तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ तर्कभाषा [ आत्मसिद्धिः
परमाणु रूप द्रव्य में भी गुण का लक्षण चला जाता उसके वारण के लिए
'ग्राह्यत्वात्' के साथ इन्द्रिय को जोड़ कर 'इन्द्रियग्राह्यत्वात्' कहा। ऐसा कहने
से परमाणु में अतिव्याप्ति नहीं होती है। क्योंकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं अपितु
अनुमानग्राह्य है। परन्तु यदि 'इन्द्रियग्राह्यत्वात्' इतना ही हेतु गुणत्व की सिद्धि
के लिए दिया जाय तो घट आदि में यह हेतु चला जायगा घटादि भी इन्द्रिय
ग्राह्य हैं। इसलिए उस अतिव्याप्ति के वारण के लिए इन्द्रिय के साथ 'एक'
और 'मात्र' पद को जोड़कर 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' कहा है। घटादि द्रव्य
चक्षु से भी गृहीत होते हैं और चक्षु के बिना टटोल कर स्पर्श के द्वारा त्वगि-
न्द्रिय से भी गृहीत हो सकते हैं। इसलिए वह 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' नहीं अपितु
दो इन्द्रियों से ग्राह्य होने से 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्व' हेतु उनमें नहीं जा सकेगा।
अब यदि केवल 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' को ही गुणत्व का साधन हेतु माना
जाय तो 'सुखत्व' आदि जाति में उसकी अतिव्याप्ति हो जावेगी। जिस इन्द्रिय-
से जो द्रव्य गृहीत होता है उसी इन्द्रिय से तद्गत जाति का भी ग्रहण होता
है इसलिए जैसे सुख-दुःख आदि का ग्रहण मन रूप एक इन्द्रिय से होता है
उसी प्रकार उनमें रहने वाली सुखत्वादि जाति का ग्रहण भी मन रूप एक
इन्द्रिय से ही होता है इसलिए 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' मनरूप केवल एक
ही इन्द्रिय से ग्राह्य होने से सुखत्वादि जाति भी गुण कहलाने लगेगी। इस
अतिव्याप्ति को वारण करने के लिए 'अनित्यत्वे सति' यह विशेषण जोड़ा गया
है। सुखत्वादि जाति 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' होने पर भी अनित्य नहीं अपितु
नित्य है। इसलिए यह हेतु अब उनमें नहीं जा सकता है। इस प्रकार 'अनि-
त्यत्वे सति एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' इस हेतु से बुद्धि आदि गुण हैं यह बात
सिद्ध होती है। और गुण, गुणी के आश्रित ही रहता है। इसलिए बुद्धि आदि
गुणों का आश्रय कोई गुणी अवश्य होना चाहिए। परन्तु आत्मा को छोड़कर
अन्य जो आठ द्रव्य रह जाते हैं वह बुद्धि आदि 'गुणों के आश्रयभूत 'गुणी'
नहीं हो सकते हैं। इसलिए उन आठ द्रव्यों से अतिरिक्त बुद्धि आदि गुणों का
आश्रय नवम द्रव्य मानना होगा। वही 'आत्मा' है इसी बात को 'परिशेष'
अनुमान से आगे सिद्ध करते हैं।
आत्मा को छोड़ कर शेष जो आठ द्रव्य रह जाते हैं उनमें से १-पृथिवी,
२ अप्, ३ तेज, ४ वायु और ५ आकाश यह पांच द्रव्य 'पञ्चभूत' कहलाते हैं।
इन पांचों भूतों के गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द आदि गुणों का प्रत्यक्ष
बाह्य इन्द्रियों में होता है, मन से नहीं। और बुद्धि आदि का प्रत्यक्ष मन से
होता है बाह्येन्द्रियों से नहीं । इस भेद के कारण बुद्धि आदि इन