सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 704 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 326

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०१
सृष्टि और मनुष्य जाति
संसार की स्थिति सृष्टि पर ही निर्भर है और सृष्टि स्त्री
पुरुष ( नर मादा ) पर निर्भर है इसके अतिरिक्त दूसरा कोई
उपाय परमात्मा ने सृष्टि उत्पत्ति का नही रक्खा । वहुत मे जीव
ऐसे भी हैं कि जो विना नर मादा के ही उत्पन्न हो जाते है
परन्तु मनुष्य विना स्त्री पुरुष के उत्पन्न नही हो सकता। सृष्टि की
उन्नति के मुख्य प्राणी मनुष्य ही है। मनुष्यो से ही सृष्टि की
उन्नति और अवनति होती है इसी लिये मनुष्यो मे स्त्री पुरुष
का जोड़ा बनाया है । उत्तम सन्तान व जाति उत्पन्न होने के
लिये ऋषियो ने विवाह की प्रथा चलाई और चार आश्रमो का
नियम रक्खा । ब्रह्मचर्य आश्रम विद्या प्राप्त करने के लिये है ।
मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह विद्या प्राप्त करने के वाद विवाह
करके गृहस्थाश्रम मे प्रवेश कर दाम्पत्य जीवन का सच्चा आनन्द
और सुख भोगते हुए उत्तम सन्तान उत्पन्न कर परमात्मा की
सृष्टि मे सहायता दे ।
यह अत्यन्त खेद् की वात है कि ब्रह्मचर्य अवस्था (वाल्यावस्था)
से ही कुसंगति मे पड़कर अनेक होनहार वच्चे अनियमता से
वीर्य का सत्यानाश मार लेते है जिसके कारण आगे चलकर अनेक
अनर्थ होते हैं, अधर्म की वृद्धि होती है, शक्ति क्षीण हो जाती है
दीर्घजीवन की जगह् अल्पायु होती है और समाज मे अनेक
प्रकार के रोग दोष फैल जाते हैं ।