विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : १३७
[ धारणा-१०१ ]
यदवेद्यं यदग्राह्यं यच्छून्यं यदभावगम् ।
तत्सर्वं भैरवं भाव्यं तदन्ते बोधसम्भवः ॥१२४॥
यद् अवेद्यं ज्ञेयदशानास्पदम्, यद् अग्राह्यम् अनुपादेयम्, यत् शून्यं देवनयो-
पात्तं स्वातन्त्र्यस्वरूपम्, यद् अभावगं गगनकुसुमादिष्वपि सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन महा-
सामान्यरूपम्, तदेतत्सर्वं भैरवं भाव्यं भैरवत्वेन भावनीयम् । तद्भावनाप्रकर्षेण अन्ते
पर्यन्ते बोधसंभवः सम्यग् बोधो भवेत् । सर्वमेतद् ब्रह्मैव भवतीति दृढानुभवबलात्
सर्वत्र भैरवस्वरूपबोधवान् भैरव एव भवति, ब्रह्म सम्पद्यत इति भावः ॥१२४॥
जो अवेद्य है, अर्थात् जो ज्ञेय दशा में कभी नहीं आता, जो अग्राह्य अर्थात् अनुपादेय
है, जो शून्यस्वरूप है तथा जो गगन-कुसुम जैसे अभावात्मक पदार्थों में भी सत्ता का बोध
करा देता है, उसी की सर्वस्वरूप भैरव के रूप में भावना करनी चाहिये । इस भावना का
उत्कर्ष होने पर अन्त में सम्यग् बोध का आविर्भाव होता है ।
यहाँ शून्य तत्त्व परमार्थतः अभावात्मक नहीं है, किन्तु सभी आलम्बन धर्मों से, सभी
तत्त्वों से और सभी क्लेशाशयों से शून्य पदार्थ को ही शून्य नाम से अभिहित किया गया है ।
इस तरह से किसी अवर्णनीय, अविज्ञेय अवस्था (स्वातन्त्र्य शक्ति) को शाक्त मत में शून्यता
माना गया है । बौद्धसंमत शून्यता का इस शास्त्र में कोई स्थान नहीं है, जो कि अन्ततः
नास्तिकता का कारण बनती है । विमर्शदीपिका में शून्यता का स्वरूप इस तरह से वर्णित है—
स्वतन्त्रं परिपूर्णं च शिवारुख्यं शून्यधाम तत् ।
तत्त्वानि यत्र लीयन्ते यस्मात् समुदयन्ति च ॥
तत्त्वेश्वरास्ततो जातास्तत्रैव निवसन्ति च ।
क्षीयन्ते किल तत्रैव शिवारुख्ये शून्यधामनि ॥
दर्शनान्तरदृष्टानि यानि शून्यान्तराण्यपि ।
तेषामुत्पत्तिविलयौ शिवशून्ये सदोदिते ॥
न तदस्ति न यत्तत्र न तदस्ति न यत्र तत् ।
अन्तर्बहिरूपतया ततोऽन्यन्नोपपद्यते ॥
उपेयमितरन्नास्ति स्वातन्त्र्यात् परमे नये ।
तदनादृत्य गाहन्ते सौगताः शून्यतां जडाः ॥
अर्थात् स्वतन्त्र, परिपूर्ण शिव ही शून्यता का आश्रय स्थान है, जहाँ से कि सारे तत्त्व निकलते
हैं और उसी में लीन होते रहते हैं । इसी शिवनामक शून्य से तत्त्वों के अधिपतियों की सृष्टि
होती है और वे रहते भी इसी में हैं । इस शिवनामक शून्य लोक में वे लीन भी हो जाने
हैं । अन्य दर्शनों में इस शून्य के नाना स्वरूपों का वर्णन मिलता है, किन्तु उन सबका उदय
और विलय इस सदोदित शिव-शून्य में ही होता रहता है । ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो इस
शून्य में न रहती हो और न कोई ऐसी ही वस्तु है जहाँ कि शन्य न रहता हो । अन्दर या
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बाहर ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो कि उससे भिन्न हो । इस उत्कृष्ट शाक्त दर्शन में इस शून्य
से भिन्न कोई उपेय नहीं है । स्वतन्त्र शिव तत्त्व ही वस्तुतः शून्य नाम से यहाँ जाना जाता
है । इस शिव तत्त्व का अनादर कर बौद्ध दार्शनिक शून्यता का निरूपण गलत तरीके से
करते हैं ।
वस्तुतः यह शून्य शिव की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विलास है । यह शून्य रूप
स्वातन्त्र्य शक्ति से संवलित शिव तत्त्व आकाश-कुसुम जैसी अलीक वस्तुओं की भी सत्ता का बोध
करा देने में समर्थ होने से महासामान्य रूप होता है । प्रत्यभिज्ञाकारिका (१।५।१४) में इस
स्वातन्त्र्य शक्ति की स्फुरत्ता को ही महासत्ता बताया गया है । स्तवचिन्तामणि (श्लो० ६)
में यह परमेश्वर का सर्वसामान्य स्वरूप माना गया है । अभाव को भी अपना विषय बनाने
वाले इस महासामान्य का वर्णन महार्थमंजरीकार ने इस तरह से किया है—
कः सद्भावविशेषः कुसुमाद्भवति गगनकुसुमस्य ।
यत्स्फुरणानुप्राणो लोकः स्फुरणं च सर्वसामान्यम् ॥ (श्लो० ३२)
अर्थात् सामान्य पुष्प से आकाशकुसुम की क्या विशेषता है कि एक की सत्ता और दूसरे की
असत्ता प्रतीत होती है ? किसी वस्तु की स्फुरत्ता के आधार पर ही व्यक्ति भाव और अभाव
का बोध करते हैं । यह स्फुरत्ता गगन-कुसुम और सामान्य-कुसुम में समान है, अतः इनमें
ऐसी कोई भी विशेषता नहीं प्रतीत होती कि जिसके आधार पर इनमें भेद किया जा सके ।
इसका अभिप्राय यह है कि भावात्मक और अभावात्मक सभी पदार्थों में परमेश्वर की स्वातंत्र्य
शक्ति महासत्ता और स्फुरत्ता के रूप में अनुस्यूत है । अतः इस स्वातन्त्र्य शक्ति संवलित शिव
के अतिरिक्त शून्यता का बौद्धसंमत चतुष्कोटिविनिर्मुक्त लक्षण बन ही नहीं सकता, क्योंकि
यह सारा जगत् सदात्मक ही है । इसमें सदात्मक कोटि के अतिरिक्त अन्य कोटियों के स्फुरण
का कोई प्रसंग ही नहीं है ।
इस विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “यतो वाचो
निवर्तन्ते” (तै० उ० २।४), “न तत्र सूर्यो भाति” (कठो० ५।१५), “आनन्दाद्ध्येव खल्वि-
मानि भूतानि जायन्ते” (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियों में यह प्रतिपादित किया गया है
कि यह सारा जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है । श्रुति प्रतिपादित इस स्थिति में अपने अनुभव को दृढ़
करने पर साधक के चित्त में सर्वत्र भैरव-बोध का ही स्फुरण होने लगता है और इस तरह से
सर्वत्र ब्रह्म-दृष्टि का विकास होने से वह स्वयं ब्रह्म बन जाता है ॥१२४॥
[ धारणा-१०२ ]
नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापके कलनोज्झिते ।
बाह्याकाशे मनः कृत्वा निराकाशं¹ समाविशेत् ॥१२५॥
नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापके कलनोज्झिते बाह्याकाशे बाह्यगगने मनो विम-
र्शात्मकं ज्ञानं कृत्वा समापन्नं विधाय निरालम्बनचिदुदये सति निराकाशम् आकाशा-
१. ᵒशे-ख० ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १३९
निष्क्रान्तमशून्यं धाम समाविशेत्। नित्यत्वादिविशेषणप्रतिपादितव्यासिके बाह्याकाशे
शून्यधारणातिशयेन तदभ्यासातिशयाच्छून्यातिशून्यभूतं यद्धाम तत्रैव योगी समाविश-
तीति भावः ॥१२५॥
नित्य, निराश्रय, शून्य, व्यापक और कलना अर्थात् इयत्ता से रहित सर्वत्र व्याप्त
बाह्य आकाश में विमर्शात्मक ज्ञान से सम्पन्न मन को समाहित करने पर साधक के चित्त
में धीरे-धीरे निरालम्बन चिच्छक्ति का, घट, नील, सुख आदि विकल्पों से अतीत शुद्ध निर्वि-
कल्पक ज्ञान का उदय होने लगता है। इस धारणा के अभ्यास से अन्ततः वह निराकाश
अशून्य धाम में, अर्थात् शिव तत्त्व में समाविष्ट हो जाता है। पूर्व श्लोक की व्याख्या में
शिव तत्त्व को शून्यता का धाम अर्थात् आश्रय-स्थान बताया गया था। अतः यह उचित ही है
कि शून्यता का यह धाम शिव तत्त्व स्वयं अशून्य अर्थात् महासामान्य, महासत्ता स्वरूप माना
जाय। इसका अभिप्राय यह है कि नित्यत्व आदि विशेषणों से जिसकी सर्वव्यापकता प्रतीत
होती है, उस बाह्य आकाश में भी योगी जब शून्यता की भावना को दृढ़ करता है कि यह
भी कुछ नहीं है, तो इस भावना के अभ्यास को बढ़ाने पर उसके चित्त में सभी बाह्य
आलम्बनों का अभाव हो जाने से वह योगी शून्यता के आश्रयभूत अतिशून्य अर्थात् अशून्य शिव
तत्त्व में समाविष्ट हो जाता है ॥१२५॥
[ धारणा-१०३ ]
यत्र यत्र मनो याति तत्तत् तेनैव तत्क्षणम् ।
परित्यज्यानवस्थित्या निस्तरङ्गस्ततो भवेत् ॥१२६॥
यत्र यत्र विषये मनश्चाञ्चल्याद् याति तत्तद् वस्तु तत्सर्वम्, तेनैव अविकल्प-
संवेदनरूपेण मनसा तत्क्षणं परित्यज्य परिहृत्य, पुनरपि गतं चेत् पुनरपि प्रत्याहृत्य,
अनवस्थित्या चित्तवृत्तिनिरोधे सति वैराग्याभ्यासयुगलदाढर्यान्मनसो निरालम्बनता-
प्राप्तियुक्त्या, ततो निस्तरङ्गो भवेत् परभैरवावेशवान् परभैरवस्वरूपवान् भवेत् ॥१२६॥
अपनी चंचलता के कारण मन जहाँ-जहाँ भी जाता है, उन सब विषयों से उसको
निर्विकल्पक संवेदन के माध्यम से तत्काल हटा ले कि वस्तुतः उन विकल्पों की कोई वास्तविक
सत्ता नहीं है। हटा लेने के बाद भी यदि वह फिर वहीं चला जाता है, तो उसको पुनः वहाँ
से हटाने का निरन्तर अभ्यास करता रहे, जब तक कि वह पूर्णतः प्रत्याहृत नहीं हो जाता,
अपने वश में नहीं आ जाता। जैसा कि गीता के—
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ (६।२६)
इस श्लोक में प्रतिपादित है। इस तरह से अपने चित्त की वृत्तियों की विषय-प्रवणता को
रोक कर तथा वैराग्य और अभ्यास के द्वारा चित्त को एकाग्र बना कर उसको निरालम्बन,
(निर्विकल्पक) समाधि में स्थिर कर दे। योगी के इस समाधि दशा में स्थित हो जाने पर वह
निस्तरंग हो जाता है, अर्थात् सांसारिक विषय-विकल्पों के कारण उसके चित्त-समुद्र में तब
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किसी प्रकार का क्षोभ (चंचलता) नहीं उठता। इस स्थिति के स्थिर हो जाने पर वह
परभैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है।
अभ्यास और वैराग्य दोनों की सहायता से चित्त के निरोध की बात "अभ्यास-
वैराग्याभ्यां तन्निरोधः" (१।१२) इस योगसूत्र में तथा "अभ्यासेनैव कौन्तेय वैराग्येण च
गृह्यते" (६।३५) इस भगवद्गीता के वचन में भी प्रतिपादित है। 'यत्र यत्र' (श्लो० ७३,
११३-११४) इत्यादि श्लोकों में मन जिस विषय की ओर आकृष्ट हो, उसी में धारणा को
स्थिर करने की बात कही गई थी। यहां गीता के उपदेश के अनुसार मन के निरोध की बात
बताई गई है ॥१२६॥
[ धारणा-१०४ ]
१भया' सर्वं २रवयति सर्वदो३ व्यापकोऽखिले ।
इति भैरवशब्दस्य ४सन्ततोच्चारणाच्छिवः ॥१२७॥
भैरवपदान्तर्गतस्य 'भा ऐ र व' इत्यक्षरचतुष्कस्यायमर्थः-भया संवित्प्रकाश-
रूपया, ऐकारः क्रियाशक्तिमान् महेश्वरः, सर्वं रवयति विमृशतीति भैरवः। यद्वा भया
ज्ञानात्मिकया शक्त्या, ऐकारेण माहेश्वर्यात्मिकया क्रियाशक्त्या, सर्वमखिलमिदं विश्वं
विमृशतीति भैरवः। 'भिया' इति पाठे भिया भयेन अवति रक्षति नीलानीलसुखासुख-
वेद्यराशेः सर्वस्याहमिति विमर्शनादित्यसौ भैरवः। सर्वदो व्यापकोऽखिले। तया भया
सर्वं शुभाशुभं राति ददातीति सर्वदः, सर्वं वाति अनुगच्छति व्यापकतेयेति व्यापकः,
अखिले संसारे व्यापकतायाऽवस्थितो भैरव इत्येवमर्थानुसन्धानपूर्वकं भैरवशब्दस्य सन्त-
तोच्चारणात् अहर्निशमुच्चारणेन साधको बाह्याभ्यन्तरे सर्वत्र 'अहमस्मि' इत्यनुभव-
दार्ढ्याधिगमात् शिवः संपद्यते, साधकस्य परमशिवीभावोऽभिव्यज्यते। समस्ततादात्म्य-
भावनया जीवन्मुक्ततायां परमेश्वरैकरूपतावेशात् परसिद्धिलाभ इति तात्पर्यम् । तथा च
“न सावस्था न या शिवः” (स्प० २९) इत्यादिना एतदाम्नातमस्ति ॥१२७॥
'भैरव' पद में स्थित 'भा ऐ र व' इन चार अक्षरों के अर्थ को विस्तार से समझने
की आवश्यकता है। अकार अनुत्तर स्वरूप और इकार इच्छारूप है। अनुत्तर में विश्रान्ति
आनन्द अर्थात् आकार और इच्छा में विश्रान्ति ईशन अर्थात् ईकार कहलाती है। इसी लिये
आकार और ईकार में क्रिया-शक्ति का व्यापार चल पड़ता है। भा संवित्स्वरूप प्रकाश को
कहते हैं। इच्छा और ईशन अर्थात् इकार और ईकार जब आनन्दस्वरूप आकार और उसके
पूर्व में विद्यमान अनुत्तर धामरूप अकार में प्रविष्ट होते हैं, तो ये एकार का रूप धारण कर
लेते हैं, अर्थात् अनुत्तर और आनन्द का इच्छा या ईशन में प्रसार होने पर एकार की उत्पत्ति
१. भिया-ख० स्त०, भ्रियात्-त० ई० । २. रच°-त० । ३. °गो-ख० । ४. सत°-त० ।
- तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १४३; भा० ३, आ० ५, पृ० ४४८), स्तव-
चिन्तामणिटीका (पृ० २८) और ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० २१४)
में यह श्लोक उद्धृत है ।
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विज्ञानभैरव : १४१
होती है। इस एकार के साथ अनुत्तर या आनन्द का पुनः संघट्ट (सन्धि) होने पर ऐकार
की उत्पत्ति होती है। इस संघट्ट (सन्धि) से होने वाली उत्पत्ति के कारण ही एकार और
ऐकार सन्ध्यक्षर कहलाते हैं। इस संघट्ट के कारण ही संवित् का प्रकाश एक दूसरे में मिल-
कर नाना रूप धारण कर लेता है। यहाँ आकर क्रिया-शक्ति का व्यापार स्फुट (स्पष्ट) हो
जाता है। क्रिया-शक्ति की स्फुटता ही ऐकार का अर्थ है। अक्षरों के अर्थों के इस विश्लेषण
के आधार पर भैरव पद का अर्थ यह होगा—ऐकार रूप क्रिया-शक्ति से संयुक्त महेश्वर
अपने संवित् प्रकाश रूप स्वभाव से सारे पदार्थों का विमर्श करता है, अथवा अपनी भा अर्थात्
ज्ञानात्मिका शक्ति से और ऐकार अर्थात् माहेश्वर्य की अभिव्यञ्जिका क्रिया-शक्ति से अखिल
विश्व का विमर्श करता है, अतः इसको भैरव कहा जाता है। 'भिया सर्वं रवयति' ऐसा पाठ
मानने पर भैरव पद का अर्थ यह होगा कि नील आदि बाह्य और सुख आदि आन्तर समस्त
वेद्य राशि को अपने से अभिन्न बताकर यह भगवान् भैरव समस्त प्राणियों को भय से मुक्त
कर देते हैं। “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४।२) इस श्रुति के अनुसार अपने से भिन्न
किसी दूसरी वस्तु से ही भय हो सकता है। अपने से भिन्न जब कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं,
तब भय किससे होगा ? इस तरह से साधक के चित्त में अभेद बोध की उत्पत्ति
कर भैरव उसको भय से मुक्त कर देता है। भैरव पद का अर्थान्तर द्वितीय पाद से इस तरह
से स्पष्ट होता है—उस भा अर्थात् संवित्प्रकाश रूप शक्ति की सहायता से यह भैरव सभी
तरह के शुभ और अशुभ कर्मों का फल देता रहता है और सभी पदार्थों में व्यापक अन्तर्यामी
के रूप मे अनुस्यूत रहता है। जैसा कि ^1 “ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा” इस
वचन में प्रतिपादित है। इस तरह से भैरव शब्द के उक्त अर्थों का अनुसन्धान करते हुए जो
साधक रात-दिन इसका उच्चारण करता रहता है, उसके चित्त में बाह्य और आभ्यन्तर सभी
पदार्थों के प्रति यह सब कुछ मैं ही हूँ, इस तरह के दृढ़ अनुभव की अनुस्यूति निरन्तर चलती
रहने से भावना में दृढ़ता आने पर वह स्वयं शिव बन जाता है, साधक का परमशिव स्वभाव
प्रकट हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि साधक जब सभी जागतिक आन्तर-बाह्य भावों
में अपने तादात्म्य का विस्तार कर लेता है, तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है। तब वह स्वयं
परमेश्वर स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है और इस तरह से परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता
है। इसी लिये शास्त्रों में बताया गया है कि ऐसी कोई अवस्था नहीं है, जिसमें कि शिव न
प्रकाशित हो रहा हो ॥१२७॥
- “अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव
वा ॥” यह श्लोक महाभारत के वनपर्व (३०।२८) के अतिरिक्त अन्य अनेक पुराण
प्रभृति ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि अज्ञानी जीव अपने
सुख-दुःख के विधान में भी असमर्थ है। वह ईश्वर से प्रेरित होकर ही स्वर्ग अथवा नरक
में जाता है।
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१४२ : विज्ञानभैरव
[ धारणा-१०५ ]
अहं १ममेदमित्यादिप्रतिपत्तिप्रसङ्गतः ।
निराधारे मनो याति तद्ध्यानप्रेरणाच्छमी ॥१२८॥
अहम्, मम इदम्—इत्यादिन्यूनाहन्ताज्ञानप्रसङ्गेनापि निराधारे वस्तुनि प्रबुद्ध-
गोचरे पूर्णाहंभाव एव मनो याति, अहंविमर्शस्यात्रुटितत्वेन निर्विशेषत्वात् । परमानन्दा-
त्मकत्वमात्मनो न कदाचिद् विच्छिद्यते, पूर्णाहन्ताविमर्शस्य परमात्मत्वेन सर्वत्र सत्त्वात् ।
अप्रबुद्धादीनां सर्वेषामेक एवात्मा, सर्वेऽपि स्वात्मन्येव रागिणः । तस्मान्नात्र कञ्चिद-
प्रबुद्धो न कश्चित् प्रबुद्धः संप्रबुद्धो वा, किन्तु स्वतन्त्रः परमेश्वर एव तथा तथा सर्वत्र
भाति । अबोधबोधसंबोधकल्पनया तत्स्वातन्त्र्यं विघटते । अतो बोधादिविकल्परहित-
त्वेन शान्तो भवेत् । “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृ० उ० ४।४।१९) इति श्रुतिवचना-
नुसारं तद्ध्यानाभ्यासनेन प्रेरणात् अहंविमर्शाबाधिगमात् शमी शान्तद्वन्द्वोऽवाप्तपरनिर्वाणो
जायत इत्यर्थः ॥१२८॥
यह मैं हूँ, यह मेरा है, इस तरह के परिमित अहन्ता के ज्ञान से भी, जो कि समझ-
दार व्यक्ति को प्रतीत होने वाली पूर्ण अहन्ता दशा के ज्ञान से भिन्न नहीं है, अन्ततः निरा-
धार वस्तु में ही मन जाता है, क्योंकि अहंस্বরূপ का विमर्श वहाँ भी समान रूप में अनुस्यूत
रहता है । आत्मा का परमानन्दस्वरूप स्वभाव कभी भी विच्छिन्न नहीं होता । पूर्णाहन्ता का
विमर्श ही तो परमात्मा का परमानन्द स्वरूप है और वह पूर्णाहन्ता सर्वत्र विद्यमान है ।
अज्ञानी हो या ज्ञानी सबकी आत्मा एक ही है । सभी अपनी आत्मा में अनुराग रखते हैं ।
अतः अपनी आत्मा के साथ होने वाले इस अनुराग को ही परमेश्वर का भजन मान सकते
हैं । शास्त्रों में प्रेम को ही ब्रह्म माना गया है । न्यूनता और पूर्णता के आधार पर स्वात्म-
स्वरूप के विमर्श का विच्छेद या प्रादुर्भाव नहीं माना जा सकता । अतः ज्ञानी हो या अज्ञानी,
वह रहेगा आनन्दस्वभाव ही । इसी लिये महेश्वरानन्द प्रभृति ने यह बताया है कि जीव अविद्या
में पड़ा हुआ हो या उससे मुक्त हो, वह अपनी आनन्दात्मक स्थिति के कारण स्वात्मविषयक
परम प्रेम से कभी विलग नहीं होता, जैसा कि महार्थमंजरी के इस श्लोक में वर्णित है—
नन्वात्मनः प्रियार्थं सर्वस्य प्रियत्वं भणति श्रुतिः ।
तस्मादानन्दस्वभाव आत्मा मुक्तोऽप्यमुक्तो वा ॥ (श्लो० ५५)
“आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति” (बृ० उ० २।४।५) यह श्रुति बताती है कि
मनुष्य अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये सब से प्रेम करता है । इसलिये मुक्त हो या
बद्ध आत्मा सदा आनन्दस्वभाव ही है । पञ्चदशी नामक वेदान्त ग्रन्थ में भी बताया
गया है—
मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनीक्ष्यते ।••••
अतस्तत्परमं तेन परमानन्दतात्मनः ॥ (१।८-९)
१. मम मये०-ख० ।
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विज्ञानभैरव : १४३
अर्थात् मेरी स्थिति सदा रहे, ऐसा न हो कि मैं कभी न रहूँ, इस तरह का प्रेम आत्मा में
देखा जाता है । इस आत्मप्रेम से बढ़कर और कोई प्रेम नहीं है, अतः आत्मा को परमानन्द-
स्वभाव मानना पड़ता है । भट्ट उत्पल ने भी अपनी स्तोत्रावली में कहा है—
त्वमेवात्मेश ! सर्वस्य सर्वश्चात्मनि रागवान् ।
इति स्वभावसिद्धां त्वद्भक्तिं जानन् जयेज्जनः ॥ (१।७)
अर्थात् हे स्वतन्त्र प्रभु, आप ही प्रत्येक पुरुष की आत्मा हैं और प्रत्येक पुरुष अपनी आत्मा से
अनुराग रखता है । इस प्रकार स्वभावतः, अर्थात् अनायास ही होने वाली आपकी भक्ति को
जो भक्त अपनी समावेश दृष्टि से जान लेता है, वह इस संसार को जीत लेता है ।
इस दृष्टि से विचार करने पर यहाँ न तो कोई अज्ञानी ही है और न कोई ज्ञानी
अथवा परम ज्ञानी ही है, किन्तु स्वतन्त्र परमेश्वर ही इन सभी रूपों में भासित होता रहता
है । अज्ञानी, ज्ञानी और परम ज्ञानी की कल्पना से उस परमेश्वर का स्वातन्त्र्य नष्ट हो जाता
है । इसलिये ¹अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्ध आदि विकल्पों से मुक्त होकर साधक को शान्तभाव
से स्वात्मस्वरूप का चिन्तन करते रहना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि "इस जगत् में
नाना पदार्थों की कोई सत्ता नहीं है" इस श्रुति वचन के अनुसार मन को निराधार (निर्वि-
कल्प) बना कर अपने परमार्थ स्वरूप के ध्यान का अभ्यास करने से चित्त शान्त हो जाता है,
उसको एक प्रकार का बल प्राप्त होता है, जिससे कि साधक के सभी प्रकार के द्वन्द्व शान्त
हो जाते हैं और उसको परम निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है ॥१२८॥
[ धारणा-१०६ ]
नित्यो विभुर्निराधारो व्यापकश्चाखिलाधिपः ।
शब्दान् प्रतिक्षणं ध्यायन् ¹कृतार्थोऽर्थानुरूपतः ॥१२९॥
विभुः परमेश्वरः, नित्य-निराधार-व्यापक-अखिलाधिपत्वादिरूप इति अर्थानु-
रूपतः अर्थानुसन्धानपूर्वकं तान् शब्दान् प्रतिक्षणं मुहुर्मुहुः ध्यायन् चिन्तयन् कृतार्थः
कृतकृत्यो भवति । जानामि, करोमीत्यत्रैव मुक्तस्वभावः स्यादिति भावः ॥१२९॥
स्वतन्त्र-स्वभाव प्रभु परमेश्वर नित्य, निराधार, व्यापक और सारे जगत् का स्वामी
है, इस तरह से नित्य आदि शब्दों के अर्थ का बार-बार अनुसन्धान करते हुए जो साधक
१. प्रकृतार्था-ख० ।
- अप्रबुद्ध, प्रबुद्धकल्प, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्धकल्प और सुप्रबुद्ध—इन पाँच प्रकार के प्रमाताओं का
विवेचन विरूपाक्षपंचाशिका की ४१-४४ कारिकाओं में किया गया है । स्पन्दकारिका के
१७, १९-२०, २५, ४४ संख्या के श्लोकों में अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध का स्वरूप
वर्णित है । इन शब्दों की चर्चा पहले भी हो चुकी है ।
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१४४ : विज्ञानभैरव
अपने चित्त को एकाग्र कर लेता है, वह कृतकृत्य हो जाता है। अर्थात् सर्वज्ञता आदि गुणों
से विशिष्ट शिव ही सर्वत्र व्याप्त है, उससे भिन्न किसी भी वस्तु की कोई सत्ता नहीं है,
वही सब कुछ करता है, इस तरह से ईश्वर के ऐश्वर्यबोधक नामों के अर्थ का चिन्तन करने
वाला योगी धीरे-धीरे यह जान जाता है कि यह सारा ऐश्वर्य मेरा ही है। मुझसे भिन्न
किसी की कोई सत्ता नहीं है, सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता आदि गुण भी मेरे ही है। यह स्वाभाविक
बात है कि इस स्थिति पर पहुँच जाने पर वह सभी प्रकार के विकल्पों से मुक्त हो अपने
स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय। स्पन्दकारिका के ‘गुणादिस्पन्द’ इत्यादि श्लोकों में इसी स्थिति
का वर्णन मिलता है। इन श्लोकों को उद्धृतकर उनकी व्याख्या पहले (पृ० १०७) की जा
चुकी है। नामकीर्तन का माहात्म्य भट्ट नारायण की स्तवचिन्तामणि में अनेक स्थलों पर
(श्लो० १९,७९,८२) वर्णित है। इनका यही अभिप्राय है कि बिना अर्थ का चिन्तन किये
ईश्वर के केवल नाम मात्र के उच्चारण से भी मानव मोक्ष पर्यन्त सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
यही प्रस्तुत धारणा का भी प्रतिपाद्य है ॥१२९॥
[ धारणा-१०७ ]
अतत्त्वमिन्द्रजालाभमिदं ¹सर्वमवस्थितम् ।
किं तत्त्वमिन्द्रजालस्य ²इति दाढर्याच्छमं व्रजेत् ॥१३०॥
इदं सर्वं जगत्, अतत्त्वं निस्तत्त्वरूपम्, असारमिति यावत्। अत एव इन्द्रजाला-
भम् इन्द्रजालतुल्यमवस्थितं वर्तते। इन्द्रजालस्य किं तत्त्वम् ? न किञ्चिदित्यर्थः।
अतः सर्वमिदमिन्द्रजालवत् प्रतीयमानं जगन्न वस्तुसदिति भावनादार्थ्यात् साधकः
शमं व्रजेत्। सद्वस्तुव्यपदेश्यं प्रमातृतत्त्वमितो भिन्नमेवेति भावनाबलेन तत्त्वविदो
निर्वाणपदावाप्तिर्भवेदिति भावः ॥१३०॥
यह सारा जगत् निस्तत्त्व है, अर्थात् सारहीन है। इसी लिये इसकी स्थिति इन्द्रजाल
के समान है, जादूगर की बनाई हुई चीजों की भांति है। जादूगर अपने जादू से, हाथ की
सफाई से जिन वस्तुओं को जिस रूप से दिखाता है, क्या उनकी कोई वास्तविक सत्ता है ?
नहीं। जैसे उनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। उसी तरह से यह प्रतीयमान जगत् भी
वास्तविक नहीं है। इस परमार्थ दृष्टि में जो साधक अपनी भावना को दृढ़ करता है, वह
शान्त समाधि में लीन हो जाता है। अर्थात् परमार्थसत् नाम से जाना जाने वाला प्रमातृ-
तत्त्व इस इन्द्रजाल तुल्य संसार से सर्वथा पृथक् है; अपनी भावना के आधार पर इस वस्तु-
स्थिति को समझने वाला तत्त्ववेत्ता निर्वाण पदवी को प्राप्त कर लेता है ॥१३०॥
[ धारणा-१०८ ]
आत्मनो निर्विकारस्य क्व ज्ञानं क्व च वा क्रिया ।
ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ॥१३१॥
आत्मनो निर्विकारस्य बोधात्मकस्य चिदात्मनो निर्विभागत्वेन निर्विकारत्वात्
१. °वं व्य°—ख०। २. चेति—ख०।
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विज्ञानभैरव : १४५
ज्ञानं क्व, क्व च वा क्रिया। ज्ञानक्रिये विकारे एव। विकारयोरनयोर्निर्विकारे चिदा-
त्मनि स्थितिनैव भवितुमर्हति। बहिर्भावाः सर्वे बाह्याः पदार्था ज्ञानायत्ता एव प्रति-
भान्ति, अतो ज्ञानक्रिययोर्विकारभूतयोर्वस्तुतोऽभावादिदं सर्वं जगत् शून्यमेव ध्यायेत्।
एवं ज्ञेयकार्यादिरूपं जगदपि न किञ्चिदिति निरूढशुद्धसंविदोऽनुत्तरभावप्राप्तिरिति
तात्पर्यम्। ज्ञानक्रियादिशक्त्ययोगाज्ज्ञेयादिकल्पना कुतः ? न कुतश्चन । अतो निर्वि-
कल्पात्मकस्य निर्विकल्पमेवेदं जगत् प्रतिभासत इति भावः ॥१३१॥
बोधात्मक चिदात्मा निर्विभाग होता है, अर्थात् बोध की चिद्धनता के कारण उसमें
विभाग की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिये वह निर्विकार है। चिदात्मा के निर्विकार
होने से इसमें ज्ञान और क्रिया की स्थिति नहीं रह सकती, क्योंकि ये दोनों भी तो विकार
ही हैं। बाह्य पदार्थ की सत्ता ज्ञान और क्रिया पर ही आधृत है। अतः ज्ञान और क्रिया के
अभाव में यह सारा जगत् शून्यस्वभाव ही माना जायगा, अर्थात् इसकी कोई पारमार्थिक
सत्ता नहीं मानी जायगी। चन्द्रज्ञान नामक आगम ग्रन्थ में शून्य के स्वरूप का वर्णन इस
तरह से किया गया है—
अध ऊर्ध्वं दिशः सर्वा भूमिरापोऽनलस्तथा।
वायुश्च खं मनो बुद्धिरहङ्कारश्च ये गुणाः ॥
सर्वं शून्यं निरालम्बं तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
यत्किञ्चित् सकलं भावरूपं तन्त्रेषु वर्णितम् ॥
तदसारतरं चन्द्र मायास्वप्नोपमं स्थितम्।
भ्रान्तिं त्यजस्व वै पुत्र सर्वं शून्ये प्रतिष्ठितम् ॥
शून्यात् प्रवर्तते शक्तिः शक्तेर्वर्णाः प्रजज्ञिरे।
वर्णेभ्यश्च तथा मन्त्रा मन्त्रेभ्यः सृष्टिरव्यया ॥
तस्माच्छून्यं जगद् ध्यायेन्न नश्येत् कदाचन ।
अर्थात् नीचे, ऊपर, सभी दिशाएँ, भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, 1मन, बुद्धि,
अहंकार तथा सत्त्व, रज, तम आदि गुण—ये सब निरालम्ब, निराधार, शून्यस्वभाव हैं। शून्य
में ही इन सबकी स्थिति है। शास्त्रों में भावरूप में वर्णित सभी पदार्थ नितान्त सारहीन हैं।
हे चन्द्र, इनकी स्थिति इन्द्रजाल से कल्पित वस्तुओं जैसी अथवा स्वप्न में दिखाई पड़ने वाली
वस्तुओं की सी क्षणिक एवं अवास्तविक है। हे पुत्र, तुम अपने इस भ्रम को दूर कर दो कि
- मन, बुद्धि अहंकार—यह क्रम पूर्व वर्णित (पृ० १००) अद्वयसम्पत्तिवार्त्तिक के अनुसार
है। सांख्य-संमत क्रम होगा—मन, अहंकार और बुद्धि । अहंकार शब्द के अर्थ के भेद
के कारण ऐसा होगा । इसका विवेचन पहले (पृ० १००-१०१) व्याख्या और टिप्पणी में
किया जा चुका है।
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१४६ : विज्ञानभैरव
इनकी कोई पारमार्थिक सत्ता है। वस्तुतः परिदृश्यमान सभी पदार्थ शून्य में प्रतिष्ठित हैं, अर्थात्
शून्यस्वरूप हैं। इस शून्य से ही शक्ति की प्रवृत्ति होती है। शक्ति से वर्ण पैदा होते हैं। वर्णों
से मन्त्र और मन्त्रों से यह कभी नष्ट न होने वाली सृष्टि होती है। इसलिये इस जगत् की
शून्य के रूप में ही उपासना करना चाहिये। ऐसा करने वाला साधक कभी नष्ट नहीं होता।
इस तरह से ज्ञान और क्रिया के विषय के रूप में, ज्ञेय और कार्य के रूप में भासित
हो रहे इस जगत् की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है, इस वस्तुस्थिति का ज्ञान जिसको भली
भाँति हो गया है, उसको अनुत्तर भाव की, पारमार्थिक शिवस्वरूप की अधिगति (प्राप्ति) हो
जाती है। जब ज्ञान और क्रिया की ही कोई वास्तविक स्थिति नहीं है, तो उनके विषय के रूप
में प्रतीत हो रहे ज्ञेय, कार्य आदि पदार्थों की कल्पना कहाँ से होगी ? अर्थात् आधार के अभाव
ये सब स्वयं कुछ भी सिद्ध नहीं हो पावेंगे। इस भावना के दृढ़ हो जाने पर निर्विकल्प स्वभाव
योगी के चित्त में यह सारा जगत् निर्विकल्प रूप में ही भासित होता है। अर्थात् उसके चित्त
में निर्विकल्प शिवभाव की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥१३१॥
[ धारणा-१०९ ]
१न मे बन्धो न मोक्षो मे 'भीतस्यैता विभीषिकाः ।
प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥१३२॥
मम चिन्मात्ररूपस्य न बन्धो मोक्षो वा, देशकालाद्यपरिच्छिन्नत्वात्, परिच्छि-
न्नस्यैव बन्धमोक्षभावात् । केवलमेता बन्धमोक्षादिकल्पना मायाशक्तिवशादपरामृष्ट-
स्वरूपस्य भीतस्यैव "द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४।२) इति द्वैतत्रस्तस्यैव, न तु
चिदद्वैतपरामर्शशीलस्य। विभीषिका चटकभीत्युत्पादनशालिरक्षणार्थाः पलालपुरुषाद्याः।
तत्त्वज्ञानिनस्तु किं करिष्यन्त्येताः-अनेन बन्धनम्, इदं न कर्तव्यम्, इदं कर्तव्यम्,
अनेनैव मोक्षः-इत्याद्याः कल्पनाः। यथा विवस्वतः सूर्यस्य प्रतिबिम्बमेव प्रतीपं जल-
मध्येऽस्ति, तथा बुद्धिरेव परिमितविषया बद्धोऽहं मुक्तोऽहमित्याकारा प्रतीपेति
मम किमायातुम्, बुद्ध्याद्यवभासकत्वेन तदतीतत्वादिति बुद्धिमेव परित्यजेत् ॥१३२॥
मैं तो चिन्मात्रस्वरूप हूँ। अतः देश, काल आदि से परिच्छिन्न न होने के कारण मैं
न तो किसी बन्धन में ही पड़ता हूँ और न उस बन्धन से मुझे किसी तरह का कोई छुटकारा
ही मिलना है। परिच्छिन्न वस्तु में ही बन्ध और मोक्ष का व्यवहार होता है। यह सब बन्ध-
मोक्ष आदि की कल्पना केवल उसी के लिये है, जो कि माया के कारण अपने स्वरूप को ठीक
से न समझ पाने से भयभीत है। श्रुति में कहा गया है कि दूसरे से भय होता है। अतः द्वैत
के भय से त्रस्त व्यक्ति के लिए ही बन्ध-मोक्ष आदि की कल्पना उसी तरह से की गई है, जैसे
१. बाल°-ख० ।
- तन्त्रालोक विवेक (भा० २, आ० ३, पृ० २७) में यह श्लोक उद्धृत है।
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विज्ञानभैरव : १४७
कि खेत के बीच में पक्षियों से अनाज की रक्षा के लिये फूस का आदमी बना कर खड़ा कर
दिया जाता है। चिद्घन, अद्वय तत्त्व को जिसने परमार्थ रूप में समझ लिया है, उस योगी के
लिये यह बन्ध-मोक्ष की व्यवस्था कुछ भी नहीं है। इस कार्य को करने से मनुष्य बन्धन में
पड़ता है, अतः इसको नहीं करना चाहिये; इस कार्य को करने से मोक्ष मिलता है, अतः इसका
अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; तरह की सारी बातें तत्त्वज्ञानी की दृष्टि से कोरी कल्पनाएं
हैं, जैसा कि कहा गया है—
निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ।
अर्थात् त्रिगुणातीत पथ पर विहार करने वाले, विचरण करने वाले योगियों के लिये
विधि क्या है और निषेध क्या ? इसका अभिप्राय यह है कि ऐसे मनीषी विधि और निषेध की
सीमा से ऊपर उठ जाते हैं। महाकवि कल्हण ने एक सुन्दर सुभाषित के रूप में इसी भाव को
व्यक्त किया है—
शालीन् पलालपुरुषोऽवति यः कृशानु-
दग्धाननश्चटकपेटकभीतिदानैः ।
त्रातुं स एव विहितो विपिने विदध्यात्
किं तत्र भञ्जनकृतां वनकुञ्जराणाम् ॥
अर्थात् फूस का बनाया गया मुझौंसा आदमी, जिसका कि मुँह आग से जलाकर काला
कर दिया गया है, खेत में खड़ा कर दिया जाय तो वह पक्षियों को डरा कर उनसे अनाज की
रक्षा कर सकता है, किन्तु वह जंगलों में भी तोड़-फोड़ मचा देने वाले हाथियों का क्या
बिगाड़ लेगा ? इसका अभिप्राय यह है कि जैसे यह पलाल-पुरुष मतवाले हाथी का कुछ भी
नहीं बिगाड़ सकता, उसी तरह से बन्ध-मोक्ष का भय भी ज्ञानी पुरुष को भयभीत नहीं कर
सकता। वह तो समझता है कि जैसे सूर्य ही जल के बीच में प्रतिबिम्ब के रूप में उलटा भासित
होता है, उसी तरह से परिमित विषय वाली बुद्धि ही 'मैं बद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ' इत्यादि आकारों
में परिणत होती रहती है। इससे मेरा क्या बनता-बिगड़ता है ? ये सब कल्पनाएँ बुद्धि आदि
में ही भासित होती हैं, चिदात्मा तो इनसे अतीत है। अतः साधक को इन भयजनक कल्पनाओं
से भरी बुद्धि का परित्याग कर देना चाहिये। तभी वह अपने स्वाभाविक स्वात्मस्वरूप में
प्रतिष्ठित हो सकता है ।।१३२।।
[धारणा-११०]
इन्द्रियद्वारकं सर्वं सुखदुःखादिमङ्गमम्¹ ।
इतीन्द्रियाणि संत्यज्य स्वस्थः स्वात्मनि वर्तते ॥१३३॥
संबध्यमानसुखदुःखादिमयं सर्वमिन्द्रियद्वारायातम्, न तु मम चिदात्मनो
वास्तवमिति हेतोरिन्द्रियाणि परित्यजेत्। इन्द्रियाणामेष एव सम्यक् त्यागो यत्
१. ॰गतम्-ख० ।
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१४८ : विज्ञानभैरव
स्वस्थत्वं स्वरूपावस्थितत्वम् स्वरूपचिन्मात्रविलासज्ञानमिन्द्रियाणां स्वस्थत्वं
वर्तते। 'वर्तते' इति लिङर्थे लट्। ततश्च आत्मसंस्थ एव तिष्ठेतेत्यर्थः। द्रष्टा दृश्यं
दर्शनं चेति भेदकल्पनात्यागादात्मनि स्वस्थः स्वात्मैव भवतीति भावः ॥१३३॥
इस चिदात्मा से संबद्ध से प्रतीत हो रहे सुख, दुःख आदि सभी व्यापार इन्द्रियों के
माध्यम से ही प्राप्त होते हैं, ये सब चिदात्मा के वास्तविक धर्म नहीं हैं। इसलिये इन
आरोपित धर्मों से छुटकारा पाने के लिये इन्द्रियों का ही परित्याग कर देना चाहिये। चित्त के
अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाने पर अपने आप इन्द्रियों से छुटकारा मिल जाता है। जैसा
कि योगवासिष्ठ में कहा गया है—
एते हि चिद्विलासान्ता मनोबुद्धीन्द्रियादयः। (६ पृ०।७८।३१)
अर्थात् चिद्विलास की, चित्स्वरूप की अभिव्यक्ति होने पर मन, बुद्धि और इन्द्रियों
का खेल खतम हो जाता है। श्लोक में 'वर्तते' पद में लट् लकार का प्रयोग लिङ् के अर्थ में
किया गया है, अतः वर्तते का अर्थ होगा वर्तेत, अर्थात् रहे। अभिप्राय यह् है कि द्रष्टा, दृश्य
और दर्शन इस तरह की भेद कल्पनाओं का आधार ये इन्द्रियाँ ही हैं। जब उक्त धारणापद्धति
से चिद्विलास में इनका उपसंहार हो जाता है, तो वे अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती हैं।
अतः साधक को चाहिये कि वह उक्त भावना के अभ्यास से भेद कल्पना का परित्याग कर
स्वात्मस्वरूप में भली भाँति प्रतिष्ठित होने के लिये निरन्तर सचेष्ट रहे ॥१३३॥
[धारणा-१११]
१ज्ञानप्रकाशकं सर्वं२ सर्वेणात्मा प्रकाशकः।
३एकमेकस्वभावत्वाज्ज्ञानं ज्ञेयं४ विभाव्यते ॥१३४॥
सर्वं प्रकाश्यं वेद्यं वस्तुजातं ज्ञानप्रकाशकमस्ति। “कृत्यल्युटो बहुलम्”
(३।३।११३) इति ज्ञानपदस्य कर्तरि प्रयोगेण ज्ञानं वेदकात्मा प्रकाशको यस्य तदेवं-
विधम्, वेदकप्रकाश्यं वेद्यमित्यर्थः। वेदकसाध्यं वेद्यत्वमुक्त्वा वेद्यसाध्यं वेदकत्वमित्याह-
सर्वेणात्मेति। सर्वेण वेद्यजातेन आत्मा वेदकः प्रकाशकारी भवति। वेद्यमृते किमपेक्षं
वेदकत्वं वेदकस्य ? वेदक इति कस्य वेदक इत्यर्थः। अतो वेद्यमेव जीवितं ददाति
वेदकस्येति विभावनीयम्। एवमेकस्वभावत्वाद् वेद्यत्वं वेदकत्वस्वरूपं वेदकत्वं च
वेद्यत्वस्वरूपमिति एकप्रकृतिकत्वाद् ज्ञानं वेदकं ज्ञेयं च एकमेव तत्त्वमिति विशेषेण
भावयेत्। प्रकाशकं ज्ञानं नात्मनः पृथक्, सर्वशब्दवाच्यं ज्ञेयजातं ज्ञानान्न पृथगित्यैक्यं
१. ०नं-शि० २. ०र्वमात्मा चैव-ख० शि०। ३. एव०-ख०, अनयोरपृथग्भावाज्ज्ञाने ज्ञानी
प्रकाशते-शि०। ४. ज्ञेये-ख०।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३७) में यह श्लोक उद्धृत है।
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विज्ञानभैरव : १४९
भावयेदिति भावः। अथवा न किमपि प्रकाशाद् व्यतिरिक्तं भाति, वर्तते वेति सर्वं
चिन्मयमेव विभाव्य यज्ज्ञानं तदेव ज्ञेयादीति तत्त्वज्ञाननिष्ठः संभवतीति भावः ॥१३४॥
सभी प्रकाश्य, अर्थात् वेद्य वस्तुएँ ज्ञान से प्रकाशित होती हैं। यहां 'कृत्यल्युटो
बहुळम्' इस पाणिनि सूत्र के आधार पर ज्ञान शब्द कर्ता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अतः
‘वेदक स्वरूप ज्ञान जिसका प्रकाशक है' इस व्युत्पत्ति के आधार पर यह अर्थ होता है कि
सभी वेद्य वस्तुएं वेदक अर्थात् आत्मा में प्रकाशित होती हैं। इस तरह वेदक आत्मा के कारण
प्रतीत हो रही वेद्य वस्तुओं की बात कह कर अब यह वेदक आत्मा भी वेद्य वस्तु के अधीन
है, इस बात को दूसरे पाद (चरण) में बताया गया है कि सब वेद्य वस्तुओं के रहने से ही
आत्मा वेदक अर्थात् उनका प्रकाशक हो सकता है। बिना वेद्य वस्तुओं के वेदक आत्मा की
वेदकता (प्रकाशकता) कहाँ से आवेगी ? यह वेदक आत्मा किसको प्रकाशित करेगा ? इसलिये
यह मानना पड़ेगा कि वेद्य वस्तु ही वेदक (प्रकाशक) आत्मा को स्वरूप प्रदान करती है। इस
तरह से वेद्य वेदकस्वरूप और वेदक वेद्यस्वरूप होने से दोनों की प्रकृति एक ही है, अतः
साधक को इस बात का सावधानी से विचार करना चाहिये कि ज्ञान की वेदकता और ज्ञेय
की वेद्यता में वस्तुतः एक ही तत्त्व भासित हो रहा है। जैसा कि निम्न श्लोक में बताया
गया है—
¹यावन्न वेदका एते तावद् वेद्याः कथं प्रिये ।
वेदकं वेद्यमेकं तु तत्त्वं.... .... ....॥
प्रकाश्य और प्रकाशक की एकता निम्न श्लोक में भी प्रदर्शित है—
प्रकाशमानं पृथक् प्रकाशात्
स च प्रकाशो न पृथग् विमर्शात् ।
नान्यो विमर्शोऽहमिति स्वरूपाद्
अहंविमर्शोऽस्मि चिदेकरूपः ॥
अर्थात् प्रकाशमान वस्तु प्रकाश से पृथक् नहीं है और वह प्रकाश विमर्श से कभी
अलग नहीं होता। यह विमर्श भी स्वात्मस्वरूप (मै हूँ) से भिन्न नहीं होता। अतः विमर्श-
स्वरूप एवं चिदात्मक तत्त्व मैं ही हूँ। इसका अभिप्राय यह है कि प्रकाशक ज्ञान आत्मा से
भिन्न नहीं है और सभी शब्दों से बोधित होने वाले ज्ञेय पदार्थ भी ज्ञान से पृथक् नहीं हैं।
इस तरह से ज्ञान और ज्ञेय की एकता की भावना करने से साधक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित
हो जाता है। अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि 'प्रकाशमानं' इत्यादि वचन
के अनुसार प्रकाश से अतिरिक्त किसी भी वस्तु का न तो ज्ञान ही होता है और न वह वस्तु
विद्यमान ही है। इस लिये—"ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्" इस वचन के
अनुसार ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीनों वास्तव में कुछ नहीं हैं, किन्तु प्रकाश के कारण ही
यह सब कुछ भासित हो रहा है। इस लिये सब कुछ चिन्मय है, ऐसी भावना करने से
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ४) में यह श्लोक उच्छुष्मभैरव का बताया गया है ।
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१५० : विज्ञानभैरव
तत्त्वज्ञानी को यह प्रतीत होने लगता है कि जो ज्ञान है, वही ज्ञेय अथवा ज्ञाता भी है। सब
कुछ प्रकाशात्मक शिवमय है। इस प्रकार के ज्ञान का उन्मेष होने पर साधक शिव बन
जाता है ॥१३४॥
[धारणा-११२]
¹मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टयम् ।
यथा प्रिये परिक्षीणं तथा तद्भैरवं वपुः ॥१३५॥
हे प्रिये, मानसं संकल्पात्मकं मनः, चेतना बुद्धिः, शक्तिः प्राणाख्या, आत्मा
एतदुपहितो जीवः परिमितप्रमाता-इत्येतच्चतुष्टयं यदा परिक्षीणं चिच्चमत्कारता-
मापन्नं तदा तत् पूर्वोक्तं भैरवं वपुः परभैरवस्वरूपम्, व्यज्यत इति शेषः । एतच्चतुष्टय-
मुपाधिमयं मायीयोपाधिगलनाद् यदा क्षीयते, तदा चिच्छेषतया हिमनिर्मुक्तभास्करवत्
प्रकाशमानः प्रकाश एवावशिष्यत इति दृढानुभवसमधिगमात् साक्षाद् भैरव एव
भवतीति भावः ॥१३५॥
हे प्रिये, संकल्पात्मक मन, चेतनात्मक बुद्धि, प्राणनामक शक्ति और इनसे उपहित
परिमित प्रमाता—ये चारों जब सब तरह से विलीन हो जाते हैं, अर्थात् जब ये साधक को
चिति के चमत्कारमात्र प्रतीत होने लगते हैं, तब वह “अन्तः स्वानुभवानन्दा” (श्लो० १५)
इत्यादि ग्रन्थ से पूर्व प्रतिपादित भैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसका अभिप्राय यह है
कि साधक जब इन चारों स्थितियों को माया की उपाधि (उपज) मान लेता है, तो माया की
अलीकता के आधार पर इन चारों स्वरूपों की स्थिति क्षीण हो जाती है और केवल चिति
बच रहती है। इस स्थिति में साधक हिम (कुहरे) से निर्मुक्त सूर्य के समान मायीय आवरणों
से निर्मुक्त चिति के प्रकाश से आलोकित हो उठता है, प्रकाशमय बन जाता है। अर्थात् इस
तरह की भावना का दृढ़ अभ्यास करने पर साधक साक्षात् भैरव हो जाता है।
इस प्रकार यहाँ निर्विकल्प अवस्था की प्राप्ति के लिये ११२ धारणाओं का वर्णन
किया गया है। इनमें से किसी एक धारणा में चित्त को एकाग्र करने वाला साधक जीवन
पर्यन्त ²जीवन्मुक्त दशा में रहता है और मृत्यु के उपरान्त विदेह-मुक्ति को प्राप्त करता है,
अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप से उसका स्वरूप अभिन्न हो जाने से वह ईश्वर बन जाता है।
“न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, अत्रैव समवलीयन्ते” (बृ० उ० ४।४।६) इस बृहदारण्यक श्रुति
के अनुसार निष्कल ब्रह्म की उपासना करने वाला जीव कहीं आता-जाता नहीं है। पशु प्रमाता
(अज्ञानी जीव) जैसे स्वर्ग या नरक में जाता है, अथवा जैसे सकल ब्रह्म का उपासक अर्चिरादि
- स्पन्दनिर्णय (पृ० २३) और शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५१) में यह श्लोक प्रमाण रूप से
उद्धृत है। - विदेह-कैवल्य को ही विदेह-मुक्ति कहा जाता है, जिसकी कि चर्चा पहले (पृ० ११६) आ
चुकी है। आगे भी (पृ० १५२ और १५४-१५५ में) जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्ति की
व्याख्या की गई है।
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विज्ञानभैरव : १५१
मार्ग से ब्रह्मलोक में जाता है, उस तरह की गति अर्थात् उत्क्रमण निष्कल ब्रह्म के उपासक
का नहीं होता, किन्तु उसके प्राण तो गरम तवे पर पड़ी पानी की बूँद की तरह वहीं लीन हो
जाते हैं । यही स्थिति शास्त्र में— "जिज्ञासारहितं शुद्धं निर्विकल्पं परं परम्" जिज्ञासा रहित
शुद्ध निर्विकल्पक परम पद के नाम से कही गई है । कठोपनिषद् में इसका वर्णन इस प्रकार
किया गया है—
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ।। (२।३।१०)
अर्थात् जब जीव की पाचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर (निश्चल=निष्क्रिय) हो
जाती हैं और बुद्धि भी काम करना बन्द कर देती है, तो इसी स्थिति को परम गति कहा
जाता है । यहाँ 'परम गति' शब्द से प्रतिपादित स्थिति और पहले बताये गये भैरव के स्वरूप
में (भैरवी मुद्रा अथवा शाम्भवी मुद्रा में) कोई अन्तर नहीं है । यह स्थिति निष्कल ब्रह्म के
उपासकों के लिये स्वतः सिद्ध है । इसके लिये मरने के बाद तिल, अन्न, मधु (शहत) आदि
मिलाकर बनाये गये पिण्डों को देने की जरूरत नहीं रहती । इनकी आवश्यकता तो कार्म ¹मल
से आवृत पशु (अज्ञ) जीवों के लिये ही है । सहज भाव से निष्कल ब्रह्म के उपासक साधक
के लिये पूजा, जप, ध्यान आदि की परिभाषाएँ भी बदल जाती हैं, जैसा कि अभी आगे
बताया जायगा ।
यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जैसे साधक की जीवन्मुक्ति दशा में कर्तृत्व और
ज्ञातृत्व की प्रतीति होती है, उसी तरह से मृत व्यक्ति में भी इनकी उपलब्धि क्यों नहीं
होती ? इसका उत्तर यह है कि परमेश्वर नित्य एवं स्वतन्त्र है । उसका स्वातन्त्र्य यही है कि
जब यह जीवदशा को प्राप्त कर लेता है, तो यह देह, इन्द्रिय प्रभृति खिलौनों से खेलने लगता
है और जब कभी अपने स्वरूप में विश्रान्ति ले लेता है, तो वह बाह्य स्पन्दों का परित्याग कर
स्वात्म-स्पन्द में ही प्रतिष्ठित हो जाता है, जैसा कि सुषुप्ति प्रभृति दशाओं में होता है । जब
शरीर छूट जाता है, तो उस समय परात्मा अपने स्वातन्त्र्य के कारण कभी क्षुब्ध न होने
वाली निष्क्रिय अवस्था को स्वीकार कर लेता है, अतः उस समय ज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि की
उपलब्धि नहीं होती । जैसा कि भैरवस्रोत के ग्रन्थ अनुत्तरभट्टारक में कहा गया है—
- तत्त्वप्रकाशकार ने १८ वीं कारिका में मल का लक्षण बताया है कि मल एक है और
अनेक प्रकार की शक्तियों से युक्त है । यह पुरुष की ज्ञान और क्रिया शक्ति को उसी तरह
से ढक लेता है, जैसे कि भूसी चावल को और कालिमा तांबे को ढके रहती है । इस तरह
से द्वैतवादी शैवों के यहाँ मल आत्मा में रहने वाला द्रव्यविशेष माना गया है । अद्वैतवादी
दार्शनिक ऐसा नहीं मानते । वे संसार के अनादि कारण अज्ञान को ही मल कहते हैं ।
यह मल तीन तरह का होता है— आणव, मायीय और कार्म । अणु (जीव) गत अज्ञान
ही उसके परमार्थ स्वरूप को ढक लेता है । इसी को आणव मल कहते हैं । माया शक्ति
के अधीन मल मायीय तथा पुण्य और पाप कर्मों की वासना से उत्पन्न मल कार्म मल
कहलाता है ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१५२ : विज्ञानभैरव
मृतचेष्टस्य पिण्डस्य न किञ्चिदुपलभ्यते ।
सुखं दुःखं न चैवास्ति परमानन्दभावनात् ॥
जिज्ञासारहितं स्थानं यत्र देवो निरञ्जनः ।
अकालकलनाहेतुर्गमागमविवर्जितः ॥
निरालम्बो निरुत्साहः शून्यभूतः शिवः स्वयम् ।
संज्ञानाशेन निर्जीवसंज्ञा सा व्योमरूपिणी ॥
अर्थात् प्राण-पखेरु के उड़ जाने से जिसकी सारी चेष्टाएँ समाप्त हो गई हैं, ऐसे मृत
शरीर को कुछ भी बोध नहीं होता, न तो उसको सुख का अनुभव होता है और न दुःख का
ही, क्योंकि वह तो परम आनन्द की भावना में लीन हो गया है । वह उस जिज्ञासारहित
स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ पर कि काल की कलना और आवागमन से रहित, निरालम्ब,
निरुत्साह, शून्यस्वरूप, निरंजन देव शिव स्वयं निवास करते हैं । संज्ञा के नष्ट हो जाने पर
शरीर निर्जीव हो जाता है, किन्तु इस दशा में वह आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हो जाता
है । इसी प्रसंग में शिव ने देवी को यह भी कहा है—
विचरामि न चैकाकी कदाचिच्छून्यरूपता ।
सर्वं सर्वमयश्चाहं तद् रमेऽहं त्वया सह ॥
कदाचिदीदृशं विश्वं दृश्यमेतदितीरितम् ।
अर्थात् मैं कभी अकेला नहीं रहता, तब भी कभी-कभी शून्य स्वरूप हो जाता हूँ । मैं
सब कुछ हूँ । यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है । मैं जब तुम्हारे साथ विहार करता हूँ, तभी
कदाचित् यह जगत् दृश्य के रूप में परिणत हो जाता है ।
देहपात के अनन्तर भी देह में आत्मा की स्थिति मानने के ही कारण जैमिनीय
शाखा वाले अन्त्येष्टि संस्कार के समय निर्जीव पिण्ड में भी विष्णुसंबंधी २१ स्नानों का विधान
करते हैं । ऐसा न मानने पर “अविनाशी वा अरेऽयमात्मा” (बृ० उ० ४।५।१४), “नित्यो
नित्यानाम्” (क० उ० २।२।१३), “न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनञ्जयः” (यो०
चू० उ० २६) इत्यादि वचन प्रामाणिक नहीं रह जायेंगे । इस लिये मृत्यु के उपरान्त
भी भैरव शरीर निर्विकल्प अवस्था में विद्यमान रहता है, इस बात को मानने में कोई दोष
नहीं प्रतीत होता ।
इस निर्विकल्प भैरवावस्था में नित्य प्रविष्ट होने से इस रहस्य मार्ग का अनुसरण
करने वाले व्यक्तियों के लिये तीर्थाटन आदि कर्मकाण्ड अनावश्यक हैं, इस बात को निम्न
श्लोक में जयरथ ने भी कहा है—
बहुलमहसि बोधे प्रोच्छलत्येकरूपे
जननमरणभाषां कातराः कल्पयित्वा ।
अविदितपरमार्थस्तीर्थदेवालयादि-
श्रयणमुपदिशन्तो हन्त ! नापत्रपन्ते ॥
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विज्ञानभैरव : १५३
अर्थात् महान् महिमाशाली एकरस बोधभैरव की विद्यमानता में भी कायर आदमी
जन्म और मरण की कल्पना करके उससे मुक्ति पाने के लिये, परमार्थ तत्त्व का ज्ञान न होने
से, तीर्थयात्रा, देवदर्शन आदि उपायों का उपदेश करते हुए लज्जित नहीं होते, हाय ! इससे
बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है ?
इस रहस्य मार्ग में श्रद्धा रखने वाले विवेकी पुरुष तो जीवन्मुक्ति को भी तुच्छ
समझते हैं, तब वे पशुदर्शन की प्राणभूत अन्त्येष्टि संस्कार जैसी बातों की उपेक्षा कर दें, तो
इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है ? जैसा कि निम्न श्लोक में बताया गया है—
नयकलनया यस्योद्भूते विवेकपरामृते
तृणमिव न सा जीवन्मुक्तिर्गता गणनीयताम् ।
प्रमयसमये प्रत्यासन्ने स्वसंविदि संस्फुरन्
अभिलषति नैवान्त्येष्ट्याद्याः क्रियाः पशुकल्पिताः ॥
अर्थात् रहस्य शास्त्रों का अभ्यास करने से जिसको विवेकरूपी परम अमृत दशा प्राप्त
हो गई है, उसको यह जीवन्मुक्ति तृण की तरह तुच्छ लगती है। मृत्यु का समय समीप आने
पर अपने संवित्स्वरूप में विचरण करने वाला योगी पशुशास्त्रों में विहित अन्त्येष्टि संस्कार
जैसे क्रियाकलापों की अभिलाषा नहीं रखता। मृत व्यक्ति को पिण्ड दान करने की बात भी
उपहासास्पद है। जैसा कि कहा गया है—
प्राग्जन्मकोटिसमुपार्जितदुष्कृतौघ-
खेदावहं कमपि पिण्डमवैति जन्तुः ।
ऊर्ध्वोर्ध्वशासनरतोऽपि गुरुर्मूताय
तस्मै समर्पयति पिण्डमिति प्रमादः ॥
अर्थात् पहले के करोड़ों जन्मों में इकट्ठे हुए पाप कर्मों के कारण प्राणी इस दुःख-
दायी पिण्ड (शरीर) को पाता है। जब यह मर जाता है, अर्थात् जब इस पिण्ड से पिण्ड छूट
जाता है, तब इस सर्वोत्कृष्ट शिवशास्त्र का अनुसरण करने वाला गुरु भी पुनः उसको पिण्ड
देने की बात करे, तो इससे बढ़ कर प्रमाद की बात ओर क्या हो सकती है ?
इस रहस्यशास्त्र का अभ्यास करने वाले साधक के लिये जन्म और मरण एक सरीखे
हैं। ये जन्म-मरण शरीर के धर्म हैं, आत्मा के नहीं। भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में इस
विषय को विस्तार से समझाया गया है। छान्दोग्य श्रुति के निम्न वचन में भी यही बात
कही गई है—‘‘जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते’’ (छा० उ० ६।११।३) ।
अर्थात् जीव (प्राण) से रहित शरीर को ही मरा हुआ कहा जाता है, जीव (आत्मा) कभी
नहीं मरता ।
शान्त-तरंग समुद्र के समान मन को निश्चल कर देने वाली ऊपर उपदिष्ट ११२
धारणाओं में से किसी एक धारणा के अभ्यास से मन के निश्चल हो जाने पर योगी के चित्त
में दो प्रकार की दशाएँ उत्पन्न होती हैं—देह के रहते जीवन्मुक्ति तथा देह के छूट जाने पर
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१५४ : विज्ञानभैरव
विदेह-मुक्ति, जिनका कि अभी ऊपर निर्देश किया जा चुका है। इनमें से जीवन्मुक्ति दशा में
मन, बुद्धि, प्राणशक्ति और आत्मा (परिमित अहन्ता)—ये चारों स्थितियाँ नष्ट हो जाती हैं,
क्योंकि जीवन्मुक्त योगी सर्वत्र सदा चिन्मात्र दशा में ही सावधानी से पड़ा रहता है और यह
समझता है कि यह सारा जागतिक प्रपंच उस चिति का ही चमत्कार है। इस स्थूल देह के
छूट जाने पर उसको शान्त बोधस्वरूप दूसरे दिव्य देह की प्राप्ति होती है, क्योंकि वह तो
परमेश्वर स्वरूप ही हो जाता है। उसको इस दूसरे देह तक उत्क्रमण की, (जाने की) आव-
श्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि आत्मा तो सर्वत्र व्याप्त है, वह जायगा कहाँ ? जैसा कि वीर-
यामल में कहा गया है—
उत्क्रान्तिर्विद्यते यस्य तस्य स्यान्मानकल्पना ।
अमाने शून्यनिभसि कस्योत्क्रान्तिः क्व च क्रमेत् ॥
यदि सर्वगतो देवो वदोत्क्रम्य क्व यास्यति ।
अथासर्वगतो देवो घटतुल्यस्तदा भवेत् ॥
अर्थात् जिसकी उत्क्रान्ति हो, अर्थात् जो कहीं अन्यत्र जाता हो, उसको परिच्छिन्न
ही मानना पड़ेगा। अपरिच्छिन्न, शून्यस्वभाव आत्मा की उत्क्रान्ति कैसे हो सकती है ? वह
जायगा भी कहाँ ? यदि परमेश्वर सर्वगत है, तो यह बताया जाय कि वह कहाँ जायगा ? अब
यदि वह असर्वगत माना जाता है, तब तो वह घड़े की तरह जड़ हो जायगा ।
मृत्यु के उपरान्त मुक्ति जीवन्मुक्त की ही होती है, देह को आत्मा मानने वाले और
कर्मकाण्ड के अनुष्ठान में लगे रहने वाले अज्ञानी को यह मुक्ति नहीं मिल सकती । उसकी
वासनाएँ मलिन हैं, अतः वह परलोक में ही जायगा । श्राद्ध करना, पिण्ड दान करना आदि
उसी के लिये सहायक हो सकते हैं। देह में आत्मा के इस अभिमान की वासना का वर्णन
श्रीमदाचार्य अभिनवगुप्त ने मालिनीवार्त्तिक में इस प्रकार किया है—
अस्ति मे पिण्डदोऽद्याहं पिण्डदानक्रमात्तथा ।
प्राप्नोम्यवयवाभोगं पूर्णदेहोऽस्मि सुस्थितः ॥
अदृष्टक्रियया पुत्रशिष्यस्वाम्यादिकल्पतया ।
स्वर्गभाग्यहम त्यन्तमात्तसद्भोगसुस्थितः ॥
नास्ति मे पिण्डदः कश्चित् स्वयं चास्म्यतिदुष्कृती ।
न मे त्रातास्ति कुत्रापि पतामि नरकार्णवे ॥ (पृ० ९९)
अर्थात् मुझे पिण्ड दान करने वाला कोई है। प्रतिदिन पिण्ड दान मिलने के ही
कारण धीरे-धीरे एक अवयव का आकार प्राप्त करता हुआ अन्त में मैं सम्पूर्ण देह से परिपूर्ण
सुव्यवस्थित हो गया हूँ। पुत्र, शिष्य, स्वामी आदि के द्वारा सम्पादित सत्कर्मों से उत्पन्न
अदृष्ट के कारण आज मैं स्वर्ग का अधिकारी हो गया हूँ और अच्छे कर्मों का फल भोग रहा
हूँ। मुझे कोई पिण्ड देने वाला नहीं है और मैं स्वयं बड़ा पापी हूँ। मेरा कोई रक्षक नहीं
है। मैं घोर नरक में पड़ने वाला हूँ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १५५
वस्तुतः यह अपनी संवित्ति का ही माहात्म्य है कि इस तरह से भ्रान्तिवश व्यक्ति
स्वर्ग और नरक की कल्पना कर लेता है । इसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं है । जिस व्यक्ति
को इस स्थिति का ज्ञान हो जाता है, वह उक्त धारणाओं में से किसी एक में अपने मन को
एकाग्र कर कृतकृत्य हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, उसका परमार्थ भैरव
स्वरूप प्रकट हो जाता है । ॥१३५॥
निस्तरङ्गोपदेशानां शतमुक्तं समासतः ।
द्वादशाभ्यधिकं देवि यज्ज्ञात्वा ज्ञानविज्जनः ॥१३६॥
हे देवि, इत्थं मया समासतः संक्षेपेण ¹निस्तरङ्गोपदेशानां स्थिरधारोपदेशानां
स्वात्ममात्रविश्रान्तिप्रदानां द्वादशाभ्यधिकं शतं द्वादशोत्तरशतमुक्तम् । एतदेव विज्ञाय
जनो ज्ञानविद् भवति साक्षाद् भैरवसारूप्यमवैतीति तात्पर्यम् ॥१३६॥
देवी के द्वारा पूछे गये प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत कर इस प्रकरण का उपसंहार करते
हुए भगवान् भैरव कहते हैं कि हे देवि, इस तरह से मैंने संक्षेप में यहां ११२ निर्विकल्पक
धारणाओं का उपदेश किया है । ये सभी धारणाएँ साधक के चित्त को निस्तरंग (स्थिर) बना
देने वाली हैं, जिससे कि उसकी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठा हो जाती है । इन धारणाओं को
ठीक से समझ लेने पर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है, अर्थात् साक्षात् भैरव बन जाता है ॥१३६॥
अत्र चैकतमे युक्तो जायते भैरवः स्वयम् ।
वाचा करोति कर्माणि शापानुग्रहकारकः ॥१३७॥
अत्र च एकतमे एतेषु उपदेशेषु मध्ये एकस्मिन्नपि युक्तः समाहितः, एतासु
धारणास्वन्यतमनिष्ठवान् मायीयोपाधिसंवलितवेद्यराशिपतितैन्द्रियगणोऽपि, वाचा
कथनमात्रेण, न पुनः प्रयत्नेनेत्यर्थः, शापानुग्रहादिकार्याणि करोति । तत्रापि तथैव
समाध्येकीभावनया तत्तदुज्झित्य निस्तरङ्गप्रकाशवान् स्वयं साक्षाद् भैरवो भवतीति
निश्चयः ॥१३७॥
ऊपर बताये गये उपदेशों में से किसी एक में भी समाहित हो जाने वाला साधक,
अर्थात् इन धारणाओं में से किसी एक का भी निष्ठापूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, भले
ही इस मायामय उपाधि से आविर्भूत जागतिक प्रपंच में रम रहा हो, बिना प्रयत्न के वचन
मात्र से सब कुछ कर सकता है, किसी को भी शाप या वरदान देने में समर्थ हो सकता है ।
इस प्रकार की सामर्थ्य के आ जाने पर भी जो साधक इसका उपयोग न कर निरन्तर समाधि
- तन्त्रालोकविवेककार जयरथ ने 'निस्तरङ्ग' शब्द का अर्थ 'स्वात्मस्वरूप में विश्राम ले
लेने के कारण शान्तस्वरूप' (निस्तरङ्गा स्वात्ममात्रविश्रान्त्या शान्तरूपेत्यर्थः—भा० ३,
आ० ५, पृ० ३९९) ऐसा किया है । इन धारणाओं के अभ्यास से भी साधक स्वात्म-
स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । अतः इन धारणाओं को निस्तरंग उपदेश बताना
उचित ही है ।
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में लीन बना रहता है, उसके चित्त में निस्तरंग (स्थिर) स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो
जाती है, वह स्वयं साक्षात् भैरव बन जाता है, यह ध्रुव सत्य है ॥१३७॥
अजरामरतामेति सोऽणिमादिगुणैर्युतः¹।
योगिनीनां प्रियो² देवि सर्वमेलापकाधिपः³ ॥१३८॥
जीवन्नपि विमुक्तोऽसौ कुर्वन्नपि न⁴ लिप्यते ।
हे देवि, स साधकः, उक्तधारणाभ्यासादार्ढ्येन अजरामरताम् एति प्राप्नोति,
अणिमादिगुणैर्युतः सन् विज्ञानात्मकसोमपानाद् योगिनीनां ज्ञानक्रियानन्दादिशक्तीनां
प्रियः सर्वमेलापकाधिपो भवति सकलस्यास्य वेद्यवेदकादिराशेः खिलीकृतस्वभावोऽत्यन्त-
निर्मलचिद्वपुरद्वैतप्रकाशमयः परमात्मा भैरवः संपद्यत इति तात्पर्यार्थः । असौ स
साधकः, जीवन्नपि विमुक्तो जीवन्मुक्त एव । पश्यन्नपि, शृण्वन्नपि, जिघ्रन्नपि इत्यादि
चेष्टितं कुर्वन्नपि न लिप्यते । कर्माणि कुर्वन्नपि तत्फलैर्न लिप्यत इति भावः ॥१३८॥
श्रुति में देवताओं ने कहा है कि “सोमरस का पान कर हम अमर हो गये हैं”। जैसे
देवगण सोमरस का पान कर अजर-अमर हो गये, उसी तरह से ऊपर बताई गई धारणाओं
में दृढ़ अभ्यास से प्राप्त हुए विज्ञान रूपी सोमरस का पान कर योगी अजर और अमर हो
जाता है। उसको अणिमा प्रभृति सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। वह ¹योगिनियों का, ज्ञान-
क्रिया-आनन्द प्रभृति शक्तियों का स्वामी हो जाता है और सभी मेलापकों का अधिपति बन
जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि वह योगी इस जगत् की सभी वेद्य (ज्ञेय) और वेदक
(ज्ञापक) वस्तुओं को तिरस्कृत कर अत्यन्त निर्मल चिन्मय शरीर को धारण कर अद्वय, प्रकाश-
मय परमात्मा, अर्थात् साक्षात् भैरव बन जाता है। इस प्रकार का साधक जीवन्मुक्त कहलाता
है। वह देखना, सुनना, सूँघना, प्रभृति क्रियाकलापों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं
होता, उनमें रस नहीं लेता। जैसा कि भगवान् ने गीता में कहा है—
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ।।
प्रलपन् विसृजन् गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।....
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ (५।८-१०)
१. °णान्वितः-क० । २. प्रभुर्दे°-ख० । ३. °कारकः-ख० । ४. च चेष्टितम्-क० ।
- कौल मत में साधक को वीर अथवा सिद्ध और साधिका को योगिनी कहा जाता है।
सिद्धों और योगिनियों के संघट्ट को मेलापक कहते हैं। ११२ प्रकार की धारणाओं में
से किसी एक का भी सहारा लेकर योगी इस मेलापक का अधिपति हो जाता है,
सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेता है, सिद्धों और योगिनियों का सारा समुदाय इसी के
निर्देश के अनुसार चलता है। योगिनीप्रिय और मेलापकाधिप इन दो शब्दों का यही
साम्प्रदायिक अर्थ है।