तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
[ ४० ]
भारत की राजनीतिक स्थिति में परिवर्तन हो जाने पर मुख्यतः राज्याश्रय से
पोषित बौद्ध धर्म अधिक काल तक भारत में ठहर नहीं सका। प्रतिकूल
परिस्थितियों के उत्पन्न होते ही बौद्ध विद्वान् भारत को छोड़कर अपने अधिक
अनुकूल पड़ने वाले तिब्बत, लङ्का आदि देशों को चले गये। इसलिये सन् ११००
में 'मोक्षाकर गुप्त' की 'तर्कभाषा' की रचना के बाद 'बौद्ध न्याय' की प्रगति एक
दम रुक गई। परन्तु 'जैन धर्म' उन प्रतिकूल परिस्थितियों में दृढ़तापूर्वक भारत
में ही जमा रहा। इसलिये उसका साहित्य निर्माण का कार्य चलता ही रहा।
और १६८८ तक 'यशोविजय' की सुन्दर दार्शनिक कृतियाँ प्राप्त होती रहीं। इस
प्रकार इतने लम्बे समय में 'बौद्ध न्याय' तथा 'जैन न्याय' का जो साहित्य तैयार
हुआ उसकी सूची हम आगे दे रहे हैं। इसी को हम 'मध्य न्याय' का साहित्य
कह सकते हैं।
मध्यकालीन न्याय के निर्माताओं का विवरण
पञ्चम शताब्दी के प्रारम्भ से सत्रहवीं शताब्दी तक के बौद्ध तथा जैन
न्यायाचार्यों के समयानुक्रम तथा ग्रन्थों का परिचय
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
१ दिङ्नाग [ ४५०-५२० ई० ]—
१ 'प्रमाण समुच्चय', २ प्रमाण समुच्चय
वृत्ति, ३ न्याय प्रवेश, ४ प्रमाण शास्त्र
न्यायप्रवेश, ५ हेतु चक्र, ६ त्रिकाल
परीक्षा, ७ आलम्बन परीक्षा, ८ आल-
म्बन परीक्षा वृत्ति ।
दिङ्नाग ने वात्स्यायन का खण्डन
किया है ।
२ परमार्थ [ ४९८-५६९ ]—
चीन देश को गया । वसुबन्धु
के 'तर्कशास्त्र' गोतम के 'न्यायसूत्र'
का चीनी भाषा में अनुवाद किया ।
'न्यायसूत्र' पर भाष्य भी लिखा ।
३ शङ्करस्वामी [ ५५० ई० ]—
दिङ्नाग के शिष्य हैं। 'हेतुविद्यान्यायप्रवेश-
शास्त्र' अपर नाम 'न्यायप्रवेश तर्कशास्त्र'
४ धर्मपाल [ ६००-६३५ ई० ]—
१ आलम्बनप्रत्यय ध्यानशास्त्रव्याख्या
२ विद्यामात्र सिद्धिशास्त्र व्याख्या
३ षट्शास्त्र वैपुल्य व्याख्या
५ आचार्य शीलभद्र [ ६३५ ई० ]—
नालन्दा विश्वविद्यालय में धर्मपाल
से अध्ययन कर वहाँ के आचार्य
बने ह्वेनत्सांग को पढ़ाया ।
६ आचार्य धर्मकीर्ति [ ६५० ई० ]—
१ प्रमाणवार्तिक कारिका, २ प्रमाण
वार्तिक वृत्ति, ३ प्रमाण विनिश्चय,
४ न्यायबिन्दु, ५ हेतुबिन्दु विवरण,
६ तर्क न्याय या वादन्याय, ७ सन्ता-
नान्तरसिद्धि, ८ सम्बन्ध परीक्षा
९ सम्बन्ध परीक्षा वृत्ति ।
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
१ सिद्धसेन दिवाकर [४८०-५५० ई०]—
१ न्यायावतार
२ जिनभद्र गणी [ ४८४-५८८ ]
अपर नाम क्षमा श्रमण
आवश्यक निर्युक्ति पर 'विशेषावश्यक
भाष्य' नामक टीका
३ सिद्धसेन गणी [ ६०० ई० ]
उमास्वाति के 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र'
पर 'तत्त्वार्थ टीका'
४ समन्त भद्र [ ६०० ई० ]—
उमास्वाति के 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र पर
१ 'गन्ध हस्तीमहाभाष्य' नामक टीका
२ आप्त मीमांसा, ३ युक्तियानुशासन,
४ रत्नकरण्डक
५ अकलङ्क देव [ ७५० ई० ]—
१ आप्त मीमांसा पर अष्टशती टीका
२ न्याय विनिश्चय, ३ लघीयस्त्रय
४ तत्त्वार्थ वार्तिक व्याख्यानालङ्कार
५ अकलङ्कस्तोत्र, ६ स्वरूप सम्बोधन
६ विद्यानन्द [ ८०० ई० ]—
१ आप्तमीमांसालङ्कृतिया अष्टसहस्र
२ प्रमाण परीक्षा, ३ आप्त परीक्षा
४ तत्त्वार्थ श्लोक वार्तिक
[ ४२ ]
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
७ देवेन्द्रबोधि [ ६५० ई० ]—
प्रमाण वार्तिक पञ्जिका
८ शाक्यबोधि [ ६७५ ई० ]—
प्रमाण वार्तिक पञ्जिका टीका
९ विनीतदेव [ ७०० ई० ]—
१ न्यायविन्दु टीका, २ हेतु विन्दु
टीका, ३ वादन्याय व्याख्या, ४सम्बन्ध
परीक्षा टीका, ५ आलम्बन परीक्षा
टीका, ६ सन्तानान्तर सिद्धि टीका ।
१० रविगुप्त [ ७२५ ई० ]—
प्रमाण वार्तिक वृत्ति ।
११ जिनेन्द्र बोधि [ ७२५ ई० ]—
विशालामलवती नाम प्रमाण
समुच्चय टीका ।
१२ शान्त रक्षित [ ७४९ ई० ]—
१ तत्त्व संग्रह कारिका, २वादन्याय
वृत्ति विपञ्चितार्थ ।
१३ कमलशील [ ७५० ई० ]—
१ न्याय विन्दु पूर्वपक्ष संक्षिप्त
२ तत्त्वसंग्रह पञ्जिका ।
१४ कल्याण रक्षित [ ८२९ ई० ]—
१ सर्वज्ञसिद्धि कारिका, २ बाह्यार्थ
सिद्धि कारिका, ३ अन्यापोह विचार
कारिका, ४ ईश्वरभङ्ग कारिका,
५ श्रुतिपरीक्षा ।
१५ धर्मोत्तराचार्य [ ८४७-ई० ]—
१ न्यायविन्दु टीका, २ प्रमाणपरीक्षा,
३ अपोह नाम प्रकरणम्, ४ परलोक
सिद्धि, ५ क्षणभङ्गसिद्धि, ६ प्रमाण
विनिश्चय टीका ।
१६ मुक्ताकुम्भ [ ९०० ई० ]—
क्षणभङ्गसिद्धि व्याख्या ।
१७ अर्चट [ ९०० ई० ]—
हेतुविन्दु विवरण
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
७ माणिक्यनन्दी [ ८०० ई० ]—
परीक्षामुख सूत्र या परीक्षा मुख शास्त्र
८ प्रभाचन्द्र [ ८२५ ई० ]
प्रमेय कमलमार्तण्ड [परीक्षामुखटीका]
न्यायकुमुद चन्द्रोदय [लघीयस्त्र टीका]
९ मल्ल वादिन् [ ८२७ ई० ]—
न्यायविन्दु टीका या धर्मोत्तर टिप्पण
१० रभस नन्दी [ ८५० ई० ]—
सम्बन्धोद्योत [सम्बन्धपरीक्षाकीटीका]
११ अमृतचन्द्र सूरि [ ९५० ई० ]—
१ तत्त्वार्थसार, २ आत्मख्याति
१२ देवसेन भट्टारक [८९९-९५० ई०]-
१ न्यायचक्र, २ दर्शनसार
१३ प्रद्यु
[ ४३ ]
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
१८ अशोक [ ९०० ई० ]—
१ अवयविनिराकरण
२ सामान्यदूषण दिक् प्रसारिता
१९ चन्द्रगोमिन् [द्वितीय, ९२५ ई०]—
न्याय सिद्ध्यालोक
२० प्रज्ञाकर गुप्त [ ९४० ई० ]—
प्रमाण वार्तिकालङ्कार
सहावलम्बनिश्चय
विक्रमशिला विश्वविद्यालय के दक्षिण
द्वार के द्वारपाल प्रज्ञाकरमति [९८३]
इनसे भिन्न थे ।
२१ आचार्य जेतारि [ ९८० ई० ]—
१ हेतुतत्त्वोपदेश, २ बालावतारातर्क
३ धर्मधर्मिविनिश्चय
२२ जिन [ ९४० ई० ]—
प्रमाण वार्तिकालङ्कार टीका
२३ रत्नकीर्ति [ १००० ई० ]—
१ अपोहसिद्धि, २ क्षणभङ्गसिद्धि
२४ रत्नवज्र [ १०४० ई० ]—
‘युक्ति प्रयोग’
२५ जिनमित्र [ १०२५ ई० ]—
न्यायविन्दु पिण्डितार्थ
२६ दानशील [१०२५ ई०] पुस्तक पाठोपाय
२७ ज्ञान श्री मित्र [ १०४० ई० ]—
‘कार्यकारणभावसिद्धि’
२८ ज्ञान श्री भद्र [ १०५० ई० ]—
‘प्रमाण विनिश्चय टीका’
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
१८ देवसूरी [ १०८६ ई० ]—
१ प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार
२ स्याद्वाद रत्नोकर
[ प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार टीका ]
१९ चन्द्रप्रभ सूरि [ ११०२ ई० ]
दर्शनशुद्धि या प्रमेयरत्नकोष
न्यायावतार वृत्ति
२० हेमचन्द्रसूरी [ १०८८-११७२ ई० ]-
१ प्रमाण मीमांसा
२ अभिधान चिन्तामणि
३ काव्यानुशास्त्रवृत्ति
४ छन्दोनुशास्त्रवृत्ति
५ अनेकार्थसंग्रह, ६ द्व्याश्रर्यमहाकाव्य
७ त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित
८ योगशास्त्र, ९ निघण्टु शेष
२१ नेमिचन्द्र कवि [ ११५० ई० ]—
‘पार्श्वनाथ चरित’ में कणाद के खण्डन
करने का वर्णन है । ग्रन्थ नहीं मिलता।
२२ आनन्द सूरी [ व्याघ्र शिशुक ]
[ १०९३-११३५ ]—
२३ अमर चन्द्र सूरी [ सिंहशिशुक ]
‘सिंह व्याघ्र लक्षण’ प्रवर्त्तक
२४ हरिभद्रसूरी [ ११२० ई० ]
१ षड् दर्शन समुच्चय
२ न्याय प्रवेश सूत्र
३ न्यायावतार वृत्ति
४ दशवैकालिकानियुक्ति टीका
२५ पार्श्वदेव गणी [ ११३३ ई० ]—
‘न्यायप्रवेश पञ्जिका’
२६ श्रीचन्द्र [११३७]-न्यायप्रवेशटिप्पण
२७ देवभद्र [ ११५० ई० ]—
‘न्यायावतार टिप्पण’
२८ चन्द्रसेन सूरी ११५० ई० ]—
‘उत्पाद सिद्धि प्रकरण’
[ ४४ ]
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
२९ रत्नाकर शान्ति [ १०४० ई० ]—
अपर नाम कलिका सर्वज्ञ
१ विज्ञप्तिमात्रसिद्धि, २ अन्तर्व्याप्ति
३० यमारि [ १०५० ई० ]—
प्रमाणवार्तिकालङ्कार टीका
३१ शङ्करानन्द [ १०५० ई० ]—
१ प्रमाणवार्तिक टीका,
२ सम्बन्धपरीक्षानुसार
३ अपोह सिद्धि, ४ प्रतिबन्धसिद्धि
३२ शुभाकर गुप्त [ १०८० ई० ]—
जैन हरिभद्रसूरी [११२७] ने इनके
मत का उल्लेख किया है। ग्रन्थ नहीं
मिलता।
३३ मोक्षाकर गुप्त [ ११०० ई० ]—
तर्कभाषा
संस्कृत ग्रन्थ नहीं मिलता। तिब्बती
भाषा में अनुवाद पाया जाता है।
पुस्तक में तीन परिच्छेद हैं। जिनमें
क्रमशः—१ प्रत्यक्ष, २ स्वार्थानुमान,
३ परार्थानुमान का वर्णन है। अल्प-
बुद्धि बालकों को धर्मकीर्ति के
सिद्धान्तों का ज्ञान करने के लिए
लिखी है।
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
२९ रत्नप्रभ सूरी [ ११८१ ई० ]—
‘स्याद्वादरत्नाकरावतारिका’
३० तिलकाचार्य [ ११८०-१२४० ई० ]
१ आवश्यकलघु वृत्ति
२ प्रत्येकबुद्धचरित
३१ मल्लिसैन सूरी [ १२९२ ई० ]—
‘स्याद्वाद मञ्जरी’
३२ राजशेखर सूरी [ १३४८ ई० ]—
‘रत्नावतारिका पञ्जिका’
‘न्यायकन्दली पञ्जिका’ [ वैशेषिक ]
३३ ज्ञानचन्द्र [ १३५० ई० ]—
‘रत्नावतारिका टिप्पण’
३४ गुणरत्न [ १४०९ ई० ]—
षड्दर्शन समुच्चय पर
तर्क रहस्य दीपिका वृत्ति
३५ श्रुतसागर गणी [ १४९३ ई० ]—
‘तत्त्वार्थ दीपिका’
३६ धर्मभूषण [ १६०० ई० ]—
न्याय दीपिका
३७ विनय विजय [१६१३-१६८१ ई०]—
‘न्यायकर्णिका’
३८ यशोविजयगणी [१६०८-१६८८ ई०]
१ न्याय प्रदीप, २ तर्कभाषा
३ न्यायरहस्य, ४ न्यायामृततरङ्गिणी
५ न्यायखण्ड खाद्य
६ अष्टसाहस्री विवरण, ७ न्यायालोक
[ ४५ ]
नव्य न्याय
भारत में बौद्ध धर्म के पतन के बाद, भारतीय इतिहास के एक नवीन युग
का प्रारम्भ हुआ जिसका प्रभाव भारतीय संस्कृति के अन्य भागों की भांति दार्श-
निक क्षेत्र पर भी पड़ा और न्याय साहित्य के निर्माण में उसने एक नवीन प्रकार
का परिवर्तन उत्पन्न कर दिया। दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दियाँ इस परिवर्तन
का संक्रान्तिकाल थीं। उनमें निर्माण होने वाले न्याय साहित्य की शैली भी बदली
हुई है और १२ वीं शताब्दी में तो उसमें अत्यधिक परिवर्तन हो गया है। इसीलिये
इस काल के न्याय साहित्य को 'नव्य न्याय' शब्द से कहा जाता है। इस नव्य
न्याय के युग में जिस साहित्य का निर्माण हुआ उसकी दो प्रमुख विशेषतायें हैं
जो उसे प्राचीन न्याय से भिन्न करती हैं। प्राचीन न्याय का सारा साहित्य सूत्रों
पर अवलम्बित था। उस समय जो ग्रन्थ बने वे या तो साक्षात् गोतम सूत्रों की
व्याख्या रूप थे या उनके भाष्य की टीका प्रटीका आदि के रूप में लिखे गये थे
और सूत्रक्रम का अवलम्बन कर उनमें प्रतिपादित पदार्थों को सूत्रकार की भावना
के अनुसार समझाने का प्रयत्न करते थे। इस युग में बौद्धों के खण्डन में इतने
विस्तृत न्याय साहित्य का निर्माण हुआ परन्तु 'उदयन' की 'न्यायकुसुमाञ्जलि' और
'आत्मतत्त्व विवेक' को छोड़कर सबका समावेश सूत्रानुसारी व्याख्या पद्धति के
भीतर हो गया। सूत्रों को छोड़कर स्वतन्त्र ग्रन्थ निर्माण की पद्धति उस
समय नहीं थी।
१. परन्तु नव्य न्याय की विशेषताओं में से पहिली विशेषता यह है कि उसके
प्राचीन सूत्र पद्धति की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रूप से ग्रंथों का निर्माण प्रारम्भ
किया गया। न केवल न्याय में अपितु व्याकरणादि अन्य शास्त्रों में भी जिस
साहित्य का निर्माण इस काल में हुआ वहाँ भी यही बात स्पष्ट दिखाई देती है।
इसी ने उन शास्त्रों में भी नवीन व्याकरण, प्राचीन व्याकरण और नवीन वेदान्त,
प्राचीन वेदान्त आदि भेद कर दिये हैं। नवीन व्याकरण का आधारभूत सिद्धान्त-
कौमुदी ग्रन्थ लक्षणानुसारिणी प्राचीन आर्षपद्धति को छोड़कर लक्ष्यानुसारिणी
नवीन पद्धति से लिखा गया है। इसी प्रकार न्याय में नव्य पद्धति से जिस
साहित्य का निर्माण हुआ उसमें भी प्राचीन सूत्र पद्धति की सर्वथा उपेक्षा कर
स्वतन्त्र रूप में ग्रन्थों का निर्माण हुआ है।
२. नव्य न्याय की पद्धति की दूसरी विशेषता है पदार्थों के महत्त्व में आपेक्षिक
परिवर्तन। न्याय के षोडश पदार्थों में से जिनका महत्त्व प्राचीन पद्धति में अधिक
था वह नव्य युग में बहुत कम हो गया है और जिनका महत्त्व कम था उनका बढ़
गया है। उदाहरण के लिये प्राचीन न्याय के सूत्रकार ने सारा पाँचवा अध्याय केवल
'जाति' और 'निग्रह स्थान' इन दो पदार्थों के वर्णन में व्यय कर दिया है, परन्तु नव्य
न्याय में उनका उल्लेख केवल नाममात्र को मिलता है। इसके विपरीत अवयव आदि
का वर्णन प्राचीन न्याय की अपेक्षा नव्य न्याय में कहीं अधिक पाया जाता है।
[ ४६ ]
३. नव्य न्याय की तीसरी विशेषता है 'प्रकरण ग्रन्थ'। प्रकरण ग्रन्थ एक
पारिभाषिक शब्द है जिसका लक्षण इस प्रकार है—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः ॥
अर्थात् शास्त्र के एक अंश के प्रतिपादक और आवश्यकतानुसार अन्य शास्त्र के
उपयोगी अंश को भी प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ भेद को प्रकरण ग्रंथ कहते हैं।
नव्य न्याय में इस प्रकार के जिन अनेक प्रकरण ग्रंथों का निर्माण हुआ है,
उनको हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं।
(क) न्याय के वे प्रकरण ग्रन्थ जो केवल एक प्रमाण पदार्थ का निरूपण करते
हैं। और शेष १५ पदार्थों को प्रमाण के भीतर ही अन्तर्भूत कर लेते हैं। इस प्रकार
के ग्रन्थों में श्री 'भासर्वज्ञ' [ १००० ई० ] के 'न्यायसार' का नाम उल्लेख योग्य है।
'भासर्वज्ञ' सम्भवतः काश्मीर के रहने वाले दशम शताब्दी के दार्शनिक हैं।
केवल एक प्रमाण पदार्थ के प्रतिपादन की यह शैली बौद्ध साहित्य से ली गई
है। भासर्वज्ञ ने अपने सामने की उसी प्रचलित पद्धति से ही न्याय के पदार्थों का
निरूपण कर दिया है। परन्तु उन्होंने न केवल प्राचीन न्याय पद्धति को परिवर्तित
कर दिया है अपितु अनेक सिद्धान्तों को भी परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया है।
उदाहरण के लिये उन्होंने प्रमाण के तीन भेद प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम किये
हैं। जब कि न्यायशास्त्रों में इनके अतिरिक्त 'उपमान' प्रमाण भी माना गया है।
प्रमाणों का यह त्रिविध विभाग न्याय सिद्धान्त की अपेक्षा सांख्य और जैन सिद्धान्त
से अधिक मिलता है क्योंकि वे तीन प्रमाण मानते हैं। लेखक ने अनुमान को
स्वार्थानुमान और परार्थानुमान इन दो भेदों में विभक्त करने में भी बौद्ध और
जैन दार्शनिकों के विभाग का अवलम्बन किया है। और उन्हीं की तरह दृष्टान्ता-
भास एवं हेत्वाभासों का वर्णन किया है। नव्य न्याय के अन्य लेखकों की भाँति
'जाति' और 'निग्रह स्थान' को उन्होंने छोड़ नहीं दिया बल्कि परार्थानुमान के
प्रकरण में उनका भी वर्णन किया है। मोक्ष के सम्बन्ध में भी उनका सिद्धान्त
प्राचीन न्याय से भिन्न है। वे मोक्ष में नित्य आनन्द की अभिव्यक्ति मानते हैं जब
भाष्यकार वात्स्यायन ने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उसका खण्डन किया है।
इस प्रकार नव्य पद्धति पर न्यायशास्त्र के इस प्रथम ग्रंथ की रचना दसवीं
शताब्दी में हुई और उसने अपने अनुरूप आदर पाया। उसके ऊपर १८ टीकायें
लिखी गईं जिनमें से मुख्य मुख्य यह हैं—
१. न्यायसार टीका [ विजयसिंह गुणी ]
२. न्यायसार टीका [ जयतीर्थ ]
३. न्यायसार विचार [ भट्ट राघव ]
४. न्यायतात्पर्यदीपिका [ जयसिंह सूरि ]
शेष का उल्लेख ग्रन्थों में मिलता है टीका उपलब्ध नहीं है।
[ ४७ ]
(ख) दूसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः न्याय के ग्रन्थ होते हुए भी
वैशेषिक दर्शन के पदार्थों का भी समावेश कर लेते हैं। इस प्रकार के ग्रन्थों में
'श्रीवरदराज' को 'तार्किकरक्षा' और 'केशवमिश्र' की 'तर्कभाषा' के नाम लिए जा
सकते हैं। इन दोनों ने न्याय के षोडश पदार्थों का वर्णन किया है और दोनों ने
'वैशेषिक' के द्रव्यादि पदार्थों का अन्तर्भाव 'प्रमेय' में कर लिया है। इनमें से
वरदराज का समय लगभग ११५० और केशवमिश्र का समय लगभग १२७५ है।
(ग) तीसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः 'वैशेषिक' के ग्रन्थ हैं
परन्तु न्यायदर्शन के 'प्रमाण' पदार्थ का पूर्णरूप से उनमें समावेश हो गया है।
इनमें से कुछ में 'प्रमाण' का अन्तर्भाव 'वैशेषिक' के 'गुणप्रकरण' में किया गया है
और कुछ में 'आत्मप्रकरण' में जो कि द्रव्य का एक भेद है। न्याय और वैशेषिक के
पदार्थों को इस प्रकार मिलाकर प्रतिपादन करने की शैली भी श्री उदयन के बाद
विशेष रूप से प्रचलित हुई। उदयन ने अपनी 'लक्षणावली' में वैशेषिक दर्शन
के सात [अभाव सहित] पदार्थों का वर्णन किया है। परन्तु उनमें न्याय के प्रमाण'
पदार्थ का निरूपण नहीं है। उससे पूर्व केवल 'प्रशस्तपादभाष्य' में 'प्रमाण' का भी
समावेश हुआ है। इस प्रकार के ग्रन्थों में १२वीं शताब्दी के 'वल्लभाचार्य' की
'न्यायलीलावती', 'अन्नंभट्ट' [ १६२३], का 'तर्कसंग्रह', विश्वनाथ न्यायपञ्चानन'
[ १६३४ ] का 'भाषापरिच्छेद', 'लौगाक्षि भास्कर' की 'तर्ककौमुदी' के नाम लिए
जा सकते हैं।
(घ) चौथे प्रकार के प्रकरण ग्रन्थ वे हैं जिनमें कुछ न्याय और कुछ वैशेषिक
के पदार्थों का निरूपण है जैसे 'शशधर' [ ११२५ ] का 'न्यायसिद्धान्तदीप' ।
इसी प्रकरण में 'सर्वदर्शनसंग्रह' के लेखक श्री 'माधवाचार्य' के नाम का भी
उल्लेख कर देना चाहिए।
तत्त्वचिन्तामणि (एक युग प्रवर्तक ग्रन्थ) —
पिछले प्रकरण में हमने जिन प्रकरण ग्रन्थों का उल्लेख किया है, वह सब
नव्यग्रन्थ होते हुए नव्यन्याय के महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं हैं। नव्यन्याय के साहित्य
में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान 'गङ्गेशोपाध्याय' के 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ
का है। इसे ही वस्तुतः नव्यन्याय का आधारभूत ग्रन्थ और 'गङ्गेशोपाध्याय को
नव्यन्याय का पिता माना जाता है। इस ग्रन्थ ने न्यायशास्त्र के इतिहास में
वस्तुतः एक नवीन युग की सृष्टि की है। अब तो संस्कृत शिक्षा पर भी कुछ आंग्ल
पद्धति का प्रभाव दिखाई देने लगा है। परन्तु अब से केवल एक पीढ़ी पूर्व तक
'तत्त्वचिन्तामणि' या उसके किसी एक खण्ड को पढ़े बिना दार्शनिक पाण्डित्य प्राप्त
करना असम्भव समझा जाता था।
इस ग्रन्थ के रचयिता श्री गङ्गेशोपाध्याय एक मैथिल विद्वान् थे जिन्होंने
सन् १२०० के लगभग इस ग्रन्थ की रचना की। अपने निर्माण काल से ही यह
ग्रन्थ मैथिल सम्प्रदाय की शिक्षा का चरम उद्देश्य बन गया। केवल इस ग्रन्थ का
[ ४८ ]
पाण्डित्य प्राप्त करने के लिए लोग अपने जीवन के १२ वर्ष प्रसन्नतापूर्वक व्यय कर
सकते थे और उसमें गौरव का अनुभव करते थे । १६वीं शताब्दी में 'वासुदेव सार्व-
भौम' ने बंगाल के प्रधान विद्यापीठ 'नवद्वीप' में इस ग्रन्थ का प्रचार किया। वासु-
देव सार्वभौम' मैथिल विद्वान् 'पक्षधर मिश्र' के शिष्य थे। उन्होंने 'नवद्वीप' जाकर
इसके पठन-पाठन को प्रचलित किया। १५०३ में 'नवद्वीप' विद्यापीठ की स्थापना
होने के बाद इस ग्रन्थ का 'रघुनाथ शिरोमणि' आदि के द्वारा सारे बंगाल में प्रचार
हो गया। इस प्रकार 'नवद्वीप' और 'मिथिला' यह दोनों 'नव्यन्याय' के प्रधान
केन्द्र रहे और आज भी इन दोनों विद्यापीठों को अपने नव्यन्याय के पाण्डित्य पर
गर्व करने का उचित अधिकार है। नवद्वीप के बाद धीरे धीरे महाराष्ट्र, मद्रास और
काश्मीर में प्रचार होते-होते सारे भारत में उसका प्रचार हो गया।
इस ग्रन्थ में कुल चार खण्ड हैं जिनमें प्रत्यक्षादि चारों प्रमाणों का विवेचन
क्रमशः एक-एक खण्ड में किया गया है। वह ग्रन्थ इस पद्धति से लिखा गया है कि
उसका हिन्दी में अनुवाद कर सकना सर्वथा असम्भव है। संसार के सारे दार्शनिक
ग्रन्थों में जितनी टीकाएँ इस ग्रन्थ की हुई हैं उतनी किसी दूसरे ग्रन्थ की नहीं।
श्री सतीशचन्द्र विद्याभूषण के लेखानुसार मूल ग्रन्थ लगभग तीन सौ पृष्ठ का है
और उस पर जो टीकाएँ लिखी गई हैं उनकी सम्मिलित पृष्ठ संख्या लगभग दस लाख
से ऊपर है। इतनी अधिक टीकाएँ विश्वसाहित्य के विरले ग्रन्थ पर ही मिल सकेंगी।
इससे इस नव्यन्याय के ग्रन्थ का महत्त्व और काठिन्य का कुछ आभास मिल सकेगा।
जैसा कि अभी कहा जा चुका है 'मिथिला' और 'नवद्वीप' यह दो स्थान नव्य-
न्याय के प्रधान केन्द्र रहे हैं। वहीं के विद्वानों ने इसके पठन-पाठन और टीका-
प्रटीका लिख कर इसे इतना महत्त्व प्रदान किया है। जिन विद्वानों ने इस प्रकार
नव्यन्याय का विस्तार किया उनकी नामावली, काल तथा ग्रन्थ आदि के विवरण
सहित हम आगे दे रहे हैं जिसमें दोनों शाखाओं के विद्वानों के नाम अलग-
अलग दिए हैं।
मैथिल शाखा
१२००–१६००
[ ४६ ]
सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ
१ | गङ्गेशोपाध्याय | १२०० | मिथि० | नव्य न्याय के प्रवर्तक | तत्त्वचिन्तामणि
२ | वर्द्धमानोपाध्याय | १२५० | ” | गङ्गेशोपाध्याय के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणि प्रकाश
| | | | | २ न्यायनिबन्ध प्रकाश (न्या.वा.ता.परिशुद्धि की टीका)
| | | | | ३ न्यायपरिशिष्ट प्रकाश (न्या० प० की टीका)
| | | | | ४ प्रमेयनिबन्ध प्रकाश
| | | | | ५ किरणावली प्रकाश
| | | | | ६ न्यायकुसुमाञ्जलि प्रकाश
| | | | | ७ न्यायलीलावती प्रकाश
| | | | | ८ खण्डनखण्ड प्रकाश
३ | पक्षधर मिश्र [ जयदेव ] | १२७५ | ” | हरि मिश्र के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणि आलोक
| | | | | २ द्रव्यपदार्थ
| | | | | ३ लीलावती विवेक
| | | | | ४ प्रसन्नराघव नाटक
| | | | | ५ चन्द्रालोक
४ | वासुदेव मिश्र | ” | ” | जयदेव मिश्र के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणिटीका [ पक्षधर के समर्थन में ]
५ | रुचिदत्त मिश्र | ” | ” | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि प्रकाश
| | | | | २ न्यायकुसुमाञ्जलि प्रकाश-मकरन्द
४ त० भू०
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ६ | भगीरथ [ मेघ ] ठक्कुर | १४०० | मिथि० | १ जलद [ कुसुमाञ्जलि प्रकाश वर्द्धमान की टीका ]<br>२ 'किरणावली प्रकाश प्रकाशिका' [ " ]<br>३ लीलावती प्रकाश व्याख्या [ " ]<br>४ पक्षधर मिश्र के 'आलोक' पर 'दर्पण' टीका | |
| ७ | महेश ठक्कुर | ” | ” | दरभंगा के राजवंश के<br>संस्थापक हैं। इनके शिष्य<br>रघुनन्दन दास राय नैया-<br>यिक की विद्वत्ता से प्रसन्न<br>होकर सम्राट् अकबर ने<br>दरभंगा का प्रान्त उनको<br>भेंट किया था जिसे<br>उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप<br>में महेश ठक्कुर को सम-<br>र्पित कर दिया और इस<br>प्रकार वे दरभंगा के राज-<br>वंश के संस्थापक बने। | |
| ८ | शङ्कर मिश्र | १४५० | ” | १ आत्मतत्त्वविवेक कल्पलता<br>२ आनन्दवर्द्धन [ खण्डनखण्डखाद्य की टीका ]<br>३ तत्त्वचिन्तामणिमयूख<br>४ त्रिसूत्रीनिबन्ध व्याख्या [ उदयन की टीका ]<br>५ भेदरत्नप्रकाश [ शाङ्कर वेदान्त का खण्डन ]<br>६ गौरीदिगम्बरप्रहसन |
[ ५० ]
</div>[ ५१ ]
७ वैशेषिकसूत्रोपस्कार
८ वादिविनोद
९ बौद्धधिकार टीका [ आत्मतत्त्वविवेक की टीका ]
१० अभेदधिकार [ शङ्कर का खण्डन ]
११ न्यायलीलावती कण्ठाभरण
१२ पण्डितविजय
१ अनुमानखण्ड टीका [ त० चि० की टीका ]
२ खण्डनखण्डोद्धार
३ न्यायसूत्रोद्धार
४ शब्दनिर्णय
९ वाचस्पति मिश्र(द्वितीय) १४५० "
१० मिसरू मिश्र १४७१ १ पदार्थचन्द्र
न्यायदीपिकाकार मिसरुक दूसरे हैं।
११ दुर्गादत्त मिश्र १५५० १ न्यायबोधिनी
१२ देवनाथ ठक्कुर १५६२ १ तत्त्वचिन्तामण्यालोक-परिशिष्ट
१३ मधुसूदन ठक्कुर १५७५ १ तत्त्वचिन्तामण्यालोक-कण्टकोद्धार
नवद्वीप शाखा
१६००-१८००
[ ५२ ]
सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ
१ | वासुदेव सार्वभौम | १५५० | नवद्वीप | नवद्वीप के महेश्वर विशा- |
| | | | रद के पुत्र थे । व्याकरण |
| | | | आदि पढ़ने के बाद लग- |
| | | | भग २५ वर्ष की अवस्था |
| | | | में मिथिला जाकर पक्ष- |
| | | | धर मिश्र के शिष्य बने । |
| | | | मैथिली पण्डित किसी |
| | | | बाहरी व्यक्ति को अपने |
| | | | ग्रन्थों की प्रतिलिपि नहीं |
| | | | करने देते थे । अत एव |
| | | | वासुदेव सार्वभौम ने |
| | | | समस्त तत्त्वचिन्तामणि |
| | | | और कुसुमाञ्जलि को कण्ठ |
| | | | कर लिया वहाँ से शिक्षा |
| | | | समाप्त कर काशी में |
| | | | वेदान्त का अध्ययन कर |
| | | | १६०० में वे नवद्वीप |
| | | | वापिस लौट आए । और |
२
रघुनाथ शिरोमणि
१६००
”
वहां न्यायकी शिक्षा देना
प्रारम्भ किया। इस प्रकार
वे नव्यन्याय की नवद्वी-
पशाखा के प्रवर्तक हैं।
नवद्वीप में वासुदेव
सार्वभौम से नव्यन्याय
की संपूर्ण शिक्षा प्राप्त
कर मिथिला गए और
पक्षधर मिश्र के शिष्य
बने। एक दिन पक्षधर
मिश्र ने किसी बात पर
इनका अपमान कर दिया
तो रात को छिपकर तल-
वार लेकर उनको मारने
के लिए घर पर पहुँचे।
उस समय पक्षधर मिश्र
अपनी पत्नी से रघुनाथ
की विद्वत्ता की प्रशंसा
कर रहे थे जिसे उन्होंने
बाहर से सुन लिया।
और तलवार फेंक कर
गुरु के चरणों पर गिर
पड़े और क्षमा मांगी।
वे एक आँख से काने थे।
१ तत्त्वचिन्तामणि-दीधिति
२ बौद्धधिक्कार-शिरोमणि
३ पदार्थतत्त्वनिरूपण
४ किरणावली-प्रकाश-दीधिति
५ न्यायलीलावती-प्रकाश-दीधिति
६ अवच्छेदकत्वनिरुक्ति
७ खण्डनखण्डखाद्य-दीधिति
८ आख्यातवाद
९ नञ्वाद
[ ५३ ]
[ ५४ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ३ | हरिदास न्यायालङ्कार भट्टाचार्य | १६०० | नवद्वीप | वासुदेव सार्वभौम के शिष्य | १ न्यायकुसुमाञ्जलि-कारिकाव्याख्या |
| २ तत्त्वचिन्तामणि-प्रकाश | |||||
| ३ भाष्यालोक-टिप्पणी | |||||
| ४ | जानकीनाथ शर्मा | ” | १ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी | ||
| ५ | कणाद तर्कवागीश | १६१० | १ मणिव्याख्या | ||
| २ भाषारत्न | |||||
| ३ अपशब्ददूषण | |||||
| ६ | रामकृष्ण भट्टाचार्य चक्रवर्ती | १६२५ | १ रघुनाथ शिरोमणि के पुत्र एवं शिष्य | १ गुणशिरोमणिप्रकाश | |
| २ न्यायदीपिका | |||||
| ७ | मथुरानाथ तर्कवागीश | ” | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि रहस्य | |
| २ ” आलोकरहस्य | |||||
| ३ दीधितिरहस्य | |||||
| ४ सिद्धान्त रहस्य | |||||
| ५ किरणावलीप्रकाशरहस्य | |||||
| ६ न्यायलीलावतीप्रकाशरहस्य | |||||
| ७ ” ” दीधितिरहस्य | |||||
| ८ बौद्ध धिकाररहस्य | |||||
| ९ आदिक्रियाविवेक | |||||
| १० आयुर्वेदभावना | |||||
| ८ | कृष्णदास सार्वभौम भट्टाचार्य | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि-दीधितिप्रसारिणी | ||
| २ अनुमानालोक-प्रसारिणी |
मयूख ३ न्यायादर्श या न्यायसारावली ४ शब्दशक्तिप्रकाशिका ५ तर्कामृत ६ पदार्थतत्त्वनिर्णय ७ न्यायलीलावतीदीधितिव्याख्याThese are at y ≈ 560 to 730! And then:१ त० चि० दीधितिपरीक्षा २ किरणावलीप्रकाशविवृतिपरीक्षा ३ पदार्थखण्डनव्याख्या ४ भावविलास [ राजस्तुति का काव्य ] ५ भ्रमरदूत`
These are at y ≈ 740 to 880!
YES! YES! YES!
Row 9 is at the TOP!
Row 10 is BELOW Row 9!
Row 11 is BELOW Row 10!
Row 12 is BELOW Row 11!
And in each row:
The row runs from LEFT to RIGHT:
Left: ९
Next: गुणानन्द विद्यावागीश
Next: १६२५
Next: The works!
And at the very top:
Above Row 9 (or in the margin above):
There is [ ५५ ]!
WAIT! Look at [ ५५ ]:
Is it at the top or right?
It's at x ≈ 450, y ≈ 95!
Wait, y ≈ 95 is ABOVE Row 9!
[ ५६ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| १३ | जयराम न्यायपञ्चानन | १७०० | ६ वृन्दावनविनोद काव्य<br>१ त० चि० दी० गूढार्थविद्योतन<br>२ त० चि० आलोकविवेक<br>३ न्यायसिद्धान्तमाला<br>४ शब्दार्थमाला<br>५ गुणदीधितिविवृत्ति<br>६ न्यायकुसुमाञ्जलिकािरकाव्याख्या<br>७ पदार्थमणिमाला<br>८ काव्यप्रकाश तिलक | ||
| १४ | गौरीकान्त सार्वभौम | १७२५ | १ भावार्थदीपिका [ तर्कभाषा की टीका ]<br>२ सद्युक्तिमुक्तावली<br>३ आनन्दलहरीवटी<br>४ विद्वन्मुखमण्डन विटीका | ||
| १५ | भवानन्द सिद्धान्तवागीश | १६२५ | १ त० चि० दी० प्रकाशिका<br>२ प्रत्यक्षालोकसारमञ्जरी<br>३ तत्त्वचिन्तामणिटीका<br>४ कारकविवेचन | ||
| १६ | हरिराम तर्कवागीश | ” | १ त० चि० टीका विचार |
[ ५७ ]
१७ विश्वनाथसिद्धान्तपञ्चानन १६३४ १ अलङ्कारपरिष्कार
२ नञ्वादटीका
३ न्यायसूत्रवृत्ति
४ सुबर्थतत्त्वालोक या कारकचक्र
५ पदार्थतत्त्वालोक
६ न्यायतन्त्रबोधिनी
७ भाषापरिच्छेद
८ पिङ्गलप्रकाश
९ सुबोधिनी [ शब्दशक्ति प्र० की टीका ]
१८ रामभद्र सिद्धान्त वागीश १६६० १ न्यायसंक्षेप
१९ गोविन्द न्यायवागीश १६५० २ पदार्थखण्डनव्याख्या
३ समासवाद
२० रघुदेव न्यायालंकार " १ त० चि० गूढार्थदीपिका
२ नतीननिर्माण
३ दीधितिटीका
४ न्या० कुसु० कारिकाव्याख्या
५ द्रव्यसारसंग्रह
६ पदार्थखण्डनव्याख्या
२१ गदाधर भट्टाचार्य " १ त० चि० दीधितिप्रकाशिका
२ " व्याख्या
३ " आलोकटीका
४ मुक्तावलीटीका
५ रत्नकोषवादरहस्य
६ अनुमानचिन्तामणिदीधितिटीका
[ ५८ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ७ आख्यातवाद | |||||
| ८ कारकवाद | |||||
| ९ नञ्वाद | |||||
| १० प्रामाण्यवाददीधितिटीका | |||||
| ११ शब्दप्रामाण्यवादरहस्य | |||||
| १२ बुद्धिवाद | |||||
| १३ मुक्तिवाद | |||||
| १४ विधिवाद | |||||
| १५ विषयतावाद | |||||
| १६ व्युत्पत्तिवाद | |||||
| १७ शक्तिवाद | |||||
| १८ स्मृतिसंस्कारवाद | |||||
| २२ | नृसिंह पञ्चानन | १६७५ | १ न्यायसिद्धान्तमञ्जरीभूषा | ||
| २३ | रामदेव चिरञ्जीव | १७०० | १ विद्वदामोदतरङ्गिणी | ||
| २ काव्यबिलास | |||||
| ३ माधवचम्पू | |||||
| ४ वृत्तरत्नावली | |||||
| २४ | रामरुद्र तर्कवागीश | ” | १ त० चि० दीधिति टीका | ||
| २ व्याप्तिवादव्याख्या | |||||
| ३ कारकनिर्णयटीका | |||||
| ४ दिनकरीप्रकाशतरङ्गिणी |
[ ५६ ]
२५ श्रीकृष्ण न्यायालङ्कार १६५० ५ तत्त्वसंग्रहदीपिका-टिप्पणी
६ सिद्धान्तमुक्तावली-टीका
२६ जयराम तर्कालङ्कार १७०० १ भावदीपिका [ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी की टीका ]
१ शक्तिवाद-टीका
१ वादपरिच्छेद
२ व्याख्याव्यूह
३ चित्तरूप
४ अधिकरणचन्द्रिका
२७ रुद्रराम १७५० ५ वैशेषिकशास्त्रीय-पदार्थनिरूपण
२८ कृष्णकान्त विद्यावागीश १७८० १ न्यायरत्नावली
२ दायभाग टीका
३ गोपाळलीलामृत
४ चैतन्यचन्द्रामृत
५ कामिनीकामकौतुक
६ उपमानचिन्तामणि-टीका
७ शब्दशक्तिप्रकाशिका-टीका
२९ राजचूडामणि मखी १६३० १ तत्त्वचिन्तामणिदर्पण
३० धमेरा आध्वरीण १६५० १ ,, प्रकाश-टीका
३१ गोपीनाथ मौनी " १ शब्दालोक