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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 330 में से

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पृष्ठ 207

१४२ तर्कभाषा [ परतःप्रामाण्यमण्डनम्
व्यतिरेक्यनुमानेनान्यस्य ज्ञानस्यानभ्यासद्शापन्नस्य प्रामाण्यमनुमीयते ।
तस्मात् परत एव प्रामाण्यं न ज्ञानग्राहकेणैव गृह्यत इति ।
[ उस प्रामाण्य का साधक ] हेतु समर्थ प्रवृत्तिजनकत्व अर्थात् सफल प्रवृत्ति
जनकत्व है । इस केवल व्यतिरेकी अनुमान से 'अभ्यासद्शापन्न' ज्ञान के प्रामाण्य
के सिद्ध हो जाने पर उसको दृष्टान्त मानकर जल प्रवृत्ति के पूर्व भी 'तज्जातीयत्व'
रूप लिङ्ग से अन्वय व्यतिरेकी अनुमान द्वारा 'अनभ्यासद्शापन्न' ज्ञान का
प्रामाण्य भी अनुमित होता है । इसलिये 'परतः प्रामाण्य' ही मानना चाहिए ।
अर्थात् ज्ञान ग्राहक [ सामग्री ] से [ प्रामाण्य ] गृहीत नहीं होता है ।
यहां 'अभ्यासद्शापन्न' और 'अनभ्यासद्शापन्न' दो प्रकार के ज्ञानों का
उल्लेख किया है । जहाँ जल ज्ञान के बाद उसकी प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति भी
हो चुकी है उस ज्ञान को 'अभ्यासद्शापन्न ज्ञान' कहते हैं । उस 'अभ्यास-
दशापन्नज्ञान' में तो 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह हेतु ठीक बैठ जाता है ।
क्योंकि उससे समर्थ प्रवृत्ति उत्पन्न हो चुकी है । परन्तु जहाँ जल प्रवृत्ति के पूर्व
ही ज्ञान में प्रामाण्य का ग्रहण हो जाता है वहाँ तो 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह
हेतु नहीं बन सकता है क्योंकि उस ज्ञान से तो अभी 'समर्थ' अथवा 'असमर्थ'
किसी प्रकार की भी प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है । तब उसको 'समर्थप्रवृत्ति-
जनक' कैसे मान सकते हैं । इसलिए इस प्रकार के 'अनभ्यासद्शापन्न ज्ञान' के
स्थल में प्रामाण्य के अनुमान के लिए 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' के स्थान पर
'समर्थप्रवृत्तिजनकज्ञानजातीयत्वात्' यह हेतु मानना चाहिए । 'अनभ्यासद्शा-
पन्न ज्ञान' से यद्यपि अभी प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है । परन्तु वह ज्ञान समर्थ-
प्रवृत्तिजनक ज्ञान के समान ही अदुष्टकरणजन्य होने से तज्जातीय है । इसलिए
उसके आधार पर अन्वय व्यतिरेकी अनुमान से 'अनभ्यासद्शापन्न ज्ञान' के
प्रामाण्य का भी निश्चय हो सकता है । इसलिये ज्ञान का ग्रहण सर्वत्र मानस-
व्यापार रूप 'अनुव्यवसाय' से और प्रामाण्य का ग्रहण 'प्रवृत्ति साफल्यमूलक
अनुमान' से होता है इसलिए ज्ञान और प्रामाण्य का ग्रहण भिन्न भिन्न सामग्री
से होने के कारण 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्व' रूप 'स्वतः प्रामाण्य' नहीं,
अपितु 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्व' रूप 'परतः प्रामाण्य' ही मानना चाहिए ।
यह ग्रन्थकार का अभिप्राय और न्याय का सिद्धान्त पक्ष है । 'इति' शब्द से
इस 'प्रामाण्यनिरूपण' के प्रकरण की समाप्ति सूचित करते हुए प्रकरण का
उपसंहार किया गया है ।