बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिपुराविमान ] [ ३११
मिला कर तीन दिन तक धूप में रखे पश्चात् पिञ्जुली द्रावक भर कर भूपुट में—भूमि में छिपावे
५ दिन स्थापित करे फिर निकाल कर कांसे के पात्र में शास्त्रानुसार स्थापित करके—॥७६-८०॥
वराटिकाद्रावकं च पूरयित्वा यथाविधि ।
पाचयेद् भूधरे यन्त्रे दिनमेकमतः परम् ॥ ८१ ॥
समुद्धृत्य पुनः कांस्यपात्रे निक्षिप्य सर्षपैः ।
सम्मेल्य टङ्कणद्रावकं तस्मिन् सम्प्रपूरयेत् ॥ ८२ ॥
पश्चादर्जुनवृक्षस्य काष्ठान् सन्दाह्य यत्नतः ।
खदिराङ्गारमध्ये (तु) स्थापयेत् त्रिदिनं तत ॥ ८३ ॥
पूर्ववत् पुनरादाय कांस्यपात्रमतः परम् ।
सम्पूरयेद् द्रावकाकजङ्घिकाया प्रमाणतः ॥ ८४ ॥
चतुर्दश्यां तथा पौर्णमास्यां चैव यथाक्रमम् ।
राकामध्ये न्यसेद् रात्रिद्वयं पश्चात् समाहरेत् ॥ ८५ ॥
कौडी का द्राव भर कर यथाविधि १ दिन तक भूधर—भूमि के खड्डे यन्त्र में पकावे, पुनः
कांसे के पात्र में डाल कर सरसों से मिला कर सुहागाद्रावक उसमें डाल दे पश्चात् अर्जुन वृक्ष के
काष्ठों को जला कर यत्न से खैर के अङ्गारों के मध्य में ३ दिन स्थापित करे पुनः कांस्यपात्र को लेकर
काकजङ्घिका के द्रावक से भर कर चतुर्दशी में या पौर्णमासी में यथाक्रम राका-पौर्णमासी और प्रतिपदा
दो रात्रि तक रखे पश्चात् ले ले ॥ ८१—८५ ॥
पुनस्तत्पात्रमानीय संग्रा ह्याभ्रकमुत्तमम् ।
सम्यक् संक्षालयेदुष्णवारिणा तदनन्तरम् ॥ ८६ ॥
कांस्यपात्रे पुनः क्षिप्त्वा नीवारं मेलयेत् क्रमात् ।
पश्चाच्छैवालिनीद्रावकं तस्मिन् पूरयेत् तत ॥ ८७ ॥
संन्यसेन्मृत्स्निकांमध्ये दिनषट्कमतः परम् ।
संगृह्य पूर्ववत् सम्यक् प्रक्षाल्य तदनन्तरम् ॥ ८८ ॥
कांस्यपात्रे विनिक्षिप्य रौद्रिकद्रावकं क्रमात् ।
सम्पूर्य विधिवत् कुण्डे शुष्कगोमयपिण्डकैः ॥ ८६ ॥
पुटं दद्याद् वितस्तीनां चतुष्षष्टिप्रमाणतः ।
ततोऽभ्रकं समाहृत्य तिलतैले विनिक्षिपेत् ॥ ६० ॥
फिर उस पात्र को लाकर उत्तम अभ्रक निकाल कर अनन्तर भली प्रकार गरम जल से प्रक्षाल ले
—धो ले पुनः कांसे के पात्र में डाल कर नीवार-नीवार नाम का धान ?, मिलावे पश्चात् शैवालिनीद्राव
उस में भर दे फिर छः दिन सौराष्ट्र मृत्तिका या प्रशस्त मृत्तिका में डाले फिर पूर्व की भांति लेकर
धो कर कांसे के पात्र में डाल कर क्रम से रौद्रिक द्राव में बड़े कुण्ड में विधिवत् भर कर सूखे गोमय
उपलों से ६४ बालिश्त का पुट देवे । फिर अभ्रक को लेकर तिलों के तैल में डाल दे ॥८६-६०॥