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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 330 में से

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पृष्ठ 214

विभुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १४६
रिक्ताकाशाश्रय इति। तथा च बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्ताश्रयाः।
तदेवं पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तो नवमं द्रव्यमात्मा सिद्धः। स च
सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः, परममहत्परिमाणवानित्यर्थः। विभुत्वाच्च
नित्योऽसौ व्योमवत्। सुखादीनां वैचित्र्यात् प्रतिशरीरं भिन्नः।
व्याप्ति का उदाहरण पहिले दिखा चुके हैं। इसलिए आत्मा का साधक यह 'अन्वय
व्यतिरेकी' अनुमान वाक्य भी बन सकता है।] इस लिए बुद्धि आदि [गुण]
पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से अतिरिक्त द्रव्य में आश्रित [गुण] हैं।
इस प्रकार पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से अतिरिक्त [बुद्धि आदि गुणों का
आश्रयभूत] नवम द्रव्य 'आत्मा' सिद्ध हो गया। और वह सर्वत्र कार्य [अदृष्टा-
नुरूप फल] की उपलब्धि होने से 'विभु' अर्थात् 'परममहत् परिमाण' वाला है।
और 'विभु' होने से वह आकाश के समान नित्य [भी] है। और [प्रत्येक
व्यक्ति के] सुख आदि के भिन्न होने से प्रत्येक शरीर में [आत्मा भी]
अलग अलग है।
विभुत्ववादी पक्ष—
यहां 'स च सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः, परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' यह
पंक्ति विशेष रूप से समझने योग्य है। यहाँ जिस आत्मा का वर्णन किया जा
रहा है उसके विषय में ही आगे 'सुखादीनां वैचित्र्यात् प्रतिशरीरं भिन्नः' यह
भी लिखा है इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह 'शरीरस्थ आत्मा'
अर्थात् 'जीवात्मा' का ही वर्णन है। और उसको विभु अर्थात् व्यापक या
'परममहत्परिमाणवान्' माना है। 'जीवात्मा' के इस विभुत्व को सिद्ध करने
के लिए सर्वत्र 'कार्योपलम्भ' को हेतु रूप में प्रस्तुत किया है। 'सर्वत्र कार्योप-
लम्भात्' का अभिप्राय यह है कि न्याय सिद्धान्त में जिस वस्तु से जिस व्यक्ति
को किसी प्रकार का भोग प्राप्त होता है उस वस्तु की उत्पत्ति में वस्तु की
उत्पादक अन्य कारण सामग्री के अतिरिक्त उस व्यक्ति का 'अदृष्ट' या धर्म और
अधर्म भी एक कारण होता है। अतएव किसी घट के निर्माण में चक्र, चीवर,
कुलाल, कपाल, आदि अन्य कारण सामग्री के साथ उससे भोग होने वाले
व्यक्ति का 'अदृष्ट' भी उसमें कारण होता है। एक ही कुम्भकार के बनाए और
एक ही 'अवा' में पकाए गए घड़ों में भी परस्पर भेद देखा जाता है। कोई
अधिक पका कोई कम पका होता है। यह जो कार्य में भेद मिलता है इसका
कारण भोक्ताओं का 'अदृष्ट' भेद ही है। एक ही उद्यान में खड़े, एक ही पानी
से सींचे गए, वृक्षों के फलों में भेद होता है। वहां भी भोक्ताओं का 'अदृष्ट'