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सर्वकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

२४ : विज्ञानभैरव
[ धारणा-१ ]
श्रीभैरव उवाच
१ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।
उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद् भरिता२ स्थितिः ॥२४॥
योऽयमूर्ध्व इति हृदो द्वादशान्तं यावद् वहन् प्राणः, यश्चाधो जीवो द्वादशान्ताद्
हृदन्तमपानः, एषा परा देवी उच्चरेत् सततं स्वयमुच्चरन्ती स्थिता । कीदृशी ?
विसर्गात्मा विसर्गोऽन्तर्बहिर्भावकरणरूपो विमर्श आत्मा यस्याः सा अप्राणाद्यशाक्त-
स्पन्दोन्मेषा, तदाच्छुरणेन विना नियतप्राणप्रवाहायोगात् । यत एवमत उत्पत्तिद्वितयस्य
बाह्याभ्यन्तरोत्पाद्यद्वयस्य यत् स्थानं हृद् द्वादशान्तश्च, तत्र भरणादिति नित्योन्मिष-
दाद्यस्फुरत्तात्मभैरवीयशक्त्युपलक्षणात्, भरिता स्थितिः भैरवस्वरूपाभिव्यक्तिर्भवति ।
अथवा ऊर्ध्वे द्वादशान्ते प्राणः प्राणनरूपो जीवनाख्यश्चित्तवृत्तिविशेषः संस्थाप्यः ।
अधश्च हृदि हृदयस्थाने जीवोऽपानः, जीव्यतेऽनेनेति जीवः, भक्षणपानादेरधोमार्गप्रस-
रणाज्जीव इत्युच्यते तदुपाधिमान्, अत एव जीव इति । विसर्गात्मा अन्तर्बहिर्भावकरण-
रूप आत्मा यस्य। तेनापि परैव उच्चारमायाति अह्मित्यन्तश्चक्रारूढा, एतयोर्द्वयो-
र्विभेदापत्त्या अहमिति प्रकाशनात् । उत्पत्तौ द्वादशान्ते द्वितीये हृदि च धारणात् । तत्र
स्थित्या भरितस्थितिः स्यादेवेति सर्वोपाधिविस्मरणादहमिति विमर्शवान् स्यादिति
भावः ॥२४॥
इस तरह से देवी के द्वारा पूछे गये परा देवी के स्वरूप को पहचानने के लिए
उपाय के रूप में क्रमशः एक के बाद दूसरी ११२ धारणाओं का निरूपण करते हुए
भगवान् भैरव कहते हैं--ऊपर हृदय से द्वादशान्त२ तक जाने वाला प्राण और नीचे
१. °त°-ख० त० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १४३) में इस श्लोक का ‘भरणाद् भरितस्थितिः’
    इतना अंश मिलता है।
  2. प्राण और अपान की गति जिस स्थान पर जाकर रुक जाती है, उसको द्वादशान्त कहते
    हैं। बाह्य और आन्तर, शिव द्वादशान्त और शक्ति द्वादशान्त के भेद से इसकी कई
    स्थानों में स्थिति मानी गई है। प्राण और अपान के विसर्ग और पूरण व्यापार के द्वारा
    प्राणी का शरीर आप्यायित होता रहता है। ४९ वें श्लोक में द्वादशान्त पद का अर्थ
    शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्ना नाडी किया गया है। तन्त्रालोक (५।७१) में
    सभी नाड़ियों के अग्रभाग में द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। विभिन्न श्लोकों की
    व्याख्या में इन शब्दों की चर्चा आई है। उपोद्घात में भी इन पर विचार किया
    जायगा।