वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
१६० वात्स्यायन-कामसूत्र
माँ के संरक्षण में कार्य—वेश्या को क्रूर स्वभाव वाली और धनलोलुप माँ के अधीन
ही रहना चाहिये ॥ ३ ॥
तदभावे मातृकायाम् ॥ ४ ॥
यदि माँ न हो तो बनायी हुई माँ या मौसी के अधीन रहे ॥ ४ ॥
सा तु गम्येन नातिप्रीयेत ॥ ५ ॥
सगी माँ हो या मौसी, ये वेश्याएँ नायकों पर अतिस्नेह नहीं दिखातीं ॥ ५ ॥
प्रसह्य च दुहितरमानयेत् ॥ ६ ॥
नायकों के साथ देर तक बैठने पर लड़की को बलपूर्वक ले जाये ॥ ६ ॥
तत्र तु नायिकायाः सन्ततमरतिर्निर्वेदो व्रीडा भयं च ॥ ७ ॥
बेटी का शिष्टता-प्रदर्शन—माँ द्वारा ऐसा व्यवहार करने पर वेश्या अपने नायक के
समक्ष जाने में अरुचि, लज्जा और भय दिखाये ॥ ७ ॥
न त्वेव शासनातिवृत्तिः ॥ ८ ॥
माँ का आज्ञापालन—कभी भी ऐसा न हो कि माँ की आज्ञा न माने ॥ ८ ॥
व्याधिं चैकमनिमित्तमजुगुप्सितमचक्षुर्ग्राह्यमनित्यं च ख्यापयेत् ॥ ९ ॥
व्याधि का बहाना—नायक के पास से जाने के लिये वेश्या को चाहिये कि किसी ऐसी
व्याधि का बहाना बनाये जो अकारण, अनिन्दित, आँखों से न दिखने वाली और सदैव न रहने
वाली हो ॥ ९ ॥
सति कारणे तदपदेशं च नायकानभिगमनम् ॥ १० ॥
बहाने का फल—मिलन का कारण उपस्थित होने पर व्याधि का बहाना करना न
मिलना ही है ॥ १० ॥
निर्माल्यस्य तु नायिका चेटिकां प्रेष्येत्ताम्बूलस्य च ॥ ११ ॥
इसकी विधि—स्वागत सत्कार में प्रयुक्त होने वाली वस्तु पान, इलायची आदि नौकरानी
के हाथों भिजवा दे ॥ ११ ॥
व्यवाये तदुपचारेषु विस्मयः ॥ १२ ॥
मिलनविषयक बातें—सम्भोग काल में नायक द्वारा प्रयुक्त उपचारों पर विस्मय प्रदर्शित
करे ॥ १२ ॥
चतुःषष्ट्यां शिष्यत्वम् ॥ १३ ॥
सम्भोग की अङ्गभूत आलिङ्गन आदि चौंसठ कामकलाओं में नायक की शिष्यता
स्वीकारे ॥ १३ ॥
तदुपदिष्टानां च योगानामाभीक्ष्ण्येनअनुयोगः ॥ १४ ॥
नायक जिन जिन योगों को बताये, उस पर केवल उन्हीं योगों का प्रयोग करे ॥ १४ ॥
तत्सात्म्याद् रहसि वृत्तिः ॥ १५ ॥
एकान्त में नायक के अनुकूल ही व्यवहार करे ॥ १५ ॥
मनोरथानामाख्यानम् ॥ १६ ॥
६. वैशिक अधिकरण १६१
मनोरथ कथन—एकान्त में नायक से अपनी इच्छाएँ कह दे ॥ १६ ॥
गुह्यानां वैकृतप्रच्छादनम् ॥ १७ ॥
दोषों को छिपाना—यदि गुह्यांगों में कोई कुरूपता, दोष या विकार हो तो उसे छिपाये
रखे ॥ १७ ॥
शयने परावृत्तस्यानुपेक्षणम् ॥ १८ ॥
शयन-विधि—यदि नायक करवट बदलकर सोये तो वेश्या को उसकी ओर मुख करके
ही सोना चाहिये ॥ १८ ॥
आनुलोम्यं गुह्यस्पर्शने ॥ १९ ॥
नायक द्वारा काँख, योनि आदि का स्पर्श करने पर उसे न रोके ॥ १९ ॥
सुप्तस्य चुम्बनमालिङ्गनं च ॥ २० ॥
सोते हुए नायक का चुम्बन और आलिङ्गन करे ॥ २० ॥
प्रेक्षणमन्यमनस्कस्य। राजमार्गे च प्रासादस्थायास्तत्र विदिताया व्रीडा
शाठ्यनाशः ॥ २१ ॥
देखने की विधि—सड़क पर जाते हुए अन्यमनस्क नायक को निर्निमेष दृष्टि से देखे,
दूर निकल जाने पर झरोखे से देखे और यदि उसकी दृष्टि पड़ जाये तो शरमा जाये ॥ २१ ॥
तद्द्वेष्ये द्वेष्यता। तत्प्रिये प्रियता। तद्रम्ये रतिः। तमनु हर्षशोकौ। स्त्रीषु
जिज्ञासा। कोपश्चादीर्घः ॥ २२ ॥
व्यवहार की विधि—नायक के शत्रु को अपना शत्रु समझे, उसके प्रेमी से प्रेम रखे,
उसके मनोनुकूल स्थान पर समागम करे, उसके हर्ष में हर्षित और दुःख में दुःखी हो, उसकी
स्त्रियों के विषय में जानने की इच्छा रखे और क्रोध अल्पकालिक ही करे ॥ २२ ॥
स्वकृतेष्वपि नखदशनचिह्नेष्वन्याशङ्का ॥ २३ ॥
अपने द्वारा किये गये नखक्षतों एवं दन्तक्षतों को भी किसी अन्य के होने की शङ्का
करे ॥ २३ ॥
अनुरागस्यावचनम् ॥ २४ ॥
अनुराग को मुख से कदापि न कहे ॥ २४ ॥
आकारतस्तु दर्शयेत् ॥ २५ ॥
परन्तु अपनी चेष्टाओं से प्रकट कर दे, मुख से न कहे ॥ २५ ॥
मदस्वप्नव्याधिषु तु निर्वचनम् ॥ २६ ॥
मदिरापान, सोने और उन्माद आदि व्याधि के बहाने अपनी सम्भोगेच्छा स्पष्ट कर
दे ॥ २६ ॥
श्लाघ्यानां नायककर्मणां च ॥ २७ ॥
नायक के सत्कर्मों को भी इसी अवस्था में कह दे ॥ २७ ॥
तस्मिन् ब्रुवाणे वाक्यार्थग्रहणम्। तदवधार्य प्रशंसाविषये भाषणम्।
तद्वाक्यस्य चोत्तरेण योजनम्। भक्तिमांश्चेत् ॥ २८ ॥
१६२ वात्स्यायन-कामसूत्र
बोलने की रीति—नायक के बोलने पर उसकी बातों का आशय समझे, उसकी बातों
को समझकर प्रशंसा भी करे, उससे विषयों पर वार्तालाप करे और उसकी बातों का उत्तर तभी
दे जब यह समझ ले कि यह स्नेहसम्पन्न है ॥ २८ ॥
कथास्वनुवृत्तिरन्यत्र सपत्न्याः ॥ २९ ॥
केवल सपत्नियों की प्रेमकथाओं को छोड़कर, नायक की प्रत्येक बात में 'हाँ' करनी
चाहिये ॥ २९ ॥
निःश्वासे जृम्भिते स्खलिते पतिते वा तस्य चार्तिमाशंसीत ॥ ३० ॥
सहानुभूति के अवसर—नायक के लम्बी साँसें लेने, जँभाई लेने, धन आदि भूल जाने
या गिरने पर दुःख प्रकट करे ॥ ३० ॥
क्षुतव्याहृतविस्मितेषु जीवेत्युदाहरणम् ॥ ३१ ॥
नायक के छींकने, महत्त्वपूर्ण बात कहने और आश्चर्य व्यक्त करने पर 'जीते रहो' ऐसा
कहे ॥ ३१ ॥
दौर्मनस्ये व्याधिदौर्हृदापदेशः ॥ ३२ ॥
नायक का मन मलिन देखकर उसका कारण पूछे और स्वयं भी रोग और शत्रु का बहाना
करे ॥ ३२ ॥
गुणतः परस्याकीर्तनम् ॥ ३३ ॥
नायक के समक्ष किसी अन्य के गुणों की प्रशंसा न करे ॥ ३३ ॥
न निन्दा समानदोषस्य ॥ ३४ ॥
जिसमें नायक के समान ही दोष हों, उसकी निन्दा कदापि न करे ॥ ३४ ॥
दत्तस्य धारणम् ॥ ३५ ॥
नायक द्वारा दी गयी वस्तु को उसके सामने सदैव धारण करना चाहिये ॥ ३५ ॥
वृथापराधे तद्व्यसने वालङ्कारस्याग्रहणभोजनं च ॥ ३६ ॥
मिथ्या आरोप लगाने या नायक पर सङ्कट आने पर उसे भोजन एवं शृंगार का परित्याग
कर देना चाहिये ॥ ३६ ॥
तद्युक्ताश्च विलापाः ॥ ३७ ॥
उसके लिये शोकाकुल होकर विलाप करे ॥ ३७ ॥
तेन सह देशमोक्षं रोचयेद्राजनि निष्क्रयं च ॥ ३८ ॥
नायक के साथ सहजीवन को प्राथमिकता—नायक के साथ देश छोड़कर भाग जाने
की इच्छा व्यक्त करे अथवा राजकीय व्यवस्था के अनुरूप खरीद डालने की बात कहे ॥ ३८ ॥
सामर्थ्यमायुषस्तदवाप्तौ ॥ ३९ ॥
जीवनसार्थक मानना—वेश्या नायक के मिलन से ही अपना जीवन सार्थक होना
कहे ॥ ३९ ॥
तस्यार्थाधिगमेऽभिप्रेतसिद्धौ शरीरोपचये वा पूर्वसम्भाषित इष्टदेवतोप-
हारः ॥ ४० ॥
६. वैशिक अधिकरण १६३
देवपूजा—नायक को धन मिलने, मनोवाञ्छित कार्य पूरा होने और शारीरिक रोग के
नष्ट हो जाने पर पहले बोली गयी देवभेंट चढ़ाये ॥ ४० ॥
नित्यमलङ्कारयोगः। परिमितोऽभ्यवहारः ॥ ४१ ॥
भोजन और अलंकार की रीति—सदैव सजी-सँवरी रहना चाहिये और सन्तुलित
भोजन करना चाहिये ॥ ४१ ॥
गीते च नामगोत्रयोग्रहणम्। ग्लान्यामुरसि ललाटे च करं कुर्वीत। तत्सुखमुप-
लभ्य निद्रालाभः ॥ ४२ ॥
वेश्या जब गाये तो उसमें नायक का नाम और कुल रखे। अस्वस्थ होने पर उसका हाथ
अपने मस्तक और वक्ष पर रख ले। उसके हाथ के स्पर्श के बहाने सो जाये ॥ ४२ ॥
उत्सङ्गे चास्योपवेशनं स्वपनं च। गमनं वियोगे ॥ ४३ ॥
नायक की गोद में बैठना और सोना चाहिये और जब वह जाये तो उसके पीछे पीछे भी
चले ॥ ४३ ॥
तस्मात् पुत्रार्थिनी स्यात्। आयुषो नाधिक्यमिच्छेत् ॥ ४४ ॥
नायक से सन्तान की इच्छा—उस नायक से पुत्रप्राप्ति की कामना करे और आयु में
उससे अधिक न जीना चाहे ॥ ४४ ॥
एतस्याविज्ञातमर्थं रहसि न ब्रूयात् ॥ ४५ ॥
आवश्यक बातें—जिस धन का नायक को पता न हो, उस धन को कभी एकान्त में भी
नहीं बताना चाहिये ॥ ४५ ॥
व्रतमुपवासं चास्य निवर्तयेत् मयि दोष इति। अशक्ये स्वयमपि तद्रूपा
स्यात् ॥ ४६ ॥
मुझे दोष लगेगा, यह कहकर नायक को व्रत और उपवास करने से रोक दे। यदि वह
कहने से भी न रुके तो उसके साथ स्वयं भी व्रत और उपवास करे ॥ ४६ ॥
विवादे तेनाप्यशक्यमित्यर्थनिर्देशः ॥ ४७ ॥
यदि किसी के साथ विवाद हो जाये तो कह दे कि इसे तो वही निपटा सकता है, दूसरा
कोई नहीं ॥ ४७ ॥
तदीयमात्मीयं वा स्वयमविशेषेण पश्येत् ॥ ४८ ॥
नायक की सम्पत्ति को अपनी ही समझे ॥ ४८ ॥
तेन विना गोष्ठ्यादीनामगमनमिति ॥ ४९ ॥
उसके बिना गोष्ठी या उत्सव में न जाये ॥ ४९ ॥
निर्माल्यधारणे श्लाघ्या उच्छिष्टभोजने च ॥ ५० ॥
नायक की उतारी हुई वस्तुएँ धारण करने और उसका उच्छिष्ट (जूठन) खाने में गौरव का
अनुभव करे ॥ ५० ॥
कुलशीलशिल्पजातिविद्यावर्णवित्तदेशमित्रगुणवयोमाधुर्यपूजा ॥ ५१ ॥
१६४ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक के कुल, शील, शिल्प, जाति, विद्या, वर्ण, धन, देश, मित्र, गुण, अवस्था और
मधुरता की सदैव प्रशंसा करे ॥ ५१ ॥
गीतादिषु चोदनमभिज्ञस्य ॥ ५२ ॥
यदि नायक गाना बजाना जानता हो तो उसे इस कार्य में लगाये ॥ ५२ ॥
भयशीतोष्णवर्षाण्यनपेक्ष्य तदभिगमनम् ॥ ५३ ॥
प्रतिकूल ऋतु में भी अभिसार—यदि नायक के साथ समागम का समय निश्चित हो
गया है तो भय, शीत, और वर्षा की ओर ध्यान नहीं देना चाहिये ॥ ५३ ॥
स एव च मे स्यादित्यौर्ध्वदेहिकेषु वचनम् ॥ ५४ ॥
जन्मान्तर सम्बन्धों की कामना—'मरने के पश्चात् दूसरे जन्म में मुझे आप ही प्रियतम
के रूप में प्राप्त हों'—ऐसा कहे ॥ ५४ ॥
तदिष्टरसभावशीलानुवर्तनम् ॥ ५५ ॥
नायक को जो रस, भाव और शील प्रिय लगता हो, उसका ही अनुकरण करे ॥ ५५ ॥
मूलकर्माभिशङ्का ॥ ५६ ॥
वशीकरण की शंका—नायक के ऊपर जादू-टोने की शङ्का करे ॥ ५६ ॥
तदभिगमने च जनन्या सह नित्यं विवादः ॥ ५७ ॥
माँ से विवाद—नायक से मिलने के लिये माँ से नित्य विवाद करे ॥ ५७ ॥
बलात्कारेण च यद्यन्यत्र तया नीयेत तदा विषमनशनं शस्त्रं रज्जुमिति
कामयेत ॥ ५८ ॥
माँ को भयभीत करना—यदि माँ उसे बलपूर्वक किसी अन्य के साथ सम्भोग के लिये
कहे तो यह कह दे—'जहर खा लूँगी, खाना नहीं खाऊँगी, चाकू मारकर आत्महत्या कर लूँगी,
फाँसी लगाकर मर जाऊँगी' ॥ ५८ ॥
प्रत्यायनं च प्रणिधिभिर्नायकस्य । स्वयं वात्मनो वृत्तिग्रहणम् ॥ ५९ ॥
रहस्योद्घाटन पर प्रयास—यदि नायक को यह पता लग जाये कि यह अन्य से भी
सम्बन्ध रखती है तो अपने आदमियों द्वारा नायक को विश्वास दिलवा दे। यदि अपने आदमियों
से यह सम्भव न हो पाये तो स्वयं जाकर इस वृत्ति (वेश्यावृत्ति) की निन्दा करे ॥ ५९ ॥
न त्वेवार्थेषु विवादः ॥ ६० ॥
धन के विषय में विवाद नहीं—धन के विषय में विवाद न करें ॥ ६० ॥
मात्रा बिना किञ्चिन्न चेष्टेत ॥ ६१ ॥
सभी कार्यों में माता की सहमति—माँ से बिना पूछे कोई कार्य न करे अर्थात् सब काम
माँ से पूछकर ही करे ॥ ६१ ॥
प्रवासे शीघ्रागमनाय शापदानम् ॥ ६२ ॥
नायक के विदेशगमन पर शपथ—यदि नायक किसी कार्य से विदेश जा रहा हो तो
उसे शीघ्र लौटने की शपथ अवश्य दिलाये ॥ ६२ ॥
६. वैशिक अधिकरण १६५
प्रोषिते मृजानियममङ्गालङ्कारस्य प्रतिषेधः। मङ्गलं त्वपेक्ष्यम्। एकं शङ्खवलयं
वा धारयेत्॥ ६३॥
प्रवासवृत्त—नायक के बाहर जाने पर एकचारिणी, शरीर का संस्कार न करे अर्थात् तेल
उबटन साबुन आदि छोड़ दे, अलंकार भी धारण न करे। मङ्गल की तो सतत अपेक्षा है, इसलिये
माङ्गलिक चिह्न (शङ्खवलय) अवश्य करे॥ ६३॥
स्मरणमतीतानाम्। गमनमीक्षणिकोपश्रुतीनाम्। नक्षत्रचन्द्रसूर्यताराम्यः स्पृह-
णम्॥ ६४॥
नायक की मधुर स्मृतियों का वर्णन कहे, शकुन बताने वाली स्त्रियों के यहाँ जाये, रात को
शकुन देखे और चाँदनी रात में चमकते चन्द्रमा और नक्षत्रों से ईर्ष्या करे॥ ६४॥
इष्टस्वप्नदर्शने तत्सङ्गमो ममास्त्विति वचनम्॥ ६५॥
शुभ स्वप्न देखकर सबसे यह कहे कि अब नायक से समागम होगा॥ ६५॥
उद्वेगोऽनिष्टे शान्तिकर्म च॥ ६६॥
यदि अनिष्टसूचक स्वप्न दिखे तो उद्वेग (घबड़ाहट) दिखाये और शान्तिकर्म
कराये॥ ६६॥
प्रत्यागते कामपूजा॥ ६७॥
नायक के आने के बाद के कृत्य—नायक के सकुशल आ जाने पर कामदेव की पूजा
करनी चाहिये॥ ६७॥
देवतोपहाराणां करणम्॥ ६८॥
प्रवासकाल में जिन जिन देवताओं की मनौती माँगी हो, उन उन के मन्दिर में जाकर भेंट
चढ़ाये॥ ६८॥
सखीभिः पूर्णपात्रस्याहरणम्॥ ६९॥
सखियों के साथ पूर्णपात्र का ग्रहण करे॥ ६९॥
वायसपूजा च॥ ७०॥
काकबलि—कौओं को बलि प्रदान करे॥ ७०॥
प्रथमसमागमानन्तरं चैतदेव वायसपूजावर्जम्॥ ७१॥
कौओं की पूजा को छोड़कर, शेष सभी कार्य प्रथम समागम के बाद ही करे॥ ७१॥
सक्तस्य चानुमरणं ब्रूयात्॥ ७२॥
साथ ही मरना—आसक्त नायक के साथ ही मर जाने (सती हो जाने) की बात
कहे॥ ७२॥
निसृष्टभावः समानवृत्तिः प्रयोजनकारी निराशङ्को निरपेक्षोऽर्थेष्विति सक्त-
लक्षणानि॥ ७३॥
आसक्त की पहचान—आसक्त नायक वही है जो नायिका पर पूर्ण विश्वास रखे, प्रवृत्ति
और निवृत्ति समान बना ले, उसके प्रयोजन को तत्काल पूर्ण कर दे, उस पर किसी भी प्रकार की
शङ्का न करे और धन के विषय में चिन्तित न हो॥ ७३॥
१६६ वात्स्यायन-कामसूत्र
तदेतन्निदर्शनार्थं दत्तकशासनादुक्तम्। अनुक्तं च लोकात् शीलयेत् पुरुष-
प्रकृतितश्च ॥ ७४ ॥
वैशिक शास्त्र के विशेषज्ञ आचार्य दत्तक को देखकर संक्षेप में यह वेश्याचरित कह
दिया गया। जो बातें यहाँ नहीं कही गयी, उन्हें लोक से और पुरुष की प्रकृति से जान लेना
चाहिये ॥ ७४ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
सूक्ष्मत्वादतिलोभाच्च प्रकृत्याज्ञानतस्तथा।
कामलक्ष्मतु दुर्ज्ञानं स्त्रीणां तद्भावितैरपि ॥ ७५ ॥
वेश्यानायकों को शिक्षा—विद्वान् व्यक्ति भी वेश्याओं के काम के वास्तविक स्वरूप
को नहीं समझ सकते; क्योंकि एक तो काम का स्वरूप ही अत्यन्त सूक्ष्म है, दूसरे ये इतनी लोभी
होती हैं कि कृत्रिम चेष्टाओं को भी स्वाभाविक के समान दिखा देती हैं और इनका जो आसक्त
है, वह तो विवेकशून्य हो ही जाता है ॥ ७५ ॥
कामयन्ते विरज्यन्ते रञ्जयन्ति त्यजन्ति च।
कर्षयन्त्योऽपि सर्वार्थान् ज्ञायन्ते नैव योषितः ॥ ७६ ॥
वेश्याएँ अपने नायकों को चाहती हैं, उन पर अनुरक्त भी रहती हैं और विरक्त भी, उनको
अनुरक्त भी बना देती हैं और त्याग भी देती हैं। वे नायक के धन को इस प्रकार से खींचती हैं
कि पुरुष को कुछ भी पता नहीं चलता ॥ ७६ ॥
'कान्तानुवृत्त'प्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न॥
●
तृतीय अध्याय
अर्थागमोपायप्रकरण
सत्ताद्वित्तादानं स्वाभाविकमुपायतश्च ॥ १ ॥
आसक्त नायक से धन दो प्रकार से मिलता है—एक तो स्वाभाविक ढंग से और दूसरे
प्रयत्नपूर्वक ॥ १ ॥
तत्र स्वाभाविकं सङ्कल्पात् समधिकं वा लभमाना नोपायान् प्रयुञ्जीतेत्या-
चार्याः ॥ २ ॥
वेश्या जितना धन प्राप्त करने की इच्छा रखती हो, यदि उतना या उससे अधिक धन उसे
स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाये तो उसे उपायों का प्रयोग नहीं करना चाहिये—यह कामशास्त्र
के आचार्यों का मत है ॥ २ ॥
विदितमप्युपायैः परिष्कृतं द्विगुणं दास्यतीति वात्स्यायनः ॥ ३ ॥
यदि फीस निश्चित होने पर भी उपाय किये जायें तो उससे दोगुनी राशि मिल सकती है—
यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३ ॥
६. वैशिक अधिकरण १६७
अलङ्कारभक्ष्यभोज्यपेयमाल्यवस्त्रगन्धद्रव्यादीनां व्यवहारिषु कालिकमुद्धा-
रार्थमर्थप्रतिनयनेन ॥ ४ ॥
धन-प्राप्ति के उपाय — आभूषण, भक्ष्य (लड्डू, जलेबी आदि), भोज्य (अन्न), पेय
(शर्बत, मदिरा आदि), माला, वस्त्र (सूती, रेशमी, ऊनी कपड़े) और गन्ध आदि वस्तुएँ बेचने
वालों को वायदे पर जो मूल्य चुकाना है उसके लिये अथवा उसके बदले में जो वस्तु धरोहर रूप
में रखी हो, उसे छुड़ाने के लिये रुपया ले ले ॥ ४ ॥
तत्समक्षं तद्वित्तप्रशंसा ॥ ५ ॥
वैशिक के धन की प्रशंसा—वैशिक के सामने उसके धन की खुलकर प्रशंसा
करे ॥ ५ ॥
व्रतवृक्षारामदेवकुलतडागोद्यानोत्सवप्रीतिदायव्यपदेशः ॥ ६ ॥
व्रत, वृक्ष, उद्यान, देवमन्दिर, कुआँ, बावड़ी, उत्सव और प्रेमोपहार का बहाना करे ॥ ६ ॥
तदभिगमननिमित्तो रक्षिभिश्चौरैर्वालङ्कारपरिमोषः ॥ ७ ॥
लूट का बहाना—आप से मिलने के लिये आ रही थी कि रास्ते में रक्षकों (पहरेदारों)
या चोरों ने आभूषण उतरवा लिये ॥ ७ ॥
दाहात् कुड्यच्छेदात् प्रमादाद् भवने चार्थनाशः ॥ ८ ॥
अग्निकाण्ड या विनाश का बहाना—घर में आग लग जाने, सेंध लग जाने या
असावधानी से धन के नष्ट हो जाने का बहाना करे ॥ ८ ॥
तथा याचितालङ्काराणां नायकालङ्काराणां च तदभिगमनार्थस्य व्ययस्य
प्रणिधिभिर्निवेदनम् ॥ ९ ॥
स्वागत-सत्कार का खर्च—इसी प्रकार माँगे हुए या नायक द्वारा दिये हुए आभूषणों के
विषय में भी कह दे और फिर वेश्या उससे मिलने के समय हुए खर्च के लिये विश्वस्त नौकरों
से कहलवाये ॥ ९ ॥
तदर्थमृणग्रहणम् । जनन्या सह तदुद्भवस्य व्ययस्य विवादः ॥ १० ॥
ऋण—नायक के स्वागत-सत्कार हेतु ऋण ले लेना चाहिये और फिर अपनी माँ के साथ
उस व्यय पर विवाद करना चाहिये ॥ १० ॥
सुहृत्कार्येष्वनभिगमनमनभिहारहेतोः ॥ ११ ॥
प्रेमोपहार की विवशता—यदि नायक के किसी मित्र के घर उत्सव हो और वह चलने
के लिये कहे तो यही कह दे कि मेरे पास देने के लिये कुछ कहीं है, इसलिये नहीं
जाऊँगी ॥ ११ ॥
तैश्च पूर्वमाहृता गुरवोऽभिहाराः पूर्वमुपनीताः पूर्वं श्राविताः स्युः ॥ १२ ॥
उनके लाये हुए बड़े बड़े प्रेमोपहार आपने पहले ही ले लिये हैं, यह बात जाने से पूर्व ही
सुना दे ॥ १२ ॥
उचितानां क्रियाणां विच्छित्तिः ॥ १३ ॥
आवश्यक खर्चों में कटौती—दैनिक जीवन के आवश्यक खर्चों में भी कटौती
कर दे ॥ १३ ॥
१६८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायकार्थं च शिल्पियु कार्यम् ॥ १४ ॥
शिल्पकारों से ऐसी वस्तुएँ बनवा ले जिसमें नायक को धन खर्च करना पड़े ॥ १४ ॥
वैद्यमहामात्रयोरुपकारक्रिया कार्यहेतोः ॥ १५ ॥
वैद्य और राजपुरुषों पर उपकार—अपने कार्य के लिये वैद्य और राजपुरुषों पर उपकार
कर दे ॥ १५ ॥
मित्राणां चोपकारिणां व्यसनेष्वभ्युपपत्तिः ॥ १६ ॥
मित्रों की सहायता—नायक के मित्रों एवं उपकारियों की सङ्कट में सहायता
अवश्य करे ॥ १६ ॥
गृहकर्म सख्याः पुत्रस्योत्सङ्गनम् दोहदो व्याधिर्मित्रस्य दुःखापनयन-
मिति ॥ १७ ॥
नायक से धन लेने के लिये घर बनवाने, सखी के पुत्र के उत्सङ्गन (चूड़ाकर्म, अन्नप्राशन
आदि), दोहद, मित्र की व्याधि और दुःख दूर करने का बहाना करे ॥ १ ॥
अलङ्कारैकदेशविक्रयो नायकस्यार्थे ॥ १८ ॥
नायक के किसी कार्य के लिये अपने कुछ आभूषण बेच दे ॥ १८ ॥
तया शीलितस्य चालङ्कारस्य भाण्डोपस्करस्य वा वणिजो विक्रयार्थं
दर्शनम् ॥ १९ ॥
प्रियवस्तु की बिक्री का बहाना—अपने प्रिय आभूषणों, बर्तनों और घर के सामान को
नायक के सामने ही व्यापारी को बिक्री हेतु दिखाये ॥ १९ ॥
प्रतिगणिकानां च सदृशस्य भाण्डस्य व्यतिकरे प्रतिविशिष्टस्य
ग्रहणम् ॥ २० ॥
विशिष्ट बर्तनों की माँग—प्रतिवेश्याओं से समान बर्तन होने के कारण उसके बर्तन
प्रायः बदल जाते हैं, इस बहाने उत्तम बर्तनों की माँग करे ॥ २० ॥
पूर्वोपकाराणामविस्मरणमनुकीर्तनं च ॥ २१ ॥
नायक के प्रति कृतज्ञताज्ञापन—नायक द्वारा किये गये पहले उपकारों को न भूले और
उनका प्रेमपूर्वक वर्णन करे ॥ २१ ॥
प्रणिधिभिः प्रतिगणिकानां लाभातिशयं श्रावयेत् ॥ २२ ॥
अपने विश्वस्त नौकरों द्वारा दूसरी प्रतिवेश्याओं को होने वाले अधिक लाभ की बात
नायक को सुनवाये ॥ २२ ॥
तासु नायकसमक्षमात्मनोऽभ्यधिकं लाभं भूतमभूतं वा व्रीडिता नाम
वर्णयेत् ॥ २३ ॥
यदि अपने यहाँ कोई वेश्या आयी हुई हो तो नायक के सामने उससे लाभ को बढ़ा-
चढ़ाकर कहे और यदि कोई लाभ न हुआ हो तो नायक की ओर देखकर और लजाकर लाभ
होना बताये ॥ २३ ॥
६. वैशिक अधिकरण १६९
पूर्वयोगिनां च लाभातिशयेन पुनः सन्धाने यतमानानामाविष्कृतः
प्रतिषेधः ॥ २४ ॥
त्यागशीलता का दिखाना—पूर्व प्रेमी जो सम्पर्क छोड़ चुके हों और अब अधिक धन
देकर सम्पर्क बनाना चाहते हों, उन्हें नायक के सामने ही स्पष्ट ना कर देना चाहिये ॥ २४ ॥
तत्स्पर्धिनां त्यागयोगिनां निदर्शनम् ॥ २५ ॥
नायक से स्पर्धा रखने वाले उन त्यागशील व्यक्तियों को उसे दिखाना चाहिये जो वेश्या के
साथ संसर्ग करना चाहते हैं ॥ २५ ॥
न पुनरेष्यतीति बालयाचितकमित्यर्थागमोपायाः ॥ २६ ॥
बच्चों के समान हठपूर्वक माँगना—यदि वेश्या को यह विश्वास हो जाये कि यह अब
नहीं आयेगा (क्योंकि मुझ से विरक्त हो गया है) तो बच्चों की तरह लज्जा त्याग कर हठपूर्वक
माँगे। ये अर्थागमोपाय हैं ॥ २६ ॥ (१)
विरक्तं च नित्यमेव प्रकृतिविक्रियातो विद्यात् मुखवर्णाच्च ॥ २७ ॥
विरक्तप्रतिपत्ति प्रकरण : विरक्त के लक्षण—सब बातों में स्वभाव के बदलने और
मुख के रागरंग से विरक्त हुए पुरुष को पहचान ले ॥ २७ ॥
ऊनमतिरिक्तं वा ददाति ॥ २८ ॥
विरक्त पुरुष के कार्य—जो वेश्या को दिया करता था, उससे कम या अधिक दे ॥ २८ ॥
प्रतिलोमैः सम्बध्यते ॥ २९ ॥
प्रतिवेश्याओं (स्पर्धी वेश्याओं) से सम्बन्ध बनाने लगे ॥ २९ ॥
व्यपदिश्यान्यत् करोति ॥ ३० ॥
एक काम को कहकर अन्य काम करने लगे ॥ ३० ॥
उचितमाच्छिनत्ति ॥ ३१ ॥
जो उचित कार्य हैं, उन्हें भी रोक दे ॥ ३१ ॥
प्रतिज्ञातं विस्मरति। अन्यथा वा योजयति ॥ ३२ ॥
देने को कहकर भी न दे अथवा यह कह दे कि मैंने देने के लिये कब कहा था! ॥ ३२ ॥
स्वपक्षैः संज्ञया भाषते ॥ ३३ ॥
अपने इष्ट-मित्रों से संकेत से बातें करे ॥ ३३ ॥
मित्रकार्यमपदिश्यान्यत्र शेते ॥ ३४ ॥
मित्र के कार्य का बहाना करके अन्यत्र जाकर सोये ॥ ३४ ॥
पूर्वसंसृष्टायाश्च परिजनेन मिथः कथयति ॥ ३५ ॥
पहली वेश्या के नौकरों से इस वेश्या की सारी बातें बता दे ॥ ३५ ॥
तस्य सारद्रव्याणि प्रागवबोधादन्यापदेशेन हस्ते कुर्वीत ॥ ३६ ॥
वेश्या के कार्य—जब तक नायक को इस बात का पता चले कि यह मेरी विरक्ति जान
गयी है, उससे पूर्व ही वेश्या किसी बहाने से उसका धन अपने हाथ में कर ले ॥ ३६ ॥
तानि चास्या हस्तादुत्तमर्णः प्रसह्य गृह्णीयात् ॥ ३७ ॥
१७० वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका का सिखाया हुआ साहूकार नायक के धन को नायिका के हाथ से बलपूर्वक ले
ले ॥ ३७॥
विवदमानेन सह धर्मस्थेषु व्यवहरेदिति विरक्तप्रतिपत्तिः ॥ ३८ ॥
यदि नायक साहूकार के साथ विवाद करने लगे तो उसे न्यायाधिकरण तक ले जाये। इस
प्रकार विरक्तप्रतिपत्ति प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ (२)
सक्तं तु पूर्वोपकारिणमप्यल्पफलं व्यलीकेनानुपालयेत् ॥ ३९ ॥
निष्कासनक्रम प्रकरण— थोड़ा देने वाले पहले उपकारी नायक को अपराध करने पर
भी निभाये, धक्के देकर न निकाले ॥ ३९ ॥
असारं तु निष्प्रतिपत्तिकमुपायतोऽपवाहयेत् । अन्यमवष्टभ्य ॥ ४० ॥
अकिञ्चन का निष्कासन— निर्धन एवं आसक्त नायक को किसी धनवान् एवं अनुरक्त
नायक का सहारा लेकर ही निकाले ॥ ४० ॥
तदनिष्टसेवा । निन्दिताभ्यासः । ओष्ठनिर्भोगः । पादेन भूमेरभिघातः । अवि-
ज्ञातविषयस्य सङ्कथा । तद्विज्ञातेष्वविस्मयः । समानदोषाणां निन्दा । रहसि
चावस्थानम् ॥ ४१ ॥
निष्कासन के प्रकट उपाय— जिन्हें नायक नहीं चाहता, उनकी सेवा करना, निन्दनीय
कर्मों का बार बार करना, होंठ चबाना, जमीन पर पैर पटकना, जिन बातों को नायक न जाने
उनकी चर्चा करना, जिन विषयों को नायक जानता हो, उन पर विस्मय प्रकट करना और उनकी
निन्दा करना, उसके अभिमान पर चोट करना, उससे बड़ों के साथ रहना, उसे अनदेखा करना,
नायक में जो दोष हैं उन ही के समान दोष वालों की निन्दा करना और एकान्त में बैठना— ये
निष्कासन के प्रकट उपाय हैं ॥ ४१ ॥
रतोपचारेषूद्वेगः । मुखस्यादानम् । जघनस्य रक्षणम् । नखदशनक्षतेभ्यो
जुगुप्सा । परिष्वङ्गे भुजमय्या सूच्या व्यवधानम् । स्तब्धता गात्राणाम् । सक्थ्नो-
र्व्यत्यासः । निद्रापरत्वं च श्रान्तमुपलभ्य चोदना । अशक्तौ हासः । शक्तावन-
भिनन्दनम् । दिवापि भावमुपलभ्य महाजनाभिगमनम् ॥ ४२ ॥
सम्भोगकालीन व्यवहार— सम्भोगकाल के उपचारों को स्वीकार न करना, अधरपान
या चुम्बन न करने देना, जाँघों पर हाथ न फेरने देना, नखक्षतों एवं दन्तक्षतों की निन्दा करना,
आलिङ्गन का प्रयास करने पर भुजाओं की कैंची बनाकर व्यवधान उत्पन्न करना, शरीर के अंगों
को कड़ा कर लेना, यन्त्रयोग करने पर एक जाँघ को दूसरी पर चढ़ा लेना, नींद का बहाना
करना, थके हुए नायक को सम्भोग के लिये उकसाना, अशक्त होने पर उसकी हँसी उड़ाना,
शक्ति में प्रशंसा न करना, उसके हाव-भावों को देखकर दिन में भी रतिकक्ष से बाहर निकल
जाना और गुरुजनों के समीप बैठ जाना— ये उपाय सम्भोगकाल में प्रयोग किये जाते हैं ॥ ४२ ॥
वाक्येषु च्छलग्रहणम् । अनर्मणि हासः । नर्मणि चान्यमपदिश्य हसति वदति
तस्मिन् कटाक्षेण परिजनस्य प्रेक्षणं ताडनं च । आहत्य चास्य कथामन्याः कथाः ।
६. वैशिक अधिकरण १७१
तद्द्वयलीकानां व्यसनानां चापरिहार्याणामनुकीर्तनम्। मर्मणां च चेटिकयोप-
क्षेपणम् ॥ ४३ ॥
बातें करने की रीति—छल-कपटपूर्ण बातें, बिना रति के उपहास, रतिकेलि में दूसरे के
बहाने नायक का उपहास, उससे बातें करते समय कटाक्ष से परिजनों को देखना और उन्हें
ताड़ित करना, उसकी बातों को बीच में काटकर दूसरी बातें करना, उसके ऐसे अवगुणों और
दोषों का वर्णन करना जिन्हें वह चाहकर भी न छोड़ सके, नौकरानी के बहाने उसकी गुप्त बातों
का उद्घाटन—यह निकालने वाले के साथ बातें करने की रीति है ॥ ४३ ॥
आगते चादर्शनम्। अयाच्ययाचनम्। अन्ते स्वयं मोक्षश्चेति परिग्रहकस्येति
दत्तकस्य ॥ ४४ ॥
अन्तिम उपाय—उसके आने पर न दिखना, न माँगने योग्य वस्तुएँ माँगना और अन्त में
धक्के देकर निकाल देना—ये अन्तिम उपाय हैं। यह विषय आचार्य दत्तक का कहा
हुआ है ॥ ४४ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
परीक्ष्य गम्यैः संयोगः संयुक्तस्यानुरञ्जनम्।
रक्तादर्थस्य चादानमन्ते मोक्षश्च वैशिकम् ॥ ४५ ॥
इस विषय में दो श्लोक प्राप्त होते हैं—
वेश्या नायकों की परीक्षा करके ही उनके साथ समागम करे। जिसके साथ समागम हो
जाये, उसे अनुरक्त करे। अनुरक्त का धन खींचे और अन्त में उसे धक्के देकर निकाल दे—संक्षेप
में वेश्याओं का आचार्य दत्तकप्रोक्त यही चरित्र है ॥ ४५ ॥
एवमेतेन कल्पेन स्थिता वेश्या परिग्रहे।
नातिसन्धीयते गम्यैः करोत्यर्थांश्च पुष्कलान् ॥ ४६ ॥
वेश्याओं के जो कार्य कहे गये हैं, उनका प्रयोजन क्या है, यह आगे बताते हैं—यदि
वेश्या ऊपर कही गयी रीति से नायकों से संसर्ग करती है और अपने प्रेमियों को धोखा नहीं देती
तो वह विपुल धन एकत्र कर लेती है। इस तरह निष्कासनक्रम पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥ ( ३ )
अर्थागमोपाय नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
चतुर्थ अध्याय
विशीर्णप्रतिसन्धान प्रकरण
वर्तमानं निष्पीडितार्थमुत्सृजन्ती पूर्वसंसृष्टेन सह सन्दध्यात् ॥ १ ॥
विशीर्णप्रतिसन्धान : जिसका सारा धन निचोड़ (चूस) लिया हो, ऐसे नायक को
छोड़ती हुई वेश्या पूर्व नायक से सन्धि कर ले ॥ १ ॥
काम० १३
१७२ वात्स्यायन-कामसूत्र
स चेदवसितार्थो वित्तवान् सानुरागश्च ततः सन्धेयः ॥ २ ॥
मिलने का कारण—यदि वह धनवान् हो, और धन देगा—यह भी निश्चित हो तथा
अनुराग भी रखता हो तभी मिलना चाहिये, अन्यथा नहीं ॥ २ ॥
अन्यत्र गतस्तर्कयितव्यः। स कार्ययुक्त्या षड्विधः ॥ ३ ॥
यदि वह दूसरी वेश्या के पास गया है, तो मिलाने से पूर्व विचार कर लेना चाहिये। अपने
कार्य की योजना के अनुसार वह छह प्रकार का हो सकता है ॥ ३ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततोऽपि स्वयमेवापसृतः ॥ ४ ॥
प्रथम : दोनों ओर से स्वयं हटने वाला—जो से स्वयं हटा हो और दूसरी वेश्या के पास
से भी स्वयं ही हटा हो ॥ ४ ॥
इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः ॥ ५ ॥
द्वितीय : दोनों ओर से धक्के देकर निकाला गया—जो यहाँ से और वहाँ से (दोनों
स्थानों से ही) धक्के देकर निकाला गया हो ॥ ५ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतः ॥ ६ ॥
तृतीय : यहाँ से स्वयं निकला और वहाँ से निकाला गया—जो यहाँ से तो स्वयं हटा
हो किन्तु वहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो ॥ ६ ॥
इतः स्वयमपसृतस्तत्र स्थितः ॥ ७ ॥
चतुर्थ : यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जमा—जो यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ स्थित हो गया
हो अर्थात् दूसरी के पास जाकर जम गया हो ॥ ७ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृतः ॥ ८ ॥
पञ्चम : जो यहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो और वहाँ से स्वयं हट गया हो ॥ ८ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्तत्र स्थितः ॥ ९ ॥
षष्ठ : यहाँ से निकाला गया और वहाँ जमा—जो यहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो
और वहाँ जाकर जम गया हो ॥ ९ ॥
इतस्ततश्च स्वयमेवापसृत्योपजपति चेदुभयोर्गुणानपेक्षी चलबुद्धिर-
सन्धेयः ॥ १० ॥
प्रथम : न मिलाने योग्य नायक—जो नायक यहाँ और वहाँ, दोनों स्थानों से, स्वयं ही
हटकर, पुनः मिलने को कहे, दोनों नायिकाओं के गुणों की अपेक्षा न करने वाला वह चञ्चल
बुद्धि वाला पुरुष है, अतएव मिलाने योग्य नहीं है ॥ १० ॥
इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः स्थिरबुद्धिः। स चेदन्यतो बहु लभमानया
निष्कासितः स्यात्ससारोऽपि तया रोषितो ममामर्षार्द् बहु दास्यतीति संधेयः ॥ ११ ॥
द्वितीय : अधिक लाभ पर स्वीकार्य—जो यहाँ और वहाँ दोनों स्थानों पर, नायिका
द्वारा ही निकाला गया हो, तभी हटा हो, वह स्थिरबुद्धि पुरुष है। यदि दूसरी ने उसे अन्यों की
अपेक्षा अधिक लाभ उठाकर भी निकाला हो, धनवान् होने पर भी वेश्या द्वारा क्रुद्ध कर दिया
गया हो, 'मुझे इस क्रोधवश अधिक देगा'—यह निश्चित हो, तभी उसके साथ सन्धि करनी
चाहिये अर्थात् उसे तभी सम्भोग का अवसर देना चाहिये, अन्यथा नहीं ॥ ११ ॥
६. वैशिक अधिकरण १७३
निःसारतया कदर्यतया वा त्यक्तो न श्रेयान् ॥ १२ ॥
निर्धन या दुष्ट संसर्ग के योग्य नहीं—यदि नायक निर्धनता या दुष्टता के कारण
निकाला गया हो तो उसके साथ संसर्ग करना श्रेयस्कर नहीं होता ॥ १२ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतो यद्यतिरिक्तमादौ च दद्यात्ततः
प्रतिग्राह्यः ॥ १३ ॥
तृतीय : अधिक धन पर स्वीकार्य—जो नायक यहाँ से स्वयं हटा हो और वहाँ से
नायिका द्वारा निकाला गया हो, ऐसा नायक यदि पहले ही अतिरिक्त धन देता है, तो उसे स्वीकार
कर लेना चाहिये अर्थात् उसे अग्रिम अतिरिक्त धन लेकर समागम का अवसर दे देना
चाहिये ॥ १३ ॥
इतः स्वयमपसृत्य तत्र स्थित उपजपंस्तर्कयितव्यः ॥ १४ ॥
चतुर्थ : विचारणीय—जो यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जम गया हो, ऐसा नायक यदि बात
चलाये तो उस पर विचार करना चाहिये ॥ १४ ॥
विशेषार्थी चागतस्ततो विशेषमपश्यन्नागन्तुकामो मयि मां जिज्ञासितुकामः स
आगत्य सानुरागत्वाद्दास्यति। तस्यां वा दोषान् दृष्ट्वा मयि भूयिष्ठान् गुणानधुना
पश्यति स गुणदर्शी भूयिष्ठं दास्यति ॥ १५ ॥
संसर्गयोग्य पक्ष—यह विशेषता से प्रेम करता है, इसीलिये वहाँ गया था। वहाँ कुछ भी
विशेषता न दिखने से अब वापस आना चाहता है और यहाँ आकर मुझे जानना चाहता है। प्रेमी
होने के कारण यहाँ आकर कुछ अधिक ही धन देगा अथवा उसमें दोष देखकर इस समय मुझमें
गुण देख रहा है। अतएव यह गुणग्राही नायक अधिक धन देगा ॥ १५ ॥
बालो वा नैकत्रदृष्टिरतिसन्धानप्रधानो वा हरिद्रारागो वा यत्किञ्चनकारी
वेत्यवेत्य सन्दध्यान्न वा ॥ १६ ॥
असंसर्गयोग्य पक्ष—बालबुद्धि है, स्थिरचित्त वाला नहीं है, विचारशील नहीं है, हल्दी
की तरह अस्थायी राग (रंग या अनुराग) वाला है अथवा जो मन में आता है, कर बैठता है—
इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके ही नायिका देखे कि यदि वह संसर्ग करने योग्य
है तो करे, अन्यथा नहीं ॥ १६ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृत उपजपँस्तर्कयितव्यः ॥ १७ ॥
पंचम : विचारणीय—यहाँ से निकाला गया और वहाँ से स्वयं हटा नायक यदि अपनी
ओर से बात चलाये, तो उस पर विचार करना चाहिये ॥ १७ ॥
अनुरागादागन्तुकामः स बहु दास्यति। मम गुणैर्भावितो योऽन्यस्यां न
रमते ॥ १८ ॥
संसर्गयोग्य पक्ष—वह मेरे अनुरागवश आना चाहता है, इसलिये अधिक देगा। वह मेरे
गुणों से प्रभावित है, इसलिये दूसरी नायिका में उसका मन नहीं रम रहा है ॥ १८ ॥
पूर्वमयोगेन वा मया निष्कासितः स मां शीलयित्वा वैरं निर्यातयितुकामो
१७४ वात्स्यायन-कामसूत्र
धनमभियोगाद्वा मयास्यापहृतं तद्विश्वास्य प्रतीपमादातुकामो निर्वेष्टुकामो वा मां
वर्तमानाद् भेदयित्वा त्यक्तुकाम इत्यकल्याणबुद्धिरसन्धेयः ॥ १९ ॥
असंसर्गयोग्य पक्ष—पहले मैंने इसे अन्यायपूर्वक निकाला था, इसलिये अब यह मुझसे
मिलकर अपना वैर निकालना चाहता है अथवा उपायों द्वारा मैंने इसका सारा धन खींच लिया है,
इसलिये अब यह विश्वास दिखाकर उसे निकालना चाहता है; अथवा वर्तमान प्रेमी को मुझसे
तोड़कर फिर मुझे छोड़ देना चाहता है, इस प्रकार यह अकल्याण बुद्धि वाला है, अतः संसर्ग
नहीं करना चाहिये ॥ १९ ॥
अन्यथाबुद्धिः कालेन लम्भयितव्यः ॥ २० ॥
यदि वह अनुरागवश मिलना चाहता है तो उसे कुछ समय बाद ही अवसर देना
चाहिये ॥ २० ॥
इतो निष्कासितस्तत्र स्थित उपजपन्नेतेन व्याख्यातः ॥ २१ ॥
षष्ठ : नायक का विचार—जो अपने यहाँ से निकाला गया हो और वहाँ जाकर जम
गया हो, वह यदि अपनी ओर से बात चलाये तो संसर्ग के योग्य होने पर ही उसके संसर्ग करे,
अन्यथा नहीं ॥ २१ ॥
तेषूपजपन्त्वन्यत्र स्थितः स्वयमुपजपेत् ॥ २२ ॥
जो यहाँ से जाकर वहाँ जम गया और सन्देश भेजने पर भी जमा रहे, उससे स्वयं बातें
करनी चाहिये ॥ २२ ॥
व्यलीकार्थं निष्कासितो मयासावन्यत्र गतो यत्नादानेतव्यः ॥ २३ ॥
इस के कारण—मैंने इसे अपराध पर निकाला था और मेरे यहाँ से यह वहाँ जाकर जम
गया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक लाना चाहिये ॥ २३ ॥
इतः प्रवृत्तसम्भाषो वा ततो भेदमवाप्स्यति ॥ २४ ॥
अथवा यहाँ से बातें चलने पर वहाँ से अलग हो जायेगा ॥ २४ ॥
तदर्थाभिघातं करिष्यति ॥ २५ ॥
मुझसे अनुरक्त होकर वह दूसरी वेश्या को आर्थिक हानि पहुँचायेगा ॥ २५ ॥
अर्थागमकालो वास्य। स्थानवृद्धिरस्य जाता। लब्धमनेनाधिकरणम्।
दारैर्वियुक्तः। पारतन्त्र्याद् व्यावृत्तः। पित्रा भ्रात्रा वा विभक्तः ॥ २६ ॥
यह इसकी धनप्राप्ति का समय है। इसके व्यापार या नौकरी में उन्नति हुई है, इसे धन या
पद आदि का अधिकार मिल गया है, इस समय यह अपनी स्त्रियों से अलग रह रहा है, इसकी
परतन्त्रता समाप्त हो गयी है, यह अपने पिता या भाई से अलग हो गया है ॥ २६ ॥
अनेन वा प्रतिबद्धमनेन सन्धिं कृत्वा नायकं धनिनमवाप्स्यामि ॥ २७ ॥
नायक इसका मित्र है, मैं इससे मिलकर उस धनवान् नायक को प्राप्त कर लूँगी ॥ २७ ॥
विमानिता वा भार्यया तमेव तस्यां विक्रमयिष्यामि ॥ २८ ॥
इसने मेरा अपमान किया है, अथवा अपनी स्त्री से जाकर मिल गया है। मैं युक्तिपूर्वक
इसकी स्त्री को अलग करके इससे ही लड़ा दूँगी ॥ २८ ॥
६. वैशिक अधिकरण १७५
अस्य वा मित्रं मद्द्वेषिणीं सपत्नीं कामयते तदमुना भेदयिष्यामि ॥ २९ ॥
अथवा इसका मित्र मुझसे वैर मानने वाली मेरी सपत्नी (सौत) को चाहता है। मैं इसके
द्वारा उससे लड़वा दूँगी ॥ २९ ॥
चलचित्ततया वा लाघवमेनमापादयिष्यामीति ॥ ३० ॥
अथवा इसे चञ्चल चित्तवाला सिद्ध करके अन्य वेश्याओं की दृष्टि में गिरा दूँगी ॥ ३० ॥
तस्य पीठमर्दादयो मातुर्दौःशील्येन नायिकायाः सत्यप्यनुरागे विवशयाः पूर्वं
निष्कासनं वर्णयेयुः ॥ ३१ ॥
नायिका के पीठमर्द आदि विश्वस्त सेवक नायक से जाकर कहें कि वह तो आज भी
आपकी अनुरक्त है, किन्तु माता की कुटिलता के कारण विवश होकर आपको निकालना
पड़ा था ॥ ३१ ॥
वर्तमानेन चाकामायाः संसर्गं विद्वेषं च ॥ ३२ ॥
वर्तमान नायक के साथ उसका संसर्ग विना अनुराग के है, दिल से तो वह उससे घृणा ही
करती है और आपकी कामना करती है ॥ ३२ ॥
तस्याश्च साभिज्ञानैः पूर्वानुरागैरैनं प्रत्यापयेयुः ॥ ३३ ॥
उस नायिका के पहले प्रेम को पहचानपूर्वक कहकर अपनी बात का विश्वास
दिलाये ॥ ३३ ॥
अभिज्ञानं च तत्कृतोपकारसम्बद्धं स्यादिति विशीर्णप्रतिसन्धानम् ॥ ३४ ॥
पूर्वकृत उपकारों से प्रेम की पहचान—उसके प्रेम की पहचान तो उसके द्वारा किये
गये पहले के उपकारों से बँधी होनी चाहिये। इस प्रकार ‘विमुक्त नायक का मिलन’ नामक
प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
अपूर्वपूर्वसंसृष्टयोः पूर्वसंसृष्टः श्रेयान्। स हि विदितशीलो दृष्टरागश्च सूपचारो
भवतीत्याचार्याः ॥ ३५ ॥
पूर्वपरिचित की श्रेष्ठता : पहले मिले हुए और कभी न मिले हुए पुरुषों में पहले मिला
हुआ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसका शील-स्वभाव परिचित रहता है, उसका प्रेम देखा हुआ रहता है
और उसका उपचार सुखपूर्वक किया जा सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत
है ॥ ३५ ॥
पूर्वसंसृष्टः सर्वतो निष्पीडितार्थत्वान्नात्यर्थमर्थदो दुःखं च पुनर्विश्वासयितुम्।
अपूर्वस्तु सुखेनानुरज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ३६ ॥
यदि पूर्व नायक का सारा धन लेकर ही उसे छोड़ा है, तो न तो वह अधिक धन ही दे
सकेगा और न उसे विश्वास दिलाना ही सरल है; जबकि नया नायक सरलता से अनुरक्त किया
जा सकता है—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३६ ॥
तथापि पुरुषप्रकृतितो विशेषः ॥ ३७ ॥
पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख—तथापि इसमें पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख होता है ॥ ३७ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
अन्यां भेदयितुं गम्यादन्यतो गम्यमेव वा।
१७६ वात्स्यायन-कामसूत्र
स्थितस्य चोपघातार्थं पुनः सन्धानमिष्यते ॥ ३८ ॥
प्रतिसन्धान के कारण : वियुक्तगत कारण—इस विषय में आनुवंश्य श्लोक उद्धृत
करते हैं—
गम्य नायक से अन्य वेश्या को अलग करने के लिये, अन्य वेश्या से मिलने वाले नायक
को अलग करने के लिये और उसको धन की हानि पहुँचाने के लिये वियुक्त नायक पुनः
मिलाया जाता है ॥ ३८ ॥
बिभेत्यन्यस्य संयोगाद् व्यलीकानि च नेक्षते ।
अतिसक्तः पुमान् यत्र भयाद् बहु ददाति च ॥ ३९ ॥
वर्तमानगत कारण—जो अत्यन्त आसक्त नायक, नायिका के साथ अन्य के संसर्ग से
डरता है और उसके अपराधों को भी नहीं देखता, ऐसा पुरुष डरते डरते बहुत धन दे
देता है ॥ ३९ ॥
असक्तमभिनन्देत सक्तं परिभवेत् तथा।
अन्यदूतानुपाते च यः स्यादतिविशारदः ॥ ४० ॥
नायक को परामर्श—जो नायक अत्यन्त निपुण हो, उसे चाहिये कि किसी अन्य के दूत
के आ जाने पर, उसके सामने असमर्थ की प्रशंसा और समर्थ की निन्दा करे ॥ ४० ॥
तत्रोपयायिनं पूर्वं नारी कालेन योजयेत्।
भवेच्चाच्छिन्नसन्धाना न च सक्तं परित्यजेत् ॥ ४१ ॥
नायिका को परामर्श—वेश्या को चाहिये कि यदि नया समर्थ और वियुक्त प्रेमी, दोनों
आ रहे हों तो दोनों को समय समय पर ही मिलाये अर्थात् पहले नये धनवान् को समागम का
अवसर दे और फिर वियुक्त प्रेमी को। न वियुक्त नायक के साथ ही मिलन में हिचकिचाहट करे
और न ही नये धनवान् नायक का ही परित्याग करे ॥ ४१ ॥
सक्तं तु वशिनं नारी सम्भाव्याप्यन्यतो व्रजेत्।
ततश्चार्थमुपादाय सक्तमेवानुरञ्जयेत् ॥ ४२ ॥
समर्थ और अनुरक्त को प्राथमिकता—वेश्या वशीभूत समर्थ पुरुष से कहकर अन्य के
पास चली जाये और वहाँ से धन लाकर समर्थ पुरुष को विधिवत् प्रसन्न करे ॥ ४२ ॥
आयतिं प्रसमीक्ष्यादौ लाभं प्रीतिं च पुष्कलाम्।
सौहृदं प्रतिसन्दध्याद्विशीर्णं स्त्री विचक्षणा ॥ ४३ ॥
वियुक्त को मिलाते समय ध्यातव्य बातें—चतुर वेश्या को चाहिये कि सर्वप्रथम
प्रभाव, लाभ, अत्यधिक प्रेम और सौहार्द को देख ले, तभी वियुक्त नायक को मिलाये ॥ ४३ ॥
अर्थागमोपाय प्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
६. वैशिक अधिकरण १७७
पञ्चम अध्याय
लाभविशेषप्रकरण
गम्यबाहुल्ये बहु प्रतिदिनं च लभमाना नैकं प्रतिगृह्णीयात् ॥ १ ॥
अपरिग्रह का कारण—मिलने वाले पुरुषों की अधिकता होने पर प्रतिदिन बहुत मिलें,
तो एक को ही न स्वीकारे अर्थात् नित्य नये नये पुरुषों को सम्भोग का अवसर प्रदान करें ॥ १ ॥
देशं कालं स्थितिमात्मनो गुणान् सौभाग्यं चान्याभ्यो न्यूनातिरिक्ततां चावेक्ष्य
रजन्यामर्थं स्थापयेत् ॥ २ ॥
एक रात की फीस (शुल्क)—देश, काल, अपनी स्थिति, गुण, सौभाग्य और दूसरी
वेश्याओं से अपने रूप, सौन्दर्य, गुण आदि की अधिकता या न्यूनता देखकर ही अपनी एक रात
का शुल्क नियत करे ॥ २ ॥
गम्ये दूताँश्च प्रयोजयेत् । तत्प्रतिबद्धाँश्च स्वयं प्रहिणुयात् ॥ ३ ॥
दूत भेजने की रीति—समागम योग्य पुरुषों का अभिप्राय जानने के लिये अपने दूत लगा
दे और नायक के सम्पर्क वाले व्यक्तियों से स्वयं कहे ॥ ३ ॥
द्वित्रिश्चतुरिति लाभातिशयग्रहार्थमेकस्यापि गच्छेत् । परिग्रहं च चरेत् ॥ ४ ॥
अधिक लाभ की रीति—एक से अधिक लाभ पाने की इच्छा से दो, तीन चार रात एक
नियत शुल्क पर ही समागम करे ओर पत्नी की तरह उसकी सेवा करता रहे ॥ ४ ॥
गम्ययौगपद्ये तु लाभसाम्ये यद्द्रव्यार्थिनी स्यात्तद्दायिनि विशेषः प्रत्यक्ष
इत्याचार्याः ॥ ५ ॥
एक साथ आने वालों से अधिक लाभ—मिलने योग्य पुरुषों के एक साथ आने पर
और समान लाभ (फीस) होने पर भी वेश्या जिसका धन ले लेगी, वह दूसरों से अधिक ही
देगा, यह स्पष्ट है—ऐसा कामशास्त्र के पूर्व आचार्यों का मत है ॥ ५ ॥
अप्रत्यादेयत्वात् सर्वकार्याणां तन्मूलत्वाद्विरणयद इति वात्स्यायनः ॥ ६ ॥
क्योंकि सिक्का (धन) अविश्वास की अवस्था में भी नहीं लौटाया जा सकता और वही
सारे कार्य सम्पन्न करने का साधन है, इसलिये सिक्का देने वाला ही गम्य है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ ६ ॥
सुवर्णरजतताम्रकांस्यलोहभाण्डोपस्करास्तरणप्रावरणवासोविशेषगन्धद्रव्य-
कटुकभाण्डघृततैलधान्यपशुजातीनां पूर्वपूर्वतो विशेषः ॥ ७ ॥
फीस का स्वरूप—सोना, चाँदी, ताँबा, कांसा, लोहा, बर्तन, सामान, बिस्तर, लिहाफ,
अन्य वस्त्र, द्रव्य, काली मिर्च, घड़ा (कलश), घी, तेल, अन्न, पशु—इन वस्तुओं में उत्तरोत्तर
की अपेक्षा पूर्व पूर्व उत्तम हैं ॥ ७ ॥
यत्तत्र साम्याद्वा द्रव्यसाम्ये मित्रवाक्यादतिपातित्वादायतितो गम्यगुणतः
प्रीतितश्च विशेषः ॥ ८ ॥
समानता में प्राथमिकता—यदि दो समान प्रेमी हों या समान धन देने वाले हों तो मित्र
१७८ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोग जिसे अभीष्ट समझें अथवा जिस नायक को अधिक गुणी, सुन्दर और प्रभावशाली समझें,
उसी की दी हुई वस्तु ग्रहण करे ॥ ८ ॥
रागित्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ ९ ॥
रागी से त्यागी की श्रेष्ठता—अनुरक्त नायक की अपेक्षा दानशील त्यागी से अधिक लाभ
प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ९ ॥
शक्यो हि रागिणि त्याग आधातुम् ॥ १० ॥
उपायों द्वारा रागी की त्यागशीलता भी सम्भव—अनुरक्त नायक को उपायों द्वारा
त्यागशील बनाया जा सकता है ॥ १० ॥
लुब्धोऽपि हि रक्तस्त्यजति न तु त्यागी निर्बन्धाद्रज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ११ ॥
अनुरक्त होने पर तो लोभी पुरुष भी धन दे सकता है, किन्तु त्यागशील को उपायों द्वारा
अनुरक्त नहीं किया जा सकता—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ११ ॥
तत्रापि धनवदधनवतोर्धनवति विशेषः । त्यागप्रयोजनकर्त्रोः प्रयोजनकर्तरि
विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १२ ॥
निर्धन से धनवान् और त्यागशील से कार्यसाधक श्रेष्ठ—इसमें भी निर्धन की अपेक्षा
धनवान् श्रेष्ठ है और त्यागशील की अपेक्षा वेश्या का स्वार्थसाधक श्रेष्ठ है—ऐसा कामशास्त्र के
पूर्व आचार्यों का मत है ॥ १२ ॥
प्रयोजनकर्ता सकृत्कृत्वा कृतिनमात्मानं मन्यते त्यागी पुनरतीतं नापेक्षत इति
वात्स्यायनः ॥ १३ ॥
वेश्या का कार्य सिद्ध करने वाला तो एक बार कार्य सिद्ध करके अपने को कृती मान लेता
है, किन्तु त्यागशील तो अतीत में दिये गये धन के विषय में सोचता ही नहीं है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ १३ ॥
तत्राप्यात्ययिकतो विशेषः ॥ १४ ॥
आवश्यकतानुसार विशिष्ट—आवश्यकतानुसार इन दोनों में भी विशेषता होती
है ॥ १४ ॥
कृतज्ञत्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १५ ॥
कृतज्ञ और त्यागी—कृतज्ञ और त्यागी—दोनों में त्यागी से विशेष लाभ प्राप्त किया जा
सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १५ ॥
चिरमाराधितोऽपि त्यागी व्यलीकमेकमुपलभ्य प्रतिगणिकया वा
मिथ्यादूषितः श्रममतीतं नापेक्षते ॥ १६ ॥
त्यागी की न्यूनता—बहुत समय तक उपायों द्वारा सिद्ध किया गया त्यागी, वेश्या के एक
ही अपराध को देखकर अथवा प्रतिगणिका (स्पर्धी वेश्या) द्वारा बहकाये जाने पर वेश्या द्वारा
उठाये गये कष्टों को नहीं देखता ॥ १६ ॥
प्रायेण हि तेजस्विन ऋजवोजनादृताश्च त्यागिनो भवन्ति ॥ १७ ॥
६. वैशिक अधिकरण १७९
त्यागियों का स्वभाव—प्रायः त्यागी तेजस्वी, सरल (निष्कपट) और अनादर को न
सह पाने वाले होते हैं ॥ १७ ॥
कृतज्ञस्तु पूर्वश्रमापेक्षी न सहसा विरज्यते। परीक्षितशीलत्वाच्च न मिथ्या
दूष्यत इति वात्स्यायनः ॥ १८ ॥
कृतज्ञ—कृतज्ञ नायिका के परिश्रम को समझता है इसलिये अकस्मात् विरक्त नहीं होता।
क्योंकि वह नायिका के शील की परीक्षा किये रहता है इसलिये स्पर्धी वेश्या के बहकावे में नहीं
आता—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ १८ ॥
तत्राप्यायतितो विशेषः ॥ १९ ॥
रागी, त्यागी, कृतज्ञ—तीनों में विशेष—रागी, त्यागी और कृतज्ञ—इन तीनों में से
भविष्य के प्रभाव को देखकर ही लाभ उठाना चाहिये ॥ १९ ॥
मित्रवचनार्थगमयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ २० ॥
मित्रवाक्य और अर्थप्राप्ति में प्राथमिकता—मित्रों के परामर्श और अर्थप्राप्ति—इन
दोनों में अर्थप्राप्ति में विशेष लाभ तो प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के पूर्व आचार्यों का मत
है ॥ २० ॥
सोऽपि ह्यर्थागमो भविता। मित्रं तु सकृद्वाक्ये प्रतिहते कलुषितं स्यादिति
वात्स्यायनः ॥ २१ ॥
मित्रों का परामर्श न मानने पर धन तो मिलेगा ही, पर अपनी बात न मानने पर वे अप्रसन्न
हो जायेंगे—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २१ ॥
तत्राप्यतिपाततो विशेषः ॥ २२ ॥
इस अर्थसञ्चय में भी फिर न मिलने वाले को प्राप्त कर लेना चाहिये। उस समय की
अपेक्षा से जो अर्थ फिर हाथ न आये, उसे प्राप्त कर लेना चाहिये, यह विशेष लाभ है ॥ २२ ॥
तत्र कार्यसन्दर्शनेन मित्रमनुनीय श्वोभूते वचनमस्त्विति ततोऽतिपातिनमर्थं
प्रतिगृह्णीयात् ॥ २३ ॥
मित्रों से अनुनय-विनय—कार्य के बहाने मित्र से अनुनय विनय कर तात्कालिक लाभ
प्राप्त कर ले और उनसे कहे कि कल आपकी बात अवश्य मानूँगी ॥ २३ ॥
अर्थगमानर्थप्रतीघातयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ २४ ॥
अर्थप्राप्ति और अनर्थनिवारण—अर्थ की प्राप्ति और अनर्थ के निवारण में अर्थ की
प्राप्ति में ही विशेष लाभ है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ २४ ॥
अर्थः परिमितावच्छेदः, अनर्थः पुनः सकृत्प्रसृतो न ज्ञायते क्वावतिष्ठत इति
वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
अर्थ की प्राप्ति तो नियमित रूप से होती ही रहती है, किन्तु यदि अनर्थ एक बार प्रारम्भ
हो जाये तो पता नहीं कब तक चलता रहे, इसलिये पहले उस पर ही ध्यान देना चाहिये—ऐसा
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २५ ॥