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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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३१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र

न्यसेत् सार्धदिन तस्मिन् पश्चात् संगृह्य चातपे ।
उदयास्तपर्यन्त सन्ताप्याथ यथाविधि ॥६१॥
प्रक्षाल्य कांस्यपात्रेय प्रक्षिपेच्छुद्धमभ्रकम् ।
क्षारसारद्रावकं च धत्तूरीबीजमिश्रितम् ॥६२॥
सम्पूर्य कुण्डलीपत्रराशिमध्ये यथाविधि ।
विनिक्षिप्य पचेत् पश्चात् पुनस्सङ्गृह्य शास्त्रत ॥६३॥
पूर्वपात्रे विनिक्षिप्य न्यसेद् दौवारिकद्रवम् ।
तुषाराङ्गारतस्सम्यक् पाचायित्वा दिन तत ॥६४॥
यदभ्रक समाहृत्य कांस्यपात्रे निधाय हि ।
शम्बरद्रावक तस्मिन् सम्पूर्य त्रिदिन ततः॥६५॥

डेढ दिन उसमें पडा रहने के पश्चात् लेकर धूप में उदय से अस्तपर्यन्त यथाविधि तपाकर
धोकर कांसे के पात्र में शुद्ध अभ्रक को डालदे धतूरे के बीज से मिश्रित क्षारसार द्रावक को कुण्डलीपत्र
गिलो के पत्तों के ढेर में दबाकर डालकर पकावे फिर लेकर पूर्वपात्र में डालकर दौवारिक द्रव ? डालदे,
तुषोंवाले अङ्गारों से दिनभर पकाकर उस अभ्रक को लेकर कांसे के पात्र में रखकर शम्बरद्रावक को
उसमें भरकर तीन दिन ६०-६५॥

चतुरैकाशकपूरं मभ्रके सन्निवेशयेत् ।
पश्चान्मन्थानयन्त्रस्य क्षिप्त्व कोषमुखान्तरे ॥६६॥
मथन कारयेदेकदिन सम्यग्यथाविधि ।
तदभ्रक समाहृत्य पषक्त्वोष्णवारिणा ॥६७॥
सिंहास्यवज्रमूषाया पूरयित्वा तथैव हि ।
विन्यसेद् रञ्जकद्राव टङ्कण त्रिपल तथा ॥६८॥
पलत्रय शिलाक्षार पलमेक तु सूरणम् ।
कंगोटक पञ्चपल वृषल पलसप्तकम् ॥६६॥
कूर्भटङ्कणक चाष्टपल रोहिणक दश ।
शम्बर विंशतिपल मुचुकुन्दं पलत्रयम् ॥१००॥

चतुर्थ अभ्रक में काशकपूर डालदे पश्चात् मन्थान यन्त्र के कोषमुख में डालकर एक दिन
भली प्रकार मन्थन करे, उस अभ्रक को लेकर गरम जल से पकाकर सिंहास्य वज्रमूषा में भरकर रञ्जक-
द्रावक भरे सुहागा ३ पल ( १२ तोला ) शिला क्षार-चूना ३ पल (१२ तोला) सूरण-शूरणकन्द १ पल
( ४ तोला ), कङ्क्रोटक ?-शीतल चीनी ? ५ पल ( २० तोला ), वृषल-गृञ्जन-गाजर शलजम ७ पल
कूर्म ? टङ्कण सुहागा ८ पल रोहिणक-लाल चन्दन १० पल शम्बर २० पल, मुचुकुन्द-मुचुकुन्दनामक फूल
का वृक्ष है उसके फूल मूल ३ पल-॥ ६६-१०० ॥