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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

३१० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मात् सर्वं प्रयत्नेन यानमेतैः प्रकल्पयेत् ।
पूर्वोक्ताभ्रकमादाय यानसामग्रधकर्मणि ॥ ७३ ॥
आदौ संशाेधयेत् सप्तदिनं शास्त्रविधानतः ।
अभ्रक के चारों वर्गों में क्रमसे पुण्डरीक, रोहिणिक, पञ्चधार, द्रौणिक ये चार अभ्रक विमान-
क्रिया के योग्य हैं, ये चारों विशेषरूप से विमानसामग्री के कार्य में शास्त्रज्ञों ने बहुधा श्रेष्ठ कहे हैं।
अतः सर्व प्रयत्न से इनसे ही विमान कार्य करे, पूर्वोक्त अभ्रक लेकर यानसामग्री कर्म में प्रथम ७ दिन
तक शोधन करे ॥७१--७३ ॥
शोधनाक्रममुक्तं संस्काररत्नाकरे—शोधनाक्रम संस्काररत्नाकर में कहा है —
स्कन्धारको शारशिकश्च पिञ्जुली वराटिका टङ्कणाकाकजङ्घिका शैवालिनो
रौद्रिकक्षारसारदौवारिकोशम्बररञ्जकं च । एतान् समाहृत्य पृथक् पृथक्
क्रमात् सम्पूरयेद् द्रावणयन्त्रकास्ये ॥ ७४ ॥
पृथक् पृथग्द्रावकमाहरेच्छनै पश्चाद् घटे काचमये प्रपूरयेत् ॥ ७५ ॥
॥ इत्यादि ॥
स्कन्धारक—स्कन्धा-२—शालपर्णी में रहनेवाला क्षार या स्कन्ध-अरक=अरकस्कन्ध=पित्तपापडे
का स्कन्ध लकडी ? शारशिक—शारणा—जयन्ती (जैंत) का क्षार या प्रसारणी गन्धप्रसारणी का तैल?,
पिञ्जुली—पिञ्जर=हरिताल ?, कौडी, सुहागा, काकजङ्घा—गुञ्जा ?, शैवालिनी—काई ?, रौद्रिक
—रुद्रजटा, क्षार, सार—यवक्षार, दौवारिक ?, शम्बर—लोध, रञ्जक—कबीला । इनको पृथक् पृथक्
लेकर द्रावक यन्त्र मुख में डाल दे पृथक् पृथक् द्रावक धीरे धीरे ले ले काच के घड़े में भर दे ॥७४-७५॥
एतेष्वेकैकजातीयद्रावकेण यथाविधि ।
अम्बरं शोधयेत् तस्मात् तद्विधि परिचक्षते ॥ ७६ ॥
चूर्णयित्वाऽभ्रकं सम्यक् स्कन्धारद्रावके न्यसेत् ।
पाचनायन्त्रकोशेथ पूरयेत् तद्रसं पुनः ॥ ७७ ॥
त्रिदिनं पाचयेदग्नौ विद्युता त्रिदिनं पचेत् ।
समाहृत्याथ विधिवत् कांस्यपात्रे पुनर्न्यसेत् ॥ ७८ ॥
तस्मिन् शारशिकाद्रावं सम्मेल्याथ दिनत्रयम् ।
आतपे विन्यसेत् पश्चात् पिञ्जुलीद्रावकं तथा ॥ ७६ ॥
सम्पूर्य भूपुटे पञ्च दिनानि स्थापयेत् तत ।
समुद्धृत्य पुनः कांस्यपात्रे संस्थाप्य शास्त्रतः ॥ ८० ॥
इन में एक एक जातीय द्रावक से यथाविधि अभ्रक को शोधे अतः उसकी विधि कहते हैं।
अभ्रक को भली प्रकार बारीक पीस कर भली प्रकार स्कन्धार द्रावक—शालपर्णी के या पित्तपापड़े के
द्राव में डाल दे, पाचनायन्त्रकोश में फिर उस रस को भर दे अग्नि में तीन दिन तक पकावे विद्युत्
से तीन दिन पकावे विधिवत् कांसे पात्र में फिर छोड दे उस में शारशिक द्राव-जयन्ती का द्राव