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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 330 में से

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पृष्ठ 218

अणुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १५३
यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसका उत्तर उपयुक्त कठोपनिषद् के वाक्य में ही
मिल जाता है। 'सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः' कह कर कठोपनिषद् ने हृदय
को ही उसका स्थान माना है। भारतीय विचार धारा के अनुसार हृदय ही
आत्मा का स्थान है। इसीलिए हृदय शब्द की 'हृदि अयम् हृदयम्' यही
निरुक्ति की गई है। 'तस्य एतदेव निरुक्तं हृदि अयं हृदयमिति' । यूनानी
दार्शनिकों में 'अरस्तू' [३८४ से ३२२ ई० पूर्व] हृदय को ही ज्ञान और आत्मा
का केन्द्र मानता था। सत्रहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक 'डेकार्टे'
[ १५९६ से १६५० ] ने हृदय के स्थान पर मस्तिष्क की नलिका में स्थित
'पीनियल' नामक ग्रन्थि को ज्ञान अथवा आत्मा का केन्द्र माना है।
हमने अपने 'दर्शनमीमांसा' ग्रन्थ में इस सब विषय को इस प्रकार लिखा है—
जीवात्मानं निरूपयति—
तत्रात्मा चेतनो नित्यो, ज्ञानादीनां समाश्रयः ।
समाहितैकधीगम्यो, स्वगुणानुमितोऽथवा ॥ १ ॥
न्यायसूत्रेषु प्राधान्याज्जीवात्मैव निरूपितः ।
परं शास्त्रेषु जीवात्मा, परमात्मा चेति स द्विधा ॥ २ ॥
मध्यमपरिमाणवादं निराकरोति—
विभुर्न्यायादिसिद्धान्ते, जीवोऽणुर्वैदिके नये ।
देहमात्रपरिच्छिन्नो मध्यमो जिनसम्मतः ॥ ३ ॥
जीव एव शरीरस्थश्चेष्टते सर्वदेहगः ।
शरीरव्यापिनीः सर्वाः स च गृह्णाति वेदनाः ॥ ४ ॥
देहाकारस्ततो जीवो जिनशास्त्रेषु सम्मतः ।
अनित्यत्वप्रसङ्गात्तु मतमेतन्न सङ्गतम् ॥ ५ ॥
अनित्यास्तु मताः सर्वे मध्याकारा घटादयः ।
अनित्यो मध्यमो जीवो, नित्योऽणुर्विभुरेव वा ॥ ६ ॥
विभुत्ववादमालोचयति—
अणुर्नानुभवेत् सर्वं, सर्वदेहं न चालयेत् ।
तस्मान्न्यायादिसिद्धान्ते सम्मतो विभुरेव सः ॥ ७ ॥
परं विभुत्व-पक्षोऽयं बहुदोषसमाकुलः ।
न सामान्येन सौकर्यात् स्वीकर्तुं तत्त शक्यते ॥ ८ ॥
१ दर्शन मीमांसा ५।