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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १८६
स्त्रियों की संभोग इच्छा कब पूरी होती है
ऋतुस्नान के चौथे दिन गर्भाधान के लिये प्राकृतिक नियमा-
नुसार स्त्रियों की सम्भोग करने की प्रबल इच्छा होती है उसी
समय स्त्रियों की सम्भोग से इच्छा पूरी होती है । केश पकड़
कर खींचना नाखून गडाकर स्त्रियों के कामदेव को कुम्भकरण
की समान जगाना महा मूर्खता है । क्योंकि यदि पति आरोग्य
है तो उसे कुम्भकरणी उपायो की आवश्यकता नही है वह अपनी
पत्नी को वैसे ही तृप्त कर सकता है यदि पति रोगी है, स्त्री का
स्पर्श करते ही पतलून विगड़ जाती है तो एक नहीं हजार काम-
शास्त्र और कोकशास्त्र के उपाय किये जावे रोगी पति की स्त्री की
कभी तृप्ति नहीं होसकती ।
ऐसे पुरुष जो कि स्वयं वीर्य दोष, प्रमेह, सुस्ती, स्वप्नदोष,
शीघ्रपात आदि रोगों से ग्रसित हैं परन्तु सम्भोग करने की
प्रति दिन इच्छा रखते हैं और साथ ही स्त्री को भी स्खलित
करना चाहते हैं परन्तु स्त्री का स्पर्श करते ही पतलून या धोती
विगाड़ देते हैं। वे केवल अपनी पत्नी को यह दिखलाना चाहते
हैं कि हम वडे वहादुर हैं। स्त्री को स्खलित करने में ही पति
अपनी वीरता समझता है परन्तु जब स्त्री के पास जाते ही पत-
लून या वोती विगड़ जाती है उस समय नानी मरजाती है
लज्जित होकर रह जाना पडता है ।
ऐसे पुरुष न स्त्री को ही तृप्त कर सकते हैं न आपही तृप्त

१६० आनन्द मन्दिर

होते हैं। मेरे इस लिखने पर कोई सज्जन बुरा न मानें क्योंकि
मेरे पास ऐसे पुरुषों की पचासो चिट्ठियाँ और स्त्रियाँ आया
करती है और लाखों आचुकी है उन चिट्ठियों और स्त्रियो से जैसा
पता लगता है उसी अनुभव से मैंने यह सब हाल लिखने का
साहस किया है।
संभोग योग्य स्त्री
वैद्यक शास्त्र बतलाता है —
भार्यां रूपगुणोपेतां तुल्यशीलकुलोद्भवाम् ।
अभिकामोऽभिकामां तु हृष्टोहृष्टामलंकृताम् ॥
सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजी करण वृंहितः ।
अर्थात्-रूप और गुणयुक्त समान स्वभाव और कुल मे तुल्य
दोनो के रमण की इच्छा वाली, पुरुष भी प्रसन्न चित्त हो और
स्त्री भी प्रसन्न चित्त वाली हो तथा श्रृंगार किये हो उस समय पुरुष
अपनी स्त्री से युक्ति के साथ अर्थात् नियमानुसार सभोग करे ।
पाठक विचार कर देखे कि हजारो मे एक ही दो ऐसे मिलेगे
जो इस प्रकार पत्नी की आरोग्यता का ध्यान रखकर सभोग
करते हो वरना अधिक सख्या ऐसो ही की मिलेगी जो केवल
विषय वासना की तृप्ति का ही ध्यान रखते है । आरोग्यता या
उत्तम सन्तान का कुछ भी नही । जब पति अपनी ही आरोग्यता
का ध्यान नही रखते तो पत्नी की आरोग्यता का कैसे हो ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६१

तभी तो कहना पड़ता है कि विषयी पुरुषों ने अपनी पत्नियो को
विषय वासना की तृप्ति करने की मशीन समझ रक्खा है इसी
लिये वे उनकी आरोग्यता और उत्तम सन्तान उत्पन्न करने का
कुछ भी ध्यान नही रखते।
पुरुषस्यगुणैर्युक्ता विहितान्यून भोजना ।
नारीऋतुमती पुंसा संगच्छेद्सुतार्थिनी ॥
अर्थात्—पुरुष की समान गुण युक्त यानी जिस प्रकार
पति स्नानकर चन्दन सुगन्ध फूलो की माला वस्त्र आभूषणो से
सजित हो स्त्री के पास जाने इच्छा करे उसी प्रकार स्त्री भी शृगार
कर थोड़ा भोजन करके पान खाकर ऋतु से शुद्ध हुई पति मे
जिसका अत्यन्त प्रेम हो और सम्भोग की प्रवल इच्छा हो ऐसी
स्त्री सन्तान की इच्छा से पति के पास जावे।
ऊपर के श्लोक से स्पष्ट होता है कि ऋतु मती होने पर ही
स्त्री का कामोद्दीपन होता है और सन्तान की इच्छा से ही सम्भोग
की इच्छा होती है। यह बात प्रकृति से भी स्पष्ट है क्योंकि पशु
पक्षियो, सबको ही गर्भाधान के ही लिये सम्भोग की इच्छा होती
है। गाय भैस वकरी इत्यादि सभी मादा पशु जब ऋतुमती होती
हैं तभी नर की इच्छा करती हैं और सम्भोग होते ही गर्भ रह
जाता है। फिर वह इच्छा नही करती यदि किसी कारण से गर्भ-
स्राव होजावे तो वह फिर नर की इच्छा करती है और सम्भोग
के बाद शांत होजाती है।

१६२ आनन्द मन्दिर
इसी प्रकार पशु नर जब गर्भ रह जाता है तब फिर उस
मादा के पास नही जाता इसी तरह पक्षियों मे भी है ।
प्रकृति का तो यही नियम है परन्तु मनुष्य ने सम्भोग के
महत्व को भुला दिया है । यही कारण है कि वर्षों संभोग करने
पर भी गर्भ नही रहता । ऐसे कडोरों घर होंगे जो सन्तान के
विना, विना दीपक वाले अधेरे घर की समान होरहे हैं ।
कामी और शक्तिहीन पुरुषो मे जिनके सन्तान होती भी
है वह रोगी और निर्बल दुर्बल कम आयुवाली होती हैं, ऐसे
बहुत थोड़े घर होगे जहा के पुरुष नियम पूर्वक चलकर उत्तम
सन्तान उत्पन्न करते हैं ।
पशु पक्षियो मे प्रकृति के नियमानुसार सन्तान के ही लिये
सम्भोग की इच्छा होती है इसी प्रकार मनुष्य में भी प्रकृति ने
यही नियम बनाया है परन्तु मनुष्य ने अपने चित्त प्रसन्नार्थ और
विषयाग्नि की शान्ति के लिये यह नियम तोड़ दिया है ।
संभोग के अयोग्य स्त्री
रजस्वलाव्याधिमती विशेषाद्योनिरोगिणी ।
वयोधिकानिष्कामा मलिनागर्भिणी तथा ॥
एतासंगमनात्पुंसां वैगुण्यानिभवन्तिह ।
इसका अर्थ यह है कि रजस्वला स्त्री, रोगी स्त्री, जिसे किसी
प्रकार का भी रोग हो, और योनि रोग वाली, जो स्त्री पुरुष

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६३
की अवस्था से अधिक अवस्था वाली हो, जिसे सभोग की
इच्छा न हो, मैली हो, गर्भवती हो, इन स्त्रियो से सभोग नहीं
करना चाहिये । रोगवाली से तात्पर्य है “ऊपरी किसी प्रकार का
रोग हो” और योनि रोग से तात्पर्य है योनि मे किसी प्रकार
का रोग हो जैसे प्रदर, प्रसूत, गर्भाशय की खराबी, गरमी, सुजाक
आदि । प्रदर प्रसूत रोग वाली स्त्री से सभोग करने से स्त्री का
रोग अधिक बढ़ जाता है और गर्भ रह जाने पर सन्तान भी
निर्वल दुर्बल और रोगी होती है ।
गरमी सुजाक वाली स्त्री से सभोग करने से पुरुष के तुरंत
ये रोग उत्पन्न हो जाते हैं और जल्दी दूर नहीं होते । सन्तान
में भी ये खरावियां उत्पन्न होती हैं जो सहज ही कभी दूर नहीं
होती, कई पीढ़ियो तक रहती हैं । गरमी सुजाक का प्रभाव
सन्तान पर बहुत बुरा पड़ता है ।
तत्रात्यशिता क्षुधिता पिपासिता-
भीता विमनाः शोकार्त्ता क्रुद्धान्यञ्च ।
पुसांसमीच्छति मैथुने चाभिकामा-
न गर्भधत्ते विगुणां वा प्रजा जनयति ॥
जिसका पेट भोजन से भरा हो, जो भूखी हो, प्यासी हो,
भयभीत हो, मनमलीन हो अर्थात् सभोग के लिये प्रसन्न चित्त
न हो, जिसे किसी वात का शोक हो, क्रोध हो, जो पति से
१३

१६४ आनन्द मन्दिर
अप्रसन्न रहती हो, ऐसी स्त्री से सभोग नही करना चाहिये ।
ऐसी स्त्री गर्भधारण नही कर सकती ।
स्त्रियों का स्वप्न प्रसंग
ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्नेमैथुनसावहेत ।
आर्तवंवायुरादाय स्वप्नेगर्भंकरोतिच ॥
मासि मासि विवर्द्धेत गर्भिण्यागर्भलक्षणम् ।
कललंजायतेतस्या वर्जितंपितृकैर्गुणैः ॥
आयुर्वेद और धर्म्मशास्त्र के मत से ऋतु से शुद्ध हुई
स्त्री मे पति को अवश्य गर्भाधान क्रिया नियम पूर्वक करनी ,
चाहिये क्योकि ऋतुस्नान से वारह रात्रि पर्यन्त स्त्री की प्रबल इच्छा
गर्भाधान के लिये पति संभोग की होती है यह प्रकृति का
नियम है। जो मूर्ख पति किसी कारण से इस नियत समय पर
पत्नी का निरादर करते, पत्नी से अलग रहते हैं उनकी पत्नियो
का क्या हाल होता है। यह ऊपर के श्लोक से पुष्ट होता है।
अर्थात् ऋतुस्नाता स्त्री की चौथे दिन से लेकर वारह रात्रि पर्यन्त
सम्भोग की इच्छा रहने के कारण यदि वह स्वप्न मे संभोग करे ,
तो वायु उस समय स्त्री के शुद्ध आर्तव को ही लेकर गर्भाशय
मे गर्भस्थापन करती है यह गर्भ भी महीने महीने असली गर्भ
की समान बढ़ता रहता है। जैसे लक्षण गर्भवती मे असली गर्भ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६५
के पाये जाते हैं उसी प्रकार के लक्षण इसमे भी पाये जाते हैं
इस कारण किसी चिकित्सक को इस बात का पता नहीं लगता।
नौ दस महीने तक तो उस स्त्री के घरवाले बालक होने का
रास्ता देखते रहते हैं और दिन गिना करते हैं फिर दस महीने
भी पूरे हो जाते हैं बल्कि बारह चौदह महीने हो जाते हैं।
इस प्रकार की गर्भवती अनेक स्त्रियां मेरे पास गर्भ की परीक्षा
कराने आई और आया करती हैं। मैने देखा है कि बारह
महीने तक घरवाले इसी आशा मे रहते हैं कि गर्भ है और बालक
होगा।
जब सन्तान नहीं होती तब लेडी डाक्टरो और अन्य डाक्टरो
के पास लेजाते हैं वे लोग भी गर्भ बतलाते हैं और कोई कोई तो
कहदेते हैं कि पेट में बच्चा कमजोर है ठीक परवरिश नहीं पारहा
है इस लिये इस गर्भवती को अच्छे अच्छे बलकारक पदार्थ
खिलाओ तब बच्चा बढ़ेगा। इस प्रकार की गर्भवती अनेक स्त्रियां
सैकड़ो रुपया गर्भ की परीक्षा में खर्च कर डालती हैं क्योकि
प्रायः स्वार्थी चिकित्सक गर्भ बढ़ने का इलाज भी करते हैं और
कहते हैं बच्चे की परवरिश के लायक गर्भवती के शरीर मे रक्त
नही बनता है इस लिये इलाज करो। यह कहकर इलाज शुरू
करते हैं और उनसे रुपया वसूल करते हैं। इस गर्भ में गर्भवती
के स्तनो मे दूध भी निकलने लगता है इन सब लक्षणो के होने
से किसी को पता नही लगता कि गर्भ नही है।
इसकी परीक्षा लक्षणो से नही होसकती किन्तु स्त्री के

१६६ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय और पेट देखने से ठीक ठीक होती है आयुर्वेद के
अनुसार निदान से होती है। डाक्टरी चिकित्सा प्रणाली में निदान
उस प्रकार नहीं है जैसा हमारे आयुर्वेद ग्रन्थों में पाया जाता
है। इस बात का मुझे २५ पच्चीस वर्ष का अनुभव है क्योंकि
मेरे पास २५ वर्ष मे सभी प्रकार के रोगों की गर्भवती और
अनेक प्रकार के साधारण और गुप्त रोग वाली लाखो स्त्रियां
इस प्रकार की रोगी गर्भवाली भी हजारों स्त्रियां आईं और मैंने
चिकित्सा करके उन्हें आराम किया तब उन्हे निश्चय हुआ कि
यह गर्भ नहीं था।
स्त्रियों में परस्पर रतिक्रिया का फल
यदानार्यावुपैयातांवृषस्यन्त्यौकथञ्चन ।
मुञ्चतःशुक्रमन्योऽन्यसनस्थिस्तत्रजायते ॥
अर्थात्—दो स्त्रियां आपस मे एक दूसरे के साथ सम्भोग करे
उससे जो गर्भ रह जावे तो बिना हड्डी का गर्भ उत्पन्न होता है
हड्डी का अंश बहुत थोडा रहता है। जैसा कि पीछे बतलाया
गया है पति पत्नी की अज्ञानता से नपुंसक स्त्रिया पैदा होती
हैं वे इसी प्रकार अन्य स्त्रियो को अपनी इच्छा पूर्ति के लिये फसा
लेती है और इस प्रकार उनसे सम्भोग करती हैं इससे जो गर्भ
रह जाता है वह बिना हड्डी का होता है। ऐसी स्त्रियो को उत्पन्न
करने वाले मूर्ख कामान्ध माता पिता ही होते हैं। स्त्रियो का इसमें
कोई दोष नही समझना चाहिये ।

वर्षा बहार । पृ० ११९ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६७
दुर्गन्धित योनि वाली स्त्रियां
ऐसी स्त्रियां लाखों मिलेगी जिनकी योनि में दुर्गन्ध आती
है क्योंकि एक तो दुर्गन्ध आने का रोग ही है दूसरा कारण
योनि को प्रति दिन न धोने का भी है। तीसरे अधिक दिनों तक
योनि को न धोने से दुर्गन्ध से रोग उत्पन्न होजाता है । चौथी
बात यह है कि प्रदर रोग जब असाध्य होजाता है तब योनि
में इतनी अधिक दुर्गन्ध आने लगती है कि उस स्त्री के पास
बैठा नहीं जाता ।
मेरे पास प्रायः ऐसी स्त्रियां योनि दुर्गन्ध का तथा प्रदर रोग
का इलाज कराने आया करती हैं। इनमें अनेक स्त्रियां ऐसी होती
हैं कि योनि रोग की परीक्षा करने के लिये जब मैं उनके पास
जाती हूँ तब कपड़ा उठाते ही इतनी दुर्गन्ध मालूम होती है कि
उनके पास खड़ा रहना कठिन होता है, परन्तु मैं स्त्रियों की
चिकित्सा करती हूँ इस कारण मुझे रोगी स्त्रियों से किसी प्रकार
की घृणा नहीं है और देखना ही पड़ता है ।
ऐसी दुर्गन्धित योनि वाली स्त्रियों का जब मैं इलाज करती
हूँ और उनसे जब तक रोग दूर न हो ब्रह्मचर्य से रहने के लिये
कहती हूँ तब वे कहती हैं कि यह बात तो शायद न हो सके
क्योंकि हमारे पति जी तो दो चार दिन को भी नहीं मानते, इस
बात पर मैं उनसे कहती हूँ कि आपके पति आपके साथ बड़ा
अत्याचार करते हैं, आप रोगी हैं और यह रोग इस प्रकार का

१६८ आनन्द मन्दिर
है कि इस दशा मे यदि आपके सन्तान होगी तो वह नपुंसक
होगी तब वे कहती है यह वात तो हमारे पति और हमको मालूम
ही नहीं है। सम्भव है यह वात बहुत कम स्त्री पुरुषों को
मालूम हो और जिन्हें मालूम होगी वे अवश्य विचार से रहते होंगे
इस लिये यह वात सब स्त्री पुरुषों को याद रखनी चाहिये कि
जिस स्त्री की योनि मे किसी कारण से दुर्गन्ध आती हो, उन्हे
संभोग नहीं करना चाहिये, इलाज करके गेग को दूर कर लेना
चाहिये। औषधि सेवन तक ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये। खराव
दशा में गर्भाधान करके नपुसक पुत्र उत्पन्न करना लज्जा की बात है।
पति दर्शन का महत्व
पूर्वपश्येदृतुस्नाता यादृशंनरमङ्गना ।
तादृशंजनयेत्पुत्रं भर्तारंदर्शयेत्ततः ॥
इसका अर्थ यह है कि ऋतु स्नान करके स्त्री सबसे पहिले
जिस पुरुष को देखेगी वैसी ही सन्तान उत्पन्न होगी इस लिये
सबसे पहिले अपने पति को ही देखे। किसी किसी ऋषि का मत
है कि यदि पति पास मे न हो तो अपने पुत्र को ही देखे, यदि
पुत्र न हो तो पति को देखे। यदि कुछ भी न हो तो उस दिन
एकान्त मे बैठकर पति का हृदय मे चिन्तन करे।
यदि पति घर पर न हो और कहीं निकट ही गया हो तो एकान्त
में बिना किसी दूसरे को देखे हुए पति की प्रतीक्षा करती रहे।
और जब पति आजावे तब शृंगार करके पति का दर्शन करे।

आनन्द
मन्दिर
सातवां अध्याय

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०१
सृष्टि और मनुष्य जाति
संसार की स्थिति सृष्टि पर ही निर्भर है और सृष्टि स्त्री
पुरुष ( नर मादा ) पर निर्भर है इसके अतिरिक्त दूसरा कोई
उपाय परमात्मा ने सृष्टि उत्पत्ति का नही रक्खा । वहुत मे जीव
ऐसे भी हैं कि जो विना नर मादा के ही उत्पन्न हो जाते है
परन्तु मनुष्य विना स्त्री पुरुष के उत्पन्न नही हो सकता। सृष्टि की
उन्नति के मुख्य प्राणी मनुष्य ही है। मनुष्यो से ही सृष्टि की
उन्नति और अवनति होती है इसी लिये मनुष्यो मे स्त्री पुरुष
का जोड़ा बनाया है । उत्तम सन्तान व जाति उत्पन्न होने के
लिये ऋषियो ने विवाह की प्रथा चलाई और चार आश्रमो का
नियम रक्खा । ब्रह्मचर्य आश्रम विद्या प्राप्त करने के लिये है ।
मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह विद्या प्राप्त करने के वाद विवाह
करके गृहस्थाश्रम मे प्रवेश कर दाम्पत्य जीवन का सच्चा आनन्द
और सुख भोगते हुए उत्तम सन्तान उत्पन्न कर परमात्मा की
सृष्टि मे सहायता दे ।
यह अत्यन्त खेद् की वात है कि ब्रह्मचर्य अवस्था (वाल्यावस्था)
से ही कुसंगति मे पड़कर अनेक होनहार वच्चे अनियमता से
वीर्य का सत्यानाश मार लेते है जिसके कारण आगे चलकर अनेक
अनर्थ होते हैं, अधर्म की वृद्धि होती है, शक्ति क्षीण हो जाती है
दीर्घजीवन की जगह् अल्पायु होती है और समाज मे अनेक
प्रकार के रोग दोष फैल जाते हैं ।

२०२ आनन्द मन्दिर
मनुष्य की नित्य प्रति की इच्छाएं
शरीरे जायते नित्यं वाञ्छा नृणां चतुर्विधा ।
बुभुक्षा च पिपासा च सुपुप्सा च रतिस्पृहा ॥
आयुर्वेद बतलाता है और प्रकृति का नियम है कि मनुष्यों
के शरीर मे भोजन करने की, पानी पीने की, सोने की और स्त्री
संभोग करने की इच्छा नित्य प्रति बनी रहती है । इन इच्छाओं
को रोकने से और नियम विरुद्ध अधिक उपभोग करने से शरीर
मे अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होजाते हैं जिससे मनुष्य की
आयु क्षीण होती जाती है और ऐसे मनुष्य अकाल मे ही काल के
कलेवा हो जाते हैं।
भोजन की इच्छा रोकने से अर्थात् समय पर भोजन न
करने से शरीर टूटने लगता है, निर्बलता और दुर्बलता आघेरती
है, अरुचि उत्पन्न होती है थकान सी मालूम होती है सुस्ती आ
आजाती है, आंखे कमजोर होजाती है और बलका क्षय होता
है । इसी प्रकार से शरीर कमजोर होजाता है।
प्यास लगने पर पानी न पीने से कठ और मुख सूख जाता
है, खुश्की होती है, कानों को हानि पहुँचती है, रक्त सूखने लगता
है और हृदय मे पीडा होती है। आती हुई निद्रा को रोकने से
जम्भाई आने लगती है । शिर तथा नेत्र भारी हो जाते है शरीर
टूटने लगता है आलस्य उत्पन्न होता है और खाया हुआ अन्न

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०३
पचता नहीं है। जो मनुष्य भूख लगने पर नहीं खाते उनकी
जठराग्नि मन्द होजाती है शरीर की अग्नि खाये हुए आहार को
पचाती है, आहार नहीं रहने मे वात पित्त तथा कफ को पचाती
है, उनके क्षय होने पर धातुयो को पचाती है और धातुओ के
क्षय होने पर शरीर को पचाती है और फिर प्राणो को पचाती है
अर्थात् प्राणों का नाश करती है।
रति ( संभोग ) के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही समझना चाहिये।
बहुतेरे मनुष्यों को अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक
रोग उनकी संभोग इच्छा पूर्ण न होने मे हो जाते हैं परन्तु
इसके यह अर्थ नहीं कि मनुष्य दिन रात संभोग मे जुटा रहे।
पुरुष रोगों का कारण
अब तक मेरे पास लाखो स्त्रियां अपने तथा अपने पति के लिये
औषधियां लेने आईं उनके पतियों की दशा सुनकर मुझे इस बात
का अनुभव हुआ कि पुरुषो की अज्ञानता ( वीर्यनाश ) से ही
अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। श्रवण शक्ति का नाश होता है, नेत्रों की
ज्योति कम हो जाती है, शुक्र ऐसा पतला होजाता है कि वस्त्र
में लगने से जलवत किसी प्रकार का चिन्ह तक नहीं रहता ।
साधारण शक्ति ऐसी नष्ट हो जाती है कि स्त्री के दर्श स्पर्श से ही
धातु बहने लगती है। एव सन्तानोत्पादक शक्ति नाश हो जाती
है। मूत्र तो सदा जलन के साथ एव थोड़ा थोडा कई बार होता
है और शुक्र मेह का प्रादुर्भाव भी हो जाता है। जिसमे शौच

३०४ आनन्द मन्दिर


(दिशा, पेशाब) करने के पहिले अथवा पीछे वीर्य स्खलित
(पतन) होता है और अकारण ही सर्वदा चिन्ता लगी रहती
है। जिसके कारण पुरुष स्वप्र मे भी उसी खोटे कर्म को करते हुए
देखता है और उसका वीर्य अनायास ही स्खलित हो जाता है
और जब तक स्वप्रदोष से यह स्खलित वीर्य किसी उपाय से
अधोपतित नही होता है, तब तक मूत्र नाली मे जलन और पेशाब
मे कड़क होती ही रहती है।
ऐसे हजारो पुरुषो की स्त्रियां मेरे पास आई और प्रतिदिन
पचासो आती है कि उनके पति किसी काम के अर्थात् गर्भाधान
करने लायक नही है, सन्तान कैसे हो ।
बहुतेरे नवयुवक स्वप्नावस्था मे किसी नवीन वयस्का बालिका
से सम्भाषण करते हुए क्षण मात्र मे ही स्खलित हो जाते
है इसी को "स्वप्रदोष" कहते है। अनैसर्गिक उपाय से स्त्री ससर्ग
की अपेक्षा स्वप्र मे अधिक वीर्य निकलता है, तथा शरीर अधिक
तर दुर्बल और बलहीन हो जाता है। इसी से मेरुदण्ड (रीढ़) मे
प्रायः दर्द हुआ करता है, अण्डकोषो का बढ़ जाना भी उन्ही कुचे-
ष्टाओ का फल है, और थोडी अवस्था मे अस्वाभाविक कर्म हस्त-
क्रिया आदि के करने से पुरुष इन्द्री छोटी और नसे खराब हो जाती
हैं; इन्द्री का अग्रभाग कुछ -टेढ़ा भी हो जाता है। स्वप्रदोष दिन
हो या रात सोते हुए होता है और मानसिक चंचलता से जागृत
अवस्था मे भी मूत्रेन्द्री मे सुरसुरी होकर धातु निकलता है।
इस प्रकार धातु निकलने से इन्द्री का अग्रभाग सदा भीगा

वर्षा ऋतु में विहार । पृ० १७३
( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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