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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 330 में से

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पृष्ठ 210

प्रमेयनिरूपणम्
प्रमाणान्युक्तानि, अथ प्रमेयाण्युच्यन्ते ।
'आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम्'
इति सूत्रम् ।
'तत्रात्मत्वसामान्यवानात्मा । स च देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तः, प्रति-
शरीरं भिन्नो नित्यो विभुश्च । स च मानसप्रत्यक्षः । विप्रतिपत्तौ तु
बुद्ध्यादिगुणलिङ्गकः । तथा हि बुद्ध्यादयस्तावद् गुणाः अनित्यत्वे
सत्येकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात् । गुणश्च गुण्याश्रित एव ।
प्रमेय निरूपण
'प्रमाणों' का वर्णन कर चुके । अब 'प्रमेयों' का वर्णन करते हैं ।
१ आत्मा, २ शरीर, ३ इन्द्रिय, ४ अर्थ, ५ बुद्धि, ६ मन, ७ प्रवृत्ति, ८ दोष,
९ प्रेत्यभाव, १० फल, ११ दुःख, और १२ अपवर्ग [ यह बारह ] तो 'प्रमेय' हैं ।
यह [ न्याय दर्शन के प्रथमाध्याय के प्रथम आह्निक का नवां ] सूत्र है ।
[ इस सूत्र में न्याय के अभिमत बारह प्रमेयों का 'उद्देश' अर्थात् नाममात्रेण वस्तु-
सङ्कीर्तन किया गया है । उन के लक्षण और परीक्षा आगे करेंगे ]
उनमें से 'आत्मत्व' सामान्य [ जाति ] जिसमें रहता है वह आत्मा
[ कहलाता ] है । वह देह, इन्द्रिय आदि से पृथक् है । प्रत्येक शरीर में अलग-
अलग, नित्य, और विभु [व्यापक] है । और वह मानस प्रत्यक्ष [ का विषय ] है ।
[ अपना आत्मा मानस प्रत्यक्ष का विषय है । दूसरे में आत्मा है या नहीं इस
प्रकार का ] मतभेद [ अथवा सन्देह ] होने पर बुद्धि आदि गुण-लिङ्गक [ होता ]
है । [ अर्थात् बुद्धि आदि गुण रूप लिङ्ग से अनुमान द्वारा सिद्ध होनेवाला है ] ।
उससे वह [ बुद्धि आदि गुणों द्वारा आत्मा की सिद्धि ] इस प्रकार [ होती ] है ।
सबसे पहिले बुद्धि आदि [ आदि पद से आत्मा में रहने वाले सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष, प्रयत्न आदि अन्य सब गुणों का ग्रहण कर लेना चाहिए ] अनित्य होते हुए
केवल एक इन्द्रिय से ही ग्राह्य होने से 'गुण' हैं। और 'गुण' 'गुणी', के आश्रित
ही रहता है । [ इसलिए बुद्धि आदि 'गुण' जिस 'गुणी' के आश्रित रहते हैं वह
आत्मा है इस बात को आगे 'परिशेष' अनुमान से सिद्ध करेंगे । ]
यहाँ बुद्धि आदि को गुण सिद्ध करने के लिए 'अनित्यत्वे सति एकेन्द्रिय-
मात्रग्राह्यत्वात्' यह हेतु दिया गया है। इसमें इतना लम्बा हेतु का स्वरूप न
रख कर केवल ग्राह्यत्वात् इतना ही हेतु रखा जाता तो अनुमान प्रमाण से ग्राह्य
१ न्यायदर्शन १, १, ९ ।
१० त० भा०