुषों
की इस भूलभरी मूर्खता ने असंख्य स्त्री पुरुषों का सत्यानाश
मारदिया। असंख्य स्त्रियां इन अनिष्टकारी भूलों की शिकार
बनगईं और बनती जा रहीं हैं।
इसी कारण बीसों हजार स्त्रियां सन्तानहीन होने से रो रो कर
जीवन व्यतीत कर रही हैं और सैकड़ों इसी तरह जीवन लीला
समाप्त करगईं। मेरे पास सन्तान हीन स्त्रियां भी बीसों हजार आईं

२२० आनन्द मन्दिर
इन मे बहुत सी तो ऐसी थी कि जवानी मे तो अधिक विषय
वासना मे लगे रहने के कारण स्त्री पुरुष किसी को भी सन्तान
होने की इच्छा ही नही हुई और अधिक विषय से गर्भाशय मे
खराबी आजाने मे हुई भी तब, जब शक्तिहीन होगयी और गर्भा-
शय का रोग भी पुराना होगया फिर वे मेरे पास सन्तान का
इलाज कराने आई।

बहुतो के रोग जो दूर हो सकते थे इलाज करके दूर कर दिये
गये और पुरुषो को भी उनकी स्त्रियो द्वारा इलाज करके आराम
करदिया गया, सन्तान होने लगी परन्तु जिनके रोग असाध्य हो
गये तथा जिनकी अवस्था भी सन्तान, उत्पन्न करने के योग्य नहीं
रह गई थी वे स्त्रिया निराश गई ।

स्त्री अधिक रति सुख की इच्छुक नहीं होती। स्त्रियो को
केवल गर्भाधान के लिये ही रति की इच्छा होती है परन्तु विषयी
लोग स्त्रियो का स्वभाव अधिक विषय करके बदल लेते हैं इस
लिये उनका स्वभाव भी विषय वासना की तृप्ति करने का होजाता
है फिर वह स्वभाव आगे चलकर हानि पहुँचाता है।

मेरे पास जितनी रोगी स्त्रियां आती हैं उनके रोगो की परीक्षा
से रोगो का निदान करने से अनियम रतिक्रिया के कारण उत्पन्न
होने वाले रोगो के विषय में जब मै उनसे ब्रह्मचर्य से रहकर
औषधि सेवन करने को कहती हू तब वे जवाब देती हैं कि हम
क्या करें

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २२१
अनेक स्त्रियों का तो कहना है कि मासिक धर्म्म की दशा मे भी
पति जी संभोग करते ही हैं।
स्त्रियो मे जो अधिक विषय का दुःस्वभाव पड जाता है वह
पति की मूर्खता मे अथवा कुसंगति से और पूर्व जन्म के बुरे कर्म्मों
के फल से। वरन स्त्रियो की इच्छा सिवाय गर्भाधान के अधिक
विषय की इच्छा से जाग्रत नही होती है।
बहुतेरे पुरुषो को थोड़े से कारण से भी इच्छा होती
है। इच्छा ही नही पता लगाने से सैकड़ा पीछे पन्चानवे पुरुष
ऐसे मिलेगे कि जिन्हें स्त्री का स्पर्श करते ही और गन्दी पुस्तके
पढ़ते ही वीर्य बहने लगता है। मेरे पास पुरुष रोगियो के जितने
पत्र आते हैं अधिक मे ही यह शिकायत लिखी होती है कि स्त्री
का स्पर्श करते ही तथा इश्कवाजी के उपन्यास पढ़ते ही वीर्य
बहने लगता है और रात में स्वप्नदोष हो जाता हैं।
२५ पच्चीस वर्षों मे मेरे पास स्त्रियो की लाखो चिट्ठिया
आईं उनमें रोगी का पूरा हाल लिखा था तथा लिखा होता है
आज तक मैंने लाखो मे दो ही चार चिट्ठिया ऐसी पाईं जिनमे
स्त्रियो मे भी यह शिकायत थी कि गन्दी पुस्तके पढ़ने से रजस्राव
होने लगता है।
स्त्रियो के स्वभाव को बिगाड़ने वाले उनके पति ही होते हैं
पति चाहे जैसा पत्नी को बना सकता है। शास्त्रकारों का भी
यही कहना है कि जिस घरके पुरुष जिस आचरण के होंगे
स्त्रिया और बालक भी वैसे ही होंगे।

' ligature: it's a vertical stroke, then half-m connected to bha.
In L12: "स्तम्भन" -> same ligature.
In L17: look at that word:
'स्' 'त' 'म्भ' 'न' -> wait, does it have 'म्भ'?
Look at the character: 'स' '्' 'त' then... wait, it's 'म्' with a slash? No, it's 'म्' connected to 'भ', but the loop of 'म्' didn't close, so it looks like 'रभ'!
Wait, is it "स्तरभन" or "स्तम्भन"?
Look at the loop: it's open at the top, like an 'र' or an unclosed 'म्'. But look at the bottom: it joins 'भ'.
Wait, in Hindi, does "स्तरभन" exist? No, it's a broken type of "स्तम्भन".
Wait, should we transcribe it as "स्तरभन" or "स्तम्भन"?
Let's look at the instructions: "transcribe the text faithfully". If it's a clear broken type, usually people write "स्तम्भन" or "स्तरभन"?
Wait, look at the letter: 'स्' 'त' 'र' 'भ' 'न'. There is a distinct 'र' followed by a full 'भ'! The 'भ' is a FULL 'भ' with its left loop and everything!
In L9, 'भ