विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 704 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०३
पचता नहीं है। जो मनुष्य भूख लगने पर नहीं खाते उनकी
जठराग्नि मन्द होजाती है शरीर की अग्नि खाये हुए आहार को
पचाती है, आहार नहीं रहने मे वात पित्त तथा कफ को पचाती
है, उनके क्षय होने पर धातुयो को पचाती है और धातुओ के
क्षय होने पर शरीर को पचाती है और फिर प्राणो को पचाती है
अर्थात् प्राणों का नाश करती है।
रति ( संभोग ) के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही समझना चाहिये।
बहुतेरे मनुष्यों को अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक
रोग उनकी संभोग इच्छा पूर्ण न होने मे हो जाते हैं परन्तु
इसके यह अर्थ नहीं कि मनुष्य दिन रात संभोग मे जुटा रहे।
पुरुष रोगों का कारण
अब तक मेरे पास लाखो स्त्रियां अपने तथा अपने पति के लिये
औषधियां लेने आईं उनके पतियों की दशा सुनकर मुझे इस बात
का अनुभव हुआ कि पुरुषो की अज्ञानता ( वीर्यनाश ) से ही
अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। श्रवण शक्ति का नाश होता है, नेत्रों की
ज्योति कम हो जाती है, शुक्र ऐसा पतला होजाता है कि वस्त्र
में लगने से जलवत किसी प्रकार का चिन्ह तक नहीं रहता ।
साधारण शक्ति ऐसी नष्ट हो जाती है कि स्त्री के दर्श स्पर्श से ही
धातु बहने लगती है। एव सन्तानोत्पादक शक्ति नाश हो जाती
है। मूत्र तो सदा जलन के साथ एव थोड़ा थोडा कई बार होता
है और शुक्र मेह का प्रादुर्भाव भी हो जाता है। जिसमे शौच