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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

( xviii )
वह उस संख्या का वर्ग होती है, जितने पद (number) उस जोड़ में प्रयुक्त हुए
हैं। इस प्रकार 1+3+5---99 तक का जोड़ 50²= 2500 होगा। क्योंकि यहाँ कुल
50 विषम संख्याओं को जोड़ा गया है। यह परिणाम क्रमिक संख्याओं के जोड़
‘सर्वधन’ के सूत्र से प्राप्त होता है। इसे व्याख्या में समीकरण की पद्धति से प्रकट
कर दिया गया है¹।
(III) त्रिशतिकाकार ने सूत्र 15 में किसी संख्या का घनफल प्राप्त करने के
लिये एक नियम बताया है। इसके आधार पर उन्होंने यह रोचक परिणाम प्राप्त
किया कि किसी भी संख्या (a) का घन उससे 1 कम संख्या (b) के घन से
3×a×b+1 अधिक होता है। जैसे-
8³= (7³) + (3×8×7+1) = 343+169 = 512
इसके सूक्ष्म निरीक्षण से महावीराचार्य ने यह परिणाम प्राप्त किया कि इस
a संख्या से 1 कम संख्या से नीचे वाली संख्याओं में भी ठीक यही नियम लागू
है²। अतः उन्होंने इससे यह मनोरंजक श्रेढ़ी विकसित की-
8³ = (6³) + (3×7×6)+1 + 169 = 512
अथवा 8³ = (5³) + (3×6×5) +1+169+127= 512
अथवा 8³ = (4³) + (3×5×4) +1+169+127+91 = 512 इत्यादि
अन्य रीति से-
4³ = 3 (4×3+3×2+2×1) + 4
त्रिशतिका के कुछ भाषा-वैज्ञानिक तथ्य- त्रिशतिका-शब्दों के
भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन से उनके उद्भव तथा विकास पर प्रकाश पड़ता है। भारत
में दूरियों को नापने के लिये मूलतः उँगलियों तथा हाथ का उपयोग किया गया
था। यह दूरियों के मात्रक के रूप में ‘अंगुल’ तथा ‘हस्त’ शब्दों से प्रमाणित है।
नापने के लिये ‘अंगुल’ का प्रयोग वेद में भी प्राप्त है³। हाथ से नापने की पद्धति
विदेशों में भी प्रचलित रही। यह इसी ‘हस्त’ अर्थ में लैटिन से निःसृत cubit शब्द
से प्रमाणित है। वहाँ मूलतः पैर अर्थ वाले foot शब्द के दूरी के मात्रक के रूप
१. त्रिशतिका सूत्र 11, पृ. 14 तथा उसकी व्याख्या।
२. इष्टाद्विगुणेषुप्रचयेष्टपदान्वयोऽथवेष्टकृतिः।
व्येकेष्टहृतैकादिद्विचयेष्ट-पदैक्ययुक्ता वा। - गणित सार संग्रह, परिकर्मव्यवहार, श्लोक 43
तथा आगे
३. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥ - यजुर्वेद 31.2

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में प्रयुक्त होने के कारण पैरों से नापने की पद्धति भी विकसित सिद्ध होती है।
काल के मात्रकों में 'घटी' का प्रयोग किया गया है। काल के मापने वाले
के लिये 'घटी-यन्त्र' तथा केवल 'घटी' शब्द भी प्रचलित रहा है। इस शब्द से
प्रकट होता है कि उस समय यह यन्त्र छोटे घड़े के आकार का बनता था। आज
कलाई में पहने जाने वाले यन्त्र के लिए 'घड़ी' का प्रयोग करने वाले कितने लोग
जानते हैं कि यह मूलतः घड़े के आकार का था।
त्रिशतिका के गणितीय शब्द देश के विभिन्न भागों से प्राप्त किये गए हैं।
इससे प्रकट होता है कि इतिहास के विशाल काल-खण्ड में विविध स्थानों में
निरन्तर गणितीय चिन्तन जारी था। त्रिशतिका में जहाँ वैदिक शब्दों के आधार पर
सहस्र, अयुत आदि का प्रयोग किया गया है, वहीं बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर पहली
बार नियुत के स्थान पर 'लक्ष' शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है।
विनिमय के मात्रकों में मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित पण आदि का
उल्लेख है। साथ ही दक्षिण भारत के 'काकिणी' का भी वर्णन है, जिसका
सर्वप्रथम उल्लेख दक्षिण भारत के वार्तिककार कात्यायन ने किया है।¹
प्राचीन भारतीय गणित में वृत्त तथा गोल दोनों प्रकार के आकारों के लिये
'वृत्त' का प्रयोग होता रहा है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वृत्त के लिये 'परिमण्डल' का
प्रयोग किया गया है² तथा बौद्धग्रन्थ धम्मसंगनी आदि में अण्डाकार के लिये इस
शब्द को प्रचलित किया गया। फिर भी गणित में काफी समय तक वृत्त तथा गोल
के अर्थों में घालमेल की सम्भावना बनी रही। अतः आर्यभट ने दक्षिण भारत से
प्राप्त 'गोल' शब्द को प्रचलित किया। यह अपने इस विशिष्ट अर्थ में मूलतः
तेलगू, कन्नड आदि का शब्द है³। आर्यभटीय गोलपाद श्लोक ६ में इस 'भूगोल'
को आकाश में लटके गोल पिंजरे के समान बताया गया है। सूर्य सिद्धान्त १२.५३
में कहा है कि इस विशाल 'महीगोल' में तात्त्विक दृष्टि से कौन स्थान 'ऊपर'
या 'नीचे' कहा जा सकता है। त्रिशतिकाकार ने भी इस शब्द को यथावत् अपनाते
हुए इसके आयतन का सर्वप्रथम वर्णन किया। आज हम 'भूगोल शास्त्र' का प्रयोग
करते हुए मूलतः दक्षिण भारतीय शब्द का प्रयोग करते हैं।
त्रिशतिका में जैन, बौद्ध ग्रन्थों से प्राप्त अनेक प्राकृत शब्द भी हैं। यहाँ
वस्तु-विनिमय के लिये 'भाण्ड-प्रतिभाण्ड' का प्रयोग किया गया है। यह प्राकृत
१. काकिण्याश्चोपसंख्यानम्-अ.सू. ५.१.३३ के महाभाष्य पर वार्तिक।
२. परिमण्डल उ वा अयं पृथिवीलोकः -शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.३७
३. तेलगू - गुडुसु (वृत्त, गोला), गुड्डु (आँख की पुतली), गोइड (गोल पत्थर) कन्नड -
गुडसु (कोई गोल चीज़) - Sanskrit language - T.Burrow Page 462

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प्रभावित संस्कृत शब्द है। इससे ज्ञात होता है कि मुख्यतः पात्रों के विनिमय द्वारा
वस्तु-विनिमय की परम्परा जारी थी। इसी प्रकार पदों की संख्या के लिये
पारिभाषिक ‘गच्छ’ का प्रयोग है। यह स्पष्टतः प्राकृत है। संस्कृत व्याकरण की
दृष्टि से संज्ञावाचक ‘गच्छ’ अशुद्ध शब्द है। क्रमिक संख्याओं के लिये ‘श्रेढ़ी’ का
प्रयोग है। यह वेद में प्राप्त ‘श्रेणी’ शब्द से निःसृत है। पर व्यापक प्रचलन के
कारण यहाँ ‘श्रेढ़ी’ का ही प्रयोग है।
इससे प्रकट है कि त्रिशतिका में अनेक परम्पराओं से प्राप्त शब्दों तथा
विधियों का उपयोग किया गया है।
त्रिशतिका में प्रतिबिम्बित सामाजिक आर्थिक जीवन- यों तो त्रिशतिका
मूलतः अंकगणित का ग्रन्थ है। पर इसके सूत्रों, उदाहरणों में प्रसंगवश तत्कालीन
जीवन की झाँकी प्राप्त हो जाती है। त्रिशतिकाकार के समय पशु-पक्षि-संकुल,
मधुर-मयूर-विरुत रमणीय अरण्यों का बाहुल्य था। अतः ऐसे अनेक उदाहरण
प्राप्त होते हैं।
समाज में मुख्यतः निम्न वर्ग तथा स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। दास,
दासियों की खरीद बिक्री इतनी प्रचलित थी कि इसमें अलग से जीव-विक्रय के
उदाहरण प्रस्तुत किये गए हैं¹। यह परम्परा लम्बे काल तक प्रचलित थी। क्योंकि
त्रिशतिका से लेकर लीलावती तथा 1039 ई. के गणित-तिलक तथा 1356 ई. के
गणित-कौमुदी तक में भी ऐसे ही उदाहरण वर्तमान हैं। पाटी-गणित की अज्ञातकर्तृक
व्याख्या में सहज ही कहा है कि जैसे कपड़ों आदि का उपयोग करने पर उनका
मूल्य घटता है, उसी प्रकार उम्र बढ़ने के व्युत्क्रमानुपात में इनका मूल्य कम होता
जाता है। (देखें इस ग्रन्थ में त्रिशतिका प्रस्तुत सूत्र पर उद्धृत टिप्पणी)। वास्तव
में यह उस समय की सामाजिक हीन दशा को स्पष्ट प्रकट करता है।
इस समय सामान्य लोगों की आर्थिक दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी।
आम आदमी ‘सूदखोरी’ की प्रथा से बहुत पीड़ित था। यों तो इस प्रथा का वर्णन
वेद, निरुक्त, अष्टाध्यायी, धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में वर्तमान है। अथर्ववेद के एक
मन्त्र में प्रार्थना है कि मैं जिससे ऋण लूँ तथा जिसका स्त्री के पास जाऊँ, वह
मुझसे उलटी, पुलटी बातें कहते हुए डाँटे, फटकारे नहीं²!!
त्रिशतिकाकार के समय इस समस्या में जरा भी कमी नहीं आई थी।
त्रिशतिका के एक उदाहरण के अनुसार ऋणी को 5% ऋणदाता के लिये, 1%
१. त्रिशतिका उदा. 56 पृ. 60
२. यस्मा ऋणं यस्य जायामुपैमि यं याचमानो अभ्यैमि देवाः।
ते वाचं वादिषुर्मोत्तरां महैवपत्नी अप्सरसावधीताम्।। - अथर्ववेद 6.118.3

( xxi )
जमानतदार के लिये, ½% मुनीम के लिये तथा ¼% ऋणपत्रलेखक के लिये अर्थात्
कुल ²⁷⁄₄ % मासिक के हिसाब से ब्याज चुकाना पड़ता था। इस प्रकार 100/= रूप
पर वार्षिक कुल ब्याज 81/= रूप प्रदान करना पड़ता था। यह अष्टाध्यायी के
'दशैकादश ऋण'¹ से तो कम था। फिर भी सामान्य आदमी को पीढ़ियों तक
बन्धुआ मजदूर बना देने के लिये काफी था। त्रिशतिका सूत्र 35 आदि के नियमों
के अनुसार ऋण तथा ब्याज का विधिवत् हिसाब रखा जाता था तथा विस्तृत ऋण
पत्र तैयार किये जाते थे।
धनी लोगों में सोना का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में होता था। इसकी विशुद्धता
तथा तदनुसार मूल्य निर्धारित करने की विस्तृत विधियाँ त्रिशतिका में बताई गई हैं।
सोना को तपाने पर इसके उज्ज्वल वर्ण के आधार पर मूल्य तय होता था। सबसे
बढ़िया चमकदार सुवर्ण 16 वर्ण (24 कैरेट) का होता था। इसे कल्याण सुवर्ण
कहा जाता था। यह बहुत प्राचीन काल से प्रचलित था। निरुक्तकार यास्क ने
निरुक्त 2.3 में चमकते चेहरे वाले मनुष्य की उपमा इस कल्याण-वर्ण से की है।
इसमें अन्य धातुओं को मिलाने पर क्रमशः हीन वर्ण का हो जाता था।
उस समय वन-सम्पदा का बाहुल्य था। गृह-निर्माण आदि के लिये विशाल
पेड़ों की चिराई करके उनसे पटरे तैयार किये जाते थे। उदा. श्लोक 100 में 100
हाथ लम्बे अतिविशाल पटरे का तथा उदा. श्लोक 101 में 1 हाथ व्यास वाली
अतिस्थूल खैर की लकड़ी से बनने वाले पटरे का वर्णन किया गया है उनके
क्षेत्रफल, चिराई की मजदूरी आदि के लिये गणित की आवश्यकता होती थी।
त्रिशतिकाकार ने श्लोक 59, 60 के में काष्ठ व्यवहार के अन्तर्गत उन सूत्रों का
वर्णन किया है।
कृषि के लिये खेतों को नापने की अनेक विधियाँ विकसित की गई थीं।
रेखा-गणित के अनेक नियम क्षेत्र-मापन के लिये आविष्कृत हुए थे। फसल पकने
के बाद धान के बड़े-२ ढेरों को मापने के लिये सूची खात का घनफल या शंकु
के आयतन की विधि विकसित हुई थी। श्लोक 61 में बताया है कि मगध देश
या बिहार में समपृष्ठ वाली धरती पर शंकु आकार में पड़ा हुआ 1 घन हस्त धान
1 खारी के समतुल्य माना जाता था। इसमें कमरे के अन्दर या बाराण्डे के बाहर
रखे गए ढेर से अपूर्ण शंकु बनने पर उनके घनफल जानने की भी अलग-२ विधि
बताई गई है।
त्रिशतिकाकार के समय मुद्राओं का प्रयोग प्रचलित था। श्लोक 4 में
विनिमय के मात्रकों के रूप में प्राचीन काल से चली आ रही अनेक मुद्राएँ बताई
१. कुसीददशैकादशात्ष्ठन् ष्ठचौ (पा.सू. 4-4-31)

( xxii )
गई हैं। उदा. श्लोक 98 आदि में मजदूरी आदि के प्रसंग में 'रूप' नामक सामान्य
सिक्के का उल्लेख किया गया है। पाणिनि ने अ.सू. 5.2.120 में आहत या ठप्पा
लगे सिक्कों के लिये 'रूप्य' नाम दिया है। कार्षापण आदि ऐसे सभी सिक्के चाँदी
पर बनाए जाते थे। अतः रूप्य का अर्थ चाँदी भी है। ऐसे सभी प्रकार के सिक्कों
के लिये 'रूप' का प्रयोग भी होता रहा है।
समाज में इन सिक्कों की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में नहीं थी। अत एव
वस्तु-विनिमय भी प्रचलित था। वस्तुओं की अलग-२ मात्रा के मुद्रा में मूल्य तय
होने के पश्चात् भी उनका आपस में अनुपात से मूल्य तय किये जाने की भी
आवश्यकता होती थी। अतः त्रिशतिका सूत्र 38 आदि में इसके नियम बताए गए
हैं।
ग्रन्थ का सम्पादन- भूमिका के प्रारम्भ में कहा गया है कि म. म. पं.
सुधाकर द्विवेदी ने वर्ष 1899 ई. में इस ग्रन्थ को पहली बार प्रकाशित किया था।
तबसे पूरी 1 शताब्दी के बीच यह ग्रन्थरत्न दूसरी बार प्रकाशित नहीं हो सका।
इस दशा में इसकी दुर्लभता का सहज अनुमान किया जा सकता है। अतः 'सुक्षेमा'
नामक व्याख्या के साथ इसका सम्पादन करते हुए इस ग्रन्थ को सुलभ तथा सुग्राह्य
बनाने का एक विनम्र प्रयास किया गया है। इस व्याख्या की कुछ प्रमुख विशेषताएँ
इस प्रकार हैं-

  1. इसका सबसे प्रमुख उद्देश्य प्राचीन गणित को आधुनिक परिवेश में
    प्रस्तुत करना है। अतः ग्रन्थ में उल्लिखित नियमों को आधुनिक चिह्नों से युक्त सूत्र
    का रूप प्रदान किया है। साथ ही उल्लिखित प्रत्येक उदाहरण में सम्बद्ध सूत्र का
    अनुप्रयोग करते हुए उनकी सिद्धि भी की गई है। इसमें भिन्न संख्याओं के जोड़
    आदि की प्राचीन विधि के वर्णन के पश्चात् नवीन लेखन क्रम को अपनाया है।
  2. प्राचीन गणित की विधियों में उनकी उपपत्तियों का निरूपण बहुत कम
    प्राप्त होता है। आधुनिक गणित में किसी भी नियम या सूत्र को उनकी उपपत्ति
    के बिना स्वीकार नहीं किया जा सकता। अतः प्रस्तुत व्याख्या में प्रत्येक सूत्र की
    उपपत्ति को प्रस्तुत किया गया है।
  3. श्रीधराचार्य ने इस त्रिशतिका में अपने बृहत् ग्रन्थ पाटी-गणित के सूत्र,
    उदाहरण प्रायः प्रस्तुत किये हैं। कहीं-२ उनके शब्दों में अन्तर है। ऐसे भिन्न
    वाक्यों को तुलना के लिये इस व्याख्या की टिप्पणी में उद्धृत कर दिया गया है।
  4. गणित के सिद्धान्तों का क्रमिक विकास तथा परवर्ती प्रभाव का निरूपण
    भी इस व्याख्या का उद्देश्य है। अतः आवश्यकतानुसार परवर्ती युग में परिष्कृत

( xxiii )
सूत्रों का तथा इस विकास के परिणामस्वरूप आधुनिक युग में प्रचलित सूत्रों का
भी उल्लेख किया गया है।
5. इस व्याख्या के मूल ग्रन्थ द्वारा प्रसंगतः संकेतित तत्कालीन सामाजिक,
आर्थिक परिस्थिति का भी स्पष्ट निरूपण किया गया है। आवश्यकतानुसार
विभिन्न शब्दों में प्राकृत प्रभाव, जैन, बौद्ध प्रभाव आदि का भी उल्लेख है। वैदिक
परम्परा से प्राप्त तथा पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन आदि द्वारा उल्लिखित शब्दों
तथा उनके क्रमशः परिवर्तित अर्थों का भी यथावसर विवेचन किया गया है।
6. परिशिष्ट में विविध पारिभाषिक शब्द तथा विविध आचार्यों द्वारा प्रस्तुत
सम्बन्धित गणितीय संक्रियाओं के सूत्र अकारादि क्रम से उल्लिखित किये गये हैं।
अन्तिम परिशिष्ट में उन सभी सूत्रों को आधुनिक सूत्रों के साथ आधुनिक पद्धति
से प्रस्तुत किया गया है।
धन्यवाद-प्रकाशन- मैं सर्वप्रथम उस अच्युत, अनन्त परमेश्वर के प्रति
नतमस्तक हूँ, जिसके गणितीय नियमों से सम्पूर्ण विश्व संचालित हो रहा है,
जिसकी अनन्तता की वेदों के शब्दों में महिमा यह है कि हम इन नियमों की
जितनी 'भूमि' को जानते हैं, उससे वह 10 अंगुल आगे बढ़ कर है१!! गणित के
उन महान् विद्वानों के प्रति मैं पुनः नतमस्तक हूँ, जिनके निरन्तर परिश्रम से आज
गणित का विशाल सौध निर्मित हो सका है।
वर्ष 1899 ई. में म.म. पं. सुधाकर द्विवेदी के महान् परिश्रम से हमें यह
ग्रन्थ सुलभ हो सका है। इनके पश्चात् वर्ष 1959 ई. में डा. कृपाशंकर शुक्ल द्वारा
स्वरचित वैदुष्यपूर्ण इंग्लिश अनुवाद के साथ बृहत् ग्रन्थ 'पाटी-गणित' का
प्रकाशन किया गया। हमने अपनी व्याख्या में पं. द्विवेदी की टिप्पणियों से तथा
तुलना के लिये डा. शुक्ल के अनुवाद से सहयोग प्राप्त किया है। अतः मैं इनके
प्रति हार्दिक धन्यवाद तथा आभार प्रकट करता हूँ।
श्री मु. म. टाउन इंटर कालेज, बलिया में व्याख्याता माननीय श्री भोला
प्रसाद 'आग्नेय' ने इस व्याख्या का पुनरीक्षण करके अनेक सुझाव प्रदान किये हैं।
अतः मैं इनके प्रति हार्दिक धन्यवाद प्रकट करता हूँ।
मुझे 'त्रिशतिका' की छाया प्रति 'पाणिनि महाविद्यालय सोनीपत में पूज्य
आचार्य विजयपाल जी विद्यावारिधि से तथा पाटी-गणित माननीय श्री नारायण
किंजवेडकर जी, गुरुबाग, वाराणसी के सौजन्य से प्राप्त हुई है। अतः मैं आप दोनों
के प्रति विनम्र श्रद्धाभाव प्रकट करता हूँ।
१. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्।। - यजुर्वेद 31.2

( xxiv )
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के कुलपति माननीय प्रो. वी. कुटुम्ब
शास्त्री जी एवम् उपनिदेशक माननीय डा. प्रकाश पाण्डेय जी ने ग्रन्थ की
उपादेयता, महत्ता तथा दुर्लभता का अनुभव करते हुए ग्रन्थ के प्रकाशन की
स्वीकृति प्रदान की है। अतः मैं आपके प्रति हार्दिक धन्यवाद एवम् आभार प्रकट
करता हूँ।
परिश्रम पूर्वक व्याख्या लिखे जाने पर भी कहीं मानवसुलभ त्रुटियाँ हो
सकती हैं, अतः भास्कराचार्य के शब्दों का उपयोग करते हुए-
ये वृद्धा लघवोऽपि येऽत्र गणका बद्ध्वाञ्जलिं वच्मि तान्।
क्षन्तव्यो मम तैर्मुदा यदि क्वचित् व्याख्याप्रमादो भवेत्।।
विदुषां विधेयः
'सुक्षेमा'-व्याख्याकारः
--०--

त्रिशतिका
विषय-सूची
श्लोक पृष्ठ

  1. शिव-नमस्कार 1 1
  2. दश-गुणोत्तर संख्याएँ 2-3 1
  3. पदार्थों के मात्रक 4-8 2
  4. संकलित विधि (एकोत्तर संख्याओं की योगविधि आदि) 1 6
  5. व्यवकलित विधि 3 10
  6. प्रत्युत्पन्न (गुणन) विधि 5 13
  7. भागहार विधि 9 16
  8. वर्ग विधि 10-11 17
  9. वर्गमूल-विधि 12-13 20
  10. घन-विधि 14-15 21
  11. घनमूल-विधि 16-18 24
  12. भिन्नसंकलन-विधि 19 26
  13. भिन्न व्यवकलन-विधि 19 27
  14. भिन्न प्रत्युत्पन्न (गुणन) विधि 20 28
  15. भिन्न भागहार-विधि 20 29
  16. भिन्न वर्ग-विधि 21 29
  17. भिन्न वर्गमूल-विधि 21 30
  18. भिन्न घन-विधि 22 30
  19. भिन्न घनमूल-विधि 22 31

( xxvi )
20. कला सवर्णन या समच्छेद विधि 22 31
21. प्रभाग जाति 23 32
22. भागानुबन्ध-जाति 24 33
23. भाग-भाग विधि 25 36
24. भाग मातृजाति विधि 25 37
25. वल्ली-सवर्णन 26-27 38
26. स्तम्भोद्देश-विधि 27 41
27. त्रैराशिक-विधि या समानुपात 29 49
28. व्यस्त-त्रैराशिक या व्युत्क्रमानुपात 30 57
29. पञ्च-सप्त-नव-राशिक-विधि 31 61
30. भाण्ड-प्रतिभाण्ड-विधि या वस्तु-विनिमय गणित 32 75
31. जीव-विक्रय में प्रस्तुत विधि 32 77
32. मिश्रक व्यवहार या मूलधन में सामान्य ब्याज की विधि 33 78
33. भाव्यक विधि 34 82
34. एक-पत्रीकरण विधि या ब्याज का विवरण-पत्र 35 84
35. सुवर्ण-वर्ण ज्ञान विधि 36 88
36. सुवर्ण-गणित में कुछ विशेष 37 90
37. प्रक्षेपक-विधि या हानि-लाभ ज्ञान करने की विधि 38 92
38. समक्रय-विषमक्रय-विधि या समानपात अथवा
विषमानुपात के आधार पर क्रय-गणित 38 94
39. श्रेढ़ी व्यवहार में अन्त्यधन-मध्यधन-सर्वधन-विधि 39 99
40. आदि धन-विधि 40 103
41. प्रचय-ज्ञान-विधि 40 105
42. गच्छ-ज्ञान-विधि 41 107
43. वर्ग तथा आयत का क्षेत्रफल 42 110
44. समलम्ब चतुर्भुज का क्षेत्रफल 42 111
45. त्रिभुज का क्षेत्रफल 43 115

( xxvii )
46. विविध आकार के क्षेत्रों के क्षेत्रफल 44 121
47. वृत्त की परिधि तथा उसके आधार पर क्षेत्रफल 45 123
48. वृत्त का आसन्न क्षेत्रफल 46 125
49. वृत्त के कार्मुक का क्षेत्रफल 47 126
50. मुरज आदि विविध आकृतियाँ 48 129
51. समलम्ब चतुर्भुज तथा त्रिभुज 49 131
52. मध्यलम्ब या कोटि तथा अवधा 50 131
53. कोटि या लम्ब, भुज या आधार तथा कर्ण के सूत्र 51 131
54. समखात तथा विषमखात का घनफल या
घन तथा घनाभ का आयतन 52-53 137
55. कूप का फल या अपूर्ण शंकु का आयतन 54 140
56. पाषाण फल हस्त की विधि 55 144
57. गोल पाषाण का घनफल या आयतन 56 145
58. वृत्त, त्रिभुज तथा चतुर्भुज का क्षेत्रफल 57 147
59. चिति का घनफल तथा उसके ईंटों की संख्या 58 148
60. क्रकच या चीरी गई लकड़ी का अंगुल तथा
हस्त में वर्गफल 59-60 150
61. धान्य राशि का घन हस्त तथा खारी का मान 61-62 153
62. खारीधान्य घनफल 63 155
63. दीवाल के किनारे रखे धान्य का घनगणित या घन हस्त 64 155
64. काष्ठ की छाया से दिन के गत तथा शेष काल का मान 65 157
--o--

ग्रन्थ-संक्षेप-सूची
संक्षेप ग्रन्थ-नाम प्रणेता
अथ. वे. अथर्ववेद
ऐ. ब्रा. ऐतरेय ब्राह्मण
बौ. शु. सू. बौधायन शुल्ब सूत्र बौधायन
पा. सू. पाणिनीय अष्टाध्यायी सूत्र पाणिनि
म. भा. महाभाष्य पतञ्जलि
आ. आर्यभटीय आर्यभट प्रथम
ब्रा. स्फु. सि. ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त ब्रह्मगुप्त
पा. ग. पाटी-गणित श्रीधराचार्य
ग. सा. सं. गणित-सार-संग्रह महावीराचार्य
प्र. पा. भा. प्रशस्तापाद-भाष्य प्रशस्त-पाद
म. सि. महासिद्धान्त आर्यभट द्वितीय
ली. लीलावती भास्कराचार्य
भा. बी. भास्करीय बीजगणित भास्कराचार्य
सि. शे. सिद्धान्त-शेखर श्रीपति
ग. ति. गणित-तिलक श्रीपति
ग. कौ गणित-कौमुदी नारायण
--०--

श्रीधराचार्य-विरचित
त्रिशतिका
अथवा
पाटी गणित सार
नत्वा शिवं स्वविरचितपाट्या गणितस्य सारमुद्धृत्य।
लोकव्यवहाराय प्रवक्ष्यति श्रीधराचार्यः।। १।।
सुक्षेमा अनुवाद-शिव को नमस्कार करके स्वविरचित पाटी-गणित से
गणित के सार को उद्धृत करते हुए श्रीधराचार्य लोकव्यवहार के लिये उसे
निरूपित करेंगे।
अनुशीलन-प्रकटतः श्रीधराचार्य शैव थे तथा उन्होंने इससे पूर्व 'पाटी-गणित'
नामक विस्तृत ग्रन्थ का निर्माण किया था।
दशगुणोत्तर संख्याएँ
एकं दश शतमस्मात् सहस्रमयुतं ततः परं लक्षम्।
प्रयुतं कोटिमथार्बुदमब्जं खर्वं निखर्वं च।। २।।
तस्मान्महासरोजं शंकुं सरितां पतिं ततस्त्वन्त्यम्।
मध्यं परार्धमाहुर्यथोत्तरं दशगुणाः संज्ञाः१।। ३।।
सुक्षेमा अनुवाद-एक, दश, शत पश्चात् सहस्र, अयुत, इसके पश्चात्
लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, इसके पश्चात् महासरोज शंकु,
सरितां पति=समुद्र, पश्चात् अन्त्य मध्य, परार्ध-ये क्रमशः दशगुणोत्तर संख्याओं के
नाम हैं।
अनुशीलन इस श्लोक में वर्णित एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, अर्बुद,
समुद्र, अन्त, मध्य, परार्ध, शब्द संख्याओं के इतिहास में प्राचीनतम शब्दों में से हैं।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 7-8, ग.ति.पृ. 1, लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 2-3 ग.कौ.
पृ. 1

2 त्रिशतिका
यजुर्वेद 17.2 में इन सभी का उल्लेख मिलता है। इनमें एक, दश, शत, सहस्र
शब्दों के प्रतिरूप भारत से लेकर यूरोप तक की प्राचीनतम भाषाओं में प्राप्त होते
हैं। आधुनिक भाषावैज्ञानिकों ने 'शत' की इस विशेषता को देखते हुए भारोपीय
भाषा परिवार का सबसे पहला उपविभाजन शतम् तथा केन्तुम् (Centum-Latin)
इसके आधार पर ही किया है। निरुक्तकार के अनुसार सहस्र शब्द का मौलिक
अर्थ 'शक्तिशाली' यह है। इसके प्रतिरूप भारोपीय शब्दों में इसी अर्थ में इसका
प्रयोग प्राप्त होता है।
यजुर्वेद के उक्त मन्त्र में मध्य, अन्त, परार्ध संख्याएँ क्रमशः 10¹⁰, 10¹¹,
10¹² को प्रकट करती हैं। पर यहाँ संख्या नाम अधिक होने से अन्त्य, मध्य,
परार्ध, क्रमशः 10¹⁵, 10¹⁶, 10¹⁷ को व्यक्त करने के लिये प्रयुक्त हुए हैं।
सहस्र के पश्चात् वैदिक संख्याओं के समान आर्यभटीय में अयुत, नियुत,
प्रयुत का उल्लेख किया गया है२। पर इन-संख्या-नाम के लगभग एक समान होने
के कारण भ्रम की सम्भावना बनी रहती थी। अतः इस ग्रन्थ में पहली बार बौद्ध
संख्याओं के आधार पर नियुत के स्थान पर 'लक्ष' का प्रयोग किया गया। परवर्ती
गणित ग्रन्थों में यह शब्द पर्याप्त प्रचलित हुआ। साथ ही रामायण के आधार पर
कोटि का प्रयोग किया गया। वेद में अर्बुद शब्द 1 करोड़ अर्थ के लिए प्रयुक्त
हुआ है। पर इस ग्रन्थ में इसके लिये कोटि शब्द के प्रयोग के कारण इसके आगे
की अर्बुद संख्या 1 अरब की वाचक बन गई। आज भी ऐसी ही प्रसिद्धि है। आगे
की अब्ज, खर्व, निखर्व, महासरोज संख्याएँ कमल के नामों के आधार पर
विकसित हैं, जो कि जैन साहित्य से प्रेरित प्रतीत होती हैं।
विनिमय के मात्रक
षोडशपणः पुराणः पणो भवेत् काकिणीचतुष्केण।
पञ्चाहतैश्चतुर्भिर्वराटकैः काकिणी ह्येका१॥ ४॥
सुक्षेमा अनुवाद-16 पण का 1 पुराण, 4 काकिणी का 1 पण तथा
5×4=20 वराटक (कौड़ी) की काकिणी होती है।
अनुशीलन-इसके अनुसार 1/16 पुराण = 1 पण, 1/4 पण = 1 काकिणी तथा
1/20 काकिणी = 1 वराटक सिद्ध होता है।
परवर्ती युग में ये नाम बदलते रहे हैं। लीलावती में 16 पण का 1 द्रम्म
बताया है। प्रस्तुत मात्रकों के नाम प्राचीन परम्परा के अनुरूप हैं। पर इनका मूल्य

१. तुल. पाटी गणित सू. 9, गणिततिलक पृ. 2, लीलावती परिभाषा श्लोक 3

त्रिशतिका ३
परिवर्तित हो गया है। प्रस्तुत श्लोक में पुराण नाम से वर्णित सिक्के को अष्टाध्यायी
में कार्षापण तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र में इसे ही पण तथा मनुस्मृति में रजत पुराण
कहा गया है। यही भारत का चाँदी का एक प्रसिद्ध सिक्का था। उस समय 16
माष = 1 पण या 1 पुराण माना जाता था। प्रस्तुत विवरण में पण पूर्वप्रचलित माष
के अनुरूप है तथा इससे 16 गुना बड़े सिक्के को पण के स्थान पर पुराण नाम
दिया गया है। वार्तिककार कात्यायन ने पहली बार दक्षिण भारत से प्राप्त
'काकिणी' नामक सिक्के का उल्लेख किया है। यह 4 काकिणी = 1 माष के
अनुरूप था। यहाँ पूर्वप्रचलित माष के पण के समकक्ष होने के कारण 4 काकिणी
= 1 पण बताया है। यह तथ्य निम्न चित्र से स्पष्ट है-

कार्षापण का भागप्राचीन ग्रन्थों में वर्णित सिक्केतोल
1/1कार्षापण-अष्टाध्यायी<br>पण - कौटिल्य अर्थशास्त्र<br>रजतपुराण - मनुस्मृति32 रत्ती<br>चाँदी
1/16माष2 रत्ती
1/64काकिणी-वार्तिककार कात्यायन½ रत्ती
पुराण का भागत्रिशतिका में वर्णित सिक्केतोल
:---:---:---
1/1पुराण32 रत्ती चाँदी
1/16पण2 रत्ती
पण का 1/4<br>पुराण का 1/64काकिणी<br>वाराटक½ रत्ती
गुरुत्व के मात्रक
माषो दशार्धगुञ्जः षोडशमाषो निगद्यते कर्षः।
स सुवर्णस्य सुवर्णस्तैरेव पलं चतुर्भिश्च॥ ५॥
सुक्षेमा-अनुवाद दशार्ध याने 5 गुञ्जा का 1 माष, 16 माष का 1 कर्ष,
सोने का बना हुआ इसी 1 कर्ष भार का 'सुवर्ण' नामक सिक्का होता है। उसी
4 कर्ष का 1 पल होता है।

4 त्रिशतिका
अनुशीलन-लीलावती में 2 यव = 1 गुञ्जा कहा है। यह गुञ्जा आधुनिक
'रत्ती' के समकक्ष है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में ताँबे के 1 माष को 5 गुञ्जा या 5
रत्ती के बराबर बताया है¹। जैन ग्रन्थ अनुयोग द्वार सूत्र 132 में माषक = 5 रत्ती,
गुञ्जा = 1 रत्ती को सोना तौलने के उपयोग में बताया है। गुञ्जा या घूँघची के
लाल फल के कारण इसे 'रक्तिका' तथा प्राकृत में 'रत्ती' नाम दिया गया है।
प्राचीन काल में 'माष' तोल और सिक्के दोनों का नाम था। इससे भ्रम की
सम्भावना के कारण श्रीधराचार्य ने 'माष' सिक्के का नाम हटाकर उसके स्थान पर
'पण' कर दिया है। (देखें पूर्वोक्त चार्ट)। 'सुवर्ण' नामक सिक्के का संकेत
पाणिनि की अष्टाध्यायी तथा वार्तिक में प्राप्त होता है²। निरुक्त में सोने के लिये
'कल्याणवर्ण' का प्रयोग प्राप्त है³। त्रिशतिका उदा. 48 में सिक्के के लिये
'कल्याणसुवर्ण' नाम प्राप्त है तथा उदा. 42 में इसे 16 पण का बताया है।
कौटिल्य में इस सिक्के का भार ठीक यही अर्थात् 16×5=80 गुञ्जा बताया है।
चरक में भी 4 कर्ष का 1 पल बताया है।
आयतन के मात्रक
खार्येका षोडशभिर्द्रोणैश्चतुराढको भवेद् द्रोणः।
प्रस्थैश्चतुर्भिराढक एकः प्रस्थश्चतुः कुडवः⁴।। ६।।
सुक्षेमा अनुवाद-16 द्रोण की 1 खारी, 4 आढक का 1 द्रोण 4 प्रस्थ का
1 आढक तथा 4 कुडव का 1 प्रस्थ होता है।
अनुशीलन-इसके अनुसार 1/16 खारी = 1 द्रोण, 1/4 द्रोण = 1 आढक,
1/4 आढक = 1 प्रस्थ, 1/4 प्रस्थ = 1 कुडव सिद्ध होता है।
अष्टाध्यायी में खारी का वर्णन प्राप्त है⁵। पतञ्जलि ने महाभाष्य में द्रोण को
खारी का हिस्सा मानते हुए उदाहरण प्रस्तुत किया है⁶। इस नाप की तोल के लिये
भी इन्हीं शब्दों का प्रयोग होता था। प्रस्तुत विवरण में आढक, प्रस्थ, कुडव की
तोल कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.19 के समतुल्य है।
१. कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.12
२. हिरण्यपरिमाणं धने (पा.सू. 6.2.55) द्वौ सुवर्णौ परिमाणमेव धनमस्य द्विसुवर्णधनः। अर्थात्
दो 'सुवर्ण' नामक सिक्कों की पूँजी वाला मनुष्य। सुवर्णशतमानयोरुपसंख्यानम्। पा.सू.
5.1.29 पर वार्तिक।
३. कल्याणवर्णस्येवास्य रूपम्। - निरुक्त 2.3।। 'कल्याणवर्ण सुवर्ण' तदेव यस्य रूपं स
कल्याणवर्णरूपः - उक्त पर, दुर्गाचार्य।
४. तुल. पाटी गणित सू. 11 गणितसारसंग्रह 1.36-37 लीलावती परिभाषा श्लोक 8
५. खार्या ईकन् (पा.सू. 5.1.33)
६. अधिको द्रोणः खार्याम् - पा.सू. 5.2.73 पर महाभाष्य तथा 2, 3, 9 पर काशिका।

त्रिशतिका 5
दूरियों के मात्रक
हस्तोऽङ्गुलविंशत्या चतुरन्वितया चतुःकरो दण्डः।
तद् द्वि सहस्रं क्रोशो योजनमेकं चतुःक्रोशम्१॥ ७॥
सुक्षेमा अनुवाद-4 सहित 20 अर्थात् 24 अंगुल का 1 हस्त, 4 हस्त का
1 दण्ड, 2 हजार दण्ड का 1 क्रोश, तथा 4 क्रोश का 1 योजन होता है।
अनुशीलन-लीलावती में 8 यवोदर का 1 अंगुल बताया है। कौटिल्य
अर्थशास्त्र 2.20 में भी ऐसा ही वर्णन है। इस प्रकार पौन इंच के बराबर 1 अंगुल
तथा 18 इंच के बराबर 1 हस्त होता था। भारत में हाथ से नापने की परम्परा होने
से 'हस्त' नाम दिया गया है। यूरोप में पैर से नापने के कारण पैर का वाचक foot
शब्द नाप के लिये प्रचलित हुआ। 3 फुट का 1 गज होता है। क्योंकि 16 अंगुल
का 1 फुट तथा 24 अंगुल या डेढ़ फुट का 1 हस्त है। अतः 2 हस्त 1 गज के
बराबर है। इस विवरण के अनुसार 2000×4 = 8000 हस्त या 4000 गज का
1 क्रोश होता है। योजन का वर्णन अष्टाध्यायी में भी प्राप्त है। ।4 क्रोश का 1
योजन सर्वत्र मान्य है।
काल के मात्रक
भवति घटीनां षष्ट्याहोरात्रं तैस्त्रिसंगुणैर्दशभिः।
मासो द्वादशभिस्तैर्वर्ष गणितेऽत्र परिभाषा२॥ ८॥
सुक्षेमा अनुवाद-60 घटी का 1 अहोरात्र, 3×10 = 30 अहोरात्र का 1
मास, 12 मास का 1 वर्ष। यही इस गणित में इनकी परिभाषा है।
अनुशीलन-मास, वर्ष की यह प्राचीन काल से प्रचलित परिभाषा दी गई
है। सूर्य सिद्धान्त 1.12 में घटी के लिये नाडी का प्रयोग है। वहाँ 60 विनाडी की
एक नाडी तथा 60 नाडी का एक अहोरात्र कहा है। (षड्भिः प्राणैर्विनाडी स्यात्
तत्षष्ट्या नाडिका स्मृता। नाडीषष्ट्या तु नाक्षत्रमहोरात्रं प्रकीर्तितम्।) आधुनिक युग
में 24×60 = 1440 मिनट का एक अहोरात्र माना जाता है। इस दृष्टि से प्राचीन
नाडी या घटी 24 मिनट की होती है। इस प्रकार की 60 घटी का 1 अहोरात्र सिद्ध
होता है।
१. तुल. पाटी गणित सू. 12 ग.सा.सं. 1.29-31 ग.कौ. पृ. 2-3
२. तुल. पाटी-गणित सू. 13

6 त्रिशतिका
संकलित या 1 आदि संख्याओं का जोड़
सैकपदाहतपददलमेकादिचयेन भवति संकलितम्¹।
सुक्षेमा अनुवाद-1 सहित अन्तिम पद या संख्या (number या n) को
अन्तिम संख्या से गुणित करे तथा गुणनफल का 2 से दल या भाग देवे। इससे
1 आदि क्रमिक संख्याओं के चय या समूह का संकलित या जोड़ प्राप्त होता है
इससे हमें यह सूत्र प्राप्त होता है-
=1+2+3----अन्तिम पद (n) तक का योग = n (n+1) / 2
इस सूत्र की उपपत्ति सर्वथा स्पष्ट है। हम देख सकते हैं कि 1 से लेकर
10 तक क्रमशः जोड़ की स्थिति में 10+1 = 11, 9+2 = 11 इस प्रकार 11 के
5 जोड़े बनते हैं। अतः 11×5 ही इन संख्याओं का योग होगा। प्रस्तुत सूत्र में 11
के साथ 10/2 के गुणन द्वारा ठीक यही कार्य किया गया है।
द्विगुणीकृतसंकलितान्मूलं गच्छोऽवशिष्टसमम्²॥ १॥
सुक्षेमा अनुवाद-पदों के संकलित से दुगुनी राशि से उन पदों की संख्या
को घटाकर वर्गमूल लेने से प्राप्त संख्या 'गच्छ' या पदों की संख्या के ठीक
बराबर होती है। यह संख्या द्विगुणीकृत संकलित से पदों के वर्ग को घटाने पर
अवशिष्ट संख्या के समतुल्य होती है।
अनुशीलन-यहाँ पदों की संख्या को संकलित के साथ की गई इन
संक्रियाओं के परिणाम के समतुल्य बताया है-
1+2+3---के संकलित (S) के पद n = √(2S-n)
अथवा-
1+2+3---के संकलित (S) के पद n = 2S-n²
ये दोनों परिणाम संकलित के पूर्वोक्त सूत्र के साथ समीकरण की संक्रिया
से अनायास प्राप्त होते हैं-
1+2+3---अन्तिम पद (n) तक का योग S = n (n+1) / 2
⇒ S = (n²+n) / 2 ⇒ 2S = n²+n ⇒ n² = 2S-n
१. तुल. पाटी-गणित सू. 14, गणित-कौमुदी पृ. 114
२. तुल. पाटी-गणित सू. 15

त्रिशतिका 7
प्रथम पक्ष पूर्ण वर्ग होने से द्वितीय पक्ष भी अवश्य पूर्ण वर्ग है। अतः
n = √(2S-n)
अथवा 2s = n²+n n = 2S-n²
इस प्रकार श्लोक में उल्लिखित दोनों तथ्य सर्वथा सही सिद्ध होते हैं।
पदयुतपदवर्गदलं संकलितं वा, तदष्टसंगुणितम्।
रूपयुतं तन्मूलं निरेकमर्धीकृतं गच्छः¹।।२।।
सुक्षेमा अनुवाद-अथवा पदों की संख्या से युक्त पदों के वर्ग का आधा
उन पदों का संकलित होता है। साथ ही 8 से गुणित संकलित (S) के रूप या
1 से युक्त होने पर प्राप्त संख्या का वर्गमूल तथा उसमें से 1 कम करने तथा 2
से भाग देने पर गच्छ या पद (n) की प्राप्ति होती है।
अनुशीलन-प्रथम उपबन्ध के अनुसार s = (n+n²)/2 है, जो कि पूर्वोक्त
उपपत्ति से सर्वथा स्पष्ट है। दूसरे उपबन्ध में संकलित से पद (n) प्राप्त करने का
सूत्र बताया है, जो इस प्रकार होगा-
1+2+3 के संकलित के पद (n) = (√(8S+1) - 1) / 2
इसकी उपपत्ति इस प्रकार है-
पूर्वोक्तानुसार 2S = n²+n
द्विघात समीकरण का रूप देने हेतु दोनों पक्षों को 4a से गुणा तथा 1 जोड़ने
पर-
⇒ 4n²+4n+1 = 8S+1
⇒ (2n)² + 2×2n×1+1² = 8S+1
⇒ (2n+1)² = 8S+1
⇒ 2n+1 = √(8S+1) ⇒ 2n = √(8S+1) - 1 = n = (√(8S+1) - 1) / 2
इस प्रकार हमने द्विघात समीकरण के सामान्य नियम से श्लोक में प्रोक्त
ठीक वही सूत्र प्राप्त कर लिया है। यह त्रिशतिका सूत्र 41 पृ. 80 में 'गच्छ' के
अन्तर्गत द्विघात समीकरण के विस्तृत सूत्र के सर्वथा समतुल्य है।
──────────────────────────────────────────
१. तुल. पाटी-गणित सू. 15,

अष्टविध परिकर्म: जोड़, घटाव, गुणा, भाग, वर्ग व घन (श्लोक ११-३०)

8 त्रिशतिका
उदाहरणानि
एकादि-दशान्तानां संकलितं किं पृथग्दशगुणानाम्।
एकाद्येकचयेन प्रचक्ष्व तस्मात् पदं चाशु।। १।।
न्यासः ।। 10 । 20 । 30 । 40 । 50 । 60 । 70 । 80 । 90 । 100 ।। एतेषु पदेषु
एकाद्येकोत्तराणामंकानां यथास्वपक्षसंयोजनेन यथोक्तं लघुखण्डेन च लब्धं पृथक्
संकलितम्।
यथा सं० । 55 । 210 । 465 । 820 । 1275 । 1830 । 2485 । 3240 । 4095 । 5050 ।
एतेभ्यः पदानि तान्येव दशादीनि। तत्रैकाद्येकोत्तराणामंकानां यथापक्षयोजनं प्रधानतरं
व्यवकलितेनैतद्वियोजनीयम्। ते शिष्यस्य प्रयत्नतो दर्शयितव्ये येनांकानां योगवियोगौ
जानाति। यत् संकलितेऽन्यत् करणसूत्रयुक्तं तत् पृथगंकयोजनावाप्तवित्तस्य प्रत्ययार्थं
लघुकमार्थं च। एवं संकलितं समाप्तम्।।
सुक्षेमा अनुवाद-1 से लेकर 10 तक क्रमिक संख्याओं का जोड़ तथा इस
प्रकार क्रम से चलते हुए अन्त में 1 से लेकर 10×10 = 100 तक संख्या का
जोड़ तथा इनसे प्राप्त पद भी शीघ्र बताओ।
अनुशीलन-व्याख्या में 1 से लेकर क्रमशः 10---20 आदि के संकलित
तथा पद बताए गए हैं। अतः यहाँ पहले इन संख्याओं में सूत्र का प्रयोग करते हुए
संकलित का निरूपण करते हैं-
संख्याएँ संकलित के सूत्र अनुसार संक्रिया संकलित (S)
1+2+3--+10 10 (10+1) = 55

2
1+2+3--+20 20 (20+1) = 210

2
1+2+3--+30 30 (30+1) = 465

2
1+2+3--+40 40 (40+1) = 820

2
1+2+3--+50 50 (50+1) = 1275

2
1+2+3--+60 60 (60+1) = 1830

2

त्रिशतिका 9
1+2+3--+70 70 (70+1) = 2485

2
1+2+3--+80 80 (80+1) = 3240

2
1+2+3--+90 90 (90+1) = 4095

2
1+2+3--+100 100 (100+1) = 5050

2
इसके पश्चात् पूर्वोक्त सूत्रों के अनुसार संकलित से पद (n) प्राप्त करने के
लिये चित्र प्रदर्शित करते हैं-
संकलित (S) पद प्राप्ति पद प्राप्ति के द्वितीय सूत्र पद या
के प्रथम सूत्र के अनुसार संक्रिया अन्तिम
के अनुसार संख्या (n)
संक्रिया
55 110-100 √8×55+1-1 = √441-1 = 21-1 = 10


2 2 2
210 420-400 √8×210+1-1 = √1681-1 = 41-1 = 20


2 2 2
465 930-900 √8×465+1-1 = √3721-1 = 61-1 = 30


2 2 2
820 1640-1600 √8×820+1-1 = √6561-1 = 81-1 = 40


2 2 2
1275 2550-2500 √8×1275+1-1 = √10201-1 = 101-1 = 50


2 2 2
1830 3660-3600 √8×1830+1-1 = √14641-1 = 121-1 = 60


2 2 2
2485 4970-4900 √8×2485+1-1 = √19881-1 = 141-1 = 70


2 2 2
3240 6480-6400 √8×3240+1-1 = √25921-1 = 161-1 = 80


2 2 2