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श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

महावीरी व्याख्या चौ. ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
बिद्यावान गुणी अति चतुर।
राम-काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥
शब्दार्थ— आतुर ▸ उत्सुक।
अर्थ—हे आञ्जनेय! आप समस्त विद्याओंके प्रशस्त भण्डार हैं एवं
समस्त गुण आपमें निवास करते हैं। एवं आप अत्यन्त चतुर हैं तथा
श्रीरामचन्द्रजूके कार्यको करनेके लिए उत्सुक रहा करते हैं।
व्याख्या—बिद्या शब्द यहाँ अष्टादश विद्याओंका संकेत करता है।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि श्रीहनुमान्‌जीने श्रीमानसके धरातलपर
तीन बार ब्राह्मण-वेष बनाया। प्रथम बार श्रीराम-लक्ष्मणके समक्ष। श्रीराम
विद्यानिधि हैं। यथा—बिद्या-बिनय-निपुन गुणशीला (रा.च.मा. १-२०४-
६) और बिद्यानिधि कहूँ बिद्या दीन्ही (रा.च.मा. १-२०९-७)। अतः
विद्यानिधिके समक्ष हनुमान्‌जीने ब्रह्मविषयक प्रश्न करके अपनी विद्या-
प्रखरताका परिचय दिया। द्वितीय बार विभीषणके समक्ष लङ्का में। यहाँ
विभीषणके आकुलत्व रूप गुणको देखकर उन्हें राम-परत्वका उपदेश कर
अपनी गुणज्ञताका परिचय दिया। क्योंकि—
सोइ सर्बग्य गुणी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म-परायन सोइ कुल त्राता।
राम-चरन जा कर मन राता॥
—रा.च.मा. ७-१२७-१,२
आञ्जनेय विभीषणसे कह पड़ते हैं—
२९

चौ. ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर महावीरी व्याख्या
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुण भरे बिलोचन नीर॥
—रा.च.मा. ५-७
तृतीय बार नन्दिग्राममें भरतजीके समक्ष। यहाँ आञ्जनेयका लोकोत्तर चातुर्य
दृष्टिगोचर होता है। श्रीभरतभद्र अविराम अश्रुधारासे श्रीरामभद्रके भावनामय
पादपद्मका अभिषेक कर रहे हैं—राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन-
जलजात (रा.च.मा. ७-१ख)। अतः श्रीहनुमान्जी सामने नहीं आते।
क्योंकि अश्रुपात-कालमें ठीक-ठीक न दीख पड़नेसे पूर्वकी भाँति फिर
कोई अन्यथा अनुमान न हो जाए, इसलिए—बोलेउ श्रवन सुधा सम
बानी (रा.च.मा. ७-२-२)। उनके कानमें जाकर बोले। तीन चौपाइयोंमें
श्रीराघवके आगमनका समाचार सुनाकर श्रीभरतको उन्होंने विरह, भय,
तथा विषादसे मुक्त किया। और भरतभद्रने नाहिन तात उरिन मैं तोही
(रा.च.मा. ७-२-१४) कहकर कृतज्ञता-ज्ञापन किया। ग्रन्थ-गौरवके भयसे
सूत्ररूपमें दिग्दर्शन कराया गया। विज्ञ पाठक तीनों प्रसंगोंकी स्वयं संगति
लगा लेंगे।
राम-काज करिबे को आतुर—श्रीरामकार्य करनेके लिए ये इतने
आतुर हैं कि क्षण-भर भी विश्राम उचित नहीं मानते, यथा—राम-काज
कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम (रा.च.मा. ५-१); और नागपाशमें बँधकर
भी लज्जाका अनुभव नहीं करते—
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
—रा.च.मा. ५-२२-६
३०

महावीरी व्याख्या चौ. ८: प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम-लखन-सीता-मन-बसिया ॥ ८ ॥
शब्दार्थ—रसिया ▸ रसिक। बसिया ▸ निवास करने वाले।
अर्थ—हे मारुते! आप श्रीराघवजूके चरितामृतको सुननेके अद्वितीय
रसिक हैं एवं आपके मनोमन्दिरमें श्रीराम, श्रीलक्ष्मण, एवं श्रीसीताका
निवास है। यद्वा, आप ही वात्सल्यातिशय होनेसे श्रीराम-लक्ष्मण एवं
श्रीसीताजीके मनमें निवास करते हैं।
व्याख्या—प्रभु-चरित्र-श्रवणके श्रीहनुमान्‌जी इतने रसिक हैं कि कथाके
लोभमें इन्होंने प्रभुका सान्निध्य ठुकरा दिया। राज्याभिषेकके पश्चात्
राजाधिराज श्रीरामने संपूर्ण वानर-भालुओंको विविध दान एवं प्रीतिदान
देकर विसर्जित किया एवं श्रीआञ्जनेयसे अपने परम धाममें रहनेके लिए
मूक इच्छा व्यक्त की। तब श्रीमारुतिने मूक भाषामें अन्तर-प्रश्न किया कि
क्या आप अपने परम धाममें मेरे रामायण-कथा-श्रवणकी व्यवस्था करेंगे?
श्रीरामभद्रजूको निरुत्तर देखकर हनुमान्‌जी महाराजने पुनः कहा, “हे वीर!
जब तक आपकी श्रीरामायण-कथा इस भूमण्डलपर चलती रहेगी, तब
तक आपकी आज्ञासे मेरे शरीरमें प्राण विद्यमान रहेंगे।” श्रीरामने भी इस
वरदानको स्वीकारते हुए कहा, “जब तक इस लोकमें मेरी कथा चलेगी,
तब तक तुम्हारी कीर्ति अचल रहेगी एवं तुम्हारे शरीरमें प्राण तब तक वर्तमान
रहेंगे।” राम-कथाके लोभमें कालनेमिका षड्यन्त्र भी इन्हें क्षणमात्र तक
स्वीकार्य-सा हो गया। स्वयं श्रीराम-कथा-श्रवणमात्रसे हनुमान्जीके नेत्र-
कमल सजल हो जाते हैं और वाणी शिथिल हो जाती है। यथा—जयति
३१

चौ. ८: प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया महावीरी व्याख्या
रामायण-श्रवण-संजात-रोमांच-लोचन-सजल-शिथिल-वाणी (वि.प.
२९-५)। श्रीराम-कथाके निमित्त ही जिन्होंने साकेतके सुखको ठुकराकर
धराधामपर विचरण करते हुए राम-कथा-श्रवणार्थ अपना जीवन रक्खा,
ऐसे श्रीआञ्जनेयके समान श्रीराम-कथाका और कौन रसिक हो सकता है?
३२

महावीरी व्याख्या चौ. ९: सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ ९ ॥
शब्दार्थ—बिकट ▸ भयंकर।
अर्थ—हे मारुते! आपने सूक्ष्म अर्थात् अत्यन्त लघु बन्दरका रूप धारण
करके माता सीताको दिखाया और भयंकर रूप धारण करके रावणकी नगरी
लङ्काको भस्मसात् कर दिया।
व्याख्या—अशोकवाटिकामें हनुमान्‌जीका इतना लघुतम रूप हुआ कि
उन्होंने अपनेको वृक्षके पल्लवोंमें छिपा रक्खा—
तरु-पल्लव महँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई॥
—रा.च.मा. ५-९-१
अध्यात्म-रामायणमें इन्हें कलविङ्कसमाकारः (अ.रा. ५-३-२०) कहा
गया है, अर्थात् छोटी गौरैयाके समान इनका आकार था। यहाँ यह शङ्का
करना निरर्थक है कि मुद्रिका कहाँ रही होगी। मुद्रिका भगवान्‌के श्रीविग्रहका
आभूषण होनेसे चिन्मय है। अतः परिस्थितिके अनुसार लघुता एवं गौरव
उसके लिए सहज है। गीतावलीजीमें सीता-मुद्रिका-संवाद भी वर्णित है।
मुद्रिका स्पष्ट कहती है—नींद भूख न देवरहि परिहरे को पछिताउ (गी.
५-४-२)। जो मुद्रिका श्रीसीताजीको श्रीराघवके समाचार सुना सकती है,
उसकी लघुता एवं गुरुताके विषयमें संदेहको स्थान ही कहाँ? हनुमान्‌जीके
लघु रूपको देखकर श्रीसीताजीको लीलापक्षमें संदेह हो गया। पुनः उन्होंने
भीम रूपकी झाँकीसे मैथिलीके संदेहको दूर किया। यथा—
३३

चौ. ९: सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा महावीरी व्याख्या
मोरे हृदय परम संदेहा।
सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
कनक-भूधराकार शरीरा।
समर-भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
—रा.च.मा. ५-१६-७,८,९
बिकट रूप धरि लंक जरावा—लङ्कादहनमें तो इनका विकट रूप
प्रसिद्ध ही है। विशेष कवितावलीका सुन्दरकाण्ड द्रष्टव्य है। इसी अवसरपर
रावणको अपना रुद्ररूप प्रदर्शित करने हेतु हनुमान्जीने अपना पञ्चमुखी रूप
प्रदर्शित किया।
३४

महावीरी व्याख्या चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥
शब्दार्थ— भीम ▸ बीभत्स तथा धीरोंको भी त्रास देने वाला।
अर्थ—आपने महाकालको भी भयभीत करने वाले भीम रूपको धारण
कर रावणपक्षीय असुरोंका संहार किया एवं भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समस्त
कार्योंको सँवारा।
व्याख्या—इनकी भीमता देखकर महाभारत-कालके धुरन्धर वीर भीमने
भी अपनी आँखें बन्द कर लीं थीं। एक बार द्रौपदीकी रुचिरञ्जनके
लिए स्वर्णकिञ्जल्कयुक्त कमल लेने भीमसेन श्रीहनुमान्जीके निवासस्थान
गन्धमादनके निकट कदलीवन पधारे। भीमको उद्धत देखकर हनुमान्जी
वृद्ध बन्दरका रूप धारण कर मार्गमें लेट गए। भीमने मार्ग छोड़नेका
अनुरोध किया। श्रीआञ्जनेयने सहजतासे कहा, “मैं वृद्ध हूँ, अतः मेरी
पूँछ उठाकर मुझे इस स्थानसे हटा दो।” भीमकी सभी चेष्टाएँ असफल
हुईं, पर हनुमान्जीकी पूँछ टस-से-मस न हुई। अपनेको श्रीहत देखकर
भीमने उस वृद्ध वानरेन्द्रको प्रणाम करके उनका परिचय पूछा। अनन्तर
अपना परिचय देकर श्रीमारुतिने भीमको संक्षेपमें रामायण-कथा सुनाई।
पश्चात् अपने कथा-श्रवणमें व्यतिक्रम जानकर श्रीमारुति शीघ्र जानेके लिए
भीमको आदिष्ट करते हुए बोले—
तदिहाप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च तथाऽनघ।
तस्य वीरस्य चरितं गायन्तो रमयन्ति माम्॥
—म.भा. ३-१४८-२०
३५

चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे महावीरी व्याख्या
अर्थात् “हे भीम! स्वर्गकी श्रेष्ठ अप्सराएँ एवं तुम्बुरु आदि कुशलगायक
गन्धर्व भगवान् श्रीराघवके चारु चरितको गाते हुए मुझे परमानन्द-सुधा-
सागरमें मग्न किए रहते हैं।” जानेसे पहले भीमने उनके मौलिक रूपको
देखनेकी इच्छा प्रकट की। तब श्रीहनुमान्जीने अपना स्वर्णशैल-संकाश
शरीर प्रस्तुत किया, जिसे देखकर भीमने आँखें बन्द कर लीं। यह कथा
महाभारतके वनपर्वमें स्पष्ट है। इसीका उद्धरण गोस्वामीजीने कवितावलीमें
प्रस्तुत किया है—कौनके तेज बलसीम भट भीम-से भीमता निरखि
कर नयन ढाँके (क. ६-४५)।
असुर सँहारे—असुर-संहारका क्या कहना! आञ्जनेयके संग्रामकी
प्रशंसा श्रीरामचन्द्र स्वयं करते हैं—
हाथिन सों हाथी मारे घोरे सों सँघारे घोरे
रथन सों रथ बिदरनि बलवान की।
चंचल चपेट चोट-चरन चकोट चाहे
हहरानि फौजें बहरानी जातुधान की।
बार बार सेवक-सराहना करत राम
तुलसी सराहै रीति साहिब सुजान की।
लाँबी लूम लसत लपेटि पटकत भट
देखौ देखौ लखन लरनि हनुमान की॥
—क. ६-४०
रामचंद्र के काज संवारे—श्रीरामजीके समस्त कार्योंको हनुमान्जीने
सजा दिया। भाव यह है कि रावणादिका वध राघवकी इच्छासे हो सकता
था, पर विभीषणादिका उद्धार आञ्जनेयके बिना कथमपि संभव नहीं था।
कारण कि जब तक जीव रघुनाथजीके सम्मुख नहीं होता, तब तक उसके
पाप नष्ट नहीं होते। यथा—
३६

महावीरी व्याख्या चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
—रा.च.मा. ५-४४-२
श्रीरघुनाथजी समस्त प्राणिमात्रके सम्मुख होकर भी, यथा—सन्मुख
सब की ओर (रा.च.मा. ३-१२), जीवकी सम्मुखताके बिना उसका
कल्याण नहीं कर सकते। अतः गोस्वामीजी यह अनुरोध करते हैं कि अनादि
कालसे भगवत्पाद-पद्म-विमुख इस जड़ जीवको श्रीमन्मारुतिके बिना कौन
श्रीराम-सम्मुख कर सकता है? यथा—
आते आञ्जनेय न जो व्याकुल धरा पै आज
क्षुधित जनों को भक्ति-अमिय पिलाता कौन।
कौन दर्शाता रामधाम का पवित्र पंथ
राम-नाम-मञ्जु-मणिदीपक जलाता कौन।
कौन सरसाता उर-भाव-सरसीरुह को
राम-प्रेम मधुर सुमोदक खिलाता कौन।
राम-गुण गायक बनाता कौन गिरिधर को
मुझ-से पतित को पथ सुमति दिलाता कौन॥
आते आञ्जनेय जो न अमल अवनि पै आज
वैष्णवों की विजय-वैजयन्ती फहराता कौन।
कौन लाँघ जाता शतयोजन पयोनिधि को
मैथिली का विरह-दवानल बुझाता कौन।
कौन लिपटाता रघुबीर-पद-पङ्कज में
राजीव-नयन के नयन-नीर से नहाता कौन।
साधन-विहीन दृगहीन मूढ़ गिरिधर को
मानस-मन्दाकिनी में मज्जन कराता कौन॥
३७

चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे महावीरी व्याख्या
इस प्रकार स्पष्ट है कि आञ्जनेयका चरित्र श्रीराघवजीकी लीलाका शृङ्गार
है और यही सँवारे पदका स्वारस्य है। यथा—काज महाराज के समाज
सब साजे हैं (ह.बा. १५) और सकल समाज-साज साजे रघुबर के
(ह.बा. ३३)।
३८

महावीरी व्याख्या चौ. ११: लाय सँजीवनी लखन जियाये
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
लाय सँजीवनी लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ ११ ॥
शब्दार्थ—सँजीवनी ▸ द्रोणाचलसे लाई हुई मृतसंजीवनी।
अर्थ—हे पवननन्दन! आपने द्रोणाचलसे मृतसंजीवनी ले आकर
श्रीलक्ष्मणको जिलाया तथा रघुवीर रामभद्रजूने प्रसन्नतासे आपको अपने
हृदयसे लगा लिया।
व्याख्या—कालके विजेता मेघनादने कालस्वरूप श्रीलक्ष्मणको
वीरघातिनी शक्तिसे मूर्च्छित किया। अनन्तर करालं महाकालकालं
कृपालं (रा.च.मा. ७-१०८-२) श्रीहनुमान्जी मूर्च्छित कालको कालातीत
श्रीराघवके पास ले आए तथा उन्होंने सुषेणके निर्देशानुसार संजीवनी ले
आकर श्रीलक्ष्मणको प्राणदान दिया एवं श्रीराघवके मङ्गलमय परिष्वङ्गका
अनुभव किया। यथा—
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना।
अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना॥
—रा.च.मा. ६-६२-१
३९

चौ. १२: रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥ १२ ॥
शब्दार्थ—रघुपति ▸ रघुवंशके स्वामी, अथवा रघु अर्थात् जीवमात्रके
स्वामी श्रीराम। लङ्घन्ते पापपुण्यानि ये ते रघवो जीवास्तेषां पतिः इति
रघुपतिः।
अर्थ—रघुकुलके स्वामी तथा समस्त प्राणिमात्रके ईश्वर श्रीरामचन्द्रजीने
आपकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भाई भरतके समान प्रिय
हो।
व्याख्या—भाई शब्दका अन्वय भरतहि शब्दके साथ ही उचित
होगा, अर्थात् ‘भाई भरतके समान तुम मुझे प्रिय हो’। हनुमान्जीके साथ
भाई शब्दका अन्वय करनेसे सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं (रा.च.मा.
५-३२-७)—इस अर्धालीकी एकवाक्यता नहीं संगत होगी क्योंकि यहाँ
श्रीराघवने आञ्जनेयको पुत्र कहा। ध्यान रहे कि श्रीलक्ष्मणसे श्रीहनुमान्जीका
इतना वैशिष्ट्य अवश्य है कि श्रीरघुनाथजी श्रीलक्ष्मणजीको भाई तथा पुत्र
दोनों मानते हैं। भाई, यथा—अस जिय जानि सुनहु सिख भाई (रा.च.मा.
२-७१-१)। पुत्र, यथा—अब अपलोक शोक सुत तोरा (रा.च.मा. ६-६१-
१३)। पर हनुमान्जीको केवल पुत्र-रूपमें ही स्वीकारते हैं, यथा—सिय-
सुखदायक दुलारो रघुनायक को (ह.बा. १०)।
४०

महावीरी व्याख्या चौ. १३: सहसबदन तुम्हरो जस गावैं
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सहसबदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ १३ ॥
शब्दार्थ—सहसबदन ▸ शेष। श्रीपति ▸ सीतापति श्रीराम।
अर्थ—सहस्र मुख वाले शेष तुम्हारा यश गाते हैं तथा गाते रहेंगे। ऐसा
कहकर श्रीसीताके पति श्रीराम हनुमान्‌जीको बार-बार गलेसे लगा रहे हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्‌जीकी यह ध्यान-झाँकी श्रीलक्ष्मण-मूर्च्छा-
समाप्तिके पश्चात्-कालकी है। श्रीलक्ष्मणजीको मूर्च्छामुक्त देखकर उन्मुक्त
कण्ठसे प्रशंसा कर श्रीराघवजीने हनुमान्‌जीको गलेसे लगा लिया।
सहसबदन यहाँ श्रीलक्ष्मणजीके लिए अभिप्रेत है। यथा—
शेष सहस्र शीष जग कारन।
जो अवतरेउ भूमि भय दारन॥
—रा.च.मा. १-१७-७
भाव यह है कि आञ्जनेय! तुम्हारे इस परम पावन यशको सहस्रमुख
शेषावतार श्रीलक्ष्मण भी गाते रहेंगे, क्योंकि रणशय्यापर शान्त हुए अनन्तको
भी तुमने जीवनदान दिया।
४१

चौ. १४: सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीशा ॥ १४ ॥
शब्दार्थ—सनकादिक ▸ सनक, सनन्दन, सनातन, एवं सनत्कुमार
(ये चार ब्रह्माजीके प्रथम ऊर्ध्वरेता पुत्र हैं)।
अर्थ—श्रीराघव प्रशंसाके शब्दोंमें कह रहे हैं, “हे वत्स! तुम्हारे इस
परम पावन यशको न केवल शेष अपितु सनकादिक ऊर्ध्वरेता ऋषि, ब्रह्मादि
देवगण, मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् नारद, और सरस्वतीके सहित अहीश्वर
(विष्णु व शंकर) भी गाते रहेंगे।”
व्याख्या—इस चौपाईमें भी पूर्व क्रिया गावैँका अन्वय होगा। भाव
यह है कि तुम्हारा लक्ष्मण-जीवनदान-रूप परम पावन यश त्रिलोकविदित
हो जाएगा। अतः पातालमें शेष, मर्त्यलोकमें सनकादि एवं नारद, तथा
स्वर्गलोकमें ब्रह्मादि, शारदा, एवं विष्णु तथा शंकर भी गाएँगे। पूर्वमें
शेषके लिए सहसबदन शब्दका प्रयोग हो चुका है। अतः यहाँ अहीशा
पद अहितल्पवासी विष्णु यद्वा अहिकौपीनधारी श्रीशिवका बोधक है।
यथा विष्णु—जौ अहि सेज शयन हरि करहीं (रा.च.मा. १-६९-५)।
शिव—जटा मुकुट अहि मौर सँवारा (रा.च.मा. १-९२-१), कुंडल
कंकन पहिरे ब्याला (रा.च.मा. १-९२-२), भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी
(रा.च.मा. १-१०६-८) आदि।
४२

महावीरी व्याख्या चौ. १५: जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सकें कहाँ ते॥ १५ ॥
शब्दार्थ—कोबिद (कोविद) ▸ वेदज्ञ। कोर्वेदस्य विदो वेत्ता कोविदः
परिकीर्तितः। को अर्थात् वेदका विद अर्थात् जाननेवाला। इस प्रकार
कोविद=वेदज्ञ।
अर्थ—यम, कुबेर आदि यावन्मात्र दिक्पाल हैं, वे भी तुम्हारा यह यश
गाते रहेंगे। इस अनन्त यशको सामान्य कवि एवं वेदज्ञ विद्वान् कहाँसे कह
सकते हैं?
व्याख्या—यहाँ जहाँ ते शब्दके साथ पूर्व क्रिया गावैंका अन्वय
होगा। श्रीहनुमन्-चालीसाकी प्रथम चौपाईसे लेकर दसवीं चौपाई तक
गोस्वामीजीने श्रीरामजीके वात्सल्य-भाजन श्रीआञ्जनेयके मङ्गलमय स्वरूप
तथा गुणका वर्णन किया। अनन्तर ग्यारहवीं चौपाईसे बीसवीं चौपाई तक
श्रीहनुमन्जीके श्रीराघव-यशोभूमिका रूप चारु चरित्रका वर्णन कर रहे
हैं। जिसमें ग्यारहवीं चौपाईसे पन्द्रहवीं चौपाई तक लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंगमें
प्रस्तुतकी हुई हनुमान्जीकी महत्तम भूमिकाका वर्णन है। मानो यही पाँच
चौपाइयाँ पञ्चाक्षर महामन्त्रके तात्पर्यके रूपमें कही गई हैं।
लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंगका दार्शनिक तात्पर्य बड़ा मनोरञ्जक तथा साभिप्राय
है। जैसे मेघनादकी शक्तिसे मूर्च्छित श्रीलक्ष्मणको आञ्जनेयजीने द्रोणाचलसे
संजीवनी लाकर जीवनदान दिया, उसी प्रकार आसक्ति-रूप वीरघातिनीसे
मूर्च्छित हम जीवोंको वैराग्यवान् सन्त रामनाम-रूप हनुमान्जी सद्गुरु
सुषेण वैद्यकी अनुमतिसे वेद-पुराण-रूप द्रोणाचलमें वर्तमान, रामभक्ति-
४३

चौ. १५: जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते महावीरी व्याख्या
रूप संजीवनी ले आकर श्रीरामतत्त्व-रूप जीवनदान देते रहें, इसी उद्देश्यसे
श्रीहनुमान्-चालीसामें यह प्रसंग निबद्ध किया गया।
दिक्पाल आठ हैं (इन्द्र, ईशान, कुबेर, अग्नि, वरुण, वायु, यम, और
नैर्ऋत्य)।
४४

महावीरी व्याख्या चौ. १६: तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज-पद दीन्हा॥ १६ ॥
शब्दार्थ—उपकार ▸ भलाई।
अर्थ—आपने सुग्रीवका महान् उपकार किया तथा उन्हें श्रीरामजीका
दर्शन कराकर किष्किन्धाका साम्राज्य दे दिया।
व्याख्या—भाव यह है कि आपके बिना सुग्रीव कुछ भी नहीं कर पाते।
पहले उन्हें श्रीरामजीको देखकर भय हुआ, पर उन्होंने जब आपकी पीठपर
बैठे हुए श्रीरामजीको देखा तभी सम्यक् दर्शन हुआ। क्योंकि परमात्माका
सम्यक् दर्शन सन्त-दृष्टिके बिना संभव नहीं है। यथा—
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा।
आवत देखि अतुल-बल-सींवा॥
अति सभीत कह सुनु हनुमाना।
पुरुष जुगल बल-रूप-निधाना॥
—रा.च.मा. ४-१-२,३
पश्चात् सम्यक् दर्शन—
जब सुग्रीव राम कहँ देखा।
अतिशय जन्म धन्य करि लेखा॥
—रा.च.मा. ४-४-६
राम मिलाय—श्रीरामजीसे मिलनेकी सुग्रीवमें कोई योग्यता नहीं थी,
पर आपने अपनी विशेष कृपाके आधारपर श्रीरामजीको सुग्रीवके पास ले
जाकर उन्हें कृतकृत्य किया। अतः आञ्जनेयको सुग्रीवदुःखैकबन्धु (वि.प.
४५

चौ. १६: तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा महावीरी व्याख्या
२७-२) कहा गया है।
राज-पद दीन्हा—भाव यह है कि आपने सुग्रीवको राजपद एवं रामपद
देकर मुक्ति तथा भुक्ति दोनोंका अधिकारी बना दिया है। वैसी ही कृपा हम
असमर्थ जीवोंपर भी करें।
४६

महावीरी व्याख्या चौ. १७: तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ १७ ॥
शब्दार्थ—मंत्र ▸ भगवत्प्रपत्तिसिद्धान्त।
अर्थ—हे आञ्जनेय! विभीषणने आपके रामप्रेम-रूप मूलमन्त्रको
स्वीकारा। उसके परिणामस्वरूप वे लङ्काके कल्पान्त शासक स्वामी बन
गए। यह सारा संसार जानता है।
व्याख्या—विभीषणने लङ्कामें अपर रात्रिकालके प्रथम साक्षात्कारके
अनन्तर निराशा भरे स्वरमें आञ्जनेयसे कहा—
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहैं कृपा भानुकुल-नाथा॥
—रा.च.मा. ५-७-२
अर्थात् भानुकुलनाथ श्रीरामने भानुपुत्र सुग्रीवपर कृपाकी क्योंकि वह उनके
कुलप्रवर्तकका पुत्र है, पर मुझमें कोई पात्रता नहीं है। श्रीआञ्जनेयने कहा,
“विभीषण! भगवत्स्मरण ही उनकी कृपाका एकमात्र असाधारण साधन
है।” यथा—
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
—रा.च.मा. ५-८-१
इसी मन्त्रने विभीषणको लङ्केश्वर बना दिया। अथवा, श्रीहनुमान्जीने
विभीषणजीसे कहा, “विभीषण! पिताके बिना तुम अधूरे हो और माताके
बिना मैं अधूरा हूँ। तुम मुझे सीता माताके दर्शन करा दो और मैं तुम्हें पिता
४७

चौ. १७: तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना महावीरी व्याख्या
श्रीरामके दर्शन करा दूँगा।" यथा—
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥
—रा.च.मा. ५-८-४
तब विभीषणने एक युक्ति बताई कि आप मेरा अर्थात् विभीषणका रूप
धारण करके अशोकवाटिकामें प्रवेश करें। आपको कोई भी राक्षस पहचान
नहीं सकेगा क्योंकि अशोकवाटिकामें मैं अर्थात् विभीषण तथा रावण ये दो
ही पुरुष जा सकते हैं। हनुमान्जीने वैसा ही किया—
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
धरि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन अशोक सीता रह जहवाँ॥
—रा.च.मा. ५-८-५,६
विभीषणके इसी मन्त्रने (जिसे हनुमान्जीने माना) हनुमान्जीको सीताजीके
दर्शन करा दिये। उसके बदले हनुमान्जीने विभीषणको श्रीरामजीके दर्शन
कराकर उन्हें लङ्काधिपति बना दिया। इसीलिए गोस्वामीजीने कहा—जयति
भुवनैकभूषण विभीषणवरद (वि.प. २६-६)।
हनुमान्जीने सुग्रीव तथा विभीषण इन दो महानुभावोंको भगवान्‌से जोड़ा।
एकके यहाँ प्रभुको ले गए और एकको प्रभुके पास ले आए। सुग्रीवको
प्रभुका प्रभाव सुनाकर एवं विभीषणको प्रभुका स्वभाव समझाकर। उसी
प्रकार हम विषयी साधकोंको भी प्रभु-कृपाका अनुभव कराएँ।
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