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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 248 में से

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पृष्ठ 196

१७० वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका का सिखाया हुआ साहूकार नायक के धन को नायिका के हाथ से बलपूर्वक ले
ले ॥ ३७॥
विवदमानेन सह धर्मस्थेषु व्यवहरेदिति विरक्तप्रतिपत्तिः ॥ ३८ ॥
यदि नायक साहूकार के साथ विवाद करने लगे तो उसे न्यायाधिकरण तक ले जाये। इस
प्रकार विरक्तप्रतिपत्ति प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ (२)
सक्तं तु पूर्वोपकारिणमप्यल्पफलं व्यलीकेनानुपालयेत् ॥ ३९ ॥
निष्कासनक्रम प्रकरण— थोड़ा देने वाले पहले उपकारी नायक को अपराध करने पर
भी निभाये, धक्के देकर न निकाले ॥ ३९ ॥
असारं तु निष्प्रतिपत्तिकमुपायतोऽपवाहयेत् । अन्यमवष्टभ्य ॥ ४० ॥
अकिञ्चन का निष्कासन— निर्धन एवं आसक्त नायक को किसी धनवान् एवं अनुरक्त
नायक का सहारा लेकर ही निकाले ॥ ४० ॥
तदनिष्टसेवा । निन्दिताभ्यासः । ओष्ठनिर्भोगः । पादेन भूमेरभिघातः । अवि-
ज्ञातविषयस्य सङ्कथा । तद्विज्ञातेष्वविस्मयः । समानदोषाणां निन्दा । रहसि
चावस्थानम् ॥ ४१ ॥
निष्कासन के प्रकट उपाय— जिन्हें नायक नहीं चाहता, उनकी सेवा करना, निन्दनीय
कर्मों का बार बार करना, होंठ चबाना, जमीन पर पैर पटकना, जिन बातों को नायक न जाने
उनकी चर्चा करना, जिन विषयों को नायक जानता हो, उन पर विस्मय प्रकट करना और उनकी
निन्दा करना, उसके अभिमान पर चोट करना, उससे बड़ों के साथ रहना, उसे अनदेखा करना,
नायक में जो दोष हैं उन ही के समान दोष वालों की निन्दा करना और एकान्त में बैठना— ये
निष्कासन के प्रकट उपाय हैं ॥ ४१ ॥
रतोपचारेषूद्वेगः । मुखस्यादानम् । जघनस्य रक्षणम् । नखदशनक्षतेभ्यो
जुगुप्सा । परिष्वङ्गे भुजमय्या सूच्या व्यवधानम् । स्तब्धता गात्राणाम् । सक्थ्नो-
र्व्यत्यासः । निद्रापरत्वं च श्रान्तमुपलभ्य चोदना । अशक्तौ हासः । शक्तावन-
भिनन्दनम् । दिवापि भावमुपलभ्य महाजनाभिगमनम् ॥ ४२ ॥
सम्भोगकालीन व्यवहार— सम्भोगकाल के उपचारों को स्वीकार न करना, अधरपान
या चुम्बन न करने देना, जाँघों पर हाथ न फेरने देना, नखक्षतों एवं दन्तक्षतों की निन्दा करना,
आलिङ्गन का प्रयास करने पर भुजाओं की कैंची बनाकर व्यवधान उत्पन्न करना, शरीर के अंगों
को कड़ा कर लेना, यन्त्रयोग करने पर एक जाँघ को दूसरी पर चढ़ा लेना, नींद का बहाना
करना, थके हुए नायक को सम्भोग के लिये उकसाना, अशक्त होने पर उसकी हँसी उड़ाना,
शक्ति में प्रशंसा न करना, उसके हाव-भावों को देखकर दिन में भी रतिकक्ष से बाहर निकल
जाना और गुरुजनों के समीप बैठ जाना— ये उपाय सम्भोगकाल में प्रयोग किये जाते हैं ॥ ४२ ॥
वाक्येषु च्छलग्रहणम् । अनर्मणि हासः । नर्मणि चान्यमपदिश्य हसति वदति
तस्मिन् कटाक्षेण परिजनस्य प्रेक्षणं ताडनं च । आहत्य चास्य कथामन्याः कथाः ।