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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 330 में से

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पृष्ठ 220

ईश्वरमीमांसा ] प्रमेयनिरूपणम् १५५
¹प्रमाणविषयीभूतं, यावज्ज्ञानस्य गोचरम् ।
प्रमेयं तद्धि विज्ञेयं, संविभक्तं द्विधा स्थितम् ॥ १ ॥
दृश्यं तत्र प्रकृत्याख्यं, जगदेतज्जडात्मकम् ।
चेतनं सर्वमात्माख्यं, द्विधा जीवेशरूपतः ॥ २ ॥
तदेतत् त्रितयं नित्यं, मिथो भिन्नं स्वरूपतः ।
तत्त्वं 'सौपर्णदृष्टान्ते' वेदे विस्पष्टमीरितम् ॥ ३ ॥
'ऋग्वेद' में एक मन्त्र आया है जो इस प्रकार है—
²द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥
इस मन्त्र का भावार्थ यह है कि मित्र रूप और साथ रहने वाले दो पक्षी
एक समान वृक्ष पर बैठे हुए हैं उनमें से एक उस वृक्ष के स्वादु फलों का
भक्षण करता है और दूसरा न खाता हुआ शोभित हो रहा है । इस मन्त्र में
अलङ्कार रूप से 'प्रकृति' रूप 'वृक्ष' के ऊपर बैठे हुए 'जीव' तथा 'ईश्वर'
रूप दो 'पक्षियों' का वर्णन है । जिनमें से एक अर्थात् 'जीवात्मा' उस 'प्रकृति'
रूप वृक्ष के फलों को भोगता है और दूसरा उस का भोग नहीं करता है ।
यह प्रतिपादन किया गया है । इसी 'द्वा सुपर्णा' वाले दृष्टान्त को ऊपर की
कारिका में 'सौपर्ण दृष्टान्त' कहा है । इस मन्त्र से 'सौपर्ण दृष्टान्त' के द्वारा
ईश्वर, जीव तथा प्रकृति इन तीनों तत्त्वों की नित्य सत्ता सिद्ध होती है ।
न्यायशास्त्र भी इन तीनों की नित्य सत्ता मानता है । ईश्वर नित्य है और
वह जगत् का निमित्त कारण है । प्रकृति भी नित्य है और वह जगत् का
उपादान कारण है । जीवात्मा भी नित्य है उसी के भोगापवर्ग सम्पादन के
लिए ईश्वर, प्रकृति रूप उपादान कारण से घटादि के समान सृष्टि का निर्माण
करता है । 'क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्' इत्यादि रूप में ईश्वर सिद्धि
के लिए जिन अनुमानों का प्रयोग नैयायिक आदि करते हैं उनका यही
अभिप्राय है ।
परमात्मानं निरूपयति—
³परमात्मा जगत्स्रष्टा, सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।
सच्चिदानन्दरूपश्च, ह्येको नित्यो विभुस्तथा ॥ ४ ॥
निमित्तमात्रं सर्गेऽसौ, जीवाच्च प्रकृतेः पृथक् ।
प्रणवादिपदैर्वाच्यस्तथा वेदप्रकाशकः ॥ ५ ॥
१ न्यायकुसुमाञ्जलि परिशिष्ट । २ ऋग्वेद १, १६४, २० । तथा मुण्डक ३, १ ।