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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १५
किसी दूसरे को वैखरी वाणी से नहीं सुनाना चाहिये । इसलिये मैं भी तुम्हारे इन प्रश्नों का
उत्तर पश्यन्ती और मध्यमा वाणी के माध्यम से ही दे रहा हूँ, वैखरी वाणी में न ह्
तुम भी ऐसा ही करोगी, इसी विश्वास पर तुमको यह सुना रहा हूँ, अन्यथा मैं न सुनाता ॥७॥
यत्किञ्चित् सकलं रूपं भैरवस्य प्रकीर्तितम् ॥८॥
तदसारतया देवि विज्ञेयं¹ शक्रजालवत् ।
मायास्वप्नोपमं चैव गन्धर्वनगरभ्रमम् ॥९॥
ध्यानार्थं भ्रान्तबुद्धीनां क्रियाडम्बरवर्तिनाम् ।
केवलं वर्णितं पुंसां विकल्पनिहतात्मनाम् ॥१०॥
हे देवि, भैरवस्य सकलं निष्कलं चेति द्विविधं रूपं शास्त्रेषु प्रकीर्तितं वर्णितम् ।
तत्र प्रसिद्धमेतत् सकलं जगद्रूपं नीलपीतघटपटादिनानावैचित्र्यात्मकं सर्वमसारतया
अवस्तुतया गन्धर्वनगरभ्रमसदृशम् इन्द्रजालतुल्यं मायानिर्मितं स्वप्नावलोकितवस्तुसदृशं
च असत्स्वरूपमेव मन्तव्यम् । भ्रान्तबुद्धीनाम् अप्रबुद्धमतीनाम् आडम्बरबहुलासु
क्रियासु निरतानाम् 'अहं विष्णुं भजामि, अहं गणपतिं यजामीति स पुत्रवित्तादिकं मे
दास्यति' इत्येवं विकल्पनिहतात्मनां पुंसां केवलं स्थूलध्यानयोगार्थमेवैतत् सकलं स्वरूप-
मित्यर्थः । सम्प्रति तावदियती योग्यता एषामुत पद्यतामिति धिया तद्वर्णितम्, न तु तत्त्व-
बुभुत्सून् प्रति तदुक्तमिति भावः ॥८-१०॥
भगवान् भैरव इस गोपनीय रहस्य को बताने से पहले हेय वस्तु को छोड़ने की तथा
उपादेय वस्तु को ग्रहण करने की बात मन में बैठाते हैं। कि हे देवि, भैरव के सकल और
निष्कल ये दो रूप शास्त्रों में बताये गये हैं। इनमें सकल नाम से प्रसिद्ध यह जगत् रूप अर्थ
नील-पीत, घट-पट आदि नाना विचित्र रूपों में भासित होता है, वह सब इन्द्रजाल के समान
माया से निर्मित और ¹गन्धर्व-नगर के भ्रम के समान, स्वप्न में देखी गई वस्तु के समान
अस्थिर और असत्स्वरूप है। अर्थात् इन्द्रजाल, गन्धर्वनगर आदि की सत्ता जैसे भ्रम पर
आधारित है, वैसे ही यह सकल स्वरूप भी भ्रम पर आधारित होने से ही असार है। इस
तरह की भ्रान्त बुद्धि वाले, फल की आकांक्षा से नाना कर्मकाण्डों में रुचि रखने वाले, 'मैं
विष्णु की पूजा करता हूँ, मैं गणपति की पूजा करता हूं, ये मुझे पुत्र, धन आदि देंगे' इस
तरह के भाँति-भाँति के संकल्प-विकल्पों के कारण अपने वास्तविक स्वरूप से अपरिचित
व्यक्तियों के लिये यह सकल स्वरूप उपदिष्ट है। इसका उपदेश इसलिये किया है कि निष्कल
स्वरूप मे प्रवेश पाने के लिये साधक को पहले सकल स्वरूप में ध्यान की योग्यता प्राप्त हो।
सक ल स्वरूप का यह उपदेश तत्त्व के जिज्ञासुओं के लिये नहीं है ॥८-१०॥
१. °यमिन्द्र°-ख० ।
1 इन्द्रजाल, गन्धर्वनगर, मृगमरीचिका, रज्जुसर्प, वेशोण्ड्रक प्रभृति शब्दों का प्रयोग दार्शनिक
गण विभ्रमात्मक सृष्टि, भ्रम से पैदा होने वाले मिथ्या ज्ञान के लिये करते हैं ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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१६ : विज्ञानभैरव
तत्त्वतो च नवात्माऽसौ शब्दराशिर्न भैरवः ।
न चासौ त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ॥११॥
नादबिन्दुमयो वापि न चन्द्रार्धनिरोधिकाः¹ ।
न चक्रक्रमसंभिन्नो न च शक्तिस्वरूपकः ॥१२॥
तत्त्वतो यथार्थतः, असौ भैरवो न नवात्मा न वा तत्त्वस्वरूपः, न वा वामा-
दिनवशक्तित्वरूपः। न शब्दराशिवमियः। न चासौ त्रिशिरोभैरवः। न च शक्तित्रयात्मकः
नरशक्तिशिवात्मा, इच्छाज्ञानक्रियाशक्तित्रयात्मा वा। न वा नादबिन्दुमियः शिवशक्ति-
स्वरूपः, नादः शक्तिः, बिन्दुश्च शिव इति। न वा अर्धचन्द्रनिरोधिकादिस्वरूपः। न
च चक्रक्रमसंभिन्नः षट्चक्रादिभेदगः, तकारादिक्षकारान्तवर्णचक्रस्वरूपो वा। न वा
कुण्डलिन्यादिशक्तिस्वरूपभाक् । वस्तुतस्तु स्वात्मभैरव एव परमार्थतोऽकथ्योऽपि यां
काञ्चित् कल्पनामाश्रित्य उपदिदिक्षाविषयीकृतः सन् प्रश्नतनवात्मशब्दराश्याद्यष्टक-
स्वरूपो भवतीति भावः ॥११-१२॥
वास्तव में यह भैरव न तो नवात्मा, नव तत्त्वस्वरूप या वामादि नव शक्तिरूप है,
न शब्दराशित्वरूप है, न त्रिशिरोभैरव है, न नर-शक्ति-शिवात्मक या इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक
शक्तित्रयस्वरूप ही है। यह न तो शिव-शक्तिस्वरूप, अर्थात् नाद¹ (शक्ति) और बिन्दु (शिव)
के रूप में शब्द और अर्थ स्वरूप है, अथवा ज्ञान और क्रिया स्वरूप है और न प्रणव (ॐकार)
की अर्धचन्द्र, निरोधिका आदि कलाएं ही उसका स्वरूप हैं। यह न तो षट्चक्रों का भेदन
करके ही जाना जाता है, अथवा अकारादि क्षकारान्त वर्णचक्र में विद्यमान अहंत्वरूप ही है
और न कुण्डलिनी आदि शक्ति के स्वरूप को धारण करने वाला है। परीक्षा करने पर ऊपर
बताये गये नवात्म प्रभृति सभी स्वरूप उस बोधभैरव का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते, क्योंकि
वह स्वात्मस्वरूप भैरव तो वस्तुतः अकथ्य है, अवर्णनीय है। उसको समझाने के लिये किसी
न किसी कल्पना का सहारा लेना पड़ेगा। ऊपर वर्णित सभी स्वरूप इस तरह की कल्पनाओं
के सहारे ही खड़े हैं। जैसा कि भट्ट उत्पल ने अपनी प्रत्यभिज्ञाकारिका में बताया है—
स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः ।
प्रभुरीशादिसंकल्पनैर्मयि व्यवहारयेत् ॥ (१।५।१६)
इसका अभिप्राय यह है कि स्वातन्त्र्य अर्थात् अनन्यमुखप्रेक्षित्त्व (किसी भी कार्य को
करते समय किसी भी तरह की सहायता के लिए किसी का भी मुंह न ताकना) आत्मा का
सहज स्वभाव माना जाता है। अद्वयस्वभाव बोधभैरव अपने स्वातन्त्र्य के कारण अपने इस
स्वभाव का परित्याग किये बिना ही मैं ईश्वर (भगवान्) या नित्य, विभु, स्वतन्त्र जीवात्मा
१. ०धकः-ख०।

  1. शिव और शक्ति के अर्थ में नाद और बिन्दु शब्दों के प्रयोग के विषय में उपोद्घात में
    सूक्ष्म विचार किया गया है।

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विज्ञानभैरव : १७
बनूं, इस तरह संकल्प अर्थात् अपनी विमर्श शक्ति के व्यापार से पूज्य-पूजक, ध्यातृ-ध्येय
आदि स्वरूपों की कल्पना करके यह स्वरूप पूज्य है, ध्येय है और यह स्वरूप पूजक है,
ध्याता है, इस तरह के नाना व्यवहारों की कल्पना करता रहता है ।
इसी सिद्धान्त के आधार पर भैरव का कहना है कि ऊपर बताए गये सभी स्वरूप
उस परम तत्त्व को समझाने के लिये की गई केवल कल्पनाएं हैं ॥११-१२॥
¹अप्रबुद्धमतीनां हि ²एता बालविभीषिकाः ।
मातृमोदकवत् सर्वं प्रवृत्त्यर्थमुदाहृतम् ॥१३॥
अप्रबुद्धमतीनां मूढमतीनाम्, एता नवात्मादिरूपणाः, बालविभीषिका मिथ्या-
भिनिवेशादिप्रशमाय । बालो हि बिभीषिकाभिर्लाल्यत एव स्वमात्रा । यथा बालाना-
मवस्त्वभिनिवेशो मिथ्याबिभीषिकाभिरपास्यते, तथा सांसारिककर्मानुष्ठाननिरतानां
विषग्रहग्रह एतैर्बिभीषिकाप्रकारैरिति भावः । अथ चौषधादिभक्षणार्थं मात्रा मोदकं
वा शर्करां वा दास्यामीति बालो लाल्यते । यथा माता मोदकदानेन बालं सत्कर्मणि
प्रवर्तयति, तद्वत् शास्त्रैरपि सिद्धिसाधनप्रदर्शनेन भगवदाराधने जनः प्रवर्त्यते क्रमशः
परभैरवभावमासादयितुम् ॥१३॥
यदि ये सब स्वरूप कल्पना मात्र हैं, तो फिर उन शास्त्रों में ऊपर बताये गये स्वरूपों
का वर्णन क्यों किया गया है ? इस प्रश्न के उत्तर में भैरव कहते हैं कि तीव्र शक्तिपात से
जिनकी बुद्धि अच्छी तरह से पवित्र नहीं हुई है, अतः उक्त रूपों में से ही किसी एक रूपकी
उपासना में जो उन्मुख हैं, ऐसे ही लोगों के लिये यह नवात्म प्रभृति की उपासना उनकी
बुरी प्रवृत्तियों तथा नाना अभिनिवेशों की शान्ति के लिये बाल-विभीषिका के रूप में विहित
है । जैसे बच्चों की गलत जिद को झूठा डर दिखाकर माता शान्त कर देती है, उसी तरह
सांसारिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे व्यक्तियों की विषयासक्ति विभिन्न शास्त्रों में प्रदर्शित
इन उपायों से दूर की जाती है । जैसे माता बालक को लड्डू अथवा मिठाई देकर दवा
खिलाती है, उसी तरह से भाँति-भाँति की सिद्धियों के लिये भाँति-भाँति के साधन बताकर
मनुष्य को भगवान् की आराधना में लगाया जाता है, जिससे कि वह धीरे-धीरे परभैरव
अवस्था तक पहुँच सके ॥१३॥
²दिक्कालकलनोन्मुक्ता ³देशोद्देशाविशेषिणी ।
व्यपदेष्टुमशक्याऽसावकथ्या परमार्थतः ॥१४॥
१. चै०-ख० । २. ०नातीता-ख० स्प० । ३. ०क्या सा न-ख० ।

  1. यह श्लोक महार्थमंजरी की परिमल टीका (पृ० २३) में उद्धृत है ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ०२७) में इस श्लोक का 'दिक्कालकलनातीता' इतना अंश उद्धृत है ।

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१८ : विज्ञानभैरव
¹अन्तःस्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा ।
याऽवस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥१५॥
तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् ।
परभैरवस्यास्य परावस्था पूर्वापरादिक्षु वर्तमानादिकालेषु च कलनातीता,
देशेन दूरासन्नादिना ²उद्देशेन च इदन्तानिर्देश्येन न विद्यते विशेषो यस्यास्तादृशी
देशादेशाविशेषिणी च विद्यते । अत एव परमार्थतो व्यपदेष्टुमुपदेष्टुमशक्या मध्यमा-
जल्पाविषया, अभिधित्सागोचरत्वाभावादकथ्या वैखर्याऽप्यव्यावर्णनीया । अन्तःस्वानु-
भवानन्दा अन्तरिति पूर्णाहन्तायां स्वानुभवः स्वप्रकाश आनन्द एव रूपं यस्यास्तादृशी
स्वप्रकाशैकस्वरूपा । विकल्पोन्मुक्तगोचरा निर्विकल्पपरमार्था च पूर्णस्वरूपस्य भैरवस्य
या भरिताकाराऽवस्था भरितोऽशेषविश्वभेदचमत्कारमय आकारः स्वरूपं यस्याः सा
तादृशी, अहमिति विश्रान्तिमयी भैरवी, तदेव तत्त्वतः परमार्थतो विमलं स्वात्मभित्त्या-
भासितजगदनाच्छादितं विश्वपूरणमशेषावभासकं वपुः स्वरूपं ज्ञेयम्, न त्वन्यदाकृत्यादि
॥१४-१५॥
यदि ऊपर बताया गया स्वरूप सकल है, तो उस निष्कल स्वरूप को भी आप बताइये,
जिससे कि मेरा परा शक्ति सम्बन्धी संशय भी दूर हो सके ? देवी के इसी संशय को दूर
करने के अभिप्राय से भैरव कहते हैं कि पर भैरव की यह परावस्था पूर्व-पश्चिम प्रभृति सभी
दिशाओं में और वर्तमान आदि सभी कालों में कलना से शून्य है; दूर, आसन्न (निकट)
आदि देश और इसका यह नाम है, इस तरह के उद्देश (व्यवहार) से इसमें किसी विशेषता
का आधान नहीं हो पाता, देश और काल आदि विशेषणों से सीमित करके उसको बताया
नहीं जा सकता । वस्तुतः इसके स्वरूप को समझा पाना इसलिये कठिन है कि न तो इसका
मध्यमा वाणी में ही स्फुरण होता है और न वैखरी वाणी से ही इसका वर्णन किया जा
सकता है । अर्थात् दिशा, काल, देश, नाम, रूप आदि से परिच्छिन्न न होने से इस परावस्था
के स्वरूप को वाणी के माध्यम से समझा पाना बड़ा कठिन है । इसका अनुभव तो पूर्णाहन्ता
का विकास होने पर अपने भीतर अपने आप प्रकाशित हो रहे आनन्द के रूप में होता है । इसका
यह स्वरूप सभी तरह की कल्पनाओं से, नाम-रूप, क्षणिकता आदि उपाधियों से रहित होने
से निर्विकल्प अत एव वास्तविक है । पूर्णस्वरूप बोध-भैरव की यह अवस्था सारे विश्व में
अहमाकार में सर्वत्र भरी हुई है, व्याप्त है । वस्तुतः यही विमल (निर्मल), अर्थात् स्वात्मभित्ति
में आभासित हो रहे जगत् के दोषों से अनाच्छादित (असंयुक्त) रह कर विश्व का पूरक,
अर्थात् सारे जगत् का प्रकाशक, निष्कल स्वरूप उस परावस्था में प्रकट होता है । इससे भिन्न
इसकी कोई आकृति नहीं मानी जाती ॥१४-१५॥

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में 'अन्तःस्वानु०' इत्यादि तीन पंक्तियाँ उद्धृत हैं ।
  2. "तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः" (न्या० भा० १।१।३) ।

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विज्ञानभैरव : १९
एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति ॥१६॥
एवंविधे निष्कले परे तत्त्वेऽहमात्मनि परभैरवस्वरूपे सति कः पूज्यः कश्च
तृप्यति ? कस्यचनान्यस्य पूज्यस्य तर्पणीयस्य चाभावात् पूज्यपूजकपूजानां तर्पकादीनां
च चिदानन्दैकघनपरमार्थत्वात् सर्वमपि क्रियाडम्बरं व्यर्थमेवेति भावः ॥१६॥
इस प्रकार निष्कल परस्वरूप का विवेचन करने के उपरान्त पूर्व प्रतिपादित कर्म-
काण्ड के आडम्बरों की व्यर्थता का यहाँ भैरव पुनः समर्थन करते हैं कि अहमात्मक परभैरव
स्वरूप की इस निष्कलावस्था में कौन पूज्य होगा और उस पूजा से कौन तृप्त होने वाला है ?
अर्थात् साधक के अपने स्वात्मस्वरूप से अतिरिक्त कोई पूजनीय और तर्पणीय तत्त्व नहीं है,
क्योंकि पूज्य, पूजक और पूजा तथा तर्पक, तर्पणीय, तर्पण प्रभृति सभी स्वरूप परमार्थतः
चिदानन्दघन परम तत्त्व की ही विभिन्न अवस्थाएँ हैं । इस स्थिति में कर्मकाण्ड का यह सारा
आडम्बर व्यर्थ है ॥१६॥
एवंविधा भैरवस्य याऽवस्था परिगीयते ।
सा परा पररूपेण परा देवी प्रकीर्तिता ॥१७॥
एवंविधा उपरि वर्णितप्रकारा भैरवस्य या निष्कलस्वरूपा अवस्था परिगीयते
शास्त्रेषु, सैषा पररूपेण परा प्रकृष्टा सती परा देवीति प्रकीर्तिता कथिता ॥१७॥
परा भट्टारिका संबन्धी संशय की पूर्णतः निवृत्ति के लिये भैरव अब उसके स्वरूप
का स्पष्ट निरूपण करते हुए कहते हैं कि ऊपर वर्णित भैरव की जिस निष्कल अवस्था का
शास्त्रों में गुणगान किया गया है, वस्तुतः वह भैरव से भिन्न नहीं है। यद्यपि कभी-कभी
इनके स्वरूप का विश्लेषण करते समय इनमें परस्पर भेद का निरूपण भी किया जाता है,
किन्तु यह वास्तविकता नहीं है । अतः बोध-भैरव के इस उत्कृष्ट निष्कल परस्वरूप से अभिन्न
स्वरूप वाली यह परा देवी केवल नाम से ही परा नहीं है, किन्तु अपनी प्रकृष्टता के आधार
पर भी परा कहलाती है ॥१७॥
१शक्तिशक्तिमतोर्यद्वदभेदः सर्वदा२ स्थितः ।
अतस्तद्धर्मधर्मित्वात् परा शक्तिः परात्मनः ॥१८॥
भैरवस्य इयमवस्था तस्य स्वरूपमेव । शक्तिस्वरूपा इयमवस्था शक्तिमतो
भैरवादभिन्नैव । शक्तिः सामर्थ्यं विश्वनिर्माणकारि, तद् भैरवस्वरूपमेव । यतो हि
शक्तिशक्तिमतोः सदा अभेदः स्वीक्रियते, अतः शक्तिमतो भैरवस्य संबन्धिनिः सर्वज्ञता-
सर्वकर्तृ ता-सर्वात्मतादिभिर्धर्मैर्धर्मिणी परस्य चिदानन्दैकघनस्यात्मन इयं शक्तिः परेति
प्रकीर्त्यते ॥१८॥
१. ॰स्मा॰-ख० ने० । २. संयवस्थितः-ने० ।

  1. यह श्लोक नेत्रतन्त्र (भा० २, पृ० ४४ और २७३) की उद्योत टीका में क्षेमराज द्वारा
    उद्धृत है ।

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२० : विज्ञानभैरव
यहाँ शंका उठती है कि भैरव की ऊपर बताई गई यह अवस्था जब उसका स्वरूप
ही है, काल आदि से परिच्छिन्न कोई दशाविशेष नहीं, तो ऐसी अवस्था में भैरव ही भैरवी
कहलावेगा ? इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए भैरव कहते हैं कि यह बात सही है कि भैरव
की यह परावस्था उसका स्वरूप ही है । शक्तिस्वरूप यह परावस्था शक्तिमान् भैरव से अभिन्न
है । शक्ति सामर्थ्य को कहते हैं । यह सामर्थ्य सारे जगत् का निर्माण करने वाले भैरव का
ही स्वरूप है । शक्ति और शक्तिमान् में सदा अभेद माना जाता है, अतः शक्तिमान् भैरव से
संबद्ध सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता, सर्वात्मता प्रभृति धर्मों से संवलित होने से धर्मिणी यह शक्ति
चिदानन्दघनस्वरूप पर आत्मा (भैरव) से अभिन्न होने से परा (भैरवी) कहलाती है ॥१८॥
न¹ वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते ।
केवलं ज्ञानसत्तायां² प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥१९॥
यथा वह्नेर्दाहिका शक्तिस्ततो व्यतिरिक्ता भिन्ना न विभाव्यते विचार्यापि
नोपलभ्यते, तथेयं परा शक्तिरपि शक्तिमतो भैरवान्नैव कदाचिद् भिन्ना प्रतिभाति ।
केवलं ज्ञानसत्तायां वह्नि जिज्ञासाोर्वह्निज्ञप्तौ यत् प्रवेशनं तत्र, अयमिति दाहशक्त्यात्मा
वह्निस्वभावः प्रारम्भः, तन्मुखेन पाचकत्वाद्यनन्तशक्त्यात्मकशक्तिमत्स्वरूपावगतेः ।
तथेयं परा शक्तिरपि भवति । तन्मुखेन हि भैरवसांमुख्यं स्यादिति भावः ॥१९॥
इस बात को दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे आग से उसकी दाहिका शक्ति,
जलाने की ताकत, विचार पूर्वक देखने पर भी कभी अलग नहीं होती, उसी तरह से यह
परा शक्ति भी शक्तिमान् परभैरव से कभी जुदी नहीं दिखाई पड़ती । यह शक्ति तो शक्ति-
मान् की सत्ता की जानकारी और उसके वास्तविक स्वरूप में प्रवेश पाने के प्राथमिक उपाय
के रूप में वर्णित है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे यदि किसी को आग का स्वरूप जानने
की इच्छा है तो वह उसकी दाह शक्ति के पास जाता है और सब से पहले उसकी जलाने की
ताकत को पहचानता है, बाद में अग्नि के पाचकत्व आदि अनन्त व्यापारों को भी समझ
लेता है, उसी तरह इस शक्ति के माध्यम से ही उस परभैरव के स्वरूप का ज्ञान कराने वाले
मार्ग में प्रवेश पाया जा सकता है ॥१९॥
²शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना ।
तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवी मुखमिहोच्यते ॥२०॥
१. ॰याः-ई० । २. ॰स्यां-स्प० ।

  1. इस श्लोक को अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० २८७)
    में उद्धृत किया है ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ० ७२) और शिवस्तोत्रावली की व्याख्या (पृ० ६४) में क्षेमराज
    द्वारा यह पूरा श्लोक उद्धृत है । इसके अतिरिक्त इस श्लोक का "शैवी मुखमिहो-
    च्यते" इतना अंश शिवस्तोत्रावलीव्याख्या (पृ० ११०), तन्त्रालोकविवेक (भा० १,

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विज्ञानभैरव : २१
पराशक्तिरूपामवस्थां यदा प्रविशति वक्ष्यमाणोपायैः समाविशति उपदेश्योऽणुः,
तदास्य निर्विभागेन भावना भवति, शक्तेः शिवावेशात् । तदा स लब्धशाक्तबलः
प्रशस्ततमशिवस्वरूपो भवत्येव, यत् शिवस्येयं शैवी शक्तिः, मुखं प्रवेशोपायद्वारमिहा-
गमेषूच्यते । यथा हि वक्त्रेणैवायमिति लभ्यते, तथा शक्त्यैव शिवोऽयमिति व्यपदेश
इति भावः ॥२०॥
शक्ति के माध्यम से पर भैरव के स्वरूप का ज्ञान किस तरह से होता है, इस बात
को उदाहरण देकर समझाया जा रहा है कि आगे बताए गए उपायों से यह उपदेश का पात्र
जीव जब परा शक्ति स्वरूप अवस्था में प्रवेश पाता है, उसके साथ एकाकार हो जाता है,
तब उसमें निर्विभाग भावना उत्पन्न होती है, अर्थात् शक्ति और शिव में उसकी विभाग-दृष्टि,
भेद-दृष्टि लुप्त हो जाती है । उस समय शाक्त बल की उपलब्धि के कारण साधक शिव-
स्वरूप हो जाता है, क्योंकि आगमों का कहना है कि शिव की यह शैवी शक्ति शिव के उस
परम सुन्दर स्वरूप में प्रवेश पाने का द्वार है । जैसे मुंह देखने से किसी व्यक्ति की पहचान
होती है, उसी तरह शक्ति को देखकर अर्थात् परा शक्ति को जानकर उसके माध्यम से शिव
को पहचाना जाता है । इसलिए यह शैवी शक्ति शिव का मुख कहलाती है । इस शक्ति के
बिना शिव में नाम, धाम आदि की कल्पना नहीं की जा सकती । जैसा कि वामकेश्वरतन्त्र
(नित्याषोडशिकार्णव) में कहा गया है—
शक्त्या बिना शिवे सूक्ष्मे नाम धाम न विद्यते (४।७) ।
इस पूरे ग्रन्थ का अभिप्राय यह है कि परा शक्ति की सहायता से ही व्यक्ति शक्ति
और शिव में अभिन्नता देख पाता है कि वस्तुतः इनका स्वरूप एक ही है । जब यह अभेद-
बोध जाग उठता है, तब परावस्था ही बच रहती है, शिव और शक्ति उसी में विलीन हो
जाते हैं । इस स्थिति को यहां बोध(विज्ञान)भैरव दशा कहा गया है ॥२०॥
¹यथाऽऽलोकेन दीपस्य किरणैर्भास्करस्य च¹ ।
ज्ञायते दिग्विभागादि तद्वच्छक्त्या शिवः² प्रिये³ ॥२१॥
१. वा-ख० स्व० त० । २. ॰वस्य च-ख० । ३. श्रितः-स्व० ।
आ० १, पृ० ७, ११५; भा० २, आ० ३, पृ० १७१, १८८; भा० ४, आ० ६,
पृ० २०३; भा० ११, अ० २९, पृ० १६३), स्पन्दकारिकाविवृति (पृ० ५४), नेत्रतन्त्रो-
द्योत (भा० १, पृ० २०, १९२), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० २८७),
स्वच्छन्दोद्योत (भा० २, प० ४, पृ० १८७; भा० ५B, प० १०, पृ० ५३४), महार्थ-
मंजरीपरिमल (पृ० ९६) में देखा जाता है ।

  1. यह श्लोक स्वच्छन्दतन्त्र (भा० २, प० ४, पृ० २१२) की टीका में क्षेमराज द्वारा तथा
    तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० २२९) में जयरथ द्वारा उद्धृत है ।

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२२ : विज्ञानभैरव
हे प्रिये, यथा दीपस्य शिखात्मन आलोकेन प्रकाशेन, भास्करस्य च किरणैः
मरीचिभिरेवात्मीयैः, दिग्विभागसंनिवेशादि ज्ञायते, तद्वत् स्फुरत्तारूपया स्वशक्त्यैव शिवः
स्वात्मा ज्ञायते प्रत्यभिज्ञायते ॥२१॥
इसी विषय को दो अन्य स्पष्ट उदाहरणों की सहायता से समझाया जाता है—हे
प्रिये, जैसे दीपक की अपनी लौ के प्रकाश से और सूर्य की ही किरणों से सारी दिशाएँ और
उनमें विद्यमान सभी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उसी तरह से स्फुरत्ता¹ स्वरूप अपनी शक्ति से
ही स्वात्मस्वरूप शिव का लाभ, अवभास अर्थात् प्रत्यभिज्ञा (पहचान) हो जाती है। इसका
अभिप्रायः यह है कि जैसे दीपक की लौ दीपक से भिन्न नहीं है, सूर्य की किरणें सूर्य से भिन्न
नहीं हैं, उसी तरह शक्ति भी शिव से भिन्न नहीं है। दीपक की लौ से और सूर्य की
किरणों से जैसे दिग्विभाग (भिन्न-भिन्न दिशा) आदि का ज्ञान होता है, उसी तरह से शक्ति की
सहायता से इस जागतिक प्रपंच का ज्ञान होता है। जैसे दीपक को देखने के लिए दूसरे दीपक
की और सूर्य के लिए दूसरे सूर्य की आवश्यकता नहीं रहती, किन्तु अपनी ही लौ और अपनी
ही किरणों से जैसे ये भासित होते हैं, उसी तरह से अपनी इस शक्ति की सहायता से ही
अपना यह स्वरूप पहचान लिया जाता है ॥२१॥
श्रीभैरवी¹ उवाच
देवदेव त्रिशूलाङ्क कपालकृतभूषण ।
दिग्देशकालशून्या च व्यपदेशविवर्जिता ॥२२॥
याऽ²वस्था भरिताकारा भैरवस्योपलभ्यते ।
कैरुपायैर्मुखं तस्य³ परा देवी कथं भवेत् ॥
यथा सम्यगहं वेद्मि तथा मे⁴ ब्रूहि भैरव ॥२३॥
१. °देवी-क० । २. शक्तिर्भ°-ख० । ३. °स्याः-ख० । ४. ब्रूहि मम प्रभो-ख० ।

  1. बीज से जैसे अंकुर स्फुरित होता है, उसी तरह से शिव से यह सारा जगत् निकलता
    है। बीज मिट्टी-पानी आदि सहकारी कारणों का संयोग होने पर ही प्रस्फुटित होता
    है। सहकारी कारणों के सम्पर्क में आने के साथ ही बीज में स्पन्दन होने लगता है
    और वह अंकुर के रूप में परिणत हो जाता है। किन्तु शिव को किसी सहकारी
    कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती। स्वेच्छा से जब उसमें स्पन्दन होने लगता है, तो
    वह अपनी इस स्पन्द शक्ति के माध्यम से जगत् के रूप में परिणत होता है। इसी
    व्यापार को स्फुरत्ता कहते हैं। यह स्फुरत्ता जैसे शिव को परिमित प्रमाता बना देती
    है, उसी तरह से स्वात्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा भी इस स्फुरत्ता शक्ति से ही निष्पन्न
    होती हैं। “सा स्फुरत्ता महासत्ता” (१.५.१४) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका में स्फुरत्ता को
    ही महासत्ता, स्पन्दतत्त्व आदि नामों से जाना गया है।

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विज्ञानभैरव : २३
एवं परास्वरूपे निर्णीते तदुपलब्ध्युपायजिज्ञासया श्रीदेव्युवाच—हे देवदेव
देवानां ब्रह्माद्यनाश्रितान्तानां देव स्वामिन्, त्रिशूलाङ्क स्वातन्त्र्यशक्तिस्फारितेच्छा-
द्यरात्रयात्मकत्रिशूलधारिन्, कपालकृतभूषण समस्तवाच्यवाचकात्मकजगत्खण्डरूप-
कपालैश्चैतन्यस्वातन्त्र्याभिव्यञ्जकत्वात् कृतभूषण भ्राजमानानाच्छादितस्वरूप ! भैरवस्य
'दिक्काल' (श्लो० १४) इत्यादिनाऽनुपदमुपदिष्टा दिग्देशकालशून्या व्यपदेशविवर्जिता
भरिताकारा या अवस्था उपलभ्यते, सा परा देवी कथं ज्ञाता भवेत् ? कैश्चोपायैः सा
तस्य भैरवस्य 'शैवी मुखम्' (श्लो० २०) इत्यत्र प्रतिपादितं मुखं भवेत् ? उपायैरिति
बहुवचनमुपलब्धुरणोः प्राणदेहबुद्धिशून्याश्रयोच्चारकरणध्यानवर्णस्थानकल्पनाभेदात्,
सार्वात्म्यभावनादिशुद्धविकल्पनानात्वात्, अविकल्पोपायवैचित्र्याच्च आणव-शाक्त-
शाम्भवोपायनानात्वं कटाक्षयति । हे भैरव, एतत्सर्वं यथा अहं सम्यक् प्रकारेण जानामि
तथा मे वद ।।२२-२३।।
इस तरह से परा देवी के स्वरूप का निर्णय हो जाने पर श्रीदेवी उस स्वरूप की
प्राप्ति के उपाय को जानने के अभिप्राय से पूछती है—हे देवदेव ! ब्रह्मा से लेकर अनाश्रित
पर्यन्त सभी देवताओं के स्वामी, हे त्रिशूलाङ्क ! स्वातन्त्र्य शक्ति के विस्फार (विस्तार)
स्वरूप इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन तीन शक्तियों के फलक वाले त्रिशूल को धारण करने
वाले, हे कपालकृतभूषण ! समस्त वाच्यवाचकात्मक जगत्खण्ड रूप कपाल में चैतन्य और
स्वातन्त्र्य की अभिव्यक्ति करने वाले अत एव सर्वत्र प्रकाशमान, निरावरण स्वरूप वाले हे
खप्परधारी भैरव ! पूर्व पश्चिम आदि दिशा, दूर-आसन्न (पास) आदि देश, वर्तमान प्रभृति
काल के परिच्छेद (इयत्ता) से रहित, नाम-रूप आदि से असंस्पृष्ट, परिपूर्ण स्वरूप वाली
भैरव की जो अवस्था उपलब्ध होती है, जिसका कि वर्णन 'दिक्काल' (श्लो० १४)
इत्यादि के द्वारा पहले भी किया जा चुका है, वह परा देवी कैसे जानी जा सकती है ? और
किन उपायों से वह 'शैवी मुखम्' (श्लो० २०) इत्यादि से प्रतिपादित शिवावस्था में प्रवेश
का द्वार बन सकती है ? उसका दर्शन किन उपायों से किया जा सकता है ? इस बात को
आप विस्तार से समझावें । उपाय शब्द में बहुवचन इस अभिप्राय से लगाया गया है कि
अपने स्वरूप की उपलब्धि में लगा जीव प्राण, देह, बुद्धि और शून्य में उच्चार, करण, ध्यान,
वर्ण और ¹स्थानकल्पना के माध्यम से आणव उपाय का, सार्वात्म्य भावना प्रभृति शुद्ध विकल्पों
के सहारे शाक्त उपाय का और निर्विकल्पात्मक नाना प्रकार के शाम्भव उपाय का सहारा
लेकर अपने सही स्वरूप को पहचान सके । देवी के प्रश्न का अभिप्राय यह है कि जिन उपायों
का सहारा लेकर मैं परा देवी और बोध(विज्ञान)भैरव के स्वरूप को ठीक से समझ सकूँ,
उनको आप विस्तार से मुझे बताइये ।।२२-२३।।

  1. इन पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या उपोद्घात में 'त्रिविध उपाय और समावेश' शीर्षक
    के अन्तर्गत देखनी चाहिये ।

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२४ : विज्ञानभैरव
[ धारणा-१ ]
श्रीभैरव उवाच
१ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।
उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद् भरिता२ स्थितिः ॥२४॥
योऽयमूर्ध्व इति हृदो द्वादशान्तं यावद् वहन् प्राणः, यश्चाधो जीवो द्वादशान्ताद्
हृदन्तमपानः, एषा परा देवी उच्चरेत् सततं स्वयमुच्चरन्ती स्थिता । कीदृशी ?
विसर्गात्मा विसर्गोऽन्तर्बहिर्भावकरणरूपो विमर्श आत्मा यस्याः सा अप्राणाद्यशाक्त-
स्पन्दोन्मेषा, तदाच्छुरणेन विना नियतप्राणप्रवाहायोगात् । यत एवमत उत्पत्तिद्वितयस्य
बाह्याभ्यन्तरोत्पाद्यद्वयस्य यत् स्थानं हृद् द्वादशान्तश्च, तत्र भरणादिति नित्योन्मिष-
दाद्यस्फुरत्तात्मभैरवीयशक्त्युपलक्षणात्, भरिता स्थितिः भैरवस्वरूपाभिव्यक्तिर्भवति ।
अथवा ऊर्ध्वे द्वादशान्ते प्राणः प्राणनरूपो जीवनाख्यश्चित्तवृत्तिविशेषः संस्थाप्यः ।
अधश्च हृदि हृदयस्थाने जीवोऽपानः, जीव्यतेऽनेनेति जीवः, भक्षणपानादेरधोमार्गप्रस-
रणाज्जीव इत्युच्यते तदुपाधिमान्, अत एव जीव इति । विसर्गात्मा अन्तर्बहिर्भावकरण-
रूप आत्मा यस्य। तेनापि परैव उच्चारमायाति अह्मित्यन्तश्चक्रारूढा, एतयोर्द्वयो-
र्विभेदापत्त्या अहमिति प्रकाशनात् । उत्पत्तौ द्वादशान्ते द्वितीये हृदि च धारणात् । तत्र
स्थित्या भरितस्थितिः स्यादेवेति सर्वोपाधिविस्मरणादहमिति विमर्शवान् स्यादिति
भावः ॥२४॥
इस तरह से देवी के द्वारा पूछे गये परा देवी के स्वरूप को पहचानने के लिए
उपाय के रूप में क्रमशः एक के बाद दूसरी ११२ धारणाओं का निरूपण करते हुए
भगवान् भैरव कहते हैं--ऊपर हृदय से द्वादशान्त२ तक जाने वाला प्राण और नीचे
१. °त°-ख० त० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १४३) में इस श्लोक का ‘भरणाद् भरितस्थितिः’
    इतना अंश मिलता है।
  2. प्राण और अपान की गति जिस स्थान पर जाकर रुक जाती है, उसको द्वादशान्त कहते
    हैं। बाह्य और आन्तर, शिव द्वादशान्त और शक्ति द्वादशान्त के भेद से इसकी कई
    स्थानों में स्थिति मानी गई है। प्राण और अपान के विसर्ग और पूरण व्यापार के द्वारा
    प्राणी का शरीर आप्यायित होता रहता है। ४९ वें श्लोक में द्वादशान्त पद का अर्थ
    शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्ना नाडी किया गया है। तन्त्रालोक (५।७१) में
    सभी नाड़ियों के अग्रभाग में द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। विभिन्न श्लोकों की
    व्याख्या में इन शब्दों की चर्चा आई है। उपोद्घात में भी इन पर विचार किया
    जायगा।

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विज्ञानभैरव : २५
द्वादशान्त से हृदय तक आने वाला जीव नामक अपान, यह परा देवी का उच्चारण है, स्पन्दन
है। परा देवी ही स्वयं इसका निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान
के रूप में स्पन्दित होती रहती है। यह परा देवी विसर्ग-स्वभाव है। अर्थात् आन्तर और
बाह्य भावों की सृष्टि करना ही इसका स्वरूप है। यह परा देवी "अबिन्दुमविसगं च"
(८८ श्लो०) इत्यादि कारिका में आगे वर्णित होने वाले अशाक्त स्पन्द अर्थात् शैव सृष्टि के
प्रथम स्पन्द अकार से उन्मिषित होती है, स्वरूप-लाभ करती है। क्योंकि उससे जब तक
इसका संपर्क नहीं होता, तब तक प्राण का प्रवाह नियमित रूप से नहीं चल सकता । "प्राणा-
पानमयः प्राणो विसर्गापूरणं प्रति" (७।२५) इत्यादि स्थल में स्वच्छन्दतन्त्र में इसी बात को
विस्तार से समझाया गया है। इस स्थिति में बाह्य और आन्तर विषय प्राण और अपान की
सृष्टि के स्थान हृदय और द्वादशान्त में नित्य उन्मिषित हो रही प्रथम स्फुरत्तास्वरूप भैरव
की शक्ति की भावना करने से योगी में भैरव स्वभाव की अभिव्यक्ति हो जाती है, उसका
भैरव स्वरूप प्रकट हो जाता है।
अथवा ऊपर द्वादशान्त में प्राण की स्थापना करनी चाहिये, जो कि प्राणन रूप अर्थात्
जीवन रूप चित्त की एक वृत्ति है। नीचे हृदय में जीव उपाधि वाले अपान को स्थापित करना
चाहिये । इसको जीव इसलिए कहा जाता है कि अपान वायु खाई गई अथवा पी गई वस्तु
को नीचे के मार्ग में ले जाता है। इसी उपाधि के कारण इसको जीव कहते हैं। अन्दर आना
और बाहर जाना जिसका स्वरूप है, स्वभाव है, प्राण वृत्ति का यह स्वाभाविक व्यापार ही
परा शक्ति का उच्चारण, स्पन्दन है, जो कि शरीर के भीतर निरन्तर चल रहे 'अहम्' चक्र
में अपना स्थान बनाए हुए है। उक्त दोनों स्थितियों का जब अलग-अलग चिन्तन होता
है, तभी 'अहम्' तत्त्व प्रकाशित होता है, उत्पन्न होता है। वह द्वादशान्त और हृदय में
अवस्थित रहता है। इस स्थिति के कारण साधक को भरित (भरी-पूरी = सम्पूर्ण स्वरूप लाभ
की) स्थिति प्राप्त हो जाती है। अर्थात् सभी तरह की उपाधियों का विस्मरण हो जाने से
'अहम्' यह विमर्श, अर्थात् 'मैं ही भैरव हूँ' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा निश्चित रूप से हो
जाती है।
ऊपर प्रथम अनुच्छेद में बताये गये अर्थ के अतिरिक्त शिवोपाध्याय ने इस श्लोक के
पाँच अन्य अर्थ भी किये हैं, जो कि क्रमशः इस प्रकार हैं-
ऊपर अर्थात् सभी इन्द्रियों के प्रसार के मार्ग में प्राण वायु विषयों का आप्यायक है,
यह सूक्ष्म प्राण के रूप में निरन्तर स्पन्दन करता रहता है और बाह्य विषयों का बोध
कराता है। नीचे जीव इन सभी विषयों में अपान के रूप में प्रविष्ट होता है। इन दोनों
स्थितियों में परा शक्ति ही निरन्तर प्रकाशित होती रहती है। इस लिये ग्राह्य की उत्पत्ति
की जगह हृदय और ग्राहक की उत्पत्ति के स्थान द्वादशान्त में, जहाँ कि उसका प्रमेय से सम्पर्क
होता है, शक्ति की भरित अवस्था का ध्यान करने पर साधक भैरव स्वरूप हो जाता है।
ऊपर, जहाँ कि प्राण और अपान का उन्मेष होता है, समस्त वाचक शब्दों का अनु-
प्राणक अकार रहता है और नीचे, सबके अन्त में जीव अर्थात् सकार की स्थिति रहती है।

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२६ : विज्ञानभैरव
इस तरह से प्राण और जीव पद से यहाँ अकारादि सकारान्त मातृका के वर्णों का बोध होता
है। विसर्ग स्वभाव के अपने एक भाग में हकार कला को धारण करने वाली नाद रूपा यह
परा देवी मातृका चक्र के क्रम से समस्त वाच्य-वाचकात्मक जगत् को लांघ कर, अपने प्रकाश
से समस्त भेद दृष्टि को दबाकर स्फुरित होती है। इस लिये उक्त दोनों उत्पत्ति स्थानों में,
हृदय और द्वादशान्त में, अकार और हकार का परामर्श करने से शिव और शक्ति का साम-
रस्य हो जाने पर साधक भैरव-स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है।
'ऊर्ध्व' पद का अर्थ है उत्कृष्ट प्राण, क्योंकि इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति का इसी
में विस्तार होता है और उसी से यह सारा विश्व अनुप्राणित है। 'अधः' पद का अर्थ है
इदन्ता परामर्श का विषय होकर निकृष्ट दशा को प्राप्त हुआ जीव, क्योंकि इच्छा के विषय
ज्ञेय वर्ग का यह कार्य बन जाता है। सोमरूप आप्यायक शक्ति संसारी जीवों की स्थिति का
कारण बनती है। यह शक्ति परा, परापरा और अपरा शक्तियों के रूप में स्फुरित
होती हुई विश्व से अभिन्न रूप में सदा भासित होती रहती है। इस लिये उत्पत्ति स्थल
अर्थात् प्रमेय पद में, द्वितय शब्द वाच्य प्रकाश्य-प्रकाशक के सामरस्य रूप प्रमाण पद में तथा
प्रमेय¹ और प्रमाण की जहाँ विश्रान्ति होती है, उस प्रमातृ पद में भरण से अर्थात् परा
भट्टारिका स्वरूप तुरीय में आनन्द से आप्यायित हो जाने से साधक में भैरव दशा की अभि-
व्यक्ति हो जाती है।
अथवा ऊर्ध्व पद का अर्थ है माया पर्यन्त अध्वा के ऊपर, प्राण का अर्थ है इनका अनु-
प्राणक शुद्ध और अशुद्ध अध्वा में व्याप्त शिव-शक्ति तत्त्व। इसके नीचे जीव की स्थिति
है, जिसने कि माया प्रभृति तत्त्वों की अधीनता स्वीकार कर ली है और मनुष्य नाम से
अभिहित होता है। यही आत्मतत्त्व कहलाता है। इन सब स्वरूपों में शिव की परात्मिका
स्वातन्त्र्य शक्ति ही स्पन्दित होती रहती है। उत्पद्यमान शुद्ध और अशुद्ध दोनों मार्गों में पर
शक्ति की इस व्याप्ति के कारण ही सब सब कुछ है, इस भावना के अभ्यास से जगत् के
समस्त पदार्थों के साथ सामरस्य की स्थिति प्राप्त हो जाने पर साधक को भरितावस्था
प्राप्त हो जाती है।
अन्तिम अर्थ यह है—अनुत्तर, अकुल स्वरूप चिद्धाम से स्वयं उन्मिषित होने वाले
हकार की स्थिति ऊपर और नीचे विसर्जनीय अनुप्राणित विसर्गस्वरूप जीव की, सकार की
स्थिति रहती है। हान और समादान, त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया के आधार पर इस हंस

  1. "त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्" (३।२०) इस शिवसूत्र में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय
    दशाओं में तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में चतुर्थ शिवपद (शुद्ध प्रमाता)
    तथा तुरीय अवस्था के आसेचन की बात कही गई है। जल पर तेल गिराने से जैसे वह
    चारों तरफ फैल जाता है, उसी तरह से उक्त तीनों स्थितियों में चतुर्थ दशा का आसे-
    चन करने से (फैला देने से) साधक शिव-स्वरूप का, तुरीय अवस्था का सभी स्थानों
    और अवस्थाओं में साक्षात्कार करने लगता है।

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विज्ञानभैरव : २७
मन्त्र का उच्चारण, जो कि 'अजपा जप'1 के नाम से प्रसिद्ध है, परा शक्ति स्वयं ही करती
है। इसीलिये 'मैं वह शिव हूँ' इस तरह के अपने स्वरूप का परिचय यहाँ प्राप्त होता है। इस
स्थिति में हकार और सकार इन दोनों की उत्पत्ति के स्थल में, अर्थात् हकार की उत्पत्ति के
स्थान हृदय और सकार की उत्पत्ति के स्थान द्वादशान्त में भरण से, अर्थात् उन वर्णों के
स्वरूप का चिन्तन करने से, शाक्त बल की प्राप्ति होती है और अन्त में साधक भैरव-स्वरूप
हो जाता है।
ऊपर बताई गई छः व्याख्याओं में से पहली और दूसरी व्याख्या के अनुसार अविकल्प
स्वरूप के चिन्तन से साधक शाम्भव समावेश में, चौथी और पांचवीं व्याख्या के अनुसार सब
कुछ अपना ही स्वरूप है, इस तरह की भावना के आधार पर शुद्ध विकल्प का चिन्तन करने
से शाक्त समावेश में एवं तीसरी और छठी व्याख्या के अनुसार धारणा में वर्णविशेष के
परामर्श की प्रधानता के आधार पर आणव समावेश में समाहित होता है। इन त्रिविध
समावेशों का वर्णन मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में 'उच्चारकरण' (२।२१-२३) इत्यादि तीन
श्लोकों में किया गया है। उपोद्घात में इस विषय पर विशेष प्रकाश डाला जायगा। इस प्रथम
धारणा में और आगे दी जा रही सभी धारणाओं में शाम्भव, शाक्त और आणव उपायों में
से किसी एक का सहारा लेकर ही योगी अनुपाय प्रक्रिया में प्रविष्ट होता है या कभी-कभी
बिना इनका सहारा लिये भी अपने स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है, इस बात का विशेष
विवेचन भी हम वहीं करेंगे। आवश्यकता के अनुसार श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में भी
इनका संक्षिप्त उल्लेख हो सकता है ॥२४॥
[ धारणा-२ ]
मरुतोऽन्तर्बहिर्वाऽपि वियद्युग्मानि१वर्तनात् ।
भैरव्या२ भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥२५॥
भैरवि, मरुतः प्राणस्यापानस्य च, अन्तर्बहिश्च यद् वियद्युग्मं हृदाकाशो
द्वादशान्तश्च यद् वियद्द्वयम्, ततोऽनिवर्तनात् प्रत्यावर्तनाभावेन क्षणमात्रमन्तर्मुखत्वेना-
वस्थानात् प्राणापानयोर्द्वयोरस्तंगतत्वात्, भैरवीस्वरूपस्य भैरवस्य परमात्मनः, वपुः
शरीरं स्वरूपमिति यावत्। धर्मिधर्मात्मकत्वेन शिवशक्तिद्वैधं प्रकाशविमर्शस्वरूपं
परमार्थत एकमेव तत्त्वं व्यज्यते प्रकाशते, प्रकटीभवति। 'अनुवर्तनात्' इति पाठे
अनुन्मेषनिमेषणादित्यर्थः ॥२५॥
हे भैरवि, प्राण और अपान नामक पवन के आधारभूत स्थान आन्तर आकाश हृदय
और बाह्य आकाश द्वादशान्त से प्रत्यावृत्ति के अभाव में एक क्षण के लिये उसकी वृत्ति
१. ॰नु॰-ख० । २. ॰वं-ख० ।

  1. आगे १५१ संख्या के श्लोक की व्याख्या में इस विषय पर विस्तार से विचार
    किया जायगा।

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२८ : विज्ञानभैरव
अन्तर्मुख हो जाती है। तब ऐसी प्रतीति होती है मानों प्राण और अपान कहीं विलीन हो
गये हैं। इस स्थिति को इस शास्त्र में 'मध्यदशा' के नाम से जाना गया है, जिसका कि
विश्लेषण आगे किया जा रहा है। इस मध्यदशा का जब विकास किया जाता है, तब परा
शक्ति भैरवी से अभिन्न रूप में विद्यमान भगवान् भैरव का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है।
धर्म और धर्मी के रूप में प्रकाश और विमर्श स्वभाव शिव और शक्ति भिन्न होते हुए भी
परमार्थतः एक ही हैं, इसका विवेचन अभी यहीं (१४-२१ श्लोक) किया जा चुका है।
'अनिवर्तनात्' के स्थान पर 'अनुवर्तनात्' ऐसा पाठ भी उपलब्ध होता है। यहाँ अनुवर्तन शब्द
का अर्थ प्राण और अपान की उन्मेष और निमेष दशा की स्थिर अनुवृत्ति है। अर्थात् प्राण
और अपान की जो स्थिति है, उसी के अनुवृत्त रहने पर, उनमें नये उन्मेष और निमेष
व्यापार के न चलने पर, पहली व्याख्या में प्रतिपादित मध्यदशा का अन्वेषण किया जा
सकता है।
योगशास्त्र¹ की प्रक्रिया के अनुसार इस श्लोक का अभिप्राय यह होगा—सकल²,
प्रलयाकल प्रभृति सभी प्रमाता जीवों के प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभा-
विक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं। हृदय स्थित कमलकोश से प्राण
का उदय होता है। नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चल कर अन्त में
आकाश में विलीन हो जाता है। इसलिए बाह्य आकाश भी योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से
प्रसिद्ध है। प्राण की इस स्वाभाविक बाह्य गति को 'रेचक' नाम से जाना जाता है। बाह्य
द्वादशान्त से अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमल-
कोश में विलीन हो जाता है। अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति 'पूरक' कही जाती है।
प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षणमात्र के लिये विलीन हो जाता है। यही प्राण की
१. शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की व्याख्या, विशेष कर आठ प्रकार के प्राणायामों का
विवेचन योगवासिष्ठ के आधार पर किया है। योगवासिष्ठ 'मोक्षोपाय' के नाम से भी
प्रसिद्ध है। द्रष्टव्य—प्रकरण ६ पूर्वार्ध, २५ वां सर्ग।
२. शैव शास्त्रों में प्रमाता के सात भेद माने गये हैं। ये हैं—शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर,
मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल। शिव और शक्ति तत्त्व मिलकर शिव प्रमाता
का रूप धारण करते हैं। इसकी स्थिति राजा के समान है। सदाशिव मन्त्रमहेश्वर,
ईश्वर मन्त्रेश्वर और शुद्धविद्या मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी स्थिति अधिकारी
राजपुरुष की सी है। विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल जीवों पर ये शिवप्रमाता रूपी
राजा के प्रतिनिधि होकर शासन करते हैं। आणव, मायीय और कार्म—ये तीन प्रकार
के मल माने गये हैं। इनमें से एक मल से आवृत विज्ञानाकल, दो मलों से आवृत
प्रलयाकल और तीनों मलों से आवृत सकल प्रमाता कहलाते हैं। ये सभी भेद परिमित
प्रमाता के हैं। प्रथम चार भेद शुद्ध सृष्टि के और अन्तिम तीन अशुद्ध सृष्टि के अन्तर्गत
हैं। अशुद्ध सृष्टि के प्रमाताओं को ही अपने मलीय आवरणों को हटाने के लिए उपायों
का सहारा लेना पड़ता है।

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विज्ञानभैरव : २९
'कुम्भक' अवस्था कही जाती है। बाहर और भीतर दोनों स्थानों में निष्पन्न होने से यह बाह्य
और आन्तर के भेद से दो तरह की होती है। मनुष्य के श्वास-प्रश्वास की निरन्तर चलने
वाली स्वाभाविक प्रक्रिया से निष्पन्न होने वाली इन रेचक, पूरक तथा बाह्य एवं आन्तर कुम्भक
अवस्थाओं का निरन्तर सावधानी से निरीक्षण¹ करने वाला योगी फिर आवागमन के चक्कर
में नहीं पड़ता।
पातंजल योग में प्राणायाम के अभ्यास से प्राण वायु की गति को नियन्त्रित इसलिये
किया जाता है कि उसी अभ्यास की पद्धति से मन को भी नियन्त्रित किया जा सके। सहज
योग के प्रतिपादक इस ग्रन्थ में न तो प्राण वायु के और न मन के ही निग्रह के लिये कोई
आयास-साध्य उपाय बताया गया है। वायु स्वभाव से ही चल है। चलते-फिरते, सोते-जागते,
उठते-बैठते प्राणों की गति निरन्तर चलती रहती है। सकल, प्रलयाकल प्रभृति प्रमाता जीवों
में ही नहीं, पशु पक्षी, मृग आदि में भी सदा, सर्वत्र दिन-रात बिना प्रयत्न के स्वाभाविक रूप से
आठ प्रकार के प्राणायाम निरन्तर निष्पन्न होते रहते हैं। इन आठ प्रकार के प्राणायामों के
स्वरूप को ठीक तरह से जान लेने पर योगी मुक्त हो जाता है। साधक जो कुछ करता है, उन
सभी अवस्थाओं में अपने स्वाभाविक बोध से इन कुम्भक प्रभृति प्राण की अवस्थाओं को
जानता रहता है, वह अन्तर्मुख हो जाता है, अर्थात् सब कुछ करते हुए भी वह उनमें लिप्त
नहीं होता।
इन आठ प्राणायामों की स्थिति इस प्रकार है—१. हृदय कमल से प्राण स्वेच्छा से ही
बहिर्मुख हो जाता है। यह प्राण की रेचक अवस्था है। २. हृदय से बाहर निकलते समय
बारह अंगुल तक प्राण का अंगों से जो स्पर्श होता है, वह पूरक दशा है। ३. पुरुष के प्रयत्न
के बिना ही बाहर से अपान के लौटते समय, अंगों में उसके भरते समय जो स्पर्श होता है,
उसको भी पूरक ही कहते हैं। ४. अपान के हृदय में आकर विलीन हो जानेपर जब तक प्राण का
उदय नहीं होता, तब तक की अवस्था कुम्भक कहलाती है। इस अवस्था का अनुभव केवल
योगी को ही हो सकता है। इस तरह प्राण वायु शरीर के बाहर और भीतर निरन्तर स्वाभा-
विक रूप से प्राण² के आयाम के अभ्यास में निरत रहता है। प्राण की भांति अपान भी
दिन-रात शरीर के भीतर और बाहर चलता हुआ अपान के आयाम के स्वाभाविक अभ्यास

  1. बौद्ध (पालि और संस्कृत) अभिधर्म ग्रन्थों में दस अनुस्मृतियां वर्णित हैं। इनमें अन्तिम
    अनुस्मृति का नाम आनापान स्मृति है (द्रष्टव्य—अभिधम्मत्थसंगहो ९।८)। इसका संबन्ध
    प्राण और अपान की इस सूक्ष्म प्रक्रिया से ही है।
  2. "तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः" (२।४९) इस योग-सूत्र और इसके
    व्यास-भाष्य प्रभृति ग्रन्थों में प्राणायाम शब्द की विस्तृत व्याख्या देखनी चाहिये। संक्षेप
    में श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना ही प्राणायाम कहलाता है।
    श्लो० ६६ की व्याख्या में इसका अवयवार्थ स्पष्ट किया गया है। प्राणायाम शब्द की
    व्याख्या करते हुए आचार्य नरेन्द्रदेव अपने ग्रन्थ 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' में आश्वास-प्रश्वास
    शब्द पर टिप्पणी करते हैं—"विनय की अर्थकथा के अनुसार 'आश्वास' सांस छोड़ने को

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३० : विज्ञानभैरव
में निरन्तर लगा रहता है। जैसे कि १. उदय के बिना अपान की अन्तर्मुखता बाह्य रेचक के
नाम से जानी जाती है। २. अपान के द्वादशान्त से उठ कर स्थूल स्वरूप धारण करने की दशा
को बाह्य पूरक कहा जाता है। ३. इसी तरह से द्वादशान्त (बाह्य आकाश) से उठ कर नासिका
के अग्रभाग तक की अपान की गति को भी बाह्य पूरक कहा जाता है। ४. बाह्य आकाश
(द्वादशान्त) में प्राण के अस्त हो जाने पर जब तक अपान का उदय नहीं हो जाता, तब तक
की अवस्था को बाह्य कुम्भक कहा जाता है। अपान की उस समय वैसी ही स्थिति रहती है,
जैसी कि मिट्टी में अभी पैदा नहीं हुए घड़े की होती है।
इस तरह से प्राण और अपान के पूरण के दो प्रकारों के अनुसार प्राणायाम के आठ भेद
होते हैं। इन सभी आठों प्राणायामों को अपना ही स्वरूप समझ कर इनकी भावना करनी
चाहिये। हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में प्राण की गति रहती है और
हृदय-कमल, मुख का संकोच-विकास तथा द्वादशान्त अपान की गति के स्थान हैं। इनमें एक
क्षण के लिये प्राण के अस्त हो जाने पर और अपान का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के
बाह्य कुम्भक की प्राप्ति होती है। इसी तरह से एक क्षण के लिये अपान के अस्त हो जाने
पर और प्राण का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के अन्तः कुम्भक की प्राप्ति होती है। यह
1मध्यदशा ही परम पद कहलाती है। प्राण और अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान
सकते हैं। एक 2त्रुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्य-
और 'प्रश्वास' सांस लेने को कहते हैं। लेकिन सूत्र की अर्थकथा में दिया हुआ अर्थ इसका
ठीक उल्टा है। आचार्य बुद्धघोष विनय की अर्थकथा का अनुसरण करते हैं। उनका
कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर
जाती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है। इस प्रवृत्ति क्रम से 'आश्वास'
वह वायु है, जिसका निःसारण होता है। सूत्र की अर्थकथा में किया गया अर्थ पातंजल
योगसूत्र के व्यास-भाष्य के अनुसार है (२।४९ पर व्यासभाष्य- “बाह्यस्थवायोरानयनं
(चमनं) श्वासः, कोष्ठ्यस्य वायोर्निःसारणं प्रश्वासः)'' (पृ० ८१)। ६६ वें श्लोक की
व्याख्या में भी इस तरह का मतभेद देखने में आता है। इस पर उपोद्घात में विचार
किया जायगा।

  1. “मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः” और “विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकास-वाहच्छेदद्यन्त-
    कोटिनिभालनादय इहोपायाः” (सू० १७-१८) प्रत्यभिज्ञाहृदय के इन दो सूत्रों और उनकी
    व्याख्या में क्षेमराज ने इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाया है।
  2. प्राण के सवा दो अंगुल चलने में जितना समय लगता हैं, उसे 'त्रुटि' कहते हैं। कमल
    के कोमल पत्तों में तीखी सुई चुभोने पर एक पत्ते को छेदने में जो समय लगता है, उसे
    'लव' कहा जाता है। अठारह निमेष (पलक झपने का समय) की एक काष्ठा, तीस
    काष्ठा की एक कला और तीस कला का एक क्षण होता है। त्रुटि, लव और क्षण की यह
    परिभाषा क्रमशः तन्त्रसार (अभिनवगुप्त कृत, पृ० ४८), प्रपंचसार (१।३९) और अमर-
    कोश (१।४।११) में दी गई है।

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विज्ञानभैरव : ३१
दशा का आविर्भाव हो जाता है और तब प्राण और अपान की पुनः प्रत्यावृत्ति नहीं होती,
अर्थात् वह साधक मुक्त हो जाता है ॥२५॥
[ धारणा-३ ]
¹न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरुद्रूपा विकासि¹ते ।
निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता² ॥२६॥
मध्ये मध्यनाडीधाम्नि निर्विकल्पतया विकल्पहान्युपायतो विकासिते सति मरु-
द्रूपा शक्तिः प्राणात्मिका न व्रजेद् हृदयतो द्वादशान्तं न यायात्, न चापानात्मिका
शक्तिः, विशेद् द्वादशान्ताद् हृदयं गच्छेत् । एवंविधया तया प्राणात्मिकया अपाना-
त्मिकया वा शक्त्या भैरवरूपता भवेत् भैरवरूपधारी योगी भवति ॥२६॥
वायुरूप यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति हृदय से द्वादशान्त तक न तो जायगी
और न द्वादशान्त से हृदय की ओर वापस ही लौटेगी, जब कि मध्यनाडी का धाम (स्थान)
विकल्पहानि रूप उपाय से विकसित कर दिया जाय, अर्थात् पूर्व श्लोक में प्रतिपादित मध्य-
दशा का योगाभ्यास की पद्धति से विकास कर लिया जाय । इसका अभिप्राय यह है—
सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विश्वक् ।
क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तम्भभूतस्तिष्ठन् विश्वाकार एकोऽवभासि ॥
कक्ष्यास्तोत्र के इस वचन के अनुसार दर्शन आदि सब शक्तियों के समूह को अपने अपने
विषय में एक साथ डाल कर, उसके आधार के रूप में—
तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ।
स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥ (श्लो० ११)
इस स्पन्दकारिका के श्लोक में प्रतिपादित स्पन्दतत्त्वात्मक अपने स्वभाव को जान कर,
निर्विकल्पभाव से निमीलन और उन्मीलन समाधि में एक साथ रहने वाली व्यापक मध्यदशा का
सहारा लेकर योगी भैरव मुद्रा में प्रविष्ट हो जाता है । इस मुद्रा का लक्षण यह है—
अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेषवर्जिता ।
इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥
इस अवस्था में प्रविष्ट हो जाने पर योगी दर्पण में बनते-बिगड़ते हुए नाना प्रकार
के प्रतिबिम्बों की भांति चिदाकाश में उदित और विलीन हो रहे बाह्य पदार्थों और आन्तर
भावों को, अर्थात् समस्त विकल्पों को, निमीलन और उन्मीलन ²समापत्ति (समाधि) के बीच
१. °स°-ख० । २. °धृत्-ख० तवि०, °धृक्-रप० ।

  1. यह श्लोक स्पन्दनिर्णय (पृ० २४) और तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३३३)
    में उद्धृत है ।
  2. समाधि के अर्थ में समापत्ति शब्द का प्रयोग बौद्ध साहित्य में भी मिलता है । भैरवी
    मुद्रा में अन्तर्लीन व्यक्ति की इन्द्रियाँ खुली रहती हैं, तो भी वे अपने विषयों की ओर
    आकृष्ट नहीं होतीं। इसी स्थिति को उन्मीलन समाधि कहते हैं। बाह्य और आन्तर इन्द्रियों
    (करणों) के प्रवाह को रोक कर प्राप्त की गई समाधि को निमीलन समाधि कहते हैं ।

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३२ : विज्ञानभैरव
में ध्यान रूपी अरणि से जलाई गई ज्ञानाग्नि के द्वारा भस्म कर अपने समस्त करणचक्र
(इन्द्रिय समूह) को आलम्बन के अभाव में अक्रम रूप से अपने स्वरूप में ही विस्फारित
(विस्तीर्ण) कर लेता है। उस समय ऐसी प्रतीति होती है, मानों ये इन्द्रियां अपने अद्भुत
स्वरूप को आँखें फाड़ कर देख रही हों। इस निर्विकल्प अवस्था में प्रवेश कर लेने पर साधक
भैरवस्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसको अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा हो जाती है, प्राण और
अपान की गति के शान्त हो जाने से, हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द
अवस्था में स्थिति हो जाने से, मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने भैरवीय स्वरूप
को पहचान लेता है, वह साक्षात् भैरव स्वरूप हो जाता है। इसी विषय को अभिनवगुप्त ने
तन्त्रालोक में—
तद्ध्यानारणिसंक्षोभान्महाभैरववह्न्यभुक् ।
हृदयाख्ये महाकुण्डे जाज्वलन् स्फीततां व्रजेत् ॥
इत्यादि ग्रन्थ से स्पष्ट किया है।
पचीसवें और छब्बीसवें श्लोक में मध्यम धाम (स्थान) का सहारा लेने वाले आणव
उपाय का वर्णन है ॥२६॥
[ धारणा-४ ]
कुम्भिता रेचिता वापि पूरिता वा यदा भवेत् ।
तदन्ते शान्तनामासौ शक्त्या शान्तः प्रकाशते ॥२७॥
शास्त्रमार्गानुसारेण रेचिता सती कुम्भिता बहिः, पूरिता वा सती कुम्भिता
अन्तः, यदा मरुद्रूपा शक्तिर्भवति, तदा तदन्ते तत्तदभ्यासपरिशीलनेन शान्तवेगानुभवेन
प्रशान्तकुम्भकावस्थोदये प्रकाशमात्रावस्थोदये भेदोपशमात् तया शक्त्या शान्तनामा
नामरूपातीतः, असौ शान्तः परमस्वभावः प्रकाशतेऽभिव्यक्तो भवति ॥२७॥
योगशास्त्र में उपदिष्ट पूर्वोक्त विधि से बाह्य कुम्भक अवस्था में, अथवा आन्तर
कुम्भक अवस्था में प्राण और अपान रूप शक्ति आदरपूर्वक निरन्तर अभ्यास का परिशीलन
करने से शान्त हो जाती है, अर्थात् मध्यदशा का विकास हो जाता है। कुम्भक की प्रशान्त
अवस्था का उदय होने से सभी भेद विगलित हो जाते हैं और शक्ति भी अपने शान्त स्वरूप
में विलीन हो जाती है। तब नाम और रूप से अतीत प्रकाशमात्र अवस्था का उदय होने पर
परम शान्तस्वभाव स्वात्मस्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है ॥२७॥
[ धारणा-५ ]
१आमूलात् किरणाभासां १सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकाम् ।
चिन्तयेत् तां द्विषट्कान्ते शाम्यन्तीं भैरवोदयः ॥२८॥
१. सूक्ष्मसूक्ष्मत°-त० ।

  1. नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ४०१)
    में यह श्लोक उद्धृत है।

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विज्ञानभैरव : ३३
आमूलात् आहृदयाद् जन्माधाराद्वा द्वादशान्तं यावत् किरणाभासां मरीचिरूपां
क्रमात्क्रमं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकां तनिमानमाश्रयन्तीं तां मरुच्छक्तिं चिन्तयेत् ध्यायेत् ।
कीदृशीम् ? द्विषट्कान्ते द्वादशान्ते शाम्यन्तीम् । एवं सुसूक्ष्मतमस्यापि ध्येयाकारस्य
गलनाद् भैरवोदयो भैरवस्वरूपाविर्भावः, भवेदिति शेषः ॥२८॥
हृदय से अथवा मूलाधार से लेकर द्वादशान्त तक चन्द्र और सूर्य के समान अपनी
किरणों से भासित हो रही तथा क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर अग्रसर हो रही
उस पवन की शक्ति का चिन्तन करे, जो कि द्वादशान्त में जाकर शान्त हो जाती है, नाम
और रूप से अतीत अवस्था को प्राप्त कर लेती है । इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त सूक्ष्म
ध्येय के आकार के भी विगलित हो जाने पर योगी भैरव स्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसकी
स्वाभाविक भैरव दशा का आविर्भाव हो जाता है ।
नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक (५।८९-९१) की
टीका में जयरथ ने इस श्लोक को उद्धृत कर जो विवरण प्रस्तुत किया है, तदनुसार यहाँ
द्वादशान्त पद से ब्रह्मरन्ध्र का ग्रहण किया जाना चाहिये । मूलाधार में अथवा हृदय में
विद्यमान प्राण शक्ति यौगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्णा मार्ग से अथवा मध्यदशा के विकास
के कारण ब्रह्मरन्ध्र तक जाते जाते अत्यन्त सूक्ष्म होकर अन्त मे प्रकाश में विलीन हो
जाती है ॥२८॥
[ धारणा-६ ]
¹उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां प्रतिचक्रं क्रमात्क्रमम् ।
ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् तावदन्ते महोदयः ॥२९॥
तामेत शक्तिं तडिद्रूपां विद्युद्वत् चलद्दीप्त्योज्ज्वलां प्रतिचक्रं कन्दादिब्रह्मरन्धा-
न्तचक्रेभ्यः क्रमात्क्रमम् उद्गच्छन्तीमुल्लसन्तीं चिन्तयेत्, यावत् परं विश्वपूरकमूर्ध्वं
मुष्टित्रयं द्वादशान्तधाम तावत् । अन्ते महोदयः महाभैरवैकात्मतोदयः, अहमेव महाभैरव
इत्यवमर्शः स्यादेव ॥२९॥
इसी विद्युतस्वरूप, बिजली के समान एकाएक चमकने वाली शक्ति का प्रत्येक चक्र
में, कन्द से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त क्रमशः ऊपर उठती हुई अवस्था में चिन्तन करे । इससे
²मुष्टित्रय परिमित द्वादशान्त धाम में परम उत्कृष्ट विश्वपूरक, सारे विश्व को अपने प्रकाश
से भर देने वाला, महाभैरव का स्वरूप प्रकाशित हो उठता है । इसी बात को तन्त्रालोक में
इस प्रकार से कहा गया है—
अधःप्रवाहसंरोधादूर्ध्वक्षेपविवर्जनात् ।
महाप्रकाशमुदयज्ञानव्यक्तिप्रदायकम् ॥
अनुभूय परे धाम्नि मात्रावृत्त्या पुरं विशेत् । (५।८८-८९)
१. यह श्लोक तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३९७) में उद्धृत है ।
२. एक मुट्ठी का परिमाण चार अंगुल माना गया है । तीन मुट्ठी, अर्थात् बाहर अंगुल ।
इस तरह से मुष्टित्रय शब्द यहाँ द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है ।

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३४ : विज्ञानभैरव
इसका अभिप्राय यह है कि प्राण और अपान की गति को रोक कर मध्यदशा का
विकास कर उससे उत्पन्न शक्ति की सहायता से ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश पाकर योगी परम प्रकाश-
मय स्थिति में अवस्थित हो जाता है ॥२९॥
[ धारणा-७ ]
क्रमद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् ।
स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वा¹ऽन्ततः शिवः ॥३०॥
जन्माग्र-मूल-कन्द-नाभि-हृत् - कण्ठ-तालु-भ्रूमध्य - ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापि-
न्याख्यं यत्क्रमाणां चक्राणां द्वादशकं द्वादशस्थाननामभिः प्रसिद्धम्, तत् सम्यगिति यथा-
यथं क्रमेण अकारादिविसर्गान्तैः षण्ढस्वरवर्जैर्द्वादशाक्षरैः, भेदितं रञ्जितम्, ध्यायेदिति
शेषः । तच्च प्रत्येकं स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या आदौ ध्यानेन स्फुटं ततश्च स्पन्दमानं ततोऽपि
ज्योतीरूपतां प्राप्तं स्थूलं सूक्ष्मं परमित्यभिधीयते । इति सोपानपदक्रमं मुक्त्वा मुक्त्वा
परित्यज्य, अन्ततोऽन्ते, शिवः परमार्थतः सर्वत्रावभासकः स्वात्मस्वरूपः शिव एव
भवति ॥३०॥
जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति,
व्यापिनी ये बारह चक्र, जो कि द्वादश स्थान के नाम से प्रसिद्ध हैं, क्रमशः एक दूसरे के ऊर्ध्व
स्थान में स्थित हैं । इन चक्रों के स्थान और स्वरूप को ठीक तरह से समझ कर उनमें अकार
से लेकर विसर्ग पर्यन्त स्वरों का ध्यान करना चाहिये । तन्त्रशास्त्र में ऋ ॠ लृ लॄ ये चार स्वर
षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं, अतः ध्यान आदि में इनका उपयोग नहीं किया जाता । सोलह स्वरों
में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने पर इनकी संख्या भी बारह रह जाती है । अतः इन
बारह स्वरों का क्रमशः उक्त बारह चक्र स्थानों में ध्यान करना चाहिये । यह ध्यान स्थूल,
सूक्ष्म और पर पद्धति से त्रिविध¹ उपाय के रूप में मृत्युंजयभट्टारक (नेत्रतन्त्र) के ६-८ अधि-
कारों में विस्तार से वर्णित है । योगी जब अपने दृढ़ संकल्प से इन ध्यानों का अभ्यास करते
हुए स्पष्ट स्थूल वस्तु के ध्यान को छोड़ कर स्पन्दावस्था में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु के ध्यान में
और सूक्ष्म ध्यान को छोड़कर ज्योतिर्मय पर वस्तु के ध्यान में प्रविष्ट होता है, तो अन्ततः इस
अभ्यास-पद्धति से वह परमार्थ रूप से सर्वत्र प्रकाशित हो रहे कल्याणमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित
हो जाता है, अर्थात् स्वयं शिव बन जाता है ॥३०॥
[ धारणा-८ ]
तया²ऽऽपूर्याशु मूर्धान्तं भङ्क्त्वा भ्रूक्षेपसेतुना ।
निर्विकल्पं मनः कृत्वा सर्वोर्ध्वे सर्वगोद्गमः ॥३१॥
१. ˚क्त्वा त˚-ख० । २. ˚था˚-ख० ।

  1. याग, होम, जप, ध्यान, मुद्रा, यन्त्र, मन्त्र—ये सब स्थूल उपाय हैं । षट्चक्र, षोडश
    आधार आदि में प्राण-चार की भावना को सूक्ष्म उपाय बताया गया है । अष्टांग
    योग के अभ्यास से प्राप्त होने वाली सर्वात्मभाव की स्थिति को पर उपाय माना
    गया है ।