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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

६. वैशिक अधिकरण १६५
प्रोषिते मृजानियममङ्गालङ्कारस्य प्रतिषेधः। मङ्गलं त्वपेक्ष्यम्। एकं शङ्खवलयं
वा धारयेत्॥ ६३॥
प्रवासवृत्त—नायक के बाहर जाने पर एकचारिणी, शरीर का संस्कार न करे अर्थात् तेल
उबटन साबुन आदि छोड़ दे, अलंकार भी धारण न करे। मङ्गल की तो सतत अपेक्षा है, इसलिये
माङ्गलिक चिह्न (शङ्खवलय) अवश्य करे॥ ६३॥
स्मरणमतीतानाम्। गमनमीक्षणिकोपश्रुतीनाम्। नक्षत्रचन्द्रसूर्यताराम्यः स्पृह-
णम्॥ ६४॥
नायक की मधुर स्मृतियों का वर्णन कहे, शकुन बताने वाली स्त्रियों के यहाँ जाये, रात को
शकुन देखे और चाँदनी रात में चमकते चन्द्रमा और नक्षत्रों से ईर्ष्या करे॥ ६४॥
इष्टस्वप्नदर्शने तत्सङ्गमो ममास्त्विति वचनम्॥ ६५॥
शुभ स्वप्न देखकर सबसे यह कहे कि अब नायक से समागम होगा॥ ६५॥
उद्वेगोऽनिष्टे शान्तिकर्म च॥ ६६॥
यदि अनिष्टसूचक स्वप्न दिखे तो उद्वेग (घबड़ाहट) दिखाये और शान्तिकर्म
कराये॥ ६६॥
प्रत्यागते कामपूजा॥ ६७॥
नायक के आने के बाद के कृत्य—नायक के सकुशल आ जाने पर कामदेव की पूजा
करनी चाहिये॥ ६७॥
देवतोपहाराणां करणम्॥ ६८॥
प्रवासकाल में जिन जिन देवताओं की मनौती माँगी हो, उन उन के मन्दिर में जाकर भेंट
चढ़ाये॥ ६८॥
सखीभिः पूर्णपात्रस्याहरणम्॥ ६९॥
सखियों के साथ पूर्णपात्र का ग्रहण करे॥ ६९॥
वायसपूजा च॥ ७०॥
काकबलि—कौओं को बलि प्रदान करे॥ ७०॥
प्रथमसमागमानन्तरं चैतदेव वायसपूजावर्जम्॥ ७१॥
कौओं की पूजा को छोड़कर, शेष सभी कार्य प्रथम समागम के बाद ही करे॥ ७१॥
सक्तस्य चानुमरणं ब्रूयात्॥ ७२॥
साथ ही मरना—आसक्त नायक के साथ ही मर जाने (सती हो जाने) की बात
कहे॥ ७२॥
निसृष्टभावः समानवृत्तिः प्रयोजनकारी निराशङ्को निरपेक्षोऽर्थेष्विति सक्त-
लक्षणानि॥ ७३॥
आसक्त की पहचान—आसक्त नायक वही है जो नायिका पर पूर्ण विश्वास रखे, प्रवृत्ति
और निवृत्ति समान बना ले, उसके प्रयोजन को तत्काल पूर्ण कर दे, उस पर किसी भी प्रकार की
शङ्का न करे और धन के विषय में चिन्तित न हो॥ ७३॥