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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

परतःप्रामाण्यमण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १४१
अथैवमप्यप्रामाण्यं परतस्तर्हि प्रामाण्यमपि परत एव गृह्यताम् ।
ज्ञानग्राहकादन्यत इत्यर्थः । ज्ञानं हि मानसप्रत्यक्षेणैव गृह्यते प्रामाण्यं
पुनरनुमानेन । तथाहि जलज्ञानानन्तरं जलार्थिनः प्रवृत्तिर्द्वैधा, फलवती,
अफला चेति । तत्र या फलवती प्रवृत्तिः सा समर्था तया तज्ज्ञानस्य
याथार्थ्यलक्षणं प्रामाण्यमनुमीयते । प्रयोगश्च विवादाध्यासितं जलज्ञानं
प्रमाणं, समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात् । यन्न प्रमाणं तन्न समर्थां प्रवृत्तिं जनयति
यथा प्रमाणाभास इति केवलव्यतिरेकी ।
अत्र च फलवत्प्रवृत्तिजनकं यज्जलज्ञानं तत्पक्षः, तस्य प्रामाण्यं साध्यं
याथार्थ्यमित्यर्थः । न तु प्रमाकरणत्वं, स्मृत्या व्यभिचारापत्तेः । हेतुस्तु
समर्थप्रवृत्तिजनकत्वं फलवत्प्रवृत्तिजनकत्वमिति यावत् ।
अनेन तु केवलव्यतिरेक्यनुमानेनाभ्यासदशापन्नस्य ज्ञानस्य प्रामाण्ये-
ऽवबोधिते तद्दृष्टान्तेन जलप्रवृत्तेः पूर्वमपि तज्जातीयत्वेन लिङ्गेनान्वय-
और यदि ऐसा होने पर भी [ अप्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी किसी
ज्ञातता विशेष से ज्ञान और अप्रामाण्य के एक साथ ही गृहीत होने पर भी ]
अप्रामाण्य परतः ही [ मानना अभीष्ट ] है तो प्रामाण्य का ग्रहण भी परतः
मानना चाहिए । [ परतः ] अर्थात् ज्ञान ग्राहक [ सामग्री ] से भिन्न [ सामग्री ]
से [ न्याय सिद्धान्त ] । ज्ञान का ग्रहण [ अनुव्यवसाय रूप ] मानस प्रत्यक्ष से
होता है । और प्रामाण्य का ग्रहण [ प्रवृत्ति साफल्य मूलक ] अनुमान से ।
[ इसे यों समझिए ] जैसे कि जल ज्ञान के अनन्तर जलार्थी की प्रवृत्ति दो प्रकार
की होती [ हो सकती ] है [ एक ] फलवती और [ दूसरी ] अफला । उसमें जो
फलवती [ सफला ] प्रवृत्ति है वह समर्था [ प्रवृत्ति कहलाती ] है । उससे उस
ज्ञान का याथार्थ्य रूप प्रामाण्य अनुमित होता है । [ उसके अनुमान वाक्य का ]
प्रयोग [ इस प्रकार बनेगा ] । विवाद ग्रस्त [ अर्थात् सन्दिग्ध, प्रस्तुत ] जल ज्ञान
समर्थ [ सफल ] प्रवृत्ति का जनक होने से प्रमाण है। जो [ ज्ञान ] समर्थ
[सफल] प्रवृत्ति को उत्पन्न नहीं करता है वह प्रमाण नहीं होता है जैसे प्रमाणा-
भास । यह केवल व्यतिरेकी [ अनुमान ] है ।
यहां [ इस व्यतिरेकी अनुमान में ] सफल प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाला जो
जल ज्ञान है वह पक्ष है और उसका प्रामाण्य अर्थात् याथार्थ्य साध्य है । प्रमा-
करणत्व नहीं [ साध्य है ] । स्मृति में व्यभिचारी होने से । [ अर्थात् समर्थ प्रवृत्ति
जनक या सफल प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाली स्मृति का भी याथार्थ्य रूप
प्रामाण्य माना जाता है । प्रमाकरणत्व रूप प्रामाण्य स्मृति का नहीं होता है ।
इसलिये यहां प्रामाण्य का अर्थ याथार्थ्य करना चाहिए प्रमाकरणत्व नहीं ] और

१४२ तर्कभाषा [ परतःप्रामाण्यमण्डनम्
व्यतिरेक्यनुमानेनान्यस्य ज्ञानस्यानभ्यासद्शापन्नस्य प्रामाण्यमनुमीयते ।
तस्मात् परत एव प्रामाण्यं न ज्ञानग्राहकेणैव गृह्यत इति ।
[ उस प्रामाण्य का साधक ] हेतु समर्थ प्रवृत्तिजनकत्व अर्थात् सफल प्रवृत्ति
जनकत्व है । इस केवल व्यतिरेकी अनुमान से 'अभ्यासद्शापन्न' ज्ञान के प्रामाण्य
के सिद्ध हो जाने पर उसको दृष्टान्त मानकर जल प्रवृत्ति के पूर्व भी 'तज्जातीयत्व'
रूप लिङ्ग से अन्वय व्यतिरेकी अनुमान द्वारा 'अनभ्यासद्शापन्न' ज्ञान का
प्रामाण्य भी अनुमित होता है । इसलिये 'परतः प्रामाण्य' ही मानना चाहिए ।
अर्थात् ज्ञान ग्राहक [ सामग्री ] से [ प्रामाण्य ] गृहीत नहीं होता है ।
यहां 'अभ्यासद्शापन्न' और 'अनभ्यासद्शापन्न' दो प्रकार के ज्ञानों का
उल्लेख किया है । जहाँ जल ज्ञान के बाद उसकी प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति भी
हो चुकी है उस ज्ञान को 'अभ्यासद्शापन्न ज्ञान' कहते हैं । उस 'अभ्यास-
दशापन्नज्ञान' में तो 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह हेतु ठीक बैठ जाता है ।
क्योंकि उससे समर्थ प्रवृत्ति उत्पन्न हो चुकी है । परन्तु जहाँ जल प्रवृत्ति के पूर्व
ही ज्ञान में प्रामाण्य का ग्रहण हो जाता है वहाँ तो 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह
हेतु नहीं बन सकता है क्योंकि उस ज्ञान से तो अभी 'समर्थ' अथवा 'असमर्थ'
किसी प्रकार की भी प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है । तब उसको 'समर्थप्रवृत्ति-
जनक' कैसे मान सकते हैं । इसलिए इस प्रकार के 'अनभ्यासद्शापन्न ज्ञान' के
स्थल में प्रामाण्य के अनुमान के लिए 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' के स्थान पर
'समर्थप्रवृत्तिजनकज्ञानजातीयत्वात्' यह हेतु मानना चाहिए । 'अनभ्यासद्शा-
पन्न ज्ञान' से यद्यपि अभी प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है । परन्तु वह ज्ञान समर्थ-
प्रवृत्तिजनक ज्ञान के समान ही अदुष्टकरणजन्य होने से तज्जातीय है । इसलिए
उसके आधार पर अन्वय व्यतिरेकी अनुमान से 'अनभ्यासद्शापन्न ज्ञान' के
प्रामाण्य का भी निश्चय हो सकता है । इसलिये ज्ञान का ग्रहण सर्वत्र मानस-
व्यापार रूप 'अनुव्यवसाय' से और प्रामाण्य का ग्रहण 'प्रवृत्ति साफल्यमूलक
अनुमान' से होता है इसलिए ज्ञान और प्रामाण्य का ग्रहण भिन्न भिन्न सामग्री
से होने के कारण 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्व' रूप 'स्वतः प्रामाण्य' नहीं,
अपितु 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्व' रूप 'परतः प्रामाण्य' ही मानना चाहिए ।
यह ग्रन्थकार का अभिप्राय और न्याय का सिद्धान्त पक्ष है । 'इति' शब्द से
इस 'प्रामाण्यनिरूपण' के प्रकरण की समाप्ति सूचित करते हुए प्रकरण का
उपसंहार किया गया है ।

संग्रहः ] प्रामाण्यवादः १४३
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में 'प्रामाण्यवाद' के विषय का इस प्रकार
संग्रह किया है,
प्रामाण्यं किं स्वतो ज्ञाने परतो वा प्रमाणजे ।
स्वतो मीमांसकाः प्राहुः परतश्चेति तार्किकाः ॥ १ ॥
ज्ञानग्राहकग्राह्यत्वं स्वतस्त्वमत्र सम्मतम् ।
परतस्त्वं पुनर्भिन्नसामग्रीग्राह्यता तयोः ॥ २ ॥
मीमांसकाभिमतं स्वतःप्रामाण्यमुपपादयति—
जाते तावद् घटज्ञाने ज्ञातता जायते घटे ।
ज्ञातोऽसाविति ज्ञाता सा कारणं ज्ञानमाक्षिपेत् ॥ ३ ॥
एवं च ज्ञाततान्यथा-नुपपत्तिप्रसूतया ।
अर्थापत्त्याग्रहस्त्वाद्ये ज्ञानप्रामाण्ययोर्मतः ॥ ४ ॥
स्वतःप्रामाण्यस्याधारभूतां ज्ञाततामुपपादयति—
घट एव घटज्ञाने विषयो न पटः कुतः ।
आलोकादावतिव्याप्तेर्नोत्पत्तिस्तन्नियामिका ॥ ५ ॥
ज्ञातता ज्ञानजन्यैव विषयत्वे प्रयोजिका ।
अन्यथानुपपत्त्यास्य ज्ञातता च प्रसिद्ध्यति ॥ ६ ॥
अत्र तार्किकमतेन ज्ञाततां खण्डयति—
घटादौ ज्ञातताधर्मो नायं तार्किकसम्मतः ।
विषयत्वं घटादीनां स्वभावादेव तन्मते ॥ ७ ॥
अन्यथाऽनागतेऽतीते विषयत्वं न सम्भवि ।
धर्मिण्यविद्यमाने हि धर्मस्तत्र कथं भवेत् ॥ ८ ॥
ज्ञाततापि स्वज्ञानस्य विषयत्वं प्रपद्यते ।
ज्ञातताधारता तत्र मता किं वा न सम्मता ॥ ९ ॥
ज्ञातता ज्ञाततायां चेदपरापि प्रकल्प्यते ।
अविश्रान्तेः क्रमस्य स्यादनवस्था दुरुत्तरा ॥ १० ॥
अनवस्थाभयान्नो चेज् ज्ञाततान्तरकल्पना ।
ज्ञाततायाः कथञ्जु स्याद्विषयत्वं तया बिना ॥ ११ ॥
विषयत्वं च तस्याश्चेज् ज्ञाततान्तरमन्तरा ।
घटादीनां कथन्न स्याद्विषयत्वं तदन्तरा ॥ १२ ॥
ज्ञातो घटः प्रतीतिश्चेज् ज्ञाततायाः प्रसाधिका ।
दृष्टः कृतः प्रतीत्या स्युर्दृष्टताकृततादयः ॥ १३ ॥
१ दर्शनमीमांसा ५ ।

१४४ तर्कभाषा [ प्रामाण्यवादोपसंहार.
चत्वार्येव प्रमाणानि युक्तिलेशोक्तिपूर्वकम् ।
केशवो बालबोधाय यथाशास्त्रमवर्णयत् ॥
इति प्रमाणपदार्थः समाप्तः
विषयत्वव्यवस्थातो स्वभावादेव मृष्यताम् ।
व्यर्थमेव तदर्थन्तु ज्ञाततायाः प्रकल्पनम् ॥ १४ ॥
ज्ञातताया अभावे च ज्ञानप्रामाण्ययोर्ग्रहः ।
नार्थापत्त्या, स्वतो नातो, भिन्नोपायैस्तयोर्ग्रहः ॥ १५ ॥
ज्ञाततासत्त्वेऽपि स्वतःप्रामाण्यानुपपत्तिं दर्शयति—
अथापि ज्ञाततासत्त्वे तुल्यसाधनसाध्यता ।
ज्ञानप्रामाण्ययोर्नैव कथञ्चिदुपपद्यते ॥ १६ ॥
ज्ञानन्तु ज्ञाततामात्रग्राह्यं सामान्यतः सदा ।
विशिष्टयेव प्रामाण्यं तत्त्वज्ञानोत्थया पुनः ॥ १७ ॥
भक्षितेऽप्यतो लशुने व्याधिशान्तिर्न दृश्यते ।
कथन्नु पण्डितम्मन्यैः कृतेयं मूढकल्पना ॥ १८ ॥
न ज्ञानं नापि प्रामाण्यमर्थापत्त्या तु गृह्यते ।
किन्तु भिन्नैव सामग्री मता न्याये तयोर्ग्रहे ॥ १९ ॥
नैयायिकाभिमतं परतः प्रामाण्यं सिद्धान्तयति—
अनुव्यवसायरूपं ज्ञानमात्मनि ज्ञानजम् ।
जानाम्यहं घटन्त्वेवं तेन ज्ञानग्रहो मतः ॥ २० ॥
तदुत्तरं प्रवृत्तेस्तु साफल्यादवधारितम् ।
प्रामाण्यमथ वैफल्यादप्रामाण्यं च निश्चितम् ॥ २१ ॥
तस्मान्न्यायस्य सिद्धान्ते स्वतस्त्वं नैव सम्मतम् ।
परत एव प्रामाण्यं तथा प्रामाण्यमेव च ॥ २२ ॥
[ इस ग्रन्थ के लेखक ] केशव [ मित्र ] ने [ इस न्याय ] शास्त्र के अनुसार
थोड़ी सी संक्षिप्त [ युक्त्यन्वित ] युक्तियाँ देते हुए [ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान
और शब्द यह ] चार ही प्रमाण हैं यह बात बालकों के बोध के लिए
वर्णित की है ।
यह प्रमाण पदार्थ [ का निरूपण ] समाप्त हुआ ।

प्रमेयनिरूपणम्
प्रमाणान्युक्तानि, अथ प्रमेयाण्युच्यन्ते ।
'आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम्'
इति सूत्रम् ।
'तत्रात्मत्वसामान्यवानात्मा । स च देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तः, प्रति-
शरीरं भिन्नो नित्यो विभुश्च । स च मानसप्रत्यक्षः । विप्रतिपत्तौ तु
बुद्ध्यादिगुणलिङ्गकः । तथा हि बुद्ध्यादयस्तावद् गुणाः अनित्यत्वे
सत्येकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात् । गुणश्च गुण्याश्रित एव ।
प्रमेय निरूपण
'प्रमाणों' का वर्णन कर चुके । अब 'प्रमेयों' का वर्णन करते हैं ।
१ आत्मा, २ शरीर, ३ इन्द्रिय, ४ अर्थ, ५ बुद्धि, ६ मन, ७ प्रवृत्ति, ८ दोष,
९ प्रेत्यभाव, १० फल, ११ दुःख, और १२ अपवर्ग [ यह बारह ] तो 'प्रमेय' हैं ।
यह [ न्याय दर्शन के प्रथमाध्याय के प्रथम आह्निक का नवां ] सूत्र है ।
[ इस सूत्र में न्याय के अभिमत बारह प्रमेयों का 'उद्देश' अर्थात् नाममात्रेण वस्तु-
सङ्कीर्तन किया गया है । उन के लक्षण और परीक्षा आगे करेंगे ]
उनमें से 'आत्मत्व' सामान्य [ जाति ] जिसमें रहता है वह आत्मा
[ कहलाता ] है । वह देह, इन्द्रिय आदि से पृथक् है । प्रत्येक शरीर में अलग-
अलग, नित्य, और विभु [व्यापक] है । और वह मानस प्रत्यक्ष [ का विषय ] है ।
[ अपना आत्मा मानस प्रत्यक्ष का विषय है । दूसरे में आत्मा है या नहीं इस
प्रकार का ] मतभेद [ अथवा सन्देह ] होने पर बुद्धि आदि गुण-लिङ्गक [ होता ]
है । [ अर्थात् बुद्धि आदि गुण रूप लिङ्ग से अनुमान द्वारा सिद्ध होनेवाला है ] ।
उससे वह [ बुद्धि आदि गुणों द्वारा आत्मा की सिद्धि ] इस प्रकार [ होती ] है ।
सबसे पहिले बुद्धि आदि [ आदि पद से आत्मा में रहने वाले सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष, प्रयत्न आदि अन्य सब गुणों का ग्रहण कर लेना चाहिए ] अनित्य होते हुए
केवल एक इन्द्रिय से ही ग्राह्य होने से 'गुण' हैं। और 'गुण' 'गुणी', के आश्रित
ही रहता है । [ इसलिए बुद्धि आदि 'गुण' जिस 'गुणी' के आश्रित रहते हैं वह
आत्मा है इस बात को आगे 'परिशेष' अनुमान से सिद्ध करेंगे । ]
यहाँ बुद्धि आदि को गुण सिद्ध करने के लिए 'अनित्यत्वे सति एकेन्द्रिय-
मात्रग्राह्यत्वात्' यह हेतु दिया गया है। इसमें इतना लम्बा हेतु का स्वरूप न
रख कर केवल ग्राह्यत्वात् इतना ही हेतु रखा जाता तो अनुमान प्रमाण से ग्राह्य
१ न्यायदर्शन १, १, ९ ।
१० त० भा०

१४६ तर्कभाषा [ आत्मसिद्धिः
परमाणु रूप द्रव्य में भी गुण का लक्षण चला जाता उसके वारण के लिए
'ग्राह्यत्वात्' के साथ इन्द्रिय को जोड़ कर 'इन्द्रियग्राह्यत्वात्' कहा। ऐसा कहने
से परमाणु में अतिव्याप्ति नहीं होती है। क्योंकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं अपितु
अनुमानग्राह्य है। परन्तु यदि 'इन्द्रियग्राह्यत्वात्' इतना ही हेतु गुणत्व की सिद्धि
के लिए दिया जाय तो घट आदि में यह हेतु चला जायगा घटादि भी इन्द्रिय
ग्राह्य हैं। इसलिए उस अतिव्याप्ति के वारण के लिए इन्द्रिय के साथ 'एक'
और 'मात्र' पद को जोड़कर 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' कहा है। घटादि द्रव्य
चक्षु से भी गृहीत होते हैं और चक्षु के बिना टटोल कर स्पर्श के द्वारा त्वगि-
न्द्रिय से भी गृहीत हो सकते हैं। इसलिए वह 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' नहीं अपितु
दो इन्द्रियों से ग्राह्य होने से 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्व' हेतु उनमें नहीं जा सकेगा।
अब यदि केवल 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' को ही गुणत्व का साधन हेतु माना
जाय तो 'सुखत्व' आदि जाति में उसकी अतिव्याप्ति हो जावेगी। जिस इन्द्रिय-
से जो द्रव्य गृहीत होता है उसी इन्द्रिय से तद्गत जाति का भी ग्रहण होता
है इसलिए जैसे सुख-दुःख आदि का ग्रहण मन रूप एक इन्द्रिय से होता है
उसी प्रकार उनमें रहने वाली सुखत्वादि जाति का ग्रहण भी मन रूप एक
इन्द्रिय से ही होता है इसलिए 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' मनरूप केवल एक
ही इन्द्रिय से ग्राह्य होने से सुखत्वादि जाति भी गुण कहलाने लगेगी। इस
अतिव्याप्ति को वारण करने के लिए 'अनित्यत्वे सति' यह विशेषण जोड़ा गया
है। सुखत्वादि जाति 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' होने पर भी अनित्य नहीं अपितु
नित्य है। इसलिए यह हेतु अब उनमें नहीं जा सकता है। इस प्रकार 'अनि-
त्यत्वे सति एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' इस हेतु से बुद्धि आदि गुण हैं यह बात
सिद्ध होती है। और गुण, गुणी के आश्रित ही रहता है। इसलिए बुद्धि आदि
गुणों का आश्रय कोई गुणी अवश्य होना चाहिए। परन्तु आत्मा को छोड़कर
अन्य जो आठ द्रव्य रह जाते हैं वह बुद्धि आदि 'गुणों के आश्रयभूत 'गुणी'
नहीं हो सकते हैं। इसलिए उन आठ द्रव्यों से अतिरिक्त बुद्धि आदि गुणों का
आश्रय नवम द्रव्य मानना होगा। वही 'आत्मा' है इसी बात को 'परिशेष'
अनुमान से आगे सिद्ध करते हैं।
आत्मा को छोड़ कर शेष जो आठ द्रव्य रह जाते हैं उनमें से १-पृथिवी,
२ अप्, ३ तेज, ४ वायु और ५ आकाश यह पांच द्रव्य 'पञ्चभूत' कहलाते हैं।
इन पांचों भूतों के गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द आदि गुणों का प्रत्यक्ष
बाह्य इन्द्रियों में होता है, मन से नहीं। और बुद्धि आदि का प्रत्यक्ष मन से
होता है बाह्येन्द्रियों से नहीं । इस भेद के कारण बुद्धि आदि इन

आत्मानुमानम् ] प्रमेयनिरूपणम् १४७
तत्र बुद्ध्यादयो न गुणा भूतानां मानसप्रत्यक्षत्वात् । ये हि भूतानां
गुणास्ते न मनसा गृह्यन्ते यथा रूपादयः । नापि दिक्कालमनसां गुणा,
विशेषगुणत्वात् । ये हि दिक्कालादिगुणाः संख्यादयो न ते विशेषगुणास्ते
हि सर्वद्रव्यसाधारणगुणा एव । बुद्ध्यादयस्तु विशेषगुणा, गुणत्वे
सत्येकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वाद्, रूपवत् अतो न दिगादिगुणाः ।
पाँच भूतों के गुण नहीं हो सकते हैं । और 'विशेष गुण' होने से बुद्ध्यादि
गुण १ दिक्, २ काल, ३ मन इन तीनों के भी गुण नहीं हो सकते हैं । क्यों-
कि दिक्, काल, और मन इन तीनों में 'सामान्य गुण' रहते हैं 'विशेष गुण'
नहीं । और बुद्धि आदि 'विशेष गुण' हैं इसलिए वह दिक्, काल, और मन के
भी गुण नहीं हो सकते हैं । यही बात कहते हैं ।
उसमें बुद्धि आदि [ गुण ] मानस प्रत्यक्ष [ के विषय ] होने से [ पृथिवी
आदि पांच ] भूतों के गुण नहीं हैं । जो [ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द
यह पाँच ] भूतों के गुण हैं वह मन से गृहीत नहीं होते हैं जैसे रूपादि [ गुण
से मन से प्रत्यक्ष नहीं होते हैं । इसलिए बुद्धि आदि गुण आठ द्रव्यों में से पाँच
भूतों के गुण नहीं हो सकते हैं ] और न दिक्, काल, तथा मन [ इन तीनों ]
के [ गुण हो सकते हैं ] 'विशेष गुण' होने से । जो संख्या आदि दिक्, काल,
आदि के गुण होते हैं वह 'विशेष गुण' नहीं [ किन्तु ] सर्वद्रव्य [ में रहने वाले ]
'साधारण गुण' ही हैं । और बुद्धि आदि तो 'विशेष गुण' हैं [ इसलिए वह
दिक्, काल, और मन इन तीनों के भी गुण नहीं हो सकते हैं । बुद्धि आदि
को 'विशेष' गुण सिद्ध करने के लिए हेतु देते हैं ] रूप के समान केवल एक
इन्द्रिय मात्र से ही ग्राह्य गुण होने से ।
यहां 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' इस हेतु के साथ 'गुणत्वे सति' यह विशेषण
जोड़ कर विशिष्ट को हेतु बनाया है । इस विशेषण रूप 'गुणत्वे सति' को
जोड़ने का अभिप्राय यह है कि 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्व' तो रूपत्व आदि जाति
में भी रहता है । यदि केवल उतना ही हेतु रखा जाय तो 'रूपत्व' आदि जाति
भी विशेष गुण कहलाने लगेगी । अतः उसके वारण के लिए 'गुणत्वे सति'
विशेषण रखा गया है । रूपत्वादि जाति 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' होने पर भी
'गुण' नहीं है अतएव उसमें 'गुणत्वे सति' यह विशेषण अंश न होने से वह
'विशेष गुण' नहीं हो सकती है । किसी किसी संस्करण में 'गुणत्वे सति
एकेन्द्रियग्राह्यत्वात्' यह पाठ है । अर्थात् 'मात्र' पद नहीं रखा गया है । उस
दशा में 'गुणत्वे सति एकेन्द्रियग्राह्यत्वात्' यह विशिष्ट हेतु भी संख्या आदि

१४८ तर्कभाषा [ आत्मानुमानम्
तस्मादेभ्योऽष्टभ्यो व्यतिरिक्तो बुद्ध्यादीनां गुणानामाश्रयो वक्तव्यः
स एवात्मा।
प्रयोगश्च, बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्याश्रिताः, पृथि-
व्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सति गुणत्वात्। यस्तु पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्त-
द्रव्याश्रितो न भवति, नासौ पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्यानाश्रितत्वे
सति गुणोऽपि भवति यथा रूपादिरिति केवलव्यतिरेकी । अन्वयव्यति-
रेकी वा । तथाहि, बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्याश्रिताः पृथि-
व्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सति गुणत्वात् । यो यदनाश्रितो गुणः स तद्व्यति-
रिक्ताश्रितो भवति । यथा पृथिव्याद्यनाश्रितः शब्दः पृथिव्याद्यति-
'सामान्य गुण में' 'अतिव्याप्त' हो जायगा। क्योंकि संख्या गुण भी है और
'एकेन्द्रिय ग्राह्य' भी है। 'मात्र' पद जोड़ देने से वह दोष नहीं रहता है ।
क्योंकि संख्या 'एकेन्द्रियग्राह्य' होनेपर भी 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' नहीं है। क्यों-
कि उसका ग्रहण चक्षु तथा त्वचा दोनों से हो सकता है। इसलिए वह पाठ ठीक
नहीं है। अथवा उस पाठ की व्याख्या मात्रपद का सन्निवेश करके ही करना होगा।
इसलिये इन [ पृथ्वी आदि पञ्चभूत तथा दिक्, काल और मन ] आठ
[ द्रव्यों ] से अतिरिक्त [ किसी नवम द्रव्य को ] बुद्धि आदि गुणों का आश्रय
कहना चाहिए । वही [ नवम द्रव्य ] आत्मा है ।
[ इस का साधक ] प्रयोग [ अनुमान वाक्य ] इस प्रकार है। १-बुद्धि
आदि पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य में आश्रित हैं [ यह प्रतिज्ञा हुई ]
२-पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में अनाश्रित होकर [ गुण ] होने से [ यह हेतु हुआ ] ।
३-जो पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य में आश्रित नहीं होता वह पृथि-
व्यादि आठ द्रव्यों से व्यतिरिक्त द्रव्य में अनाश्रित गुण भी नहीं होता । अपितु
पृथिव्या

विभुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १४६
रिक्ताकाशाश्रय इति। तथा च बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्ताश्रयाः।
तदेवं पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तो नवमं द्रव्यमात्मा सिद्धः। स च
सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः, परममहत्परिमाणवानित्यर्थः। विभुत्वाच्च
नित्योऽसौ व्योमवत्। सुखादीनां वैचित्र्यात् प्रतिशरीरं भिन्नः।
व्याप्ति का उदाहरण पहिले दिखा चुके हैं। इसलिए आत्मा का साधक यह 'अन्वय
व्यतिरेकी' अनुमान वाक्य भी बन सकता है।] इस लिए बुद्धि आदि [गुण]
पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से अतिरिक्त द्रव्य में आश्रित [गुण] हैं।
इस प्रकार पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से अतिरिक्त [बुद्धि आदि गुणों का
आश्रयभूत] नवम द्रव्य 'आत्मा' सिद्ध हो गया। और वह सर्वत्र कार्य [अदृष्टा-
नुरूप फल] की उपलब्धि होने से 'विभु' अर्थात् 'परममहत् परिमाण' वाला है।
और 'विभु' होने से वह आकाश के समान नित्य [भी] है। और [प्रत्येक
व्यक्ति के] सुख आदि के भिन्न होने से प्रत्येक शरीर में [आत्मा भी]
अलग अलग है।
विभुत्ववादी पक्ष—
यहां 'स च सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः, परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' यह
पंक्ति विशेष रूप से समझने योग्य है। यहाँ जिस आत्मा का वर्णन किया जा
रहा है उसके विषय में ही आगे 'सुखादीनां वैचित्र्यात् प्रतिशरीरं भिन्नः' यह
भी लिखा है इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह 'शरीरस्थ आत्मा'
अर्थात् 'जीवात्मा' का ही वर्णन है। और उसको विभु अर्थात् व्यापक या
'परममहत्परिमाणवान्' माना है। 'जीवात्मा' के इस विभुत्व को सिद्ध करने
के लिए सर्वत्र 'कार्योपलम्भ' को हेतु रूप में प्रस्तुत किया है। 'सर्वत्र कार्योप-
लम्भात्' का अभिप्राय यह है कि न्याय सिद्धान्त में जिस वस्तु से जिस व्यक्ति
को किसी प्रकार का भोग प्राप्त होता है उस वस्तु की उत्पत्ति में वस्तु की
उत्पादक अन्य कारण सामग्री के अतिरिक्त उस व्यक्ति का 'अदृष्ट' या धर्म और
अधर्म भी एक कारण होता है। अतएव किसी घट के निर्माण में चक्र, चीवर,
कुलाल, कपाल, आदि अन्य कारण सामग्री के साथ उससे भोग होने वाले
व्यक्ति का 'अदृष्ट' भी उसमें कारण होता है। एक ही कुम्भकार के बनाए और
एक ही 'अवा' में पकाए गए घड़ों में भी परस्पर भेद देखा जाता है। कोई
अधिक पका कोई कम पका होता है। यह जो कार्य में भेद मिलता है इसका
कारण भोक्ताओं का 'अदृष्ट' भेद ही है। एक ही उद्यान में खड़े, एक ही पानी
से सींचे गए, वृक्षों के फलों में भेद होता है। वहां भी भोक्ताओं का 'अदृष्ट'

१५० तर्कभाषा [ मध्यमपक्षः
उस भेद का कारण है। इस प्रकार एक व्यक्ति के जीवन में जिस जिस वस्तु से
भोग प्राप्त होता है वह किन किन स्थानों में विभक्त है इसका परिगणन सम्भव
नहीं है। जहां भी वह पुरुष पहुंच जाय वहीं उसको भोग प्राप्त होगा। इसलिए
उसके भोग की सामग्री सर्वत्र है यही मानना चाहिए। उस स्थान विशेष पर
उस वस्तु की उत्पत्ति में यदि उस व्यक्ति का 'अदृष्ट' कारण है तो यह मानना
चाहिए कि सर्वत्र उस 'अदृष्ट' का सम्बन्ध है। यह तभी हो सकता है जब कि
उस 'अदृष्ट' के अधिकरण 'आत्मा' की सत्ता सर्वत्र मानी जाय। इसीलिए आत्मा
की सर्वत्र सत्ता मानने के लिए उसको 'विभु' या परममहत् परिमाण वाला मानना
आवश्यक है। यही 'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' इस पंक्ति का आशय है।
मध्यमपरिमाणवादी पक्ष—
न्याय आदि अनेक दर्शनों में जीवात्मा को 'विभु' माना गया है और इस
'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' को ही उसके 'विभुत्व' का उपपादक हेतु माना
गया है। परन्तु इसके अतिरिक्त आत्मा को 'मध्यमपरिमाण और 'अणुपरिमाण'
मानने वाले पक्ष भी पाये जाते हैं। जैन विद्वान् आत्मा को 'मध्यम परिमाण'
अथवा 'देहपरिमाण' मानते हैं।
परन्तु 'मध्यम परिमाण' मानने में सबसे प्रमुख दोष यह है कि 'मध्यम
परिमाण' वाले सभी पदार्थ अनित्य होते हैं। 'मध्यम परिमाण' जन्य या
अनित्य पदार्थों में ही रहता है। नित्य पदार्थ या तो 'अणु परिमाण' वाले होते
हैं अथवा 'विभु' अर्थात् 'परममहत्परिमाण' वाले। 'जीवात्मा' के फल भोग
आदि की व्यवस्था उसको नित्य मानने पर ही बन सकती है। इसलिए उसको
नित्य मानना आवश्यक है। और नित्य होने की दशा में दो ही मार्ग हैं या
तो उसे 'अणु परिमाण' माना जाय अथवा 'विभु'। 'मध्यम परिमाण' नहीं
माना जा सकता है। इसलिए 'जीवात्मा' को 'मध्यम परिमाण' अथवा 'देह
परिमाण' वाला मानना उचित नहीं है।
न्याय के अतिरिक्त सांख्य आदि अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा को विभु
माना गया है। विभु मानने का आधार ऊपर दिखाया जा चुका है। 'स च
सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः'। सर्वत्र 'अदृष्टानुरूप फलभोग रूप' 'कार्य' की
उपलब्धि होने से जीवात्मा विभु है। इसके अतिरिक्त अणु पक्ष में एक देश-
स्थित आत्मा से सकल देह व्यापिनी चेष्टा आदि का नियंत्रण नहीं हो
सकता है। इसलिए जीवात्मा को विभु मानना चाहिए यह विभुवादियों का
अभिप्राय है।

अणुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १५१
जीवात्मा के 'विभुत्ववाद' की आलोचना—
परन्तु यह 'विभुत्व पक्ष' भी नितान्त निर्दोष पक्ष नहीं कहा जा सकता
है देहादि के साथ जीवात्मा का सम्बन्ध होना ही जन्म और देहादि से उसका
वियोग होना ही मृत्यु है। जन्म के समय जीवात्मा का शरीर में आना और
मृत्यु के समय जीवात्मा का शरीर को छोड़ जाना यह दोनों बातें उसको
'विभु' मानने में नहीं बन सकती हैं। विभु पदार्थ तो सर्वत्र व्यापक है ।,
उसका आना जाना नहीं बन सकता है। फिर जीवात्मा को भोग तो शरीर
देश में ही होता है। बिना शरीर के अथवा शरीर से बाहर तो किसी प्रकार
का भोग नहीं होता। तब शरीर से बाहर उसको 'विभु' मानने से क्या लाभ।
'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' कह कर जो उसके 'विभुत्व' का उपपादन किया
है सो सुख-दुःख रूप कार्य की सर्वत्र उपलब्धि तो देह के वहां पहुंचने पर
ही होती है देह के पहुंचे बिना नहीं होती। उस दशा में वहां अन्य समय
में भी जीवात्मा रहता है ऐसा मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।
और प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति में भोक्ता के अदृष्ट को कारण मान कर
उस पदार्थ की उत्पत्ति काल में भोक्ता के अदृष्ट का सम्बन्ध हो सके केवल
इस दृष्टि से जीवात्मा को विभु कहा जा सकता है। उसमें भी आपत्ति यह
है कि एक वस्तु से अनेकों व्यक्तियों को भोग होता है उन सबका अदृष्ट
उस वस्तु के निर्माण में कारण होगा तो इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ के अनन्त
कारण मानने होंगे और उससे बड़ा गौरव होगा। इसके अतिरिक्त यह सभी
जीवात्मा एक समान आकार वाले समान परिमाण वाले हैं। उन सबकी
एकत्र स्थिति कैसे हो सकेगी। व्याप्य-व्यापक भाव से तो दो पदार्थ एक
जगह रह सकते हैं। परन्तु व्याप्य-व्यापक भाव के लिए उनमें स्थूल सूक्ष्म का
तारतम्य होना चाहिए जीवात्माओं में परस्पर वैसा तारतम्य नहीं है।
इसलिये समानाकार अनेक जीवात्माओं की एकत्र स्थिति का उपपादन
भी नहीं हो सकता है। यदि आत्मा को विभु मानेंगे तो उसके साथ
अनेकात्मवाद के स्थान पर 'एकात्मवाद' का मानना अधिक सुसङ्गत होगा।
जो कि नैयायिकों को अभीष्ट नहीं है। ऐसी दशा में विभुत्व पक्ष भी सुसङ्गत
प्रतीत नहीं होता।
जीवात्मा का अणुत्ववादी पक्ष—
उस दशा में जीवात्मा के परिमाण के विषय में तीसरा अणुत्व पक्ष शेष
रह जाता है। इस अणुत्व पक्ष में मुख्य दोष यह दिया जाता है कि शरीर के
एक देश में जीवात्मा के स्थित होने पर सारे शरीर की क्रियाओं का नियंत्रण

१५२ तर्कभाषा [अणुत्वपक्षः
और शरीर के भिन्न भिन्न स्थानों में होने वाली वेदनाओं का अनुभव जीवात्मा
को कैसे हो सकेगा । इसका समाधान अधिक कठिन नहीं है शरीर की रचना
में तारयंत्र के समान इस प्रकार की व्यवस्था की हुई है कि किसी भी स्थान
पर हुई क्रिया की सूचना तुरन्त केन्द्रस्थान में पहुँच जाती है और उसकी
प्रतिक्रिया उचित स्थान पर हो जाती है। इसके लिए शरीर में ज्ञानवाही
और क्रियावाही तन्तु माने गए हैं। उनके द्वारा आत्मा को एक देशस्थ मानने
पर भी देहव्यापिनी क्रियाओं के नियंत्रण में कोई बाधा नहीं होती । इसलिए
जीवात्मा को अणु परिमाण मानने में कोई बाधक हेतु प्रतीत नहीं होता है ।
इसके अतिरिक्त जीवात्मा को अणु मानने में जन्म के समय उसके शरीर
के साथ संयोग तथा मृत्यु के समय शरीर से वियोग का उपपादन भी हो
सकता है । जो विभुत्व पक्ष में नहीं बन सकता है । अतएव 'अणुत्व' पक्ष
अधिक युक्तिसङ्गत है । उपनिषदों में जीवात्मा के अणुत्व के प्रतिपादक
अनेक वचन भी मिलते हैं । उनमें कुछ वाक्य यहां दे रहे हैं -
'१एषो अणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' ।
'२अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रोऽयं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः' ।
'३अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः' ।
'तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतमिति' ॥
इन वाक्यों में 'अंगुष्ठमात्रः' शब्द जीवात्मा के अणुत्व का ही सूचक है।
'अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात्' आदि वचनों में अन्यत्र भी आत्मा को
'अंगुष्ठमात्र' कहा गया है। परन्तु यहां अंगुष्ठमात्र पद सूक्ष्मशरीर सहित आत्मा
का ग्राहक है अथवा लक्षणया अणुत्व का बोधक है यही मानना होगा ।
अन्यथा अंगुष्ठमात्रत्व के 'मध्यम' परिमाण में आ जाने से वह 'अंगुष्ठमात्र' भी
अनित्य हो जायगा। कठोपनिषद् के उपर्युक्त वचन में शरीर से उसके
निष्क्रमण का वर्णन बड़े सुन्दर दृष्टान्त से किया गया है 'मुञ्जादिवेषीकां'
जैसे सरकण्डे की मूंज के भीतर से सींक निकल आती है और मूंज ज्यों की
त्यों बनी रहती है। इसी प्रकार 'धैर्येण' धीरे से आत्मा को निकाल लिया
जाता है । यह जो जीवात्मा का देह में प्रवेश और देह से निर्गम है वह
अणुत्व पक्ष के अतिरिक्त अन्य पक्षों में नहीं बनता है। इसलिए जीवात्मा को
अणु ही मानना युक्तिसङ्गत है।
आत्मा का स्थान -
अणु होने की अवस्था में शरीर में आत्मा का स्थान कौन सा माना जाय
१ मुण्डक ३, ९ । २ मुण्डक ३, ५ । ३ कठ० २, १७ ।

अणुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १५३
यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसका उत्तर उपयुक्त कठोपनिषद् के वाक्य में ही
मिल जाता है। 'सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः' कह कर कठोपनिषद् ने हृदय
को ही उसका स्थान माना है। भारतीय विचार धारा के अनुसार हृदय ही
आत्मा का स्थान है। इसीलिए हृदय शब्द की 'हृदि अयम् हृदयम्' यही
निरुक्ति की गई है। 'तस्य एतदेव निरुक्तं हृदि अयं हृदयमिति' । यूनानी
दार्शनिकों में 'अरस्तू' [३८४ से ३२२ ई० पूर्व] हृदय को ही ज्ञान और आत्मा
का केन्द्र मानता था। सत्रहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक 'डेकार्टे'
[ १५९६ से १६५० ] ने हृदय के स्थान पर मस्तिष्क की नलिका में स्थित
'पीनियल' नामक ग्रन्थि को ज्ञान अथवा आत्मा का केन्द्र माना है।
हमने अपने 'दर्शनमीमांसा' ग्रन्थ में इस सब विषय को इस प्रकार लिखा है—
जीवात्मानं निरूपयति—
तत्रात्मा चेतनो नित्यो, ज्ञानादीनां समाश्रयः ।
समाहितैकधीगम्यो, स्वगुणानुमितोऽथवा ॥ १ ॥
न्यायसूत्रेषु प्राधान्याज्जीवात्मैव निरूपितः ।
परं शास्त्रेषु जीवात्मा, परमात्मा चेति स द्विधा ॥ २ ॥
मध्यमपरिमाणवादं निराकरोति—
विभुर्न्यायादिसिद्धान्ते, जीवोऽणुर्वैदिके नये ।
देहमात्रपरिच्छिन्नो मध्यमो जिनसम्मतः ॥ ३ ॥
जीव एव शरीरस्थश्चेष्टते सर्वदेहगः ।
शरीरव्यापिनीः सर्वाः स च गृह्णाति वेदनाः ॥ ४ ॥
देहाकारस्ततो जीवो जिनशास्त्रेषु सम्मतः ।
अनित्यत्वप्रसङ्गात्तु मतमेतन्न सङ्गतम् ॥ ५ ॥
अनित्यास्तु मताः सर्वे मध्याकारा घटादयः ।
अनित्यो मध्यमो जीवो, नित्योऽणुर्विभुरेव वा ॥ ६ ॥
विभुत्ववादमालोचयति—
अणुर्नानुभवेत् सर्वं, सर्वदेहं न चालयेत् ।
तस्मान्न्यायादिसिद्धान्ते सम्मतो विभुरेव सः ॥ ७ ॥
परं विभुत्व-पक्षोऽयं बहुदोषसमाकुलः ।
न सामान्येन सौकर्यात् स्वीकर्तुं तत्त शक्यते ॥ ८ ॥
१ दर्शन मीमांसा ५।

१५४ तर्कभाषा [ अणुत्वपक्षः
¹विभुर्यदि भवेज्जीवो बहिर्देहाद् विनिःसृतः ।
सर्वस्त्वनुभवो देहे बहिष्ट्वे किं प्रयोजनम् ॥ ९ ॥
विभोश्च सर्वव्यापित्वान्न गतागतिसम्भवः ।
जीवस्यातो विभुत्वे हि, न स्यादस्य गतागतिः ॥ १० ॥
जन्म देहादिभिर्योगो वियोगो मृत्युरेव च ।
विभोर्जन्म च मृत्युश्च गत्यभावान्न सम्भवेत् ॥ ११ ॥
विभोर्देहादिभिर्योगो जीवस्य सुस्थिरः सदा ।
जन्ममृत्यु-व्यवस्थायै कल्प्यं हेत्वन्तरं भवेत् ॥ १२ ॥
विभुत्वे तुल्यरूपत्वं बहुत्वं चापि सम्मतम् ।
बहूनां तुल्यरूपाणां कथमेकत्र संस्थितिः ॥ १३ ॥
अणुत्वपक्षं सिद्धान्तयति—
तस्मादणुर्मतो जीवो नित्योऽनेकः समः सदा ।
एकदेशस्थितो देहे सर्वं वेत्तुं च स क्षमः ॥ १४ ॥
यांत्रिकी रचना देहे तादृशी प्रभुणा कृता ।
स क्षमः सर्वविज्ञाने हृद्देशेऽपि स्थितो यथा ॥ १५ ॥
हृद्देशे सुस्थितो जीव ईशश्चात्र प्रतिष्ठितः ।
तस्मादत्रैव संप्रोक्तः साक्षात्कारोऽनयोः सदा ॥ १६ ॥
ईश्वर की चर्चा—
आत्मा के साथ 'ईश्वर' का विवेचन दर्शनों का मुख्य विषय होना चाहिए
था । परन्तु प्रायः प्रमाणों के विवेचन के प्रपञ्च में फँस कर दर्शनों ने मुख्य
प्रमेय परमात्मा के निरूपण में बहुत उदासीनता से काम लिया है । यहां भी
तर्कभाषाकार ने ईश्वर के विषय में कुछ भी नहीं लिखा है । तत्त्वदृष्टि से देखा
जाय तो प्रमाणों के विषय में इतना विस्तार न करके यदि सबसे मुख्य प्रमेय
ईश्वर के विवेचन में अधिक से अधिक भाग का उपयोग होता तो वह अधिक
उपयुक्त होता । परन्तु जान पड़ता है कि इन ग्रन्थकारों ने 'साधन' भूत प्रमाणों
को ही सब कुछ समझ कर उनको ही 'साध्य' जैसी प्रधानता दे दी है । और
मुख्य प्रमेय ईश्वर की नितान्त उपेक्षा कर दी है । यह दर्शनशास्त्र के गौरव को
कम करनेवाली स्थिति है । तर्कभाषा की इस कमी को पूरा करने के लिए हम
अपने लिखे 'न्यायकुसुमाञ्जलिपरिशिष्ट' में से कुछ कारिकाएं जिन में ईश्वर-
विषयक चर्चा की गई है यहां उद्धृत कर रहे हैं ।
१ दर्शनमीमांसा ५ ।

ईश्वरमीमांसा ] प्रमेयनिरूपणम् १५५
¹प्रमाणविषयीभूतं, यावज्ज्ञानस्य गोचरम् ।
प्रमेयं तद्धि विज्ञेयं, संविभक्तं द्विधा स्थितम् ॥ १ ॥
दृश्यं तत्र प्रकृत्याख्यं, जगदेतज्जडात्मकम् ।
चेतनं सर्वमात्माख्यं, द्विधा जीवेशरूपतः ॥ २ ॥
तदेतत् त्रितयं नित्यं, मिथो भिन्नं स्वरूपतः ।
तत्त्वं 'सौपर्णदृष्टान्ते' वेदे विस्पष्टमीरितम् ॥ ३ ॥
'ऋग्वेद' में एक मन्त्र आया है जो इस प्रकार है—
²द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥
इस मन्त्र का भावार्थ यह है कि मित्र रूप और साथ रहने वाले दो पक्षी
एक समान वृक्ष पर बैठे हुए हैं उनमें से एक उस वृक्ष के स्वादु फलों का
भक्षण करता है और दूसरा न खाता हुआ शोभित हो रहा है । इस मन्त्र में
अलङ्कार रूप से 'प्रकृति' रूप 'वृक्ष' के ऊपर बैठे हुए 'जीव' तथा 'ईश्वर'
रूप दो 'पक्षियों' का वर्णन है । जिनमें से एक अर्थात् 'जीवात्मा' उस 'प्रकृति'
रूप वृक्ष के फलों को भोगता है और दूसरा उस का भोग नहीं करता है ।
यह प्रतिपादन किया गया है । इसी 'द्वा सुपर्णा' वाले दृष्टान्त को ऊपर की
कारिका में 'सौपर्ण दृष्टान्त' कहा है । इस मन्त्र से 'सौपर्ण दृष्टान्त' के द्वारा
ईश्वर, जीव तथा प्रकृति इन तीनों तत्त्वों की नित्य सत्ता सिद्ध होती है ।
न्यायशास्त्र भी इन तीनों की नित्य सत्ता मानता है । ईश्वर नित्य है और
वह जगत् का निमित्त कारण है । प्रकृति भी नित्य है और वह जगत् का
उपादान कारण है । जीवात्मा भी नित्य है उसी के भोगापवर्ग सम्पादन के
लिए ईश्वर, प्रकृति रूप उपादान कारण से घटादि के समान सृष्टि का निर्माण
करता है । 'क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्' इत्यादि रूप में ईश्वर सिद्धि
के लिए जिन अनुमानों का प्रयोग नैयायिक आदि करते हैं उनका यही
अभिप्राय है ।
परमात्मानं निरूपयति—
³परमात्मा जगत्स्रष्टा, सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।
सच्चिदानन्दरूपश्च, ह्येको नित्यो विभुस्तथा ॥ ४ ॥
निमित्तमात्रं सर्गेऽसौ, जीवाच्च प्रकृतेः पृथक् ।
प्रणवादिपदैर्वाच्यस्तथा वेदप्रकाशकः ॥ ५ ॥
१ न्यायकुसुमाञ्जलि परिशिष्ट । २ ऋग्वेद १, १६४, २० । तथा मुण्डक ३, १ ।

१५६ तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
तदस्तित्वे च तद्रूपे विवादो बहु दृश्यते ।
दर्शनानां च धर्माणां भेदस्तन्मूलको मतः ॥ ६ ॥
'जडाद्वैतं' निराकरोति—
१बृहस्पतिसमाः प्रज्ञा नव्याश्च स्पेन्सरादयः ।
जडाद्वैतपरा नून-मात्ममात्रापलापकाः ॥ ७ ॥
पञ्चभूतानि तत्त्वानि, यद्वा भूतचतुष्टयम् ।
जडाऽजडात्मकं तेभ्यो जगत्सर्वं प्रवर्तते ॥ ८ ॥
जडाद्वैतपरा ये तु, चेतनाद्वैतिनश्च ये ।
अगृहीतार्थतत्त्वौ तु, समावेताववैदिकौ ॥ ९ ॥
जडं वा चेतनं तत्त्वमेकमेव भवेद् यदि ।
कथञ्चामावकल्पेत, दृश्यमाना भिदानयोः ॥ १० ॥
स्वभाववादं निराकरोति—
लोकायताश्च बौद्धाश्च, तथा चान्येऽपि नास्तिकाः ।
सर्गं स्वाभाविकं मत्वा, प्रतिषेधन्ति चेश्वरम् ॥ ११ ॥
सर्गस्याकस्मिकत्वे तु, तद्विनाशो न सम्भवी ।
हेतोर्नाशात्तु कार्याणां, विनाशोऽप्युपपद्यते ॥ १२ ॥
नियतावधिकार्याणां, दर्शनाच्छुतिबोधितः ।
कार्यकारणभावोऽयं, स्वीकर्तव्यस्त्वकामतः ॥ १३ ॥
मनसाप्यचिन्त्यरूपस्य, सूक्ष्मस्य जगतो ध्रुवम् ।
उत्पत्तिश्च व्यवस्था च सर्वज्ञादेव सम्भवेत् ॥ १४ ॥
बुद्धयपेक्षा व्यवस्थाऽस्य, रचना च सुदुष्करा ।
चेतनापेक्षिणी नित्यं, जडाद्वैते न कल्पते ॥ १५ ॥
अग्निरुष्णो जलं शीतं, सर्गमेवं निदर्शनात् ।
यस्तु स्वाभाविकं ब्रूते, नासौ न्यायेन सङ्गतः ॥ १६ ॥
स्वाभाविकेऽपि सामर्थ्ये, चेष्टिकादौ विशेषतः ।
न भवनादिनिर्माणं, दृष्टं चेतनमन्तरा ॥ १७ ॥
एवं प्रकृतिसामर्थ्य-मात्रान्न सर्गसम्भवः ।
नापि युक्ता व्यवस्थाऽस्य, सम्भवेच्चेतनं विना ॥ १८ ॥
यतः सर्गो व्यवस्था च, नियन्तारमपेक्षते ।
तस्मान्नैव जडाद्वैत-पक्षो युक्तियुतो भवेत् ॥ १९ ॥
१ न्यायकुसुमाञ्जलि परिशिष्ट क ।

ईश्वरमीमांसा ] प्रमेयनिरूपणम् १५७
'चेतनाद्वैतवादं' निराकरोति
लोके बहुतरं तत्त्वं, जडमत्रानुभूयत ।
चेतनाद्वैतपक्षे तु, तत्सर्वं नावकल्पते ॥ २० ॥
कूटस्थं चेतनं ब्रह्म, कथन्नाम जडीभवेत् ।
तदभावे कथं लोके, पृथिव्याद्युपलभ्यते ॥ २१ ॥
इदं दृश्यमयं द्रष्टा, चेतनोऽयं जडं स्विदम् ।
कथं स्याच्चेतनाद्वैते, भेदोऽयं सर्वसाक्षिकः ॥ २२ ॥
अतो नव्याश्च प्रज्ञाश्च, चेतनाद्वैतवादिनः ।
प्रत्यात्मानुभवाद्भिन्नं, विश्वं मिथ्येति चक्षते ॥ २३ ॥
रज्जौ सर्पादि विभ्रान्ति-स्तथा स्वप्नादिप्रत्ययः ।
बाध्यतेऽतो मतो मिथ्या, न चेदं बाध्यते जगत् ॥ २४ ॥
अबाध्यतेऽपि मिथ्येति, वचो साहसमात्रकम् ।
चेतनाद्वैतपक्षोऽयं, तस्मान्नैवोपपद्यते ॥ २५ ॥
अस्मिन् पक्षे तु संदृष्टा, सर्वं मिथ्येति कल्पना ।
लोकानुभवविरोधात्, सैव मिथ्येति निश्चयः ॥ २६ ॥
अथवाङ्गीकृतेऽद्वैतेऽनुपपत्तेस्तु लाघवात् ।
चेतनाद्वैततो नूनं जडाद्वैतस्य साधुता ॥ २७ ॥
चेतनाऽद्वैतविज्ञानाद्वैतयोः साहश्यं दर्शयति—
विज्ञानं तु निराचष्टे शङ्करो दृढयुक्तिभिः ।
योगक्षेमे समं ब्रह्म-वादमातिष्ठते पुनः ॥ २८ ॥
स्वप्नवत् कल्पिता अर्था, मता विज्ञानिनां यथा ।
सांवृताः शाङ्करेऽप्येवं स्वप्नवत् परिकल्पिताः ॥ २९ ॥
विज्ञानाद्वैतवादश्चेद्, युक्तिभिर्नोपपद्यते ।
नतरां तस्य युक्तः स्याद्, ब्रह्मवादोऽपि तादृशः ॥ ३० ॥
नास्तिकास्तु जडाद्वैतं, चेतनाद्वैतमास्तिकाः ।
मन्वते इति भेदोऽपि, वस्तुतो नोपपद्यते ॥ ३१ ॥
समावनीश्वरौ वादावुभावेताववैदिकौ ।
दुर्बलश्चेतनाद्वैतः, प्रत्यक्षादिविरोधतः ॥ ३२ ॥
अभिन्ननिमित्तोपादानसिद्धान्तं निराकरोति—
ब्रह्मोपादानकञ्चैव, जगद् ब्रह्मनिमित्तकम् ।
लूतानिदर्शनाद् घोषः, सदोषोऽद्वैतवादिनाम् ॥ ३३ ॥

१५८ तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
लूतातन्तूपादानं, शरीरं तद्ध्यचेतनम् ।
चेतनं च निमित्तं स्या-न्नाभिन्नमुभयं ततः ॥ ३४ ॥
जडचेतनसंभिन्ना, लूतैकाभिमता यदि ।
जडाऽजडात्मकं तर्हि, किन्नु ब्रह्मापि कल्प्यते ॥ ३५ ॥
जडाऽजडं विरुद्धं तु, रूपमेकत्र पश्यता ।
सामानाधिकरण्यं हि, तेजस्तिमिरयोः कृतम् ॥ ३६ ॥
किन्ते प्रयोजनं सिद्ध्येत्, कुर्वतः क्लिष्टकल्पनाम् ।
जडाऽजडात्मकं तत्त्वं भिन्नमास्थीयतामतः ॥ ३७ ॥
लूतातन्तुदृष्टान्तं सङ्गमयति—
जगतः सृजने चैव, पालने चाथ नाशने ।
निमित्तत्वं प्रभोः प्रोक्तं, नोभयत्वं निदर्शने ॥ ३८ ॥
स्वदेहसुलभं तत्त्वमुपादाय जडं यथा ।
‘सृजते गृह्णते’ तन्तुं, लूता काले यथोचितम् ॥ ३९ ॥
एवं प्रकृतिमादाय, विश्वं निर्माति चेश्वरः ।
क्षिणोति च स्वयं काले, सोऽयमर्थो निदर्शने ॥ ४० ॥
नैवाभिन्ननिमित्तोपा-दानकत्वमुदीरितम् ।
जडाऽजडं विरुद्धं नो ततो ब्रह्म प्रकल्प्यताम् ॥ ४१ ॥
मृत्पिण्डदृष्टान्तं सङ्गमयति—
यत्र च ब्रह्मणो ज्ञानात्, सर्वज्ञानं प्रतिश्रुतम् ।
यथा मृत्पिण्डविज्ञानात्, ज्ञातं सर्वन्तु मृण्मयम् ॥ ४२ ॥
एवंविधे तु दृष्टान्ते, विकारार्थे मयट् श्रुतः ।
तदर्थः प्रकृतेर्ज्ञानाद्, विकारो ज्ञायतेऽखिलः ॥ ४३ ॥
एवञ्चेद् ब्रह्मणो ज्ञानात्, सर्वज्ञानमभीप्सितम् ।
विकृतं वै भवेद् ब्रह्म, कूटस्थं नोपपद्यते ॥ ४४ ॥
किञ्च ज्ञातेऽप्युपादाने, लौहे चाथ मृदादिके ।
तद्विकारास्तु दुर्ज्ञेया, यन्त्रदेहादयो मताः ॥ ४५ ॥
ब्रह्मज्ञानेऽपि न ज्ञातं विश्वनिर्माणकौशलम् ।
तत एषा प्रतिज्ञा तु हीयते लोकदर्शनात् ॥ ४६ ॥
किञ्च दृष्टान्तसामर्थ्यात्, प्रकृतित्वं समर्थितम् ।
न निमित्तमतो ब्रह्म, जडं स्यान्नोभयात्मकम् ॥ ४७ ॥
नवीनवेदान्तस्य अवैदिकत्वं दर्शयति—
नोपादानमतो ब्रह्म निमित्तं केवलन्तु तत् ।

jagat?
Wait, look at line 6:
तत्त्वं ब्रह्मैव जीवेशौ तद्विवर्तौ जगत् तथा ॥ ५० ॥
तद्विवर्तौ: त द्वि व र्तौ (ta-dvi-var-tau).
जगत् तथा ॥ ५० ॥
Line 7:
प्रकृतिर्भावभूताऽपि, 'माया' शब्दात्तथोदिता ।
Look at 'माया': it has single quotes: 'माया'.
Line 8:
स्वप्नवच्च निरालम्बा सर्वा सर्गस्थितिर्मता ॥ ५१ ॥
Line 9:
एषां नैकोऽपि सिद्धान्तो, वास्तवो वैदिकोऽथवा ।
Line 10:
सा सर्वा शाङ्करी माया, तत्त्वदृष्टिं व्यपोहति ॥ ५२ ॥
Wait, is it "शाङ्करी"?
श ा ङ्क री -> yes, ङ्क.
Line 11:
अबाध्यं लोकप्रत्यक्षं, यच्च वेदोदितं ध्रुवम् ।
Line 12:
तन्मिथ्याऽगोचरं बुद्धेः, कल्पनाप्रभवं च सत् ॥ ५३ ॥
Wait, after बुद्धेः is there a comma?
बुद्धेः, -> yes, visarga followed by comma.
Line 13:
तथ्यं वित

१६० तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
वेदेऽप्यपौरुषेयेऽतो, स्वतः प्रामाण्यसम्भवात् ।
नेश्वरापेक्षि प्रामाण्यं, ततो नासौ प्रकल्प्यताम् ॥ ६३ ॥
कश्चिन्मीमांसकम्मन्य-स्तर्काभाससमाश्रयः ।
वेदानुगोऽपि वै चित्रं, प्रत्याचष्टे परेश्वरम् ॥ ६४ ॥
नासदीये तु ऋक्सूक्ते, लयावस्था प्रदर्शिता ।
अभिध्यानात्तथेशस्य, सर्गोत्पत्तिश्च वर्णिता ॥ ६५ ॥
आविर्भावश्च वेदानां, परेशाद् दर्शितो मुहुः ।
स्फुटं पुरुषसूक्ते च, ततो नापौरुषेयता ॥ ६६ ॥
ततश्चापौरुषेयत्व-नित्यत्वे वेदसर्गयोः ।
न वेदे सम्मते क्वापि, ध्रुवं तेऽवैदिके ततः ॥ ६७ ॥
ज्ञानं गुणो गुणी चेशो, वेदो नूनं तदाश्रयः ।
सर्वविद्यामयो ज्ञेयो, न कर्मैकपरो मतः ॥ ६८ ॥
वैदिकेनाप्यनेनैवं, दर्शिता वेदबाह्यता ।
मूर्खमित्रादतः श्रेष्ठो विद्वान् शत्रुः प्रकीर्तितः ॥ ६९ ॥
ईश्वरस्य स्वरूपं दर्शयति—
ईश्वरोऽयं निराकारः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।
अनादिरविकारी चा-नन्तः सर्वगतो विभुः ॥ ७० ॥
सच्चिदानन्दरूपोऽपि, दयालुर्न्यायतत्परः ।
सर्गे स्थितौ लये हेतुः नित्यतृप्तो निराशयः ॥ ७१ ॥
सृष्टिकर्तृत्वे सांख्यस्य पूर्वपक्षः—
प्रेक्षावतां प्रवृत्तिस्तु स्वार्थात् कारुण्यतोऽथवा ।
व्याप्ता संदृश्यते लोके, न स्तः सर्गक्रमे च ते ॥ ७२ ॥
स्वार्थमूला प्रवृत्तिश्चे-न्नित्यतृप्तः कथं प्रभुः ।
सर्गोद्भवञ्च कारुण्यं, कथं सर्गे प्रवर्त्तयेत् ॥ ७३ ॥
ततः सर्गक्रमो नैव, प्रेक्षावद्वृत्तिमूलकः ।
प्रकृत्यैव कृतो नूनमिति सांख्यनयो मतः ॥ ७४ ॥
तस्य निराकरणम्—
परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यमन्तराऽपि तद् ।
स्वार्थहीनाः प्रवर्त्तन्ते, स्वकर्तव्यपरायणाः ॥ ७५ ॥
‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि’, घोषोऽयं वैदिकस्तु नः ।
स्वार्थकारुण्यहीनां वै ब्रूते कर्तव्यभावनाम् ॥ ७६ ॥