तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ तर्कभाषा [ अणुत्वपक्षः
¹विभुर्यदि भवेज्जीवो बहिर्देहाद् विनिःसृतः ।
सर्वस्त्वनुभवो देहे बहिष्ट्वे किं प्रयोजनम् ॥ ९ ॥
विभोश्च सर्वव्यापित्वान्न गतागतिसम्भवः ।
जीवस्यातो विभुत्वे हि, न स्यादस्य गतागतिः ॥ १० ॥
जन्म देहादिभिर्योगो वियोगो मृत्युरेव च ।
विभोर्जन्म च मृत्युश्च गत्यभावान्न सम्भवेत् ॥ ११ ॥
विभोर्देहादिभिर्योगो जीवस्य सुस्थिरः सदा ।
जन्ममृत्यु-व्यवस्थायै कल्प्यं हेत्वन्तरं भवेत् ॥ १२ ॥
विभुत्वे तुल्यरूपत्वं बहुत्वं चापि सम्मतम् ।
बहूनां तुल्यरूपाणां कथमेकत्र संस्थितिः ॥ १३ ॥
अणुत्वपक्षं सिद्धान्तयति—
तस्मादणुर्मतो जीवो नित्योऽनेकः समः सदा ।
एकदेशस्थितो देहे सर्वं वेत्तुं च स क्षमः ॥ १४ ॥
यांत्रिकी रचना देहे तादृशी प्रभुणा कृता ।
स क्षमः सर्वविज्ञाने हृद्देशेऽपि स्थितो यथा ॥ १५ ॥
हृद्देशे सुस्थितो जीव ईशश्चात्र प्रतिष्ठितः ।
तस्मादत्रैव संप्रोक्तः साक्षात्कारोऽनयोः सदा ॥ १६ ॥
ईश्वर की चर्चा—
आत्मा के साथ 'ईश्वर' का विवेचन दर्शनों का मुख्य विषय होना चाहिए
था । परन्तु प्रायः प्रमाणों के विवेचन के प्रपञ्च में फँस कर दर्शनों ने मुख्य
प्रमेय परमात्मा के निरूपण में बहुत उदासीनता से काम लिया है । यहां भी
तर्कभाषाकार ने ईश्वर के विषय में कुछ भी नहीं लिखा है । तत्त्वदृष्टि से देखा
जाय तो प्रमाणों के विषय में इतना विस्तार न करके यदि सबसे मुख्य प्रमेय
ईश्वर के विवेचन में अधिक से अधिक भाग का उपयोग होता तो वह अधिक
उपयुक्त होता । परन्तु जान पड़ता है कि इन ग्रन्थकारों ने 'साधन' भूत प्रमाणों
को ही सब कुछ समझ कर उनको ही 'साध्य' जैसी प्रधानता दे दी है । और
मुख्य प्रमेय ईश्वर की नितान्त उपेक्षा कर दी है । यह दर्शनशास्त्र के गौरव को
कम करनेवाली स्थिति है । तर्कभाषा की इस कमी को पूरा करने के लिए हम
अपने लिखे 'न्यायकुसुमाञ्जलिपरिशिष्ट' में से कुछ कारिकाएं जिन में ईश्वर-
विषयक चर्चा की गई है यहां उद्धृत कर रहे हैं ।
१ दर्शनमीमांसा ५ ।