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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 330 में से

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पृष्ठ 212

आत्मानुमानम् ] प्रमेयनिरूपणम् १४७
तत्र बुद्ध्यादयो न गुणा भूतानां मानसप्रत्यक्षत्वात् । ये हि भूतानां
गुणास्ते न मनसा गृह्यन्ते यथा रूपादयः । नापि दिक्कालमनसां गुणा,
विशेषगुणत्वात् । ये हि दिक्कालादिगुणाः संख्यादयो न ते विशेषगुणास्ते
हि सर्वद्रव्यसाधारणगुणा एव । बुद्ध्यादयस्तु विशेषगुणा, गुणत्वे
सत्येकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वाद्, रूपवत् अतो न दिगादिगुणाः ।
पाँच भूतों के गुण नहीं हो सकते हैं । और 'विशेष गुण' होने से बुद्ध्यादि
गुण १ दिक्, २ काल, ३ मन इन तीनों के भी गुण नहीं हो सकते हैं । क्यों-
कि दिक्, काल, और मन इन तीनों में 'सामान्य गुण' रहते हैं 'विशेष गुण'
नहीं । और बुद्धि आदि 'विशेष गुण' हैं इसलिए वह दिक्, काल, और मन के
भी गुण नहीं हो सकते हैं । यही बात कहते हैं ।
उसमें बुद्धि आदि [ गुण ] मानस प्रत्यक्ष [ के विषय ] होने से [ पृथिवी
आदि पांच ] भूतों के गुण नहीं हैं । जो [ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द
यह पाँच ] भूतों के गुण हैं वह मन से गृहीत नहीं होते हैं जैसे रूपादि [ गुण
से मन से प्रत्यक्ष नहीं होते हैं । इसलिए बुद्धि आदि गुण आठ द्रव्यों में से पाँच
भूतों के गुण नहीं हो सकते हैं ] और न दिक्, काल, तथा मन [ इन तीनों ]
के [ गुण हो सकते हैं ] 'विशेष गुण' होने से । जो संख्या आदि दिक्, काल,
आदि के गुण होते हैं वह 'विशेष गुण' नहीं [ किन्तु ] सर्वद्रव्य [ में रहने वाले ]
'साधारण गुण' ही हैं । और बुद्धि आदि तो 'विशेष गुण' हैं [ इसलिए वह
दिक्, काल, और मन इन तीनों के भी गुण नहीं हो सकते हैं । बुद्धि आदि
को 'विशेष' गुण सिद्ध करने के लिए हेतु देते हैं ] रूप के समान केवल एक
इन्द्रिय मात्र से ही ग्राह्य गुण होने से ।
यहां 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' इस हेतु के साथ 'गुणत्वे सति' यह विशेषण
जोड़ कर विशिष्ट को हेतु बनाया है । इस विशेषण रूप 'गुणत्वे सति' को
जोड़ने का अभिप्राय यह है कि 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्व' तो रूपत्व आदि जाति
में भी रहता है । यदि केवल उतना ही हेतु रखा जाय तो 'रूपत्व' आदि जाति
भी विशेष गुण कहलाने लगेगी । अतः उसके वारण के लिए 'गुणत्वे सति'
विशेषण रखा गया है । रूपत्वादि जाति 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' होने पर भी
'गुण' नहीं है अतएव उसमें 'गुणत्वे सति' यह विशेषण अंश न होने से वह
'विशेष गुण' नहीं हो सकती है । किसी किसी संस्करण में 'गुणत्वे सति
एकेन्द्रियग्राह्यत्वात्' यह पाठ है । अर्थात् 'मात्र' पद नहीं रखा गया है । उस
दशा में 'गुणत्वे सति एकेन्द्रियग्राह्यत्वात्' यह विशिष्ट हेतु भी संख्या आदि