विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०४ आनन्द मन्दिर
(दिशा, पेशाब) करने के पहिले अथवा पीछे वीर्य स्खलित
(पतन) होता है और अकारण ही सर्वदा चिन्ता लगी रहती
है। जिसके कारण पुरुष स्वप्र मे भी उसी खोटे कर्म को करते हुए
देखता है और उसका वीर्य अनायास ही स्खलित हो जाता है
और जब तक स्वप्रदोष से यह स्खलित वीर्य किसी उपाय से
अधोपतित नही होता है, तब तक मूत्र नाली मे जलन और पेशाब
मे कड़क होती ही रहती है।
ऐसे हजारो पुरुषो की स्त्रियां मेरे पास आई और प्रतिदिन
पचासो आती है कि उनके पति किसी काम के अर्थात् गर्भाधान
करने लायक नही है, सन्तान कैसे हो ।
बहुतेरे नवयुवक स्वप्नावस्था मे किसी नवीन वयस्का बालिका
से सम्भाषण करते हुए क्षण मात्र मे ही स्खलित हो जाते
है इसी को "स्वप्रदोष" कहते है। अनैसर्गिक उपाय से स्त्री ससर्ग
की अपेक्षा स्वप्र मे अधिक वीर्य निकलता है, तथा शरीर अधिक
तर दुर्बल और बलहीन हो जाता है। इसी से मेरुदण्ड (रीढ़) मे
प्रायः दर्द हुआ करता है, अण्डकोषो का बढ़ जाना भी उन्ही कुचे-
ष्टाओ का फल है, और थोडी अवस्था मे अस्वाभाविक कर्म हस्त-
क्रिया आदि के करने से पुरुष इन्द्री छोटी और नसे खराब हो जाती
हैं; इन्द्री का अग्रभाग कुछ -टेढ़ा भी हो जाता है। स्वप्रदोष दिन
हो या रात सोते हुए होता है और मानसिक चंचलता से जागृत
अवस्था मे भी मूत्रेन्द्री मे सुरसुरी होकर धातु निकलता है।
इस प्रकार धातु निकलने से इन्द्री का अग्रभाग सदा भीगा