सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 206

विज्ञानभैरव : १४९
भावयेदिति भावः। अथवा न किमपि प्रकाशाद् व्यतिरिक्तं भाति, वर्तते वेति सर्वं
चिन्मयमेव विभाव्य यज्ज्ञानं तदेव ज्ञेयादीति तत्त्वज्ञाननिष्ठः संभवतीति भावः ॥१३४॥
सभी प्रकाश्य, अर्थात् वेद्य वस्तुएँ ज्ञान से प्रकाशित होती हैं। यहां 'कृत्यल्युटो
बहुळम्' इस पाणिनि सूत्र के आधार पर ज्ञान शब्द कर्ता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अतः
‘वेदक स्वरूप ज्ञान जिसका प्रकाशक है' इस व्युत्पत्ति के आधार पर यह अर्थ होता है कि
सभी वेद्य वस्तुएं वेदक अर्थात् आत्मा में प्रकाशित होती हैं। इस तरह वेदक आत्मा के कारण
प्रतीत हो रही वेद्य वस्तुओं की बात कह कर अब यह वेदक आत्मा भी वेद्य वस्तु के अधीन
है, इस बात को दूसरे पाद (चरण) में बताया गया है कि सब वेद्य वस्तुओं के रहने से ही
आत्मा वेदक अर्थात् उनका प्रकाशक हो सकता है। बिना वेद्य वस्तुओं के वेदक आत्मा की
वेदकता (प्रकाशकता) कहाँ से आवेगी ? यह वेदक आत्मा किसको प्रकाशित करेगा ? इसलिये
यह मानना पड़ेगा कि वेद्य वस्तु ही वेदक (प्रकाशक) आत्मा को स्वरूप प्रदान करती है। इस
तरह से वेद्य वेदकस्वरूप और वेदक वेद्यस्वरूप होने से दोनों की प्रकृति एक ही है, अतः
साधक को इस बात का सावधानी से विचार करना चाहिये कि ज्ञान की वेदकता और ज्ञेय
की वेद्यता में वस्तुतः एक ही तत्त्व भासित हो रहा है। जैसा कि निम्न श्लोक में बताया
गया है—
¹यावन्न वेदका एते तावद् वेद्याः कथं प्रिये ।
वेदकं वेद्यमेकं तु तत्त्वं.... .... ....॥
प्रकाश्य और प्रकाशक की एकता निम्न श्लोक में भी प्रदर्शित है—
प्रकाशमानं पृथक् प्रकाशात्
स च प्रकाशो न पृथग् विमर्शात् ।
नान्यो विमर्शोऽहमिति स्वरूपाद्
अहंविमर्शोऽस्मि चिदेकरूपः ॥
अर्थात् प्रकाशमान वस्तु प्रकाश से पृथक् नहीं है और वह प्रकाश विमर्श से कभी
अलग नहीं होता। यह विमर्श भी स्वात्मस्वरूप (मै हूँ) से भिन्न नहीं होता। अतः विमर्श-
स्वरूप एवं चिदात्मक तत्त्व मैं ही हूँ। इसका अभिप्राय यह है कि प्रकाशक ज्ञान आत्मा से
भिन्न नहीं है और सभी शब्दों से बोधित होने वाले ज्ञेय पदार्थ भी ज्ञान से पृथक् नहीं हैं।
इस तरह से ज्ञान और ज्ञेय की एकता की भावना करने से साधक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित
हो जाता है। अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि 'प्रकाशमानं' इत्यादि वचन
के अनुसार प्रकाश से अतिरिक्त किसी भी वस्तु का न तो ज्ञान ही होता है और न वह वस्तु
विद्यमान ही है। इस लिये—"ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्" इस वचन के
अनुसार ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीनों वास्तव में कुछ नहीं हैं, किन्तु प्रकाश के कारण ही
यह सब कुछ भासित हो रहा है। इस लिये सब कुछ चिन्मय है, ऐसी भावना करने से

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ४) में यह श्लोक उच्छुष्मभैरव का बताया गया है ।