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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१३

संभोग के लिये अयोग्य पुरुष
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्वान्सव्यथाङ्गः पिपासितः ।
बालो वृद्धोन्यरोगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ॥
जिसने अत्यन्त भोजन किया हो, धैर्य रहित, भूखा, जिसके
शरीर मे किसी प्रकार का रोग हो प्यासा हो, बालक, बुड्ढा
या रोगी हो ऐसे पुरुष को मैथुन कदापि नही करना चाहिये ।
इसी सम्बन्ध मे दूसरे ऋषि की राय है —
क्षुधितः क्षुब्धचित्तश्च मध्यान्हे तृषितोऽबलः ।
स्थितश्च हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ॥
व्याधितस्यरुजा प्लीहा मूर्छा मृत्युश्च जायते ॥
अर्थात्—जो पुरुष भूखा, क्षोभित चित्त वाला, प्यासा,
बलहीन अर्थात् निर्बल दुर्बल हो उसे तथा मध्यान्ह के समय,
संभोग नही करना चाहिये । यदि करे तो शुक्र की हानि अर्थात्
वीर्य नाश हो, वायु का कोप हो और रोग बढ़े तथा रोग में
कष्ट बढ़े, पीडा अधिक हो । तापतिल्ली तथा मूर्छा रोग हो और
( मृत्युश्च जायते ) मृत्यु भी हो ।
इससे पाठक समझ सकते हैं कि नियम विरुद्ध रतिक्रिया
करने से स्त्री पुरुष दोनो को कितनी हानि पहुँचती है और
सन्तान रोगी निर्बल होती है। महर्षियो के बताए हुए इन नियमों