तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअणुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १५१
जीवात्मा के 'विभुत्ववाद' की आलोचना—
परन्तु यह 'विभुत्व पक्ष' भी नितान्त निर्दोष पक्ष नहीं कहा जा सकता
है देहादि के साथ जीवात्मा का सम्बन्ध होना ही जन्म और देहादि से उसका
वियोग होना ही मृत्यु है। जन्म के समय जीवात्मा का शरीर में आना और
मृत्यु के समय जीवात्मा का शरीर को छोड़ जाना यह दोनों बातें उसको
'विभु' मानने में नहीं बन सकती हैं। विभु पदार्थ तो सर्वत्र व्यापक है ।,
उसका आना जाना नहीं बन सकता है। फिर जीवात्मा को भोग तो शरीर
देश में ही होता है। बिना शरीर के अथवा शरीर से बाहर तो किसी प्रकार
का भोग नहीं होता। तब शरीर से बाहर उसको 'विभु' मानने से क्या लाभ।
'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' कह कर जो उसके 'विभुत्व' का उपपादन किया
है सो सुख-दुःख रूप कार्य की सर्वत्र उपलब्धि तो देह के वहां पहुंचने पर
ही होती है देह के पहुंचे बिना नहीं होती। उस दशा में वहां अन्य समय
में भी जीवात्मा रहता है ऐसा मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।
और प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति में भोक्ता के अदृष्ट को कारण मान कर
उस पदार्थ की उत्पत्ति काल में भोक्ता के अदृष्ट का सम्बन्ध हो सके केवल
इस दृष्टि से जीवात्मा को विभु कहा जा सकता है। उसमें भी आपत्ति यह
है कि एक वस्तु से अनेकों व्यक्तियों को भोग होता है उन सबका अदृष्ट
उस वस्तु के निर्माण में कारण होगा तो इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ के अनन्त
कारण मानने होंगे और उससे बड़ा गौरव होगा। इसके अतिरिक्त यह सभी
जीवात्मा एक समान आकार वाले समान परिमाण वाले हैं। उन सबकी
एकत्र स्थिति कैसे हो सकेगी। व्याप्य-व्यापक भाव से तो दो पदार्थ एक
जगह रह सकते हैं। परन्तु व्याप्य-व्यापक भाव के लिए उनमें स्थूल सूक्ष्म का
तारतम्य होना चाहिए जीवात्माओं में परस्पर वैसा तारतम्य नहीं है।
इसलिये समानाकार अनेक जीवात्माओं की एकत्र स्थिति का उपपादन
भी नहीं हो सकता है। यदि आत्मा को विभु मानेंगे तो उसके साथ
अनेकात्मवाद के स्थान पर 'एकात्मवाद' का मानना अधिक सुसङ्गत होगा।
जो कि नैयायिकों को अभीष्ट नहीं है। ऐसी दशा में विभुत्व पक्ष भी सुसङ्गत
प्रतीत नहीं होता।
जीवात्मा का अणुत्ववादी पक्ष—
उस दशा में जीवात्मा के परिमाण के विषय में तीसरा अणुत्व पक्ष शेष
रह जाता है। इस अणुत्व पक्ष में मुख्य दोष यह दिया जाता है कि शरीर के
एक देश में जीवात्मा के स्थित होने पर सारे शरीर की क्रियाओं का नियंत्रण