वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 248 में से
संदर्भ में पढ़ें६. वैशिक अधिकरण १६९
पूर्वयोगिनां च लाभातिशयेन पुनः सन्धाने यतमानानामाविष्कृतः
प्रतिषेधः ॥ २४ ॥
त्यागशीलता का दिखाना—पूर्व प्रेमी जो सम्पर्क छोड़ चुके हों और अब अधिक धन
देकर सम्पर्क बनाना चाहते हों, उन्हें नायक के सामने ही स्पष्ट ना कर देना चाहिये ॥ २४ ॥
तत्स्पर्धिनां त्यागयोगिनां निदर्शनम् ॥ २५ ॥
नायक से स्पर्धा रखने वाले उन त्यागशील व्यक्तियों को उसे दिखाना चाहिये जो वेश्या के
साथ संसर्ग करना चाहते हैं ॥ २५ ॥
न पुनरेष्यतीति बालयाचितकमित्यर्थागमोपायाः ॥ २६ ॥
बच्चों के समान हठपूर्वक माँगना—यदि वेश्या को यह विश्वास हो जाये कि यह अब
नहीं आयेगा (क्योंकि मुझ से विरक्त हो गया है) तो बच्चों की तरह लज्जा त्याग कर हठपूर्वक
माँगे। ये अर्थागमोपाय हैं ॥ २६ ॥ (१)
विरक्तं च नित्यमेव प्रकृतिविक्रियातो विद्यात् मुखवर्णाच्च ॥ २७ ॥
विरक्तप्रतिपत्ति प्रकरण : विरक्त के लक्षण—सब बातों में स्वभाव के बदलने और
मुख के रागरंग से विरक्त हुए पुरुष को पहचान ले ॥ २७ ॥
ऊनमतिरिक्तं वा ददाति ॥ २८ ॥
विरक्त पुरुष के कार्य—जो वेश्या को दिया करता था, उससे कम या अधिक दे ॥ २८ ॥
प्रतिलोमैः सम्बध्यते ॥ २९ ॥
प्रतिवेश्याओं (स्पर्धी वेश्याओं) से सम्बन्ध बनाने लगे ॥ २९ ॥
व्यपदिश्यान्यत् करोति ॥ ३० ॥
एक काम को कहकर अन्य काम करने लगे ॥ ३० ॥
उचितमाच्छिनत्ति ॥ ३१ ॥
जो उचित कार्य हैं, उन्हें भी रोक दे ॥ ३१ ॥
प्रतिज्ञातं विस्मरति। अन्यथा वा योजयति ॥ ३२ ॥
देने को कहकर भी न दे अथवा यह कह दे कि मैंने देने के लिये कब कहा था! ॥ ३२ ॥
स्वपक्षैः संज्ञया भाषते ॥ ३३ ॥
अपने इष्ट-मित्रों से संकेत से बातें करे ॥ ३३ ॥
मित्रकार्यमपदिश्यान्यत्र शेते ॥ ३४ ॥
मित्र के कार्य का बहाना करके अन्यत्र जाकर सोये ॥ ३४ ॥
पूर्वसंसृष्टायाश्च परिजनेन मिथः कथयति ॥ ३५ ॥
पहली वेश्या के नौकरों से इस वेश्या की सारी बातें बता दे ॥ ३५ ॥
तस्य सारद्रव्याणि प्रागवबोधादन्यापदेशेन हस्ते कुर्वीत ॥ ३६ ॥
वेश्या के कार्य—जब तक नायक को इस बात का पता चले कि यह मेरी विरक्ति जान
गयी है, उससे पूर्व ही वेश्या किसी बहाने से उसका धन अपने हाथ में कर ले ॥ ३६ ॥
तानि चास्या हस्तादुत्तमर्णः प्रसह्य गृह्णीयात् ॥ ३७ ॥