तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० तर्कभाषा [ मध्यमपक्षः
उस भेद का कारण है। इस प्रकार एक व्यक्ति के जीवन में जिस जिस वस्तु से
भोग प्राप्त होता है वह किन किन स्थानों में विभक्त है इसका परिगणन सम्भव
नहीं है। जहां भी वह पुरुष पहुंच जाय वहीं उसको भोग प्राप्त होगा। इसलिए
उसके भोग की सामग्री सर्वत्र है यही मानना चाहिए। उस स्थान विशेष पर
उस वस्तु की उत्पत्ति में यदि उस व्यक्ति का 'अदृष्ट' कारण है तो यह मानना
चाहिए कि सर्वत्र उस 'अदृष्ट' का सम्बन्ध है। यह तभी हो सकता है जब कि
उस 'अदृष्ट' के अधिकरण 'आत्मा' की सत्ता सर्वत्र मानी जाय। इसीलिए आत्मा
की सर्वत्र सत्ता मानने के लिए उसको 'विभु' या परममहत् परिमाण वाला मानना
आवश्यक है। यही 'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' इस पंक्ति का आशय है।
मध्यमपरिमाणवादी पक्ष—
न्याय आदि अनेक दर्शनों में जीवात्मा को 'विभु' माना गया है और इस
'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' को ही उसके 'विभुत्व' का उपपादक हेतु माना
गया है। परन्तु इसके अतिरिक्त आत्मा को 'मध्यमपरिमाण और 'अणुपरिमाण'
मानने वाले पक्ष भी पाये जाते हैं। जैन विद्वान् आत्मा को 'मध्यम परिमाण'
अथवा 'देहपरिमाण' मानते हैं।
परन्तु 'मध्यम परिमाण' मानने में सबसे प्रमुख दोष यह है कि 'मध्यम
परिमाण' वाले सभी पदार्थ अनित्य होते हैं। 'मध्यम परिमाण' जन्य या
अनित्य पदार्थों में ही रहता है। नित्य पदार्थ या तो 'अणु परिमाण' वाले होते
हैं अथवा 'विभु' अर्थात् 'परममहत्परिमाण' वाले। 'जीवात्मा' के फल भोग
आदि की व्यवस्था उसको नित्य मानने पर ही बन सकती है। इसलिए उसको
नित्य मानना आवश्यक है। और नित्य होने की दशा में दो ही मार्ग हैं या
तो उसे 'अणु परिमाण' माना जाय अथवा 'विभु'। 'मध्यम परिमाण' नहीं
माना जा सकता है। इसलिए 'जीवात्मा' को 'मध्यम परिमाण' अथवा 'देह
परिमाण' वाला मानना उचित नहीं है।
न्याय के अतिरिक्त सांख्य आदि अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा को विभु
माना गया है। विभु मानने का आधार ऊपर दिखाया जा चुका है। 'स च
सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः'। सर्वत्र 'अदृष्टानुरूप फलभोग रूप' 'कार्य' की
उपलब्धि होने से जीवात्मा विभु है। इसके अतिरिक्त अणु पक्ष में एक देश-
स्थित आत्मा से सकल देह व्यापिनी चेष्टा आदि का नियंत्रण नहीं हो
सकता है। इसलिए जीवात्मा को विभु मानना चाहिए यह विभुवादियों का
अभिप्राय है।