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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

त्रिपुरविमान ] [ ३०५
चक्राधोभागमाक्रम्य स्वयं स्थित्वा यथाक्रमम् ।
पुनस्स्वस्थानमासाद्य भूमौ चक्रप्रसारणम् ॥२८॥
यथा भवेत् तथा कीलकानि तेषु प्रकल्पयेत् ।
चक्राणां कल्पयेत् पश्चादीषादण्डान् यथाविधि ॥२९॥
विद्युदाकुञ्चनार्थाय तेष्वाकुञ्चनकीलकान् ।
प्रतिदण्डे यथाशास्त्र मध्यकेन्द्रे नियोजयेत् ॥३०॥
सार्धद्वयवितस्त्युन्नत वितस्त्येकगात्रकम् ।
ईषादण्डप्रमाण स्याच्चक्रमाणा (न?) प्रकीर्त्यते ॥३१॥
वितस्तित्रयमायाम गात्रमेकवितस्तिकम् ।
षडर वाथ सप्तार पञ्चार वा यथोचितम् ॥३२॥
प्रकल्प्य नेम्या सन्धाय मुषीकावरण तथा ।
चक्रान्त्यभागे चतुरङ्गुलमुत्सृज्य शास्त्रत ॥३३॥
द्रोणियों के ऊपरवाले भाग में ३ बालिश्त घेरे का छिद्र सर्वत्र विधि से करे,
अपने अन्तर्गत चक्रों को अति वेग से ऊपर खींचकर अदृश्य चक्रों को जैसे तैसे आवरण से
क्रमश चक्रों के नीचले भाग को आक्रमित कर स्वयं यथाक्रम स्थित होकर पुन अपने
स्थान को प्राप्त हो भूमि में चक्रप्रमाण करना जैसे हो कीलों को उनमें लगावे । पश्चात्
चक्रों के ईषादण्ड—बम—चूल दण्डों को यथाविधि विद्युत् के आकर्षणार्थ उनमें आकर्षण
कीलें प्रतिदण्ड में यथाशास्त्र मध्य केन्द्र में लगावे अढाई बालिश्त मोटा ईषादण्ड का
माप होना चाहिए। चक्र का माप कहा जाता है १ बालिश्त मोटा ६ अरेवाला या ७ अरेवाला
पांच अरेवाला या यथोचित बनाकर नेमि में लगाकर मुषीका ? का आवरण तथा चक्र के अन्तिम भाग
में ४ अंगुल छोड़कर शास्त्र से—॥२८-३३॥
रन्ध्रमन्त प्रकल्प्य काचावरणतः क्रमात् ।
एव सर्वत्र चक्राणां कारयेद् वर्त्तुलं यथा ॥३४॥
चक्रद्रोण्यन्तरे चक्राण्येतानि द्वादश क्रमात् ।
सन्धारयेद् यथेष्ट वा षट् चतुश्चाष्ट एव च ॥३५॥
सोमकान्ताख्यलोहस्य तन्त्रीशक्त्यपकर्षणे ।
चक्रान्तस्थितरन्ध्रेषु सन्धारयेत् पृथक् पृथक् ॥३६॥
एकैकचक्रमध्येथ विद्युदाघातकीलकान् ।
संयोजयेत् ततस्तेषु छिद्रप्रसारणकीलकान् ॥३७॥
सन्धाय तच्चालनार्थ चक्रकीलमत परम् ।
स्थापयेत् तस्योर्ध्वभागे यथा स्वाभिमुखं भवेत् ॥३८॥
साङ्केतकानुसारेण क्रमाच्चक्राणि चालयेत् ।

३०६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सर्वेषा चक्रद्रोणीनामुपरिष्टान्तरे क्रमात् ॥३६॥
सन्धारयेत् सोमकान्ततन्त्रीद्वयमत परम् ।
पूर्वपश्चिमदेशेषु चक्राणा सन्धिकीलके ॥४०॥
काचावरण से इस प्रकार सब चक्रों का अन्दर गोल छिद्र करना चाहिए । चक्र-
द्रोणियों के अन्दर ये १२ चक्र क्रम से लगावे या यथेष्ट ६, ४, या ८, सोमकान्त लोह ?--
ताम्बा ? की तारों को शक्ति के खींचने में चक्रों के अन्त में स्थित छिद्रों में पृथक् पृथक्
लगावे एक एक चक्र के मध्य विद्युत् को ठोकर देने वाली प्रेरित करने वाली कीलों को
लगावे फिर उनमें दिशाप्रसारण कीलों को लगाकर उनके चलाने को चक्रकील उसके ऊर्ध्व
भाग में अपने सामने स्थापित करे संकेतप्रेरक साधन के अनुसार चक्रों को चलाने सब
चक्रद्रोणियों के ऊपर अन्दर सोमकान्त लोह--ताम्बा ? की दो तार पूर्वपश्चिम स्थानों में और
चक्रों के सन्धिकीलों में लगावे ॥३४-४०॥
आसन्धिकीलमारभ्य तन्त्यन्तं सर्वत क्रमात् ।
विद्युच्छक्त्याकर्षणार्थं शलाकान् संनियोजयेत् ॥४१॥
सर्वचक्रद्रोण्यूर्ध्वभागेष्वपि (च) यथाक्रमम् ।
तन्त्र्यन्तर्गतशक्तिं तच्छलाकै रपकृष्य च ॥४२॥
चोदयेत् सर्वचक्राणामुपरिष्टाद् यथाविधि ।
चक्राधोभागदेशेषु चक्रान्तर्गतं तन्त्रिभि ॥४३॥
चोदयेद् वेगतश्शक्तिं तत्तत्कीलकचालनात् ।
पर्वतारोहणे तिर्यग्गमनादौ विशेषत ॥४४॥
चक्रोर्ध्वाध प्रदेशस्थशक्तिवेगप्रचोदनात् ।
विमानो याति वेगेन शवतधाकुञ्चनतः क्रमात् ॥४५॥
सन्धिकील से लेकर तार के अन्त तक सब ओर क्रम से विद्युत् शक्ति के आकर्षणार्थ
शलाकाओं को लगावे सब द्रोणीचक्रों के ऊपर भागों में भी यथाक्रम तारों के अन्तर्गत शक्ति को उसकी
शलाकाओं से खींच कर सब चक्रों के ऊपर यथाविधि प्रेरित करे, चक्रों के नीचले भाग में चक्रों के
अन्तर्गत तारों से वेग से शक्ति को कील चला कर प्रेरित करे विशेषत पर्वत पर चढने तिरछे चलने
आदि में चक्रों के ऊपर नीचे देश में स्थित शक्ति के वेग की प्रेरणा से विमान वेग से शक्ति के खींचने
से क्रमशः जाता है गति करता है ॥ ४१-४५ ॥
चक्रोर्ध्वशक्त्याकर्षणेनाधश्शक्तिप्रसारणात् ।
यथा यथा प्रगन्तव्य गच्छत्येव तथा स्वत ॥ ४६ ॥
तिर्यञ्चनादौ चक्राणा पुरस्ताच्चक्रकीलकान् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं सुदृढ सरल यथा ॥ ४७ ॥
वेगप्रचोदने सूक्ष्मकीलकद्वयमप्यथ ।
सङ्केतकीलचक्रस्योभयपार्श्वे दृढं यथा ॥ ४८ ॥

in line 29: ॥ ५६ ॥.
In line 29: ५६ -> the second digit has a loop at the bottom right.
In line 3: ४ and then... wait, it looks like ६!
Wait, why would it be ४६? Could it be a misprint in the book for ४९?
YES! Printers often make typographical errors, mistaking ९ for ६ or vice versa!
Wait, look at : is it ४६-५०?
If the printer made the typo in L3 as ४६, then in L11 the printer ALSO put ४६-५०!
Wait, let's look at again:
Is it ४६-५० or ४९-५०?
Look at the character: ४ then ६ (or ९) - ५ ०.
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Whether it is printed as ४६ or ४९, let's look very carefully.
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३०८ ] [ बृहद्विमानशास्त्र
समाकृष्याथ विधिवच्चक्रोर्ध्वाधःप्रदेशके ।
सञ्चोदयेद् यथाकाम काचकुप्पिकमध्यतः ॥ ५९ ॥
तेन वेगात् प्रचलन चक्राणा प्रभवेत् क्रमात् ।
पश्चाद् विमानगमन भवेत् साकेततस्स्वयम् ॥ ६० ॥
यथाशास्त्र चक्रसहित एक पीठ मूल के अन्दर नाल लगावे जो कि दो तारों से युक्त हो, पांच-
मुख चक्रों के कीलमुखों के अन्दर से उन कीलों के मध्यस्थित दो तार संस्थापित करे चक्र के ऊपर
नीचे स्थित दो तारों को यथाविधि मिलावे यथा प्रमाण शक्ति इन तारों के मुख से खींच कर विधिवत्
चक्रों के ऊपर नीचे प्रदेश में यथेष्ट प्रेरित करे काचकुप्पी में से इससे वेग से चक्रों का चलना क्रमशः
हो जावे पश्चात् सङ्केत साधन से स्वयं विमान का चलना हो जावे ॥ ५६-६० ॥
पश्चादावरण कुर्याच्चक्रद्रोण्युपरिक्रमात् ।
पीठावृत्तप्रदेशस्थद्रोणीरेखा द्वयान्तरे ॥ ६१ ॥
एकैकस्तम्भवत् सर्वद्रोणीसन्धिषु शास्त्रत ।
स्तम्भप्रतिष्ठा कृत्वार्थ तेषामुपर्यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
शोधिताभ्रकसामग्रीसहायेन दृढ यथा ।
कुर्यादावरण शिल्पशास्त्रमार्गानुसारत ॥ ६३ ॥
पश्चात् चक्र द्रोणी के ऊपर क्रम से आवरण करे, पीठ के आवृत्त प्रदेश में स्थित दो द्रोणियों
के रेखामध्य एक एक स्तम्भ की भांति सब द्रोणी सन्धियों में शास्त्रानुसार स्तम्भप्रतिष्ठा करके अनन्तर
उनके ऊपर यथाक्रम शोधित अभ्रक सामग्री की सहायता से शिल्पशास्त्रमार्गानुसार दृढ आवरण
करे ॥ ६१-६३ ॥
शुद्धाम्बराच्छद्धि ॥ अ० २, सू० २ ॥ १
बो० वृ०
विमानरचना शुद्धव्योमेनैव प्रकल्पयेत् ।
अन्यथा निष्फल यातीत्युक्त सूत्रे यथाविधि ॥ ६४ ॥
प्रसिद्धद्योतनार्थाय हिकार परिकीर्तित ।
तस्माद् यानोम्बरेणैव कर्तव्यमिति निर्णितम् ॥ ६५ ॥
विमान की रचना शुद्ध अभ्रक से ही करनी चाहिये अन्यथा निष्फलता को प्राप्त होता है ऐसा
सूत्र में कहा है प्रसिद्धि द्योतनार्थ हि शब्द कहा गया है अतः विमान अभ्रक से ही करना चाहिये यह
निर्णय किया है ॥ ६४-६५ ॥
अभ्रकलक्षणमुक्तं धातुसर्वस्वे— अभ्रक लक्षण कहा है धातुसर्वस्व में—
चत्वार्यंभ्रकजातिस्स्याद् ब्रह्मक्षत्रादिभेदत ॥ ६६ ॥
श्वेताभ्रको ब्रह्मजाति क्षत्रियो रक्तवरांक ।
पीताभ्रको वैश्यजाति कृष्णशूद्राभ्रको भवेत् ॥ ६७ ॥

त्रिपुरविमान ] [ ३०६
ब्रह्माभ्रकप्रभेदास्तु भवेत्तु षोडशधा क्रमात् ।
रक्ताभ्रको , द्वादशभेदेन सुविराजित. ॥ ६८ ॥
वैश्यजातिस्सप्तधा स्याच्छूद्रः पञ्चदश क्रमात् ।
आहत्य पञ्चाशद् भेदाश्शून्यस्याहुर्मनीषिणः ॥ ६९ ॥
ब्राह्मण क्षत्रिय आदि भेद से अभ्रक की चार जाति हैं । श्वेत अभ्रक ब्राह्मण, रक्त अभ्रक
क्षत्रिय, पीत अभ्रक वैश्य और कृष्ण अभ्रक शूद्र है । ब्राह्मण अभ्रक के १६ भेद हैं क्षत्रिय अभ्रक
के १२ भेद वैश्य अभ्रक के ७ भेद और शूद्र अभ्रक १५ भेद का है । इस प्रकार मिलाकर ५० भेद
अभ्रक के मनीषी जनों ने कहे हैं ॥ ६८--६९ ॥
उक्तं हि शौनकीये — शौनकीय सूत्र में कहा ही है—
अथाम्बरस्वरूपं व्याख्यास्यामोऽत्र चत्वारो वर्णा ब्रह्माक्षत्रियवैश्यशूद्र-
भेदात् । तेषां प्रभेदा पञ्चाशत् तत्र ब्रह्माजातिष्षोडश क्षत्रियजातिद्वादश वैश्य-
जातिस्सप्त शूद्रजाति पञ्चदशाहत्य पञ्चाशत् , तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम ।
ब्रह्माम्बरस्य रव्यम्बरभ्राजकरोचिष्मकपुण्डरीकविरञ्चिकवज्रगर्भकोशाम्बर-
सौवर्चलसोमकामृतनेत्रशैत्यमुखकुरन्दरुद्रास्यपञ्चोदररुक्मगर्भश्चेति षोडश
नामानि भवन्ति । अथ शुण्डीरकशाम्बररेखास्यौदुम्बरभद्रकपञ्चास्याशु-
मुखरक्तनेत्रमणिगर्भकरोहिणकसोमांशककौमिकश्चेति द्वादश रक्ताभ्रकनामानि
भवन्ति । वैश्याभ्रकस्य कृष्णमुखश्यामरेखगरलकोशपञ्चधाराम्बरीषकमणि-
गर्भक्रौञ्चास्य इति सप्त नामधेयानि भवन्तीति । अथ शूद्रस्य गोमुखकन्दुरक-
शौण्डिकमुग्धास्यविषगर्भमण्डूकतैलगर्भरेखास्यपार्वणिकराकाशुकप्राणदद्रोणिक-
रक्तबन्धकरसग्राहकव्रणहारिकश्चेति पञ्चदशनामधेयानि भवन्तीति ॥ ७० ॥
अब अभ्रक के स्वरूप का आख्यान करेंगे । इसके चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र भेद
से उनके ५० प्रकार होते हैं उनमें ब्राह्मण १६ क्षत्रिय १२ वैश्य ७ और शूद्र १५ हैं मिला कर ५० हैं,
उनके नामों को कहेंगे । ब्राह्मण अभ्रक के रवि, अम्बर, भ्राजक, रोचिष्मक, पुण्डरीक, विरञ्चिक, वज्रगर्भ,
कोशाम्बर, सौवर्चल, सोमक, अमृतनेत्र, शैत्यमुख, कुरन्द, रुद्रास्य, पञ्चोदर, रुक्मगर्भ ये १६ नाम होते
हैं । और शुण्डीरक, शाम्बर, रेखास्य, औदुम्बर, भद्रक, पञ्चास्य, अंशुमुख, रक्तनेत्र, मणिगर्भ, रोहिणिक,
सोमांशक, कौर्मिक ये रक्ताभ्रक—क्षत्रिय अभ्रक के नाम हैं । वैश्य अभ्रक के कृष्णमुख, श्यामरेख,
गरलकोश, पञ्चधार, अम्बरीषक, मणिगर्भ, कौञ्चास्य ये ७ नाम होते हैं । और शूद्र अभ्रक के गोमुख,
कन्दुरक, शौण्डिक, मुग्धास्य, विषगर्भ, मण्डूक, तैलगर्भ, रेखास्य, पार्वणिक, रक्तांशुक, प्राणद, द्रोणिक,
रक्तबन्धक, रसग्राहक, व्रणहारिक ये १५ नाम होते हैं ॥ ७० ॥
पुण्डरीको रोहिणिक पञ्चधारश्च द्रोणिक ।
चातुर्वर्ण्यक्रमात् तेषु व्योमयानक्रियार्हका ॥ ७१ ॥
चत्वार्येते विशेषेण यानसामग्र्यकर्मणि ।
शास्त्रज्ञै बहुधा प्रोक्तास्सम्यक् श्रेष्ठतमा इति ॥७२ ॥

३१० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मात् सर्वं प्रयत्नेन यानमेतैः प्रकल्पयेत् ।
पूर्वोक्ताभ्रकमादाय यानसामग्रधकर्मणि ॥ ७३ ॥
आदौ संशाेधयेत् सप्तदिनं शास्त्रविधानतः ।
अभ्रक के चारों वर्गों में क्रमसे पुण्डरीक, रोहिणिक, पञ्चधार, द्रौणिक ये चार अभ्रक विमान-
क्रिया के योग्य हैं, ये चारों विशेषरूप से विमानसामग्री के कार्य में शास्त्रज्ञों ने बहुधा श्रेष्ठ कहे हैं।
अतः सर्व प्रयत्न से इनसे ही विमान कार्य करे, पूर्वोक्त अभ्रक लेकर यानसामग्री कर्म में प्रथम ७ दिन
तक शोधन करे ॥७१--७३ ॥
शोधनाक्रममुक्तं संस्काररत्नाकरे—शोधनाक्रम संस्काररत्नाकर में कहा है —
स्कन्धारको शारशिकश्च पिञ्जुली वराटिका टङ्कणाकाकजङ्घिका शैवालिनो
रौद्रिकक्षारसारदौवारिकोशम्बररञ्जकं च । एतान् समाहृत्य पृथक् पृथक्
क्रमात् सम्पूरयेद् द्रावणयन्त्रकास्ये ॥ ७४ ॥
पृथक् पृथग्द्रावकमाहरेच्छनै पश्चाद् घटे काचमये प्रपूरयेत् ॥ ७५ ॥
॥ इत्यादि ॥
स्कन्धारक—स्कन्धा-२—शालपर्णी में रहनेवाला क्षार या स्कन्ध-अरक=अरकस्कन्ध=पित्तपापडे
का स्कन्ध लकडी ? शारशिक—शारणा—जयन्ती (जैंत) का क्षार या प्रसारणी गन्धप्रसारणी का तैल?,
पिञ्जुली—पिञ्जर=हरिताल ?, कौडी, सुहागा, काकजङ्घा—गुञ्जा ?, शैवालिनी—काई ?, रौद्रिक
—रुद्रजटा, क्षार, सार—यवक्षार, दौवारिक ?, शम्बर—लोध, रञ्जक—कबीला । इनको पृथक् पृथक्
लेकर द्रावक यन्त्र मुख में डाल दे पृथक् पृथक् द्रावक धीरे धीरे ले ले काच के घड़े में भर दे ॥७४-७५॥
एतेष्वेकैकजातीयद्रावकेण यथाविधि ।
अम्बरं शोधयेत् तस्मात् तद्विधि परिचक्षते ॥ ७६ ॥
चूर्णयित्वाऽभ्रकं सम्यक् स्कन्धारद्रावके न्यसेत् ।
पाचनायन्त्रकोशेथ पूरयेत् तद्रसं पुनः ॥ ७७ ॥
त्रिदिनं पाचयेदग्नौ विद्युता त्रिदिनं पचेत् ।
समाहृत्याथ विधिवत् कांस्यपात्रे पुनर्न्यसेत् ॥ ७८ ॥
तस्मिन् शारशिकाद्रावं सम्मेल्याथ दिनत्रयम् ।
आतपे विन्यसेत् पश्चात् पिञ्जुलीद्रावकं तथा ॥ ७६ ॥
सम्पूर्य भूपुटे पञ्च दिनानि स्थापयेत् तत ।
समुद्धृत्य पुनः कांस्यपात्रे संस्थाप्य शास्त्रतः ॥ ८० ॥
इन में एक एक जातीय द्रावक से यथाविधि अभ्रक को शोधे अतः उसकी विधि कहते हैं।
अभ्रक को भली प्रकार बारीक पीस कर भली प्रकार स्कन्धार द्रावक—शालपर्णी के या पित्तपापड़े के
द्राव में डाल दे, पाचनायन्त्रकोश में फिर उस रस को भर दे अग्नि में तीन दिन तक पकावे विद्युत्
से तीन दिन पकावे विधिवत् कांसे पात्र में फिर छोड दे उस में शारशिक द्राव-जयन्ती का द्राव

त्रिपुराविमान ] [ ३११
मिला कर तीन दिन तक धूप में रखे पश्चात् पिञ्जुली द्रावक भर कर भूपुट में—भूमि में छिपावे
५ दिन स्थापित करे फिर निकाल कर कांसे के पात्र में शास्त्रानुसार स्थापित करके—॥७६-८०॥
वराटिकाद्रावकं च पूरयित्वा यथाविधि ।
पाचयेद् भूधरे यन्त्रे दिनमेकमतः परम् ॥ ८१ ॥
समुद्धृत्य पुनः कांस्यपात्रे निक्षिप्य सर्षपैः ।
सम्मेल्य टङ्कणद्रावकं तस्मिन् सम्प्रपूरयेत् ॥ ८२ ॥
पश्चादर्जुनवृक्षस्य काष्ठान् सन्दाह्य यत्नतः ।
खदिराङ्गारमध्ये (तु) स्थापयेत् त्रिदिनं तत ॥ ८३ ॥
पूर्ववत् पुनरादाय कांस्यपात्रमतः परम् ।
सम्पूरयेद् द्रावकाकजङ्घिकाया प्रमाणतः ॥ ८४ ॥
चतुर्दश्यां तथा पौर्णमास्यां चैव यथाक्रमम् ।
राकामध्ये न्यसेद् रात्रिद्वयं पश्चात् समाहरेत् ॥ ८५ ॥
कौडी का द्राव भर कर यथाविधि १ दिन तक भूधर—भूमि के खड्डे यन्त्र में पकावे, पुनः
कांसे के पात्र में डाल कर सरसों से मिला कर सुहागाद्रावक उसमें डाल दे पश्चात् अर्जुन वृक्ष के
काष्ठों को जला कर यत्न से खैर के अङ्गारों के मध्य में ३ दिन स्थापित करे पुनः कांस्यपात्र को लेकर
काकजङ्घिका के द्रावक से भर कर चतुर्दशी में या पौर्णमासी में यथाक्रम राका-पौर्णमासी और प्रतिपदा
दो रात्रि तक रखे पश्चात् ले ले ॥ ८१—८५ ॥
पुनस्तत्पात्रमानीय संग्रा ह्याभ्रकमुत्तमम् ।
सम्यक् संक्षालयेदुष्णवारिणा तदनन्तरम् ॥ ८६ ॥
कांस्यपात्रे पुनः क्षिप्त्वा नीवारं मेलयेत् क्रमात् ।
पश्चाच्छैवालिनीद्रावकं तस्मिन् पूरयेत् तत ॥ ८७ ॥
संन्यसेन्मृत्स्निकांमध्ये दिनषट्कमतः परम् ।
संगृह्य पूर्ववत् सम्यक् प्रक्षाल्य तदनन्तरम् ॥ ८८ ॥
कांस्यपात्रे विनिक्षिप्य रौद्रिकद्रावकं क्रमात् ।
सम्पूर्य विधिवत् कुण्डे शुष्कगोमयपिण्डकैः ॥ ८६ ॥
पुटं दद्याद् वितस्तीनां चतुष्षष्टिप्रमाणतः ।
ततोऽभ्रकं समाहृत्य तिलतैले विनिक्षिपेत् ॥ ६० ॥
फिर उस पात्र को लाकर उत्तम अभ्रक निकाल कर अनन्तर भली प्रकार गरम जल से प्रक्षाल ले
—धो ले पुनः कांसे के पात्र में डाल कर नीवार-नीवार नाम का धान ?, मिलावे पश्चात् शैवालिनीद्राव
उस में भर दे फिर छः दिन सौराष्ट्र मृत्तिका या प्रशस्त मृत्तिका में डाले फिर पूर्व की भांति लेकर
धो कर कांसे के पात्र में डाल कर क्रम से रौद्रिक द्राव में बड़े कुण्ड में विधिवत् भर कर सूखे गोमय
उपलों से ६४ बालिश्त का पुट देवे । फिर अभ्रक को लेकर तिलों के तैल में डाल दे ॥८६-६०॥

३१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र

न्यसेत् सार्धदिन तस्मिन् पश्चात् संगृह्य चातपे ।
उदयास्तपर्यन्त सन्ताप्याथ यथाविधि ॥६१॥
प्रक्षाल्य कांस्यपात्रेय प्रक्षिपेच्छुद्धमभ्रकम् ।
क्षारसारद्रावकं च धत्तूरीबीजमिश्रितम् ॥६२॥
सम्पूर्य कुण्डलीपत्रराशिमध्ये यथाविधि ।
विनिक्षिप्य पचेत् पश्चात् पुनस्सङ्गृह्य शास्त्रत ॥६३॥
पूर्वपात्रे विनिक्षिप्य न्यसेद् दौवारिकद्रवम् ।
तुषाराङ्गारतस्सम्यक् पाचायित्वा दिन तत ॥६४॥
यदभ्रक समाहृत्य कांस्यपात्रे निधाय हि ।
शम्बरद्रावक तस्मिन् सम्पूर्य त्रिदिन ततः॥६५॥

डेढ दिन उसमें पडा रहने के पश्चात् लेकर धूप में उदय से अस्तपर्यन्त यथाविधि तपाकर
धोकर कांसे के पात्र में शुद्ध अभ्रक को डालदे धतूरे के बीज से मिश्रित क्षारसार द्रावक को कुण्डलीपत्र
गिलो के पत्तों के ढेर में दबाकर डालकर पकावे फिर लेकर पूर्वपात्र में डालकर दौवारिक द्रव ? डालदे,
तुषोंवाले अङ्गारों से दिनभर पकाकर उस अभ्रक को लेकर कांसे के पात्र में रखकर शम्बरद्रावक को
उसमें भरकर तीन दिन ६०-६५॥

चतुरैकाशकपूरं मभ्रके सन्निवेशयेत् ।
पश्चान्मन्थानयन्त्रस्य क्षिप्त्व कोषमुखान्तरे ॥६६॥
मथन कारयेदेकदिन सम्यग्यथाविधि ।
तदभ्रक समाहृत्य पषक्त्वोष्णवारिणा ॥६७॥
सिंहास्यवज्रमूषाया पूरयित्वा तथैव हि ।
विन्यसेद् रञ्जकद्राव टङ्कण त्रिपल तथा ॥६८॥
पलत्रय शिलाक्षार पलमेक तु सूरणम् ।
कंगोटक पञ्चपल वृषल पलसप्तकम् ॥६६॥
कूर्भटङ्कणक चाष्टपल रोहिणक दश ।
शम्बर विंशतिपल मुचुकुन्दं पलत्रयम् ॥१००॥

चतुर्थ अभ्रक में काशकपूर डालदे पश्चात् मन्थान यन्त्र के कोषमुख में डालकर एक दिन
भली प्रकार मन्थन करे, उस अभ्रक को लेकर गरम जल से पकाकर सिंहास्य वज्रमूषा में भरकर रञ्जक-
द्रावक भरे सुहागा ३ पल ( १२ तोला ) शिला क्षार-चूना ३ पल (१२ तोला) सूरण-शूरणकन्द १ पल
( ४ तोला ), कङ्क्रोटक ?-शीतल चीनी ? ५ पल ( २० तोला ), वृषल-गृञ्जन-गाजर शलजम ७ पल
कूर्म ? टङ्कण सुहागा ८ पल रोहिणक-लाल चन्दन १० पल शम्बर २० पल, मुचुकुन्द-मुचुकुन्दनामक फूल
का वृक्ष है उसके फूल मूल ३ पल-॥ ६६-१०० ॥

द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् -> द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान्? Let's write: द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् or द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान्? Let's look at the letters: द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् -> द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान्? Let's write: द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् or द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान्? Let's look at the letters: द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् -> द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान्? Let's write: द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् or द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान्? Let's look at the letters: द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्दशविस्तृतान् -> `द्रोणीप्रमाणमीन्त्यन्त्वितस्तद्द

३१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
कुर्याच्चित्रविचित्राणि गृहाण्यस्मिन् दृढानि हि ।
यथा दृश्यं परेषां स्यात् तथावरणकीलकैः ॥ ११२ ॥
कवाटान् स्थापयेत् तद्वद् वातायनमुखानपि ।
सर्वत्र गृहमध्येष्टदिक्षु शास्त्रानुसारतः ॥ ११३ ॥
कीलसञ्चालनेनाशु गृहसम्भ्रमणं यथा ।
भवेत् तथावृत्तचक्रकीलकान् स्थापयेत् क्रमात् ॥ ११४ ॥
प्रसारणतिरोधानं चक्राणां प्रभवेद् यथा ।
तथा कीलसन्धानं कृत्वा पश्चाद् यथाक्रमम् ॥ ११५ ॥
चालक यात्रियों के बैठने के अर्थ और सामग्री रखने के लिए, जैसे कर्ता ने सङ्कल्पित किया
वैसे ही विधिवत् क्रम से चित्र विचित्र घर इसमें स्थिर करे, जैसे दूसरों का दृश्य सामने आ जावे ऐसे
आवरण कीलों से किवाड लगावे खिडकियों के मुख भी सर्वत्र घर के मध्य आठ दिशाओं में शास्त्रानुसार
कील चलाने से शीघ्र घर का भ्रमण जिससे हो जावे वैसे घूमने वाले चक्रों की कीलें लगावे प्रसारण-
खोलने और तिरोधान-बन्द होना चक्रों का हो जावे ऐसे कील को सन्धान करके यथाक्रम-॥१११-११५॥
चक्राणि स्थापयेद् द्रोणीद्वयमध्यस्थसन्धिषु ।
सम्पूरणाकर्षणार्थं तथा सञ्चोदनाय हि ॥ ११६ ॥
वाताकर्षणनालानि सचक्राणि तथैव हि ।
भस्त्रिकामुखयुक्तानि विस्तृतास्यान्यथाक्रमम् ॥ ११७ ॥
विशद्विहाय सन्धिद्वयकेन्द्रान्यथाविधि ।
संस्थापयेत् ततस्तन्मुखपुरोभागत्तो मृदु ॥ ११८ ॥
पुरोवाताघातचक्राण्यपि सर्वत्र कीलकैः ।
अध प्रसारणे वायुं तद्वदूर्ध्वप्रचोदने ॥ ११९ ॥
द्विमुखीनालचक्राणि यानावृत्तप्रदेशके ।
त्रिशद्वितस्त्यन्तराय कृत्वा शास्त्रप्रमाणतः ॥ १२० ॥
दो द्रोणियों की मध्यस्थ सन्धियों में सम्पूरण और आकर्षण के अर्थ तथा प्रेरणा देने के लिए
चक्रसहित वाताकर्षण नाल भस्त्रामुख दो सन्धियों के केन्द्र २० विस्तार में छोड़ कर उनके मुख के
सामने भाग संस्थापित करे । सामने के वायु को आघात देने वाले चक्रों सर्वत्र कीलों से वायु को नीचे
लाने ऊपर प्रेरित करने में दो मुख वाले नाल चक्रों को विमान के घिरे या घूमने वाले प्रदेश में ३०
बालिश्त अन्तर छोड कर शास्त्र प्रमाण से - ॥ ११६-१२० ॥
सर्वत्र स्थापयेत् पश्चाद् यानाधोभागदेशके ।
वेणीतन्त्रीसमायुक्तानयःपिण्डान् यथाक्रमम् ॥ १२१ ॥
विमानाकाशगमनकाले संयोजितु क्रमात् ।
अष्टदिक्षु तथा मध्ये कीलकान् नव कल्पयेत् ॥ १२२ ॥

त्रिपुराविमान ] [ ३१५
वितस्तिसप्तकोन्नत्यं प्रथमावरणं दृढम् ।
कल्पयित्वाथ विधिवद् यावदावरणं भवेत् ॥ १२३ ॥
तावत्सर्वत्र सुदृढान् नलिकाकीलान् (?) वरान् ।
ग्रहणार्थं मध्ययानपीठस्य सुदृढं यथा ॥ १२४ ॥
कृत्वा वितस्तिदशकान्तरं सर्वत्र शास्त्रतः ।
विशद्वितस्त्यन्तरायाम मध्यदेशे तथैव हि ॥ १२५ ॥
सर्वत्र विमान के नीचले भाग वाले देश में स्थापित करे, वेणी तन्त्री—वेणी के आकार के
तारों या चिन्तासूचक तारों को जोड़पिण्डों को यथाक्रम विमान के आकाश गमन काल में जोडने को
क्रम से ८ दिशाओं में तथा मध्य में उत्तम ६ कीलों को मध्य यान पीठ के ग्रहणार्थ शास्त्रानुसार १०
बालिश्त का अन्तर करके मध्य देश में २० वितस्ति अन्तर पर लम्बा—॥ १२१-१२५ ॥
स्थापयेत् सुदृढं पश्चात् कीलकाना मुखान्तरे ।
सचक्रतन्त्रीविधिवद् योजयेत् सुदृढं यथा ॥ १२६ ॥
प्रतिकीलमुखे तन्त्र्या चञ्चुपुटद्वयं यथा ।
न्यग्भावेनोर्ध्वमुखतः विस्तृतं स्याद् यथा तथा ॥ १२७ ॥
सम्मे (म्मि ?) लीकरणं पूर्वापरभागद्वयो क्रमात् ।
यथा भवेत् तथा तन्त्रीकीलकान् परिकल्पयेत् ॥ १२८ ॥
न्यग्गुलीकरणं चैव तद्वद्विकसनं यथा ।
छत्रीवत् प्रभवेच्चक्रकीलकान् कल्पयेत्तथा ॥ १२६ ॥
न्यग्गुलीकरणे तेषामुपरिष्टात् समन्ततः ।
प्रभवेत् पटावरणं यथा चोर्ध्वमुखान्तरात् ॥ १३० ॥
—सुदृढ स्थापित करे । पश्चात् कीलों के मुख के अन्दर विधिवत् चक्रसहित दो तारों को सुदृढ
जोडे, प्रत्येक कील के मुख में तार में दो चञ्चुपुट जैसे ऐसे हो अलग होने से—पुट खुलने से ऊर्ध्व-
मुख से विस्तृत हो जावे मिलाना पूर्व पिछले दोनों भागों का क्रम से जिससे वैसे तारों की कीलों
को लगावे । संकुचित करना बन्द करना और उसी भांति विकसित करना खोलना छत्री की भांति हो
ऐसे चक्रों की कीलों को बनावे, सङ्कोच करने बन्द करने में उनका ऊपर पटावरण समान हो जिससे
ऊर्ध्वमुख अन्दर से युक्त करे ॥ १२६-१३० ॥
तथा पट चोर्ध्वमुखे योजयेत् कीलकैससह ।
तिरोधान पटस्याथ यथा स्याद् गृहविस्तृते ॥ १३१ ॥
प्रथमावरणमेव कृत्वा पश्चाद् यथाविधि ।
द्वितीयावरणं कुर्यात् त्रिणेत्रेण मनोहरम् ॥ १३२ ॥
तथा पट को ऊपर के मुख में कीलों से लगावे, पट का हटा देना घर के विस्तार के निमित्त
है । इस प्रकार प्रथमावरण बना कर पश्चात् यथाविधि दूसरा सुन्दर आवरण त्रिणेत्र लोहे से
करे ॥ १३१-१३२ ॥

३१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तदुपरि चान्यत् ॥ अ० २, सू० ३ ॥ १
बो० वृ०
प्रथमावरणस्यैवमुक्तवाथ रचनाविधिम् ।
द्वितीयावरणरचनाविधिरस्मिन् प्रकीर्त्यते ॥ १३३ ॥
प्रथमावरणस्योपर्यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ।
अन्यदावरणं कुर्यादिति सूत्रविनिर्णयः ॥ १३४ ॥
प्रथमावरणात् किञ्चिद्ध्रस्वमावरणं यथा ।
तथा द्वितीयावरणं कर्तव्यमिति वर्णितम् ॥ १३५ ॥
वितस्तिशतकायामं यदि स्यात् प्रथमाऽङ्गणम् ।
वितस्त्यशीत्यायामं स्याद् द्वितीयावरणं तथा ॥ १३६ ॥
वितस्त्यशीत्यायामं च वितस्तित्रयगात्रकम् ।
द्वितीयावरणपीठं त्रिणेत्रेणैव कल्पयेत् ॥ १३७ ॥
प्रथम आवरण की इस प्रकार रचनाविधि कह कर द्वितीय आवरण की रचनाविधि इसमें कही
जाती है । प्रथम आवरण के ऊपर यथाशास्त्र यथाक्रम अन्य आवरण करे यह सूत्र का निर्णय है । प्रथम
आवरण से कुछ छोटा आवरण वैसा दूसरा आवरण करना चाहिए यह कहा है, प्रथम अङ्गण-आवरण
यदि १०० बालिशत लम्बा हो तो दूसरा आवरण ८० बालिशत लम्बा ३ बालिशत मोटा दूसरे आवरण
का पीठ त्रिणेत्र लोहे से बनावे ॥ १३३-१३७ ॥
पीठस्याध प्रदेशेथ प्रथमावरणोपरि ।
संयोजनार्थं विधिवत् कीलकानि दृढं यथा ॥ १३८ ॥
प्रथमावरणे यावत्संख्या स्यात् तावदेव हि ।
सन्धारयेद् यथाकामं सर्वत्राधोमुखान्यथ ॥ १३६ ॥
कीलकद्वयसंयोजनार्थं शास्त्रानुसारतः ।
कीलीग्रहणयोग्यानि हस्तचक्राण्यपि क्रमात् ॥ १४० ॥
कीलपक्त्यनुसारेणोभयत्र च यथाक्रमम् ।
कीलकानि स्थापयित्वा तेषामन्तरतस्ततः ॥ १४१ ॥
सचक्रनालान् सर्वत्र सतन्त्रीन् योजयेद् दृढम् ।
विद्युत्स्थानमुखात् तेषु विद्युत्संयोजनं यथा ॥ १४२ ॥
भवेत् तथा बृहच्चक्रकीलकं सरलं दृढम् ।
विद्युत्पात्रमुखे सार्धवितस्त्यन्तरतः क्रमात् ॥-१४३ ॥
स्थापयित्वा तदारभ्य नालचक्रोपरि क्रमात् ।
सुसूक्ष्मा मृदुला शुद्धा कनिष्ठाङ्गुलमानतः ॥ १४४ ॥
पीठ के नीचले प्रदेश में और प्रथम आवरण के ऊपर लगाने को कीलें दृढ प्रथम आवरण में

त्रिपुरविमान ] [ ३१७
जितनी संख्या हो उतने ही लगावे यथेष्ट सर्वत्र नीचे मुख वाली दो कीलों के लगाने को शास्त्रानुसार
कीली से ग्रहण करने योग्य हस्तचक्र—मण्डूकाइस्त चक ? भी क्रम से कील पंक्ति के अनुसार दोनों ओर
यथाक्रम कीलें स्थापित करके उनके अन्दर से चक्रसहित तारों को लगावे, विद्युत् स्थान मुख से उनमें
विद्युत् का संयोग जिससे हो जावे ऐसे सरल बडे चक्र की कील विद्युत् पात्र के मुख में डेढ बालिश्त
अन्दर से या अन्तर से ? स्थापित करके उससे आरम्भ कर नालचक्र के ऊपर क्रम से सुसूक्ष्म मृदु शुद्ध
कनिष्ठा अंगुली के समान—॥ १३८-१४४ ॥
पट्टिका योजयेत् कीलकान्तं सम्यग्यथाविधि ।
पश्चात् कीलपकतीना मुखसन्धिषु शास्त्रतः ॥ १४५ ॥
व्यत्यस्तहस्तवद् वेगादूर्ध्वमागत्य सर्वतः ।
पूर्वोत्तरावरणकीलक्रमादृत्य पंक्ति । १४६ ॥
अन्योन्यं योजयित्वाथ बध्नीयात् सुदृढं यथा ।
❊ततोर्ध्वमुखसर्पाख्यकीलकानि पृथक् पृथक् ॥ १४७ ॥
संस्थापयेत् ततस्सर्वकीलक्रमणाय हि ।
पूर्वोक्तविद्युत्पात्रस्य पुरोभागस्थकीलकात् ॥ १४८ ॥
तदन्तर्गतबृहच्चक्रभ्रमणं भवेद् यथा ।
तथा प्रसारयेद् विद्युच्छक्तिं तदुपरि क्रमात् ॥ १४६ ॥
शक्तिवेगानुसारेण तच्चक्रभ्रमणं भवेत् ।
एतच्चक्रस्य भ्रमणं दशवारं यथा भवेत् ॥ १५० ॥
तत्पुरोभागस्थचक्रभ्रमणं वेगतो भवेत् ।
तेन नालस्थचक्राणि सर्वाण्यपि यथाक्रमम् ॥ १५१ ॥
भ्रामयन्ति वेगेन कीलपंक्तिमुखावधि ।
—पट्टिका लगावे कील के अन्त में यथाविधि, पश्चात् कीलपंक्तियों के मुख सन्धिस्थानों में
शास्त्र से उलटे हाथ वाले वेग से ऊपर सर्वतः आकर पूर्वोत्तर के आवरण की कीली को लेकर पंक्ति से
एक दूसरे में मिला कर सुदृढ बान्ध दे फिर ऊर्ध्वमुख सर्पाख्य कीलें पृथक् पृथक् संस्थापित करे फिर सब
कीलों के भ्रमण के लिए पूर्वोक्त विद्युत्पात्र के सम्मुख भाग में वर्तमान कील से उसके अन्दर के बड़े
चक्र का भ्रमण जिससे हो जावे वैसे उसके ऊपर विद्युत् शक्ति को प्रसारित करे शक्ति के वेगानुसार
वह चक्रभ्रमण हो जावे । इस चक्र का भ्रमण दश बार जिससे हो जावे । उसके सामने वाले चक्र का
भ्रमण वेग से हो इससे नालस्थ सब चक्र भी कीली पंक्ति के मुख तक वेग से घूमते हैं ॥ १४५-१५१ ॥
पश्चादूर्ध्वमुखतस्सर्पास्यकीलक्रमागतं ॥ १५२ ॥
तच्छक्तिं चोदयद् वेगात् तेन कीलकान्तरात् स्वयम् ।
तत्कीलहस्तस्सर्वत्र अनुलोमविलोमत ॥ १५३ ॥
ऊर्ध्वमागत्य वेगेनावरणद्वयकीलकान् ।
❊ तत ऊर्ध्वं० एकादेशसन्धिरार्थंः ।

३१८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
समाहृत्याय सम्मेल्य बध्नाति सुदृढं यथा ॥ १५४ ॥
पूर्वोत्तरावरणयोः सन्धिसम्मेलनं यथा ।
विद्युदाकर्षणेनाशु प्रभवेत् सर्वतः क्रमात् ॥ १५५ ॥
तथा पञ्चास्यमयूरकीलकानि नियोजयेत् ।
सन्धिसम्मेलनं तेन प्रभवेन्नात्र संशयः ॥ १५६ ॥
तत्पृथक्करणार्थाय पुनः कालानुसारतः ।
सर्वत्र शक्त्यपकर्षणकीलान्यपि पूर्ववत् ॥ १५७ ॥
शक्तिप्रचोदनयन्त्रेष्वेव संस्थापयेत् क्रमात् ।
पश्चात् ऊर्ध्वमुख से सर्पास्य कील मार्ग से उस शक्ति को वेग से प्रेरित करे उससे स्वयं कील
के अन्दर से वह कील हाथ सर्वत्र अनुलोम विलोम से ऊपर आकर वेग से दो आवरणों की कीलों को
पकड कर मिला कर सुदृढ बान्धता है जिससे पूर्व और उत्तर आवरण में सन्धि का सम्मेलन—मेल
संयोग विद्युत् के आकर्षण से शीघ्र सब ओर क्रम से हो जावे वैसे पञ्चास्य—पञ्चमुख वाली
मायूर कीली मोर के आकार के पेंच को लगावे, उससे सन्धि सम्मेलन हो जावे इसमें संशय नहीं ।
फिर कालानुसार अलग करने के लिए सर्वत्र शक्त्याकर्षण—शक्ति को खींचने वाली कीलों को भी पूर्व
की भांति शक्तिप्रेरक यन्त्रों में ही क्रम से संस्थापित कर दे ॥ १५२-१५७ ॥
१५८ का पूर्वार्द्ध विषय अधूरा रहा, अतः कुछ श्लोक मध्य में अन्य होकर पश्चात् हस्तलेख
कापी संख्या २२ पश्चात् २१ वस्तुतः कापी २३ का भाग (मैटर) होना चाहिये ।

कापी संख्या २२—
(यह हस्तलेख कापीसंख्या २२ है त्रिपुरविमान का शेष प्रतीत होता है जो हस्तलेख कापी २३
वस्तुतः कापी २१) के पीछे जाना चाहिए—
जलान्तर्गमने पूर्वावरणस्य यथाविधि ॥१॥
सर्वचक्रोपसंहारं कृत्वा पश्चाद् यथाक्रमम् ।
चक्रद्रोण्यावरणं कुर्याद् यानादधः क्रमात् ॥२॥
जलनिबन्धनार्थाय आमूलाग्रं यथाविधि ।
कुर्यादावरणं क्षीरीपटतत्समुद्बढं यथा ॥२॥
वितस्त्यायामस्तत्तद्वद् वितस्त्यर्धघनं तथा ।
मण्डूकहस्तवत् कुर्याच्चक्राणि सुदृढान्यथा ॥४॥
चतुरङ्गुलगात्रांश्च द्वादशाङ्गुलमुन्नतान् ।
लोहदण्डान् कल्पयित्वा तेषामग्रे यथाविधि ॥५॥
मण्डूकहस्तचक्राणि योजयेत् कीलकैस्सह ।
(त्रिपुर विमान के ) जल के अन्दर जाने के निमित्त पूर्व आवरण—पृथिवी पर चलने वाले
आवरण के सब चक्रों का उपसंहार—संकोच करके उनके गतिक्रम को रोककर पश्चात् यथाक्रम
विमान के नीचे चक्रद्रोणी चक्रों के आधारस्थान का आवरण करे जल के बान्धने के लिये आगे पीछे
तक यथाविधि क्षीरीवृक्षों के दूध का गोन्द से बने पट से सुदृढं आवरण करे । १ बालिश्त लम्बे चौडे
आधे बालिश्त मोटे चक्र मेण्डक के हाथ के समान बनावे, ३ अङ्गुल ऊंचे लम्बे लोहदण्डों को बनाकर
उनके आगे यथाविधि मण्डूकहस्तचक्रों को कीलों से युक्त करे—॥१-५॥
सर्वत्र चक्रद्रोणीना पार्श्वयोरुभयोरपि ॥६॥
द्रोण्यन्तर्गतचक्राणां सन्धिस्थानसमानत ।
संस्थापयेल्लोहदण्डान् सचक्रांश्च यथाविधि ॥७॥
सुदृढान् सरलान् चक्रकीलकान्तर्गतान्यथ ।
तथा दण्डद्वयं चक्रसयुत कीलकैस्सह ॥८॥
आहृत्य पूर्वोक्तचक्रदण्डसन्धिमुखान्तरात् ।
विमानपुरतस्तद्वत्पार्श्वयोरुभयोरपि ॥६॥

३२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सलिलोत्क्षेपणार्याय स्थापयेत् कीलकं दृढम् ।
शक्तिसञ्चोदनादादिकीलकभ्रमणं भवेत् ॥१०॥
—सर्वत्र चक्रद्रोणियों के दोनों पाश्र्वों में भी। द्रोणियों के भीतरी चक्रों के सन्धिस्थान
की सहायता से सरल चक्रकीलों के अन्तर्गत चक्रसहित लोहदण्डों को संस्थापित करे । चक्र-
संयुक्त कीलों से दो दण्डों को पूर्वोक्त चक्रदण्डसन्धिमुख के अन्दर से निकालकर विमान के
सामने से दोनों पाश्र्वों से जल के हटाने के लिये कीलों से दृढ लगावे, इस प्रकार शक्तिप्रेरणा से आदि
कीलों—पेचों का भ्रमण होगा ॥६—१०॥
तच्चक्रवेगात्सर्वेषां चक्राणां भ्रमणं भवेत् ।
जलस्योत्क्षेपणा तेन ह्यासस्रन्ताद् यथाक्रमम् ॥११॥
प्रभवेदतिवेगेन तस्माद् यान. प्रधावति ।
एव क्रमेण विधिवदूर्ध्वावरणपाश्र्वयो ॥१२॥
सन्धारयेन्नलाघातचक्राणि सुदृढान्यथ ।
[L

त्रिपुरविमान ] [ ३२१
शक्तिसञ्चोदनात्तत्कीलकचक्रस्य भ्रामणम् ।
तेन वातद्वयं सम्यक् क्रमादावरणद्वये ॥२०॥
सम्पूर्यत्यतिवेगेन यन्त्रेणा तेन भूरिशः ।
सुखावहं भवेत् तस्मिन् सर्वेषां युगपत् क्रमात् ॥२१॥
घूमने वाले लोहमुख स्थापित करे फिर वातपूरककीलों को उनके पाश्र्वों में लगावे,
ऊपर की वायु के खींचने को सीत्कारी सीत्-वायुचूषण करने वाली कीलों को भी सर्वत्र
विशेषरूप से लगावे, सीत्कारी के आकर्षण-से प्रकट हुआ वायु नाल में भरा हुआ द्वितीय
आवरण से लेकर प्रथम आवरण की अवधि तक होता है, उसका जैसे सर्वतोमुख वेगसे
प्रसार हो वैसा यथाक्रम कील युक्त करे । शक्ति के प्रेरण से उस कीलचक्र का घूमना होता
है, इससे वायुएं क्रम से दोनों आवरणों में अतिवेग से भर जाती हैं इससे उसमें सब चालक
और यात्रियों को एक साथ बहुत सुखद होवे-होता है ॥१६-२१॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वातनालान्नियोजयेत् ।
वातनालावरणद्वयमध्ये यथाविधि ॥२२॥
संस्थाप्य पश्चादावरणोर्ध्वपाश्र्वे समं यथा ।
दक्षिणोत्तरभागेषु चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥२३॥
विकासनोपसंहारकीलकान् चक्रसंयुतान् ।
सुदृढान् सरलांश्चैव स्थापयेच्छक्तिवत्क्रमात् ॥२४॥
पूर्वोक्तरावरणयोस्सन्धिस्थाने यथाविधि ।
एकैकावरणस्याथ पृथक्करणहेतुकान् ॥२५॥
जतातन्त्रीसमायुक्तचक्रकीलकान् पृथक् पृथक् ।
सर्वत्र स्थापयेत् सम्यग्वितस्तिदशकान्तरे ॥२६॥
अतः सर्वप्रयत्न से वातनालों को लगावे, दोनों वातनालावरणों के मध्य में यथाविधि
संस्थापित करके पश्चात् आवरण के ऊपर पार्श्व में भी समान दक्षिण उत्तर भागों में चारों दिशाओं में
यथाक्रम विकासन-फैलाने उपसंहार-संकोच करने वाली कीलों को चक्रसहित दृढ सरल शक्ति की भांति
स्थापित करे पूर्वोक्त आवरण के सन्धिस्थान भी यथाविधि एक एक आवरण के पृथक् करने के हेतुरूप
जटा तारों-जटारूप में परस्पर ऐंठा पाए हुए तारों से युक्त चक्रकीलों को पृथक् पृथक् सर्वत्र १० बालिश्त
के अन्दर स्थापित करे ॥२२-२६॥
शक्तिसञ्चोदनात् कीलचक्राणां भ्रमणं यथा ।
तथा तन्त्रिं समाहृत्य शक्तिस्थानाद् यथाक्रमम् ॥२७॥
चक्रकीलकमूलान्तं सम्यक् सञ्चोदयेद् दृढम् ।
तेन विद्युत्प्रसरणं कुर्यादुक्तप्रमाणतः ॥२८॥
तच्छक्तिचोदनात्कीलचक्राणां भ्रमणं भवेत् ।
तस्मादावरणभेदः पृथक् पृथग् यथाक्रमम् ॥२९॥

३२२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
युगपत्प्रभवेत्सम्यक् पृथिव्याकाशमार्गतः ।
यथेष्टं वेगतश्चावरणौ यन्तु भवेत् स्वतः ॥३०॥
शक्ति की प्रेरणा से कीलचक्रों का भ्रमण जैसे हो वैसे शक्तिस्थान से—मीटर तार को लेकर
यथाक्रम चक्र की कील के मूलतक भली प्रकार प्रेरित करे उससे उक्त प्रमाण से विद्युत् का फैलाव करे,
उस शक्तिप्रेरण से कीलचक्रों का भ्रमण होवे । इससे पृथक् पृथक् पृथिवी और आकाश के मार्ग सम्बन्धी
आवरणों का भेद एक साथ हो जावे फिर यथेष्ट दोनों आवरणों में वेग से जाना हो सके ॥२६-३०॥
पश्चाद् द्वितीयावरणोपरि शास्त्रप्रमाणतः ।
यन्त्रूपवेशनार्थाय वस्तुप्रक्षेपणाय च ॥३१॥
गृहाणि कल्पयेच्चित्रविचित्राणि यथाक्रमम् ।
वातायनकवाटाश्च पूर्वावरणवत्क्रमात् ॥३२॥
यथादृश्य भवेद् बाह्यं कर्तव्यास्तत्र(च) तथा ।
पश्चादावरणकुड्याना समन्ताद् यथाक्रमम् ॥३३॥
सर्वत्र कारयेत् पीठावरणाग्रे दृढ यथा ।
वितस्तिसप्तकोन्नत्य गात्रे त्वर्धवितस्तिकम् ॥३४॥
सर्वत्र कुड्यप्रमाणमेव शास्त्रे निरूपितम् ।
तृतीयावरणाद् विद्युत्सङ्ग्रहार्थं यथाविधि ॥३५॥
[

त्रिपुराविमान ] [ ३२१
हस्तात् संगृह्य तत्रत्यवेणीतन्त्रि प्रकर्षयेत् ॥४०॥
विमान के सामने वाले भाग में ध्वजस्तम्भ सुदृढ स्थापित करे, उस स्तम्भ के मूल में दो
घण्टे भी कांसे लोहे के बने हुए चालक और यात्रियों के कालसङ्केत के अर्थ घण्टानाद् करने को
वहां सरल स्थापित करे, वेणीतन्त्रो — चिन्ता सूचिका ❄ डोरी जैसी तार कीलसहित को लेकर घर—कमरे
की भित्ति के ऊपर क्रम से सब सरल जगह लगावे । अत्यन्त अनर्थकार्ये जब जहां हो वेणीतन्त्रि को
खींच ले—॥ ३७–४० ॥
तेन विज्ञायते कृत्य शीघ्रं यानाधिकारिणा ।
ततो यानाधिकारी तु वेगादागत्य तद् गृहम् ॥ ४१ ॥
विचार्य तत्रत्यानर्थकारणं न्यायतस्स्वयम् ।
समाधानं करोत्यस्माद् वेणीतन्त्रि नियोजयेत् ॥४२॥
भाषाकर्षणयन्त्राणि भावाकर्षणकान्यपि ।
दिक्प्रदर्शकयन्त्राणि कालप्रमाकान्यपि ॥ ४३ ॥
शीतोष्णप्रमापकयन्त्राण्यपि विशेषतः ।
सतन्त्रीकीलकं सम्यक् पूर्वपश्चिमयो क्रमात् ॥ ४४ ॥
सस्थापयेत् ततोऽत्यन्तवातवर्षातपादिभि ।
अत्यन्तोपद्रव व्योमयानस्य प्रभवेद् यदि ॥ ४५ ॥
तन्निवारयितु यन्त्रत्रय पश्चाद् यथाविधि ।
इस से यानाधिकारी द्वारा जान लिया जाता है, तब वह यानाधिकारी शीघ्र उस कमरे में
आकर और अनर्थकारण का युक्ति से विचार कर समाधान करता है अतः वेणीतन्त्री लगानी चाहिए ।
भाषण को खींचने वाले यन्त्र, भाव को खींचने वाले यन्त्र, दिशाप्रदर्शक यन्त्र, कालमापक यन्त्र, शीत
और उष्णता को मापने वाले यन्त्र भी विशेषतः तारों और कीलों के साथ आगे पीछे लगावे— संस्थापित
करे । फिर अत्यन्त वात वर्षा आतप — धूप आदि से विमान का अत्यन्त बिगाड हो तो उसके निवारणार्थ
तीन यन्त्र पीछे यथाविधि —॥४१-४५॥
पूर्वपश्चिमयोश्चैव तथा शिखरपार्श्वयोः ॥ ४६ ॥
सस्थापयेत् क्रमात् सम्यक् पृथक् पृथग्यथाक्रमम् ।
श्लोकस्थादिपदात् सम्यग्घिमसंहारकादय ॥ ४७ ॥
प्रोक्तास्स्तु पालनार्थाय विमानस्य यथाक्रमम् ।
उक्त हि यन्त्रसर्वस्वे यन्त्रत्रय यथाविधि ॥ ४८ ॥
सर्वेषां सुखबोधाय तान्येवात्र प्रचक्षते ।
श्वास्यवातनिरसनयन्त्र तद्वन्मनोहरम् ॥ ४६ ॥

❄ "वेण् चिन्तायाम्" ( भ्वादि० )

! Wait, is it शारिका? शा, रि, का, र, स: वारिकुड्मलशारिकारसपञ्चवारणसोदरान् ।

Line 26:
वाधिपञ्चकमाक्षिकाष्टकवातकङ्करिकोदरान् ॥५५॥
Wait, वातकङ्करिकोदरान् or वातकङ्कुरिकोदरान् or वातकङ्करिकोदरान्? It is वातकङ्करिकोदरान् or वातकन्दुरिकोदरान्? Let's check: क, ङ्क, रि, क, ो, द, र, ा, न्: वातकङ्करिकोदरान् or वातकङ्कुरिकोदरान् (looks like वातकङ्करिकोदरान् or कङ्कुरिकोदरान्, it has no u-matra on ङ्क, so वातकङ्करिकोदरान् or वातकङ्करिकोदरान् -> wait, look at कङ्क: क + ङ्क with ु? No, wait, look at कङ्करि: क, ङ्क, रि? Wait, is it कङ्कूरिकोदरान्? There is an u-matra ू under it! Look at कङ्कू -> wait, `वातक