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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 330 में से

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पृष्ठ 49

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पाण्डित्य प्राप्त करने के लिए लोग अपने जीवन के १२ वर्ष प्रसन्नतापूर्वक व्यय कर
सकते थे और उसमें गौरव का अनुभव करते थे । १६वीं शताब्दी में 'वासुदेव सार्व-
भौम' ने बंगाल के प्रधान विद्यापीठ 'नवद्वीप' में इस ग्रन्थ का प्रचार किया। वासु-
देव सार्वभौम' मैथिल विद्वान् 'पक्षधर मिश्र' के शिष्य थे। उन्होंने 'नवद्वीप' जाकर
इसके पठन-पाठन को प्रचलित किया। १५०३ में 'नवद्वीप' विद्यापीठ की स्थापना
होने के बाद इस ग्रन्थ का 'रघुनाथ शिरोमणि' आदि के द्वारा सारे बंगाल में प्रचार
हो गया। इस प्रकार 'नवद्वीप' और 'मिथिला' यह दोनों 'नव्यन्याय' के प्रधान
केन्द्र रहे और आज भी इन दोनों विद्यापीठों को अपने नव्यन्याय के पाण्डित्य पर
गर्व करने का उचित अधिकार है। नवद्वीप के बाद धीरे धीरे महाराष्ट्र, मद्रास और
काश्मीर में प्रचार होते-होते सारे भारत में उसका प्रचार हो गया।
इस ग्रन्थ में कुल चार खण्ड हैं जिनमें प्रत्यक्षादि चारों प्रमाणों का विवेचन
क्रमशः एक-एक खण्ड में किया गया है। वह ग्रन्थ इस पद्धति से लिखा गया है कि
उसका हिन्दी में अनुवाद कर सकना सर्वथा असम्भव है। संसार के सारे दार्शनिक
ग्रन्थों में जितनी टीकाएँ इस ग्रन्थ की हुई हैं उतनी किसी दूसरे ग्रन्थ की नहीं।
श्री सतीशचन्द्र विद्याभूषण के लेखानुसार मूल ग्रन्थ लगभग तीन सौ पृष्ठ का है
और उस पर जो टीकाएँ लिखी गई हैं उनकी सम्मिलित पृष्ठ संख्या लगभग दस लाख
से ऊपर है। इतनी अधिक टीकाएँ विश्वसाहित्य के विरले ग्रन्थ पर ही मिल सकेंगी।
इससे इस नव्यन्याय के ग्रन्थ का महत्त्व और काठिन्य का कुछ आभास मिल सकेगा।
जैसा कि अभी कहा जा चुका है 'मिथिला' और 'नवद्वीप' यह दो स्थान नव्य-
न्याय के प्रधान केन्द्र रहे हैं। वहीं के विद्वानों ने इसके पठन-पाठन और टीका-
प्रटीका लिख कर इसे इतना महत्त्व प्रदान किया है। जिन विद्वानों ने इस प्रकार
नव्यन्याय का विस्तार किया उनकी नामावली, काल तथा ग्रन्थ आदि के विवरण
सहित हम आगे दे रहे हैं जिसमें दोनों शाखाओं के विद्वानों के नाम अलग-
अलग दिए हैं।