सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 192

१६६ वात्स्यायन-कामसूत्र
तदेतन्निदर्शनार्थं दत्तकशासनादुक्तम्। अनुक्तं च लोकात् शीलयेत् पुरुष-
प्रकृतितश्च ॥ ७४ ॥
वैशिक शास्त्र के विशेषज्ञ आचार्य दत्तक को देखकर संक्षेप में यह वेश्याचरित कह
दिया गया। जो बातें यहाँ नहीं कही गयी, उन्हें लोक से और पुरुष की प्रकृति से जान लेना
चाहिये ॥ ७४ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
सूक्ष्मत्वादतिलोभाच्च प्रकृत्याज्ञानतस्तथा।
कामलक्ष्मतु दुर्ज्ञानं स्त्रीणां तद्भावितैरपि ॥ ७५ ॥
वेश्यानायकों को शिक्षा—विद्वान् व्यक्ति भी वेश्याओं के काम के वास्तविक स्वरूप
को नहीं समझ सकते; क्योंकि एक तो काम का स्वरूप ही अत्यन्त सूक्ष्म है, दूसरे ये इतनी लोभी
होती हैं कि कृत्रिम चेष्टाओं को भी स्वाभाविक के समान दिखा देती हैं और इनका जो आसक्त
है, वह तो विवेकशून्य हो ही जाता है ॥ ७५ ॥
कामयन्ते विरज्यन्ते रञ्जयन्ति त्यजन्ति च।
कर्षयन्त्योऽपि सर्वार्थान् ज्ञायन्ते नैव योषितः ॥ ७६ ॥
वेश्याएँ अपने नायकों को चाहती हैं, उन पर अनुरक्त भी रहती हैं और विरक्त भी, उनको
अनुरक्त भी बना देती हैं और त्याग भी देती हैं। वे नायक के धन को इस प्रकार से खींचती हैं
कि पुरुष को कुछ भी पता नहीं चलता ॥ ७६ ॥
'कान्तानुवृत्त'प्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न॥
●
तृतीय अध्याय
अर्थागमोपायप्रकरण
सत्ताद्वित्तादानं स्वाभाविकमुपायतश्च ॥ १ ॥
आसक्त नायक से धन दो प्रकार से मिलता है—एक तो स्वाभाविक ढंग से और दूसरे
प्रयत्नपूर्वक ॥ १ ॥
तत्र स्वाभाविकं सङ्कल्पात् समधिकं वा लभमाना नोपायान् प्रयुञ्जीतेत्या-
चार्याः ॥ २ ॥
वेश्या जितना धन प्राप्त करने की इच्छा रखती हो, यदि उतना या उससे अधिक धन उसे
स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाये तो उसे उपायों का प्रयोग नहीं करना चाहिये—यह कामशास्त्र
के आचार्यों का मत है ॥ २ ॥
विदितमप्युपायैः परिष्कृतं द्विगुणं दास्यतीति वात्स्यायनः ॥ ३ ॥
यदि फीस निश्चित होने पर भी उपाय किये जायें तो उससे दोगुनी राशि मिल सकती है—
यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३ ॥