तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ तर्कभाषा [अणुत्वपक्षः
और शरीर के भिन्न भिन्न स्थानों में होने वाली वेदनाओं का अनुभव जीवात्मा
को कैसे हो सकेगा । इसका समाधान अधिक कठिन नहीं है शरीर की रचना
में तारयंत्र के समान इस प्रकार की व्यवस्था की हुई है कि किसी भी स्थान
पर हुई क्रिया की सूचना तुरन्त केन्द्रस्थान में पहुँच जाती है और उसकी
प्रतिक्रिया उचित स्थान पर हो जाती है। इसके लिए शरीर में ज्ञानवाही
और क्रियावाही तन्तु माने गए हैं। उनके द्वारा आत्मा को एक देशस्थ मानने
पर भी देहव्यापिनी क्रियाओं के नियंत्रण में कोई बाधा नहीं होती । इसलिए
जीवात्मा को अणु परिमाण मानने में कोई बाधक हेतु प्रतीत नहीं होता है ।
इसके अतिरिक्त जीवात्मा को अणु मानने में जन्म के समय उसके शरीर
के साथ संयोग तथा मृत्यु के समय शरीर से वियोग का उपपादन भी हो
सकता है । जो विभुत्व पक्ष में नहीं बन सकता है । अतएव 'अणुत्व' पक्ष
अधिक युक्तिसङ्गत है । उपनिषदों में जीवात्मा के अणुत्व के प्रतिपादक
अनेक वचन भी मिलते हैं । उनमें कुछ वाक्य यहां दे रहे हैं -
'१एषो अणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' ।
'२अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रोऽयं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः' ।
'३अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः' ।
'तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतमिति' ॥
इन वाक्यों में 'अंगुष्ठमात्रः' शब्द जीवात्मा के अणुत्व का ही सूचक है।
'अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात्' आदि वचनों में अन्यत्र भी आत्मा को
'अंगुष्ठमात्र' कहा गया है। परन्तु यहां अंगुष्ठमात्र पद सूक्ष्मशरीर सहित आत्मा
का ग्राहक है अथवा लक्षणया अणुत्व का बोधक है यही मानना होगा ।
अन्यथा अंगुष्ठमात्रत्व के 'मध्यम' परिमाण में आ जाने से वह 'अंगुष्ठमात्र' भी
अनित्य हो जायगा। कठोपनिषद् के उपर्युक्त वचन में शरीर से उसके
निष्क्रमण का वर्णन बड़े सुन्दर दृष्टान्त से किया गया है 'मुञ्जादिवेषीकां'
जैसे सरकण्डे की मूंज के भीतर से सींक निकल आती है और मूंज ज्यों की
त्यों बनी रहती है। इसी प्रकार 'धैर्येण' धीरे से आत्मा को निकाल लिया
जाता है । यह जो जीवात्मा का देह में प्रवेश और देह से निर्गम है वह
अणुत्व पक्ष के अतिरिक्त अन्य पक्षों में नहीं बनता है। इसलिए जीवात्मा को
अणु ही मानना युक्तिसङ्गत है।
आत्मा का स्थान -
अणु होने की अवस्था में शरीर में आत्मा का स्थान कौन सा माना जाय
१ मुण्डक ३, ९ । २ मुण्डक ३, ५ । ३ कठ० २, १७ ।