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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 330 में से

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पृष्ठ 213

१४८ तर्कभाषा [ आत्मानुमानम्
तस्मादेभ्योऽष्टभ्यो व्यतिरिक्तो बुद्ध्यादीनां गुणानामाश्रयो वक्तव्यः
स एवात्मा।
प्रयोगश्च, बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्याश्रिताः, पृथि-
व्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सति गुणत्वात्। यस्तु पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्त-
द्रव्याश्रितो न भवति, नासौ पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्यानाश्रितत्वे
सति गुणोऽपि भवति यथा रूपादिरिति केवलव्यतिरेकी । अन्वयव्यति-
रेकी वा । तथाहि, बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्याश्रिताः पृथि-
व्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सति गुणत्वात् । यो यदनाश्रितो गुणः स तद्व्यति-
रिक्ताश्रितो भवति । यथा पृथिव्याद्यनाश्रितः शब्दः पृथिव्याद्यति-
'सामान्य गुण में' 'अतिव्याप्त' हो जायगा। क्योंकि संख्या गुण भी है और
'एकेन्द्रिय ग्राह्य' भी है। 'मात्र' पद जोड़ देने से वह दोष नहीं रहता है ।
क्योंकि संख्या 'एकेन्द्रियग्राह्य' होनेपर भी 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' नहीं है। क्यों-
कि उसका ग्रहण चक्षु तथा त्वचा दोनों से हो सकता है। इसलिए वह पाठ ठीक
नहीं है। अथवा उस पाठ की व्याख्या मात्रपद का सन्निवेश करके ही करना होगा।
इसलिये इन [ पृथ्वी आदि पञ्चभूत तथा दिक्, काल और मन ] आठ
[ द्रव्यों ] से अतिरिक्त [ किसी नवम द्रव्य को ] बुद्धि आदि गुणों का आश्रय
कहना चाहिए । वही [ नवम द्रव्य ] आत्मा है ।
[ इस का साधक ] प्रयोग [ अनुमान वाक्य ] इस प्रकार है। १-बुद्धि
आदि पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य में आश्रित हैं [ यह प्रतिज्ञा हुई ]
२-पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में अनाश्रित होकर [ गुण ] होने से [ यह हेतु हुआ ] ।
३-जो पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य में आश्रित नहीं होता वह पृथि-
व्यादि आठ द्रव्यों से व्यतिरिक्त द्रव्य में अनाश्रित गुण भी नहीं होता । अपितु
पृथिव्या