शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
60 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
[वाम स्तम्भ / Left Column]
प्रकृति का कारण
(शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः।
प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।। 63 ।।)
गर्भाधान के समय शुक्र एवं शोणित के संयोग में जो
दोष (वात, पित्त एवं कफ) उत्कट अर्थात् बढ़ा हुआ होता है,
उसके प्रभाव से 'प्रकृति' उत्पन्न होती है। उसका लक्षण
मुझसे सुनो।
वात-प्रकृति का लक्षण
अल्पकेशः कृशो रूक्षो वाचालश्चलमानसः।
आकाशचारी स्वप्नेषु वातप्रकृतिको नरः।। 64 ।।
जिसके केश छोटे-छोटे हों, शरीर कृश तथा रूक्ष हो, जो
वाचाल या बकवादी हो, जिसका मन चञ्चल हो और स्वप्नों
में आकाश में उड़ा करे, वह पुरुष 'वातप्रकृति' होता है।
पित्त-प्रकृति का लक्षण
अकालपलितैर्व्याप्तो धीमान् स्वेदी च रोषणः।
स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्तप्रकृतिको नरः।। 65 ।।
जिसके बाल (केश एवं दाढ़ी-मूँछ) अकाल या
युवावस्था में ही श्वेत हो जायें, जो बुद्धिमान् हो, जिसे पसीना
अधिक हो, जो क्रोधी हो तथा स्वप्नों में ज्योति या चमकने
वाले तारे, बिजली आदि को देखा करे, वह मनुष्य 'पित्तप्रकृति'
होता है।
कफ-प्रकृति का लक्षण
गम्भीरबुद्धिः स्थूलाङ्गः स्निग्धकेशो महाबलः।
स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः।। 66 ।।
जिसकी बुद्धि गम्भीर हो, शरीर मोटा हो, केश चिकने
हों, जो बलवान् हो और स्वप्नों में जलाशयों (झील, तालाब
आदि) को देखा करे, वह पुरुष 'कफप्रकृति' होता है।
मिश्रित प्रकृति का लक्षण
ज्ञातव्या मिश्रचिह्नैश्च द्वित्रिदोषोल्बणा नराः।
उपरिलिखित चिह्नों के मिश्रण से द्विदोष-प्रकृति तथा
त्रिदोष-प्रकृति जानी जाती है।
निद्रा, मूर्च्छा, भ्रम एवं तन्द्रा का कारण
तमः कफाभ्यां निद्रा स्यान्मूर्च्छा पित्ततमोभवा ।। 67 ।।
रजःपित्तानिलैर्भ्रान्तिस्तन्द्रा श्लेष्मतमोनिलैः।
तमोगुण एवं कफ की अधिकता से 'निद्रा' या 'नींद'
पित्त तथा तमोगुण की अधिकता से 'मूर्च्छा' या बेहोशी;
रजोगुण, पित्त एवं वायु की अधिकता से 'भ्रान्ति' या भ्रम
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
और कफ, तमोगुण तथा वायु की अधिकता से 'तन्द्रा' या
'उँघायी' उत्पन्न होती है।
ग्लानि और आलस्य का लक्षण
ग्लानिरोजःक्षयाद्दुःखादजीर्णाच्च श्रमाद्भवेत्।। 68 ।।
यः सामर्थ्येऽप्यनुत्साहस्तदालस्यमुदीर्यते।
ओजस् के क्षय से, दुःख से, अनपच से एवं थकावट से
ग्लानि या सुस्ती होती है। सामर्थ्य (शक्ति) होने पर भी जो
किसी काम को करने का उत्साह (हौसला) नहीं होता, उसे
'आलस्य' कहते हैं।
वक्तव्य—'ग्लानि' हर्ष (उल्लास) के क्षय का नाम है।
जृम्भा का लक्षण
चैतन्यशैथिल्यत्वाद् यः पीत्वैकं श्वासमुद्गमेत्।। 69 ।।
विदीर्णवदनः श्वासं जृम्भा सा कथ्यते बुधैः।
चेतनाशक्ति के शिथिल होने से मुँह खोलकर जो एक
लम्बा साँस लेकर फिर छोड़ा जाता है, उसे 'जृम्भा' या 'जँभाई'
कहते हैं।
छींक का कारण और लक्षण
उदानप्राणयोरूर्ध्वयोगान्मौलिखस्रवात् ।। 70 ।।
शब्दः सञ्जायते नस्तः क्षुतं तत् कथ्यते बुधैः।
उदानवायु तथा प्राणवायु का ऊर्ध्वभाग (शृंगाटक मर्म)
में संयोग होने के कारण शिर में स्थित कफ का स्राव होने से
नाक द्वारा जो छीं-छीं ऐसा शब्द होता है, उसे 'क्षुत' या छींक
कहते हैं।
उद्गार का कारण तथा लक्षण
उदानकोपादाहारसुस्थिरत्वाच्च यद् भवेत्।। 71 ।।
पवनस्योर्ध्वगमनं तमुद्गारं प्रचक्षते।
उदानवायु के कोप के कारण अथवा आमाशय में भोजन
के स्थित होने से वायु को जो ऊर्ध्वगमन (ऊपर को उठना
और मुखमार्ग से निकलना) होता है, उसे 'उद्गार' या डकार
कहते हैं।
निद्रा का कारण और लक्षण
(यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।। 72 ।।
विषयेभ्यो निवर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः।)
मन के क्रियाहीन हो जाने पर जब चक्षुः आदि इन्द्रियाँ
अपने-अपने रूप आदि विषयों को ग्रहण करने से निवृत्त हो
जाती हैं, तब मानव सोता है, यही 'निद्रा' कही जाती है।
वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान
षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 61
वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान
तथा च० सू० अ० 24।
उत्क्लेश का कारण और लक्षण
(उत्क्लिश्यान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकष्ठीवनेरितम् ।। 76 ।।
हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्क्लेशं विनिर्दिशेत्।)
जिससे उदर में से अन्न निकलना चाहता है, किन्तु
निकलता नहीं, मुख में पानी जाता है, बार-बार थूक आता है
एवं हृदय में पीड़ा होती है, उसे 'उत्क्लेश' (जी मिचलाना या
मिचली आना) कहते हैं।
भ्रम का कारण और लक्षण
(चक्रवद् भ्रमतो लोकान् स्वात्मानं मन्यते तथा ।। 73 ।।
उत्थाने चाऽसमर्थः स्यात् यस्मात्स वै भ्रमः स्मृतः ।)
जिससे संसार के सभी पदार्थ चक्र के समान घूमते से
दिखलायी पड़ें और मनुष्य अपने को भी वैसा ही माने तथा
जिससे मनुष्य खड़ा रहने में भी असमर्थ हो जाये, उसका नाम
'भ्रम' या चक्कर आना है।
तन्द्रा का कारण और लक्षण
(इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः ।। 74 ।।
निद्रार्त्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत्।)
जिसको रूपादि विषयों का सम्यक् ज्ञान न हो, शरीर में
भारीपन हो, जम्भाइयाँ आ रही हों, सुस्ती हो तथा उँघाई
आती हो, उसकी इस व्याधि को 'तन्द्रा' कहते हैं।
ग्लानि का कारण और लक्षण
(वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टनं भ्रमः ।। 77 ।।
न चान्नमभिकाङ्क्षेत ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत्।)
जिससे मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंठन, भ्रम एवं
अन्न में अरुचि हो, उसे 'ग्लानि' कहते हैं।
गौरव का कारण और लक्षण
(आर्द्रचर्मावनद्धं हि यो गात्रमभिमन्यते ।
तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद् विनिर्दिशेत् ।। 78 ।।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे आहारादिगतिकथनं नाम
षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।।
जिससे रोगी शरीर को आर्द्र चर्म (गीला चमड़ा) से
बँधा हुआ-सा और शिर को अत्यन्त भारी-सा अनुभव करता
हो, उसे 'गौरव' कहते हैं।
क्लम का कारण और लक्षण
(योजनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।। 75 ।।
क्लमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रबाधकः ।)
जिससे बलपूर्वक कार्य किये बिना शरीर में 'श्रम'
(थकावट) बढ़ जाता है, किन्तु श्वास में किसी प्रकार का कष्ट
नहीं होता, इन्द्रियों द्वारा विषयों के ग्रहण में बाधा पड़ती है,
उसे 'क्लम' जानना चाहिये।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का छठा अध्याय समाप्त ।। 6 ।।
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यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
सप्तमोऽध्यायः
रोगगणना
[बायाँ स्तम्भ]
रोगभेद-परिचय
रोगाणां गणना पूर्वं मुनिभिर्या प्रकीर्तिता।
मयात्र प्रोच्यते सैव तद्भेदा बहवो मताः॥१॥
महर्षियों ने पूर्वकाल में (ग्रन्थों में) रोगों की जो गणना
(संख्या) कही है, मैं इस ग्रन्थ में उसी (गणना) को कहता
हूँ, किन्तु उसके बहुत से भेद माने गये हैं।
वक्तव्य- ग्रन्थकर्त्ता ने इस अध्याय में केवल रोगों की
संख्या मात्र का उल्लेख किया है कि अमुक रोग इतने प्रकार
का होता है; और रोग का अपना लक्षण तो उसके नाममात्र से
जान लिया जा सकता है। अतः किसी रोग का लक्षण लिखना
अनावश्यक समझ कर छोड़ दिया है। इसीलिए हमने भी रोगों
के विशिष्ट लक्षण लिखने का विचार छोड़ दिया। रोगों का
निश्चय करने के लिए प्रत्येक वैद्य के पास माधव-निदान
आदि पुस्तकें रहती ही हैं। यहाँ एक बात स्मरण रखनी चाहिये
कि आर्षग्रन्थों में रोगों की संख्या का निर्देश भिन्न-भिन्न
दृष्टिकोणों से किया गया है। यही कारण है कि किसी ग्रन्थ में
ज्वर आठ प्रकार का और किसी में पच्चीस प्रकार का, इसी
प्रकार किसी ग्रन्थ में अतिसार 6 है, तो किसी में सात इत्यादि।
इस प्रकार के भेदों को तात्त्विक भेद नहीं समझना चाहिये।
उदाहरण के लिए देखें—'एकम् एव रोगानीकं दुःखसामान्यात्।'
अर्थात् दुःखदायी होने के कारण सभी रोग एक से ही हैं,
इनका भेद भी नहीं है। 'द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं
चासाध्यं च'। अर्थात् साध्य और असाध्य भेद से रोग दो
प्रकार के होते हैं (च० वि० अ० ३)। दस प्रकार के भेदों का
कारण केवल यही है कि किसी ने किसी प्रकार से गणना
की और किसी ने किसी प्रकार से। इसी विषय को आचार्य
शार्ङ्गधर ने 'तद्भेदा बहवो मताः' कहकर व्यक्त किया
हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
ज्वर-संख्या
पञ्चविंशतिरुद्दिष्टा ज्वरास्तद्भेद उच्यते।
पृथग्दोषैस्तथा द्वन्द्वभेदेन त्रिविधः स्मृतः ॥२॥
एकश्च सन्निपातेन तद्भेदा बहवः स्मृताः।
प्रायशः सन्निपातेन पञ्च स्युर्विषमज्वराः ॥३॥
सन्ततः सततश्चैव अन्येद्युष्कस्तृतीयकः।
चातुर्थकश्च पञ्चैते कीर्तिता विषमज्वराः ॥४॥
तथागन्तुज्वरोऽप्येकस्त्रयोदशविधो मतः।
अभिचारग्रहावेशशापैरागन्तुकस्त्रिधा ॥५॥
श्रमाच्छेदात् क्षताद्दाहाच्चतुर्धाऽऽघातजो ज्वरः।
कामाद्भीतेः शुचो रोषाद् विषादौषधगन्धतः ॥६॥
अभिषङ्गज्वराः षट् स्युरेवं ज्वरविनिश्चयः।
ज्वर पच्चीस होते हैं। उनका भेद कहा जाता है—
पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन और सन्निपात
से एक; और सन्निपात के अनेक भेद होते हैं। तीनों दोषों के
सन्निपात से पाँच तो विषम ज्वर होते हैं। यथा—1. सन्तत, 2.
सतत, 3. अन्येद्यु, 4. तृतीयक (तिजारी) और 5. चातुर्थक
(चौथैया)। ये पाँचों 'विषमज्वर' भी कहे जाते हैं। इसी
प्रकार 'आगन्तु' ज्वर भी एक ही होता है, किन्तु उसके तेरह
भेद होते हैं। यथा—1. अभिचार (मारण, मोहन आदि क्रियाओं
से), 2. ग्रहावेश (ग्रहपीड़ा) से तथा 3. शाप से। अभिघात
(चोट आदि) से चार ज्वर होते हैं—1. श्रम (थकावट) से, 2.
छेद (अंग कटने) से, 3. क्षत (घाव) से और 4. दाह (जलने)
से। 1. काम (मैथुनाभिलाष) से, 2. भीति (भय या डर) से,
3. शोक से, 4. क्रोध से, 5. विष से और औषधियों (जहरीली)
के गन्ध से—ये 6 ज्वर 'अभिषंग' से होते हैं। इस प्रकार ज्वरों
की संख्या का निश्चय किया गया है।
सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 63
वक्तव्य-शरीर में साधारण से अधिक गर्मी या ताप का
बढ़ जाना 'ज्वर' कहलाता है। रोगी के अनुभव से, स्पर्श एवं
'थर्मामीटर' (धर्ममितर) नामक प्रसिद्ध यन्त्र (पारद-पूर्ण
काँच-नलिका) से ज्वर रोग की सत्ता जान ली जाती है।
प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक साधारण गर्मी 97 से 98½ डिग्री
होती है। विशेष देखें-च० नि० अ० 1 'चन्द्रिका-टीका'।
अतिसार-ग्रहणी-प्रवाहिका-गणना
पृथक् त्रिदोषैः सर्वैश्च शोकादामाद् भयादपि ।।7।।
अतीसारः सप्तधा स्याद् ग्रहणी पञ्चधा मता।
पृथग्दोषैः सन्निपातात् तथा चामेन पञ्चमी ।।8।।
प्रवाहिका चतुर्धा स्यात् पृथग्दोषैस्तथास्रतः।
पृथक्-पृथक् तीन दोषों से तीन, सन्निपात से एक, शोक
से एक, और भय से एक इस प्रकार 'अतिसार' (दस्त) सात
प्रकार का होता है। 'ग्रहणी' पाँच प्रकार की होती है-तीनों
दोषों से तीन, सन्निपात से चौथी और आम से पाँचवीं।
'प्रवाहिका' चार प्रकार की होती है-तीन दोषों से तीन और
रक्त से चौथी।
वक्तव्य-शरीर के तरल पदार्थों का गुदमार्ग से निकलना
या पतला पाखाना होना ही 'अतिसार' कहा जाता है। कभी
सूखे और कभी पतले पीड़ा युक्त अतिसार की परम्परा का
नाम 'ग्रहणी' या 'संग्रहणी' है और ऐंठन या मरोड़ के साथ
आँव का निकलना 'प्रवाहिका' या 'पेचिस' कहा जाता है।
इसी कारण मूत्र के अधिक होने को 'मूत्रातिसार' भी कहते हैं।
अजीर्ण-अलसक-विसूची-दण्डालसक-विलम्बिका-गणना
अजीर्णं त्रिविधं प्रोक्तं विष्टब्धं वायुना मतम् ।।9।।
पित्ताद् विदग्धं विज्ञेयं कफेनामं तदुच्यते।
विषाजीर्णं रसादेकं दोषैः स्यादलसस्त्रिधा ।।10।।
विसूची त्रिविधा प्रोक्ता दोषैः सा स्यात् पृथक्पृथक्।
दण्डकालसकश्चैव एकैव स्याद् विलम्बिका।।11।।
अजीर्ण (अनपच) तीन प्रकार का होता है-1. वायु से
विष्टब्ध, 2. पित्त से विदग्ध और 3. कफ से आम नामक
अजीर्ण होता है। रस से एक अजीर्ण होता है-विषाजीर्ण।
तीनों दोषों से 'अलसक' तीन प्रकार का होता है। विसूची
(हैजा या कालरा) पृथक्-पृथक् दोषों से तीन प्रकार की
होता है। 'दण्डालसक' एवं विलम्बिका एक-एक प्रकार के
होते हैं।
वक्तव्य-उक्त सभी रोग अनपच के ही रूपान्तर हैं। रस
का पूर्णतया परिपाक न होने से शरीर में विष के से लक्षण
उत्पन्न होने के कारण एक 'विषाजीर्ण' संज्ञा भी दी गयी है।
अलसक को 'गुम हैजा' भी कहते हैं। 'दण्डालसक' में रोगी
का शरीर दण्ड के समान अकड़ जाता है।
अर्श-गणना
अर्शांसि षड्विधान्याहुर्वातपित्तकफास्रतः।
सन्निपाताच्च संसर्गात् तेषां भेदो द्विधा स्मृताः ।। 12।।
सहजोत्तरजन्मभ्यां तथा शुष्कार्द्रभेदतः।
त्रिधैव चर्मकीलानि वातात् पित्तात् कफादपि ।। 13।।
बवासीर छः प्रकार के होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से,
3. कफ से, 4. रक्त से, 5. सन्निपात से और 6. दो-दो दोषों
के संसर्ग से, ये दो प्रकार के होते हैं-1. सहज (शरीर के
साथ ही उत्पन्न होने वाले) और 2. जन्म के पश्चात् उत्पन्न होने
वाले। 'शुष्कार्श' (सूखी या वादी) तथा 'आर्द्र (स्राव युक्त
या खूनी) के भेद से दो प्रकार के होते हैं। चर्मकील (मस्से)
तीन प्रकार के होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से और 3. कफ
से।
वक्तव्य-गुद-प्रदेश में जो मांस के 'अंकुर' उत्पन्न हो
जाते हैं, उन्हें 'अर्श' या बवासीर कहते हैं और त्वचा पर जो
मस्से निकल आते हैं, उन्हें 'चर्मकील' कहते हैं।
कृमि-गणना
एकविंशतिभेदेन कृमयः स्युर्द्विधा च ते।
बाह्यास्तथाभ्यन्तराः स्युस्तेषु यूका बहिश्चराः ।।14।।
लिक्षाश्चान्येऽन्तरचराः कफात्ते हृदयादकाः।
अन्नादा उदरावेष्ठाश्चूरवश्च महागुहाः ।। 15।।
सुगन्धा दर्भकुसुमास्तथा रक्ताच्च मातरः।
सौरसा लोमविध्वंसा रोमद्वीपा उदुम्बराः।। 16।।
केशादाश्च तथैवान्ये शकृज्जाता मकेरुकाः।
लेलिहाश्च सलूनाश्च सौसुरादाः ककेरुकाः ।। 17।।
तथान्यः कफरक्ताभ्यां सञ्जातः स्नायुकः स्मृतः।
व्रणस्य क्रिमयश्चान्ये विषमा बाह्ययोनयः ।। 18।।
कृमि बीस प्रकार के होते हैं और वे सब 'बाह्य' (बाहर
होने वाले) तथा 'आभ्यन्तर' (भीतर होने वाले) के भेद से
दो प्रकार के होते हैं। उनमें 'यूका' (जूएँ) तथा 'लिक्षा'
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64 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
(लीख) बाह्य या 'बहिर्श्वर' (बाहरी त्वचा पर घूमने वाले)
कहे जाते हैं। शेष सब अन्तश्चर (भीतर घूमने वाले) होते
हैं। यथा-1. हृदयादक (हृदय को खाने वाले 'कृमिज हृद्रोग'
के उत्पादक), 2. अन्नाद (आँतड़ियों को खाने वाले 'आन्त्रिक
ज्वर' के उत्पादक), 3. उदरावेष्ट (आमाशय में लिपटने वाले)
4. चुरु 5. महागुहा (महास्रोतस् या आँतड़ियों में होने वाले)
6. सुगन्धा (नाक तथा शिर में उत्पन्न होने वाले) और 7.
दर्भकुसुम (फुफ्फुसों में उत्पन्न होने वाले या यक्ष्मा रोग के
उत्पादक), ये सब कफ से होते हैं। तथा-1. मातृ (जन्तु
माता) 2. सौरस (तरुणास्थियों को खाने वाले), लोमविध्वंस
(रोमनाशक), 4. रोमद्वीप (रोमों की जड़ में रहने वाले), 5.
उदुम्बर (गूलर के फल जैसा शोथ उत्पन्न करने वाले, उसमें
अनन्त कृमि होते हैं) और 6. केशाद (शिर के बालों की जड़
को खा जाने वाले)। ये छः रक्त से होते हैं, जो कुष्ठरोगियों के
रक्त में पाये जाते (कुष्ठैककर्माणः) हैं। और दूसरे पुरीष
(मल) में उत्पन्न होते हैं। यथा-1. मकेरुक, 2. लेलिह, 3.
ससूना (सशूलाः, च० वि० अ० 7), 4. सौसुराद तथा 5.
ककेरुक। तथा एक और कृमि जो कफ एवं रक्त से उत्पन्न
होता है, उसे 'स्नायुक' या 'नहरुआ' कहते हैं। व्रणों या घावों
में छोटे-बड़े कृमि उत्पन्न हो जाते हैं, वे बाहरी कारणों से
(किरौनी नामक मक्खी के बैठने से) उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य-उक्त कृमियों में से कुछ तो आँखों से देखे जाते
हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी हैं, जो 'अणुवीक्षण' यन्त्र द्वारा देखे जा
सकते हैं। मेरे विचार से आजकल जो पाश्चात्य चिकित्सकों
में कृमियों की चर्चा चल रही है, उसको इन बीस प्रकार के
कृमियों से मिलान करने का कष्ट करें तो इस विषय को
समझने में आपको बड़ी सहायता मिलेगी। 'स्नायुक' प्रायः
शरीर की शाखाओं (टाँगों और बाँहों) में होता है और सफेद
डोरे जैसा निकलता है। आचार्य शार्ङ्गधर ने व्रण के कृमियों
को अलग गिना है, किन्तु चरक में वे 'जन्तुमातरः' (जन्तुः
माता येषां ते=जन्तुमातरः) के नाम से कहे गये हैं। कृमियों के
विवेचन के लिए सु० उ० अ० 54 को पूर्ण जानकारी के लिए
अवश्य देखें।
पाण्डुकामला-कुम्भकामला-हलीमक-गणना
पाण्डुरोगाश्च पञ्च स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा।
त्रिदोषैर्मृत्तिकाभिश्च तथैका कामला स्मृता।। १९।।
स्यात् कुम्भकामला चैका तथैकं च हलीमकम्।
पाण्डुरोग पाँच प्रकार का होता है-1. वायु से, 2. पित्त
से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, और 5. मिट्टी खाने से।
कामला एक ही होता है, कुम्भकामला एक होता है और
'हलीमक' भी एक होता है।
वक्तव्य-रक्त में रक्तकणों की कमी हो जाने से शरीर
पीलापन लिये सफेद हो जाता है। इस रोग को 'पाण्डुरोग'
कहते हैं। यदि रक्त में पित्त का अधिक मिश्रण हो जाता है, तो
शरीर का रंग हल्दी का-सा हो जाता है, आँखें और मूत्र
अधिक पीले हो जाते हैं। इसे 'कामला' या 'पीलिया' कहते
हैं। उक्त रोगों का यदि कुम्भ (उदर) में (यकृत्-प्लीहा पर)
अधिक प्रभाव पड़ता है, तो उसे 'कुम्भकामला' कहा जाता है
और जब रोगी का वर्ण काला या हरापन लिये पीला होता है,
तो उसे 'हलीमक' कहते हैं। हलीमक को ही 'कालाजार'
कहते हैं। इन सबमें यकृत् और प्लीहा की विकृति ही कारण
होता है।
रक्तपित्त-गणना
रक्तपित्तं त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वगं कफसम्भवम् ।। २० ।।
अधोगं मारुतं ज्ञेयं तद्द्वयेन द्विमार्गगम्।
रक्तपित्त तीन प्रकार का होता है-1. ऊर्ध्वगामी नाक,
मुख आदि ऊपर के स्रोतों से निकलने वाला, जो कफ से
होता है, 2. अधोगामी लिंग एवं योनिमार्ग से निकलने वाला,
जो वायु से होता है और 3. द्विमार्गगामी, ऊपर एवं नीचे के
स्रोतों से, जो कि वायु एवं कफ के प्रकोप से होता है।
वक्तव्य-पित्त की वृद्धि से रक्त इतना पतला हो जाता है
कि वह केशिकाओं से रिसकर (चूकर) निकलने लगता है।
यह रक्तपित्त का असाध्य स्थिति कही जाती है।
कास-गणना
कासाः पञ्च समुद्दिष्टास्ते त्रयः स्युस्त्रिभिर्मलैः ।। २१ ।।
उरः क्षताच्चतुर्थः स्यात् क्षयाद्धातोश्च पञ्चमः।
कास पाँच प्रकार का होता है-वातादि दोषों से तीन, उरः
(फुफ्फुस एवं श्वासमार्ग) में क्षत या घाव होने से चौथा और
धातुक्षय से पाँचवाँ।
क्षय-गणना
क्षयाः पञ्चैव विज्ञेयास्त्रिभिर्दोषैस्त्रयश्च ते ।। २२ ।।
सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 65
चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमः स्यादाुरःक्षतात्।
क्षय पाँच ही माने जाते हैं। यथा-तीनों दोषों से तीन,
सन्निपात से चौथा और उरःक्षत से पाँचवाँ।
वक्तव्य-क्षय का दूसरा नाम 'राजयक्ष्मा' या तपेदिक
है। एक तो इस रोग में रसधातु कफ के रूप में और उरःक्षत
होने पर रक्त के रूप में निकल जाता है। अतः इसे 'कफक्षयी'
भी कहा जाता है और शुक्र के अधिक क्षय से (सब धातु
शुक्र रूप में परिणत होकर निकल जाते हैं) उक्त दोनों ही
प्रकार से धातुओं का क्षय या ह्रास होता जाता है, अतएव इसे
'क्षय' कहते हैं।
शोष की कारण-भेद से गणना
शोषाः स्युः षट्प्रकारेण स्त्रीप्रसङ्गाच्छुचो व्रणात् ।। २३ ।।
अध्वश्रमाच्च व्यायामाद् वार्धक्यादपि जायते।
शोष छः प्रकार का होता है-1. अधिक मैथुन करने से,
2. शोक से, 3. व्रण से, 4. मार्ग की थकावट से, 5. अधिक
व्यायाम (कसरत) से और 6. बुढ़ापा से।
वक्तव्य-स्वस्थान स्थित धातुओं का सूख जाना ही 'शोष'
होता है। हमारे विचार में मैथुन एवं व्रण से होने वाले शोष को
क्षय कहना उचित होगा, क्योंकि इनमें शुक्र और पूय (मवाद)
के रूप में धातुओं का क्षय होता है, न कि शोष।
श्वास-गणना
श्वासाश्च पञ्च विज्ञेयाः क्षुद्रः स्यात्तमकस्तथा ।। २४ ।।
ऊर्ध्वश्वासो महाश्वासश्छिन्नश्वासश्च पञ्चमः।
'श्वास' रोग पाँच होते हैं। यथा-1. क्षुद्र, 2. तमक, 3.
ऊर्ध्वश्वास, 4. महाश्वास और 5. छिन्नश्वास।
वक्तव्य-'श्वास रोग' को 'दमा' कहते हैं। श्वास लेने में
कष्ट होना ही 'श्वास रोग' है।
हिक्का-गणना
कथिताः पञ्च हिक्कास्तु तास्तु क्षुद्राऽन्नजा तथा ।। २५ ।।
गम्भीरा यमला चैव महती पञ्चमी तथा।
हिक्का पाँच प्रकार की होती है। यथा-1. क्षुद्रा, 2.
अन्नजा, 3. गम्भीरा, 4. यमला और 5. महती।
वक्तव्य-हिक्का को ही 'हिचकी' कहते हैं।
जठराग्नि विकार गणना
चत्वारोऽग्नेर्विकाराः स्युर्विषमो वातसम्भवः ।। २६ ।।
तीक्ष्णः पित्तात् कफान्मन्दो भस्मको वातपित्तयोः।
अग्नि-विकार चार होते हैं। यथा-1. वायु से विषम,
2. पित्त से तीक्ष्ण, 3. कफ से मन्द एवं 4. वात-पित्त से
'भस्मक'।
अरोचक-गणना
पञ्चैवारोचका ज्ञेया वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। २७ ।।
सन्निपातान्मनस्तापात् -
अरोचक पाँच होते हैं। यथा-1. वायु से, 2. पित्त से, 3.
कफ से, 4. सन्निपात से और 5. मानसिक कष्ट से।
वक्तव्य-जब रोगी यह कहता है कि खाने को जी नहीं
चाहता या खाना अच्छा नहीं लगता, तो इसे 'अरोचक या
अरुचि' समझना चाहिये।
छर्दि-गणना
-छर्दयः सप्तधा मताः।
त्रिभिर्दोषैः पृथक् तिस्रः कृमिभिः सन्निपाततः ।। २८ ।।
घृणया च तथा स्त्रीणां गर्भाधानाच्च जायते।
छर्दि सात प्रकार की होती है। यथा-तीनों दोषों से
पृथक्-पृथक् तीन, कृमियों से चौथी, सन्निपात से पाँचवीं,
घृणा से छठी और स्त्रियों को गर्भधान हो जाने से सातवीं।
वक्तव्य-छर्दि को ही उलटी, कै, वमि या वमन कहते हैं।
स्वरभेद-गणना
स्वरभेदाः षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रयः ।। २९ ।।
मेदसा सन्निपातेन क्षयात् षष्ठः प्रकीर्तितः।
स्वरभेद छः प्रकार का होता है-1. वायु से, 2. पित्त से,
3. कफ से, 4. मेदा के बढ़ने से, 5. सन्निपात से और
6. धातुक्षय से।
वक्तव्य-गला बैठना या बोला न जाना ही 'स्वर भेद'
कहा जाता है।
तृष्णा-गणना
तृष्णा च षड्विधा प्रोक्ता वातात् पित्तात् कफादपि ।। ३० ।।
त्रिदोषैरुपसर्गेण क्षयाद् धातोश्च षष्ठिका।
तृष्णा छः प्रकार की कही गयी है। यथा-1. वायु से, 2.
पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. उपसर्ग से और 6.
धातुक्षय से।
66 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
वक्तव्य-आवश्यकता से अधिक प्यास लगना 'तृष्णा
रोग' होता है उपसर्ग-घाव आदि होने पर जब शरीर से रक्त
धातु अधिक निकल जाता है, तो प्यास बहुत लगती है। इसी
को 'उपसर्गजा तृष्णा' कहते हैं।
मूर्च्छादि-गणना
मूर्च्छा चतुर्विधा ज्ञेया वातपित्तकफैः पृथक् ।। 31 ।।
चतुर्थी सन्निपातेन तथैकश्च भ्रमः स्मृतः।
निद्रा तन्द्रा च संन्यासो ग्लानिंश्चैकैकशः स्मृताः ।। 32 ।।
मूर्च्छा चार प्रकार की होती है-वात, पित्त तथा कफ से
तीन और सन्निपात से चौथी। भ्रम रोग एक ही प्रकार का होता
है। निद्रा (नींद), तन्द्रा, संन्यास एवं ग्लानि ये रोग एक-एक
प्रकार के ही होते हैं।
वक्तव्य-बेहोशी को ही मूर्च्छा कहा जाता है। संन्यास
उस मूर्च्छा को कहते हैं, जिससे रोगी चिकित्सा के बिना होश
में नहीं आता और मर भी जाता है। मूर्च्छा का रोगी तो कुछ
समय के बाद स्वयं होश में आ जाता है।
मद-मदात्ययादि-गणना
मदाः सप्त समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रयः।
त्रिदोषैरसृजा मद्याद्विषादपि च सप्तमः ।। 33 ।।
मदात्ययश्चतुर्था स्याद् वातपित्तकफादपि।
त्रिदोषैरपि विज्ञेय एकः परमदस्तथा ।। 34 ।।
पानाजीर्णं तथा चैकं तथैकः पानविभ्रमः।
पानात्ययस्तथा चैको-
मद सात कहे गये हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन,
सन्निपात से एक, रक्त से एक, मद से एक एवं विष से
सातवाँ। 'मदात्यय' चार प्रकार का होता है-वात से, पित्त से,
कफ से तथा सन्निपात से। 'परमद' एक ही प्रकार का होता
है, 'पानाजीर्ण' एक प्रकार का होता है, 'पानविभ्रम' एक
होता है और 'पानात्यय' भी एक होता है।
वक्तव्य-'मद' उस अवस्था का नाम है, जो शराब,
भाँग आदि मादक द्रव्यों के सेवन करने पर हो जाता है।
'मदात्यय' मद से होने वाली हानि को कहते हैं। 'परमद' मद
की अधिकता का नाम है। सेवन किये हुये मादक द्रव्यों का
न पचना 'पानाजीर्ण' है और उन्हीं मादक द्रव्यों के विकार से
होने वाली हानि को 'पानविभ्रम' तथा मादक द्रव्यों का अधिक
सेवन करने पर होने वाली हानि को 'पानात्यय' कहा जाता है।
दाह-गणना
-दाहाः सप्त मतास्तथा ।। 35 ।।
रक्तपित्तात्तथा रक्तात्तृष्णायाः पित्ततस्तथा।
धातुक्षयान्मर्मघाताद् रक्तपूर्णोदरादपि ।। 36 ।।
'दाह' सात माने जाते हैं-1. रक्तपित्त से, 2. रक्त से, 3.
प्यास रोकने से, 4. पित्त से, 5. धातुक्षय से, 6. मर्मस्थानों पर
चोट आने से और 7. रक्त से उदर भर जाने से।
वक्तव्य-दाह उस जलन को कहते हैं, जिसका अनुभव
केवल रोगी ही करता है।
उन्माद-गणना
उन्मादाः षट् समाख्यातास्त्रिभिर्दोषैस्त्रयश्च ते।
सन्निपाताद् विषाज्ज्ञेयः षष्ठो दुःखेन चेतसः ।। 37 ।।
उन्माद छः कहे जाते हैं-तीनों दोषों से तीन, सन्निपात से
चौथा, विष से पाँचवाँ और मानसिक दुःख से छठा।
वक्तव्य-'उन्माद' पागलपन का नाम है। बुद्धि का बिगड़
जाना ही पागलपन है।
भूतोन्माद-गणना
भूतोन्मादा विंशतिः स्युस्ते देवाद्वानवादपि ।
गन्धर्वात् किन्नराद्यक्षात् पितृभ्यो गुरुशापतः ।। 38 ।।
प्रेताच्च गुह्यकाद् वृद्धात्सिद्धाद्भूतात्पिशाचतः।
जलाधिदेवतायाश्च नागाच्च ब्रह्मराक्षसात् ।। 39 ।।
राक्षसादपि कूष्माण्डात् कृत्यावेतालयोरपि।
भूतोन्माद बीस होते हैं-1. देवता से, 2. दानव से, 3.
गन्धर्व से, 4. किन्नर से, 5. यक्ष से, 6, पितर से, 7. गुरुजन
के शाप से, 8. प्रेत से, 9. गुह्यक से, 10. वृद्ध को कष्ट देने
से, 11. सिद्धों से, 12. भूत से, 13. पिशाच से, 14. वरुण से,
15. नाग से, 16. ब्रह्मराक्षस से, 17. राक्षस से, 18. कूष्माण्ड
से, 19. कृत्या (तान्त्रिकक्रिया-विशेष) से और 20. वेताल से।
वक्तव्य-गुरु तथा वृद्ध को छोड़कर शेष सभी अलौकिक
आत्माएँ हैं। इन आत्माओं का किन्हीं कारणों से मानव-शरीर
में आवेश होता है और मनुष्य पागल हो जाता है। कृत्या के
साहित्य तथा उसके उपचारों को तान्त्रिक लोगों से समझें।
सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 67
अपस्मार-गणना
अपस्मारश्चतुर्धा स्यात् समीरात् पित्ततस्तथा ।। 40 ।।
श्लेष्मणोऽपि तृतीयः स्याच्चतुर्थः सन्निपाततः ।
अपस्मार चार प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त
से, 3. कफ से और 4. सन्निपात से।
वक्तव्य-अपस्मार को मृगी या मिरगी भी कहते हैं।
आमवात-गणना
चत्वारश्चामवाताः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 41 ।।
चतुर्थः सन्निपातेन -
आमवात चार होते हैं-वात, पित्त और कफ से तीन और
चौथा सन्निपात से।
वक्तव्य-आमवात को प्रचलित भाषा में 'गठिया' कहा
जाता है।
शूल-गणना
- शूलान्यष्टौ बुधा जगुः।
पृथग्दोषैस्त्रिधा द्वन्द्वभेदेन त्रिविधान्यपि ।। 42 ।।
आमेन सप्तमं प्रोक्तं सन्निपातेन चाष्टमम्।
विद्वान् लोग 'शूल' को आठ प्रकार का कहते हैं-
पृथक्-पृथक् वात आदि दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन,
आम से सातवाँ और सन्निपात से आठवाँ।
वक्तव्य-शूल मध्यकाय में कहीं भी हो सकता है। इसके
विशेष ज्ञान के लिए देखें-सु० उ० तं० अ० 42।
परिणामशूल-गणना
परिणामभवं शूलमष्टधा परिकीर्तितम् ।। 43 ।।
मलैयैः शूलसङ्ख्या स्यात् तैरेव परिणामजम्।
अन्नद्रवभवं शूलं ज्वरपित्तभवं तथा ।। 44 ।।
एकैकं गणितं सुज्ञैः-
परिणामशूल आठ प्रकार का कहा गया है-जिन मलों
(वातादि दोषों और आम) से शूल की गणना की गयी है,
उन्हीं से परिणामशूल भी हो जाता है। अन्नद्रवशूल एवं जरत्पित्त
से होनेवाला शूल ये एक एक प्रकार के होते हैं।
वक्तव्य-ऊपर कहे गये शूलों का स्पष्टीकरण-
परिणामशूल-यह केवल आहार की पच्यमानावस्था (पचते
समय) में होता है। अन्नद्रवशूल-यह केवल द्रव आहार पीने
से अथवा आहार में मिलने वाले द्रव रसों (पित्त आदि) के
विकार से होता है। जरत्पित्तशूल- यह पित्त के पचते समय
होता है जो कै या उलटी होने पर शान्त हो जाता है।
उदावर्त्त-गणना - उदावर्तास्त्रयोदश ।
एकः क्षुन्निग्रहात्प्रोक्तस्तृष्णारोधाद् द्वितीयकः ।। 45 ।।
निद्राघातात्तृतीयः स्याच्चतुर्थः श्वासनिग्रहात्।
छर्दिरोधात् पञ्चमः स्यात् षष्ठः क्षवथुनिग्रहात् ।। 46 ।।
जृम्भारोधात् सप्तमः स्यादुद्गारग्रहतोऽष्टमः ।
नवमः स्यादश्रुरोधाद् दशमः शुक्रधारणात् ।। 47 ।।
मूत्ररोधान्मलस्यापि रोधाद् वातविनिग्रहात्।
उदावर्तास्त्रयश्चैते घोरोपद्रवकारकाः ।। 48 ।।
उदावर्त्त तेरह होते हैं-1. भूख को रोकने से, 2. प्यास
को रोकने से, 3 निद्रा (नींद) को रोकने से, 4. श्वास (चढ़े
हुये श्वास) को रोकने से, 5. कै (दूषित कै) को रोकने से, 6.
छींक को रोकने से, 7. जँभाई को रोकने से, 8. उद्गार
(डकार) को रोकने से, 9. आँसुओं को रोकने (जब रोने का
वेग उत्पन्न हो, तो उसे रोकने) से, 10. शुक्र को अनुचित ढंग
से (ब्रह्मचर्य रखना बहुत आवश्यक है) रोकने से, 11. मूत्र
को रोकने से, 12. मल (विष्ठा) को रोकने से और 13. वायु
(अपानवायु) को रोकने से, इनमें अन्तिम तीन उदावर्त्त बड़े
भयंकर होते हैं।
वक्तव्य-प्रकृति जिन पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल
देना चाहती है, उनको हठात् न निकलने देना अर्थात् उक्त
पदार्थों का उत् (उलटा) आवर्त्त (पीछे को घूमना या लौट
जाना) 'उदावर्त्त' कहलाता है। इससे बहुत हानि होती है,
अतः 'न वेगान् धारयेत् धीमान्' अर्थात् उक्त वेगों को नहीं
रोकना चाहिये, ऐसा कहा गया है। जैसे रोगयुक्त श्वास के वेग
को रोकना तो हानिकारक होता है, किन्तु प्राणायाम के समय
उसे रोकना लाभदायक होता है।
आनाह-गणना
आनाहो द्विविधो ज्ञेय एकः पक्वाशयोद्भवः ।
आमाशयोद्भवश्चान्यः प्रत्यानाहः स कथ्यते ।। 49 ।।
आनाह दो प्रकार का होता है-1. पक्वाशय का और 2.
आमाशय का, इसे 'प्रत्यानाह' भी कहा जाता है।
68 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
| 68 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे |
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**वक्तव्य-**पक्वाशय एवं आमाशय में स्वभाव से ही आकुञ्चनवत् गति हुआ करती है (जिसके कारण आहार आगे-आगे सरकता रहता है), इसकी गति का रुक जाना ही 'आनाह' (आङ् उपसर्ग पूर्वक णह बन्धने' धातु का घञ् प्रत्ययान्त रूप) है।
उरोग्रह-गणना
उरोग्रहस्तथा चैको-
'उरोग्रह' एक प्रकार का होता है।
वक्तव्य-'उरोग्रह' नामक रोग सम्भवतः 'उरः=उरःस्थल का ग्रह=जकड़ना' का अथवा हृदय की गति के निरोध (हार्ट-फेल) का अथवा फुप्फुस की गति के निरोध का नाम है।
हृद्रोग-गणना
-हृद्रोगाः पञ्च कीर्तिताः।
वातादिभित्रयः प्रोक्ताश्चतुर्थः सन्निपाततः ॥ ५० ॥
पञ्चमः कृमिसञ्जातः-
हृद्रोग पाँच कहे गये हैं-वायु आदि तीनों दोषों से तीन, चौथा सन्निपात से और पाँचवाँ कृमियों से।
**वक्तव्य-**दोनों फुप्फुसों के मध्य में रक्त का सञ्चालक हृदय नामक जो यन्त्र है, उसी में रोग होते हैं। 'पञ्चमः कृमिसञ्जातः' जो रोग है, उसमें उक्त 'हृदयाद' नामक कृमि उत्पन्न हो जाते हैं।
उदररोग-गणना
-तथाष्टावुदराणि च।
वातात्पित्तात्कफात्रीणि त्रिदोषेभ्यो जलादपि ॥ ५१ ॥
प्लीह्नः क्षताद् बद्धगुदादष्टमं परिकीर्तितम्।
'उदर रोग' आठ होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. जल (जलोदर) से, 6. प्लीहा (यकृत्-विकार) से, 7. क्षत (आँतड़ियों में घाव या छिद्र होने) से तथा 8. बद्धगुद (मलाशय या गुद में मल की रुकावट होने) से।
**वक्तव्य-**उदर में अनेक रोग होते हैं, किन्तु वे उदर के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में होते हैं। सम्पूर्ण उदर में विकृति होने के कारण ही ये 'उदर-रोग' कहे जाते हैं।
गुल्मरोग-गणना
गुल्मास्त्वष्टौ समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रयः ॥ ५२ ॥
द्वन्द्वभेदास्त्रयः प्रोक्ताः सप्तमः सन्निपाततः।
रक्तादष्टमकः ख्यातो-
गुल्म आठ कहे गये हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, दो-दो दोषों से तीन; सातवाँ सन्निपात से और आठवाँ रक्त से (यह स्त्रियों के गर्भाशय में ही होता है)।
वक्तव्य-'गुल्म' वायुगोला के नाम से प्रसिद्ध रोग है।
मूत्राघात-गणना
- मूत्राघातास्त्रयोदश ।। ५३ ।।
वातकुण्डलिका पूर्वा वाताष्ठीला ततः परा।
वातवस्तिस्तृतीयः स्यान्मूत्रातीतश्चतुर्थकः ।। ५४ ।।
पञ्चमं मूत्रजठरं षष्ठो मूत्रक्षयः स्मृतः।
मूत्रोत्सर्गः सप्तमः स्यान्मूत्रग्रन्थिस्तथाष्टमः ।। ५५ ।।
मूत्रशुक्रं तु नवमं विड्घातो दशमः स्मृतः।
मूत्रासादश्चोष्णवातो वस्तिकुण्डलिका तथा ।। ५६ ।।
मूत्राघातास्त्रयोऽप्येते पृथग्घोराः प्रकीर्तिताः।
मूत्राघात तेरह होते हैं-1. वातकुण्डलिका, 2. वाताष्ठीला, 3. वातवस्ति, 4. मूत्रातीत, 5. मूत्रजठर, 6. मूत्रक्षय, 7. मूत्रोत्सर्ग, 8. मूत्रग्रन्थि, 9. मूत्रशुक्र, 10. विड्घात, 11. मूत्रासाद, 12. उष्णवात तथा 13. वस्तिकुण्डलिका। इनमें अन्तिम तीन मूत्राघात बहुत कष्टदायक होते हैं।
**वक्तव्य-**उक्त रोगों में मूत्र में रुकावट होती है, अथवा मूत्राशय में मूत्र बनता ही नहीं, अतः इन्हें मूत्राघात कहते हैं। उष्णवात और मूत्रासाद दोनों का सम्मिलित नाम 'सुजाक' हो सकता है। दोनों के लक्षणों पर आप ध्यान दें।
मूत्रकृच्छ्र-गणना
मूत्रकृच्छ्राणि चाष्टौ स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। ५७ ।।
सन्निपाताच्चतुर्थं स्याच्छुक्रकृच्छ्रं च पञ्चमम्।
विट्कृच्छ्रं षष्ठमाख्यातं घातकृच्छ्रं च सप्तमम् ।। ५८ ।।
अष्टमं चाश्मरीकृच्छ्रं-
मूत्रकृच्छ्र आठ होते हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, सन्निपात से चौथा, शुक्रकृच्छ्र पाँचवाँ, विट्कृच्छ्र छठा, घातकृच्छ्र सातवाँ और अश्मरीकृच्छ्र आठवाँ।
**वक्तव्य-**उक्त रोगों में पेशाब करने में अधिक कष्ट होता है; अतः इन्हें 'मूत्रकृच्छ्र' कहते हैं।
सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना ६९
अश्मरी-गणना
-चतुर्धा चाश्मरी मता।
वातात्पित्तात्कफाच्छुक्रात् -
अश्मरी (पथरी) चार प्रकार की होती है-१. वायु से, २. पित्त से, ३. कफ से तथा ४. शुक्र से।
वक्तव्य- अश्मरी या पथरी वस्ति या मूत्राशय में तथा वृक्कों में होती है और शुक्राश्मरी (शुक्र की पथरी) शुक्राशय में होती है।
प्रमेह-गणना
-तथा मेहाश्च विंशतिः ॥५९॥
इक्षुमेहः सुरामेहः पिष्टमेहश्च सान्द्रकः।
शुक्रमेहोदकाख्यौ च लालामेहश्च शीतकः॥६०॥
सिकताख्यः शनैर्मेहो दशैते कफसम्भवाः।
मञ्जिष्ठाख्यो हरिद्राख्यो नीलमेहश्च रक्तकः॥६१॥
कृष्णमेहः क्षारमेहः षडेते पित्तसम्भवाः।
हस्तिमेहो वसामेहो मज्जामेहो मधुप्रभः॥६२॥
चत्वारो वातजा मेहा इति मेहाश्च विंशतिः।
प्रमेह बीस होते हैं-१. इक्षुमेह, २. सुरामेह, ३. पिष्टमेह, ४. सान्द्रमेह, ५. शुक्रमेह, ६. उदकमेह, ७. लालामेह, ८. शीतमेह, ९. सिकतामेह तथा १०. शनैर्मेह, ये दस प्रमेह कफ से होते हैं; ११. मञ्जिष्ठामेह, १२. हरिद्रामेह, १३. नीलमेह, १४. रक्तमेह, १५. कृष्णमेह (मसीमेह) तथा १६. क्षारमेह, ये छः प्रमेह पित्त से होते हैं; १७. हस्तिमेह, १८. वसामेह, १९. मज्जामेह और २०. मधुमेह, ये चार प्रमेह वातदोष से होते हैं।
वक्तव्य- धातुओं के उपादान (धातुपोषक पदार्थ, जो कि आहार रस के रूप में रक्त में पहुँचते हैं) वृक्कों द्वारा छन जाते हैं और मूत्र में मिलकर निकलते हैं (अतएव मूत्र अधिक एवं गाढ़ा आने लगता है), बस इसी को 'प्रमेह' कहते हैं। प्रमेहों के नामों पर ध्यान देने से ज्ञात हो सकता है कि उन-उन में मूत्र कैसा होता है और उसमें क्या-क्या घुला रहता है।
सोमरोग-गणना
सोमरोगस्तथा चैकः-
सोम रोग एक होता है।
वक्तव्य- इस रोग में निर्मल या केवल जल जैसा मूत्र होता है और मात्रा में बहुत अधिक। उक्त रोग स्त्रियों को अधिक होता है।
प्रमेहपिड़का-गणना
-प्रमेहपिडका दश॥६३॥
शराविका कच्छपिका पुत्रिणी विनताऽलजी।
मसूरिका सर्षपिका जालिनी च विदारिका॥६४॥
विद्रधिश्च दशैताः स्युः पिडका मेहसम्भवाः।
प्रमेहपिड़काएँ दस होती हैं-१. शराविका, २. कच्छपिका, ३. पुत्रिणी ४. विनता, ५. अलजी, ६. मसूरिका, ७. सर्षपिका, ८. जालिनी, ९. विदारिका और १०. विद्रधि-ये दस पिड़काएँ (फुन्सियाँ या फोड़े) प्रमेह के कारण होती हैं।
वक्तव्य- उक्त पिड़काएँ प्रायः प्रमेह रोगियों को होती हैं और बहुत कष्टप्रद होती हैं। 'विनता' नाम का वह प्रसिद्ध फोड़ा है, जिसे 'अदीठ' या 'कार्बकल' कहते हैं।
मेडोरोग-गणना
मेदोदोषस्तथा चैकः-
मेदोरोग एक होता है।
वक्तव्य- अनावश्यक रूप से मोटा होना 'मेदो-दोष' या 'मोटापा' कहलाता है।
शोथ-गणना
-शोथरोगा नव स्मृताः॥६५॥
दोषैः पृथग्द्वयैः सर्वैरभिघाताद् विषादपि।
शोथ (सूजन) नौ प्रकार का होता है-पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन, सब दोषों (सन्निपात) से एक, अभिघात (चोट लगने) से एक तथा विष-सेवन से एक।
वृद्धिरोग-गणना
वृद्धयः सप्त गदिता वातात्पित्तात्कफेन च॥६६॥
रक्तेन मेदसा मूत्रादन्त्रवृद्धिश्च सप्तमी।
वृद्धिरोग सात प्रकार का कहा गया है-१. वायु से, २. पित्त से, ३. कफ से, ४. रक्त से, ५. मेदा से, ६. मूत्र से और ७. अन्त्रवृद्धि से।
वक्तव्य- यह अण्डकोष (पोतों) का रोग है। इसमें उक्त अंग बढ़ जाता है और 'अन्त्रवृद्धि' अँतड़ी या आँत के उतरने से हो जाती है।
70 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
[वाम स्तम्भ / Left Column]
अण्डवृद्धि-गणना
अण्डवृद्धिस्तथा चैका-
अण्डवृद्धि एक होती है।
वक्तव्य- केवल अण्ड या वृषण के बढ़ने का नाम 'अण्डवृद्धि' है।
गण्डमाला-गणना
-तथैका गण्डमालिका ॥ ६७ ॥
गण्डमाला एक होती है।
वक्तव्य- इस रोग में लसीका-ग्रन्थियाँ विकृत हो जाती हैं।
गण्डालजी-गणना
गण्डालजी तु चैका स्यात्-
'गण्डालजी' एक होती है। इसे घेंघा भी कहा जाता है।
ग्रन्थि-गणना
-ग्रन्थयो नवधा मताः।
त्रिभिर्दोषैस्त्रयो रक्ताच्छिराभिर्मेदसो व्रणात् ॥ ६८ ॥
अस्थ्ना मांसेन नवमः-
ग्रन्थियाँ नौ मानी जाती हैं-१-३. वात आदि दोषों से तीन, ४. रक्त की विकृति से, ५. शिराओं की विकृति से, ६. मेदा की विकृति से, ७. व्रण की विकृति से, ८. अस्थि की विकृति से तथा ९. मांस की विकृति से।
वक्तव्य- ये बिना मुँह के फोड़े होते हैं।
अर्बुद-गणना
-षड्विधं स्यात् तथार्बुदम्।
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तान्मांसादपि च मेदसः ॥ ६९ ॥
'अर्बुद' छः प्रकार का होता है-१. वायु से, २. पित्त से, ३. कफ से, ४. रक्त से, ५. मांस से तथा ६. मेदा से।
वक्तव्य- अर्बुद को ही 'रसौली' भी कहते हैं।
श्लीपद-गणना
श्लीपदं च त्रिधा प्रोक्तं वातात्पित्तात्कफादपि।
श्लीपद तीन प्रकार का होता है-वात, पित्त और कफ से। इसी को 'फीलपाँव' कहते हैं।
विद्रधि-गणना
विद्रधिः षड्विधः ख्यातो वातपित्तकफैस्त्रयः ॥ ७० ॥
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
रक्तात् क्षतात् त्रिदोषैश्च-
विद्रधि छः प्रकार का कहा गया है-वात, पित्त तथा कफ से तीन, रक्त से एक, क्षत (घाव) से एक और त्रिदोष से एक।
वक्तव्य- यह अत्यन्त भयंकर फोड़ा है। इसमें प्रायः लेपादि क्रियाएँ सफल नहीं होतीं। इसमें अन्ततोगत्वा चीरा देना ही पड़ता है। यह दो प्रकार का होता है-१. बाह्यविद्रधि और २. अन्तर्विद्रधि। इनमें से पहला बाहरी शरीर पर और दूसरा शरीर के भीतरी अवयवों (वृक्क, यकृत्, एवं प्लीहा आदि) में होता है, जो और भी भयंकर होता है।
व्रण-गणना
-व्रणाः पञ्चदशोदिताः।
तेषां चतुर्धा भेदाः स्युरागन्तुर्देहजस्तथा ॥ ७१ ॥
शुद्धो दुष्टश्च विज्ञेयस्तत्सङ्ख्या कथ्यते पृथक्।
वातव्रणः पित्तजश्च कफजो रक्तजो व्रणः ॥ ७२ ॥
वातपित्तभवश्चान्यो वातश्लेष्मभवस्तथा।
तथा पित्तकफाभ्याञ्च सन्निपातेन चाष्टमः ॥ ७३ ॥
नवमो वातरक्तेन दशमो रक्तपित्ततः।
श्लेष्मरक्तभवश्चान्यो वातपित्तासृगुद्भवः ॥ ७४ ॥
वातश्लेष्मासृगुत्पन्नः पित्तश्लेष्मास्रसम्भवः।
सन्निपातासृगुद्भूत इति पञ्चदश व्रणाः ॥ ७५ ॥
व्रण (घाव) पन्द्रह प्रकार के होते हैं और उनके चार भेद होते हैं। यथा-१. आगन्तु (सद्योव्रण जो कि तलवार आदि शस्त्रों के लगने से होता है), २. देहज या शारीरज, जो कि फोड़ा निकलकर घाव हो जाता है, ३. शुद्ध (अविकृत) तथा ४. दुष्ट (विकृत)। अब उनकी गिनती पृथक्-पृथक् कही जाती है-१. वातज, २. पित्तज, ३. कफज, ४. रक्तज, ५. वातपित्तज, ६. वातकफज, ७. पित्तकफज, ८. सन्निपातज, ९. वातरक्तज, १०. पित्तरक्तज, ११. कफरक्तज, १२. वात-पित्तरक्तज, १३. वातकफरक्तज, १४. पित्तकफरक्तज और १५. त्रिदोषरक्तज।
सद्योव्रण-गणना
सद्योव्रणस्त्वष्टधा स्याद्विक्षिप्तविलम्बितौ।
छिन्नभिन्नप्रचलिता घृष्टविद्धनिपातिताः ॥ ७६ ॥
सद्योव्रण (आगन्तु व्रण) आठ प्रकार का होता है-१.
सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 71
अविक्लुप्त (चाकू आदि का घाव), 2. बिलम्बित (अंग का
कटकर लटकने लगना), 3. छिन्न (अंग का सर्वथा अलग हो
जाना), 4. भिन्न (आमाशय तथा वस्ति आदि आशय का
फटना), 5. प्रचलित (ऊपर की त्वचा का निचली त्वचा पर
से हटना), 6. घृष्ट (रगड़ लगना), 7. विद्ध (बिंध जाना)
और 8. निपातित (जड़ से उखड़ना, जिसमें केवल गड्ढा रह
जाये)।
वक्तव्य-ध्यान दें, ये भिन्न-भिन्न प्रकार के घाव हैं।
व्रण का अर्थ है-उस स्थान का विचूर्णित हो जाना। देखें-'व्रण
विचूर्णने' धातु।
कोष्ठभेद-गणना
कोष्ठभेदो द्विधा प्रोक्तश्छिन्नान्त्रो निःसृतान्त्रकः ।
कोष्ठ या उदर का भेद या फटना दो प्रकार का होता
है-1. छिन्नान्त्र (आँतड़ी का फटना) तथा 2. निःसृतान्त्रक
(उदर की दीवार फटकर आँतों का बाहर निकलना)।
अस्थिभंग-गणना
अस्थिभङ्गोऽष्टधा प्रोक्तो भग्नपृष्ठविदारितौ ।। 77 ।।
विवर्तितश्च विश्लिष्टस्तिर्यक्क्षिप्तस्त्वधोगतः ।
ऊर्ध्वगः सन्धिभग्नश्च-
अस्थिभग्न आठ प्रकार का कहा गया है-1. भग्न
(टूटना), 2. पृष्ठविदारित (अस्थि की पीठ का फटना या
दरार पड़ना), 4. विवर्तित (ऐंठ जाना या मरोड़ खा जाना),
4. विश्लिष्ट (सन्धि का सरकना), 5. तिर्यक्क्षिप्त (सन्धि-
स्थान का टेढ़ा होना), 6. अधोगत (सामने वाली हड्डी के
नीचे आ जाना), 7. ऊर्ध्वग (ऊपर वाली हड्डी के ऊपर
चढ़ जाना) और 8. सन्धि भग्न (सन्धिस्थान का टूट जाना)।
वक्तव्य-उक्त भग्न दो प्रकार का भी माना जाता है,
यथा-1. काण्डभग्न (अस्थि का टूटना) तथा 2. सन्धिभग्न
(सन्धि या जोड़ का खिसकना)। इनमें पहले दो अस्थिभग्न
तथा शेष छः सन्धिभग्न कहे जाते हैं।
अग्निदग्ध-गणना
- वह्निदग्धश्चतुर्विधः ।। 78 ।।
प्लुष्टो विदग्धो दुर्द्दग्धः सम्यग्दग्धः प्रकीर्तितः ।
वह्निदग्ध (आग से जलना) चार प्रकार का होता है-1.
प्लुष्ट (झुलसना), 2. विदग्ध (फफोला पड़ना), 3. दुर्द्दग्ध
(त्वचा का जल जाना) तथा 4. सम्यग्दग्ध या अतिदग्ध
(मांस आदि का जल जाना)।
नाड़ीव्रण-गणना
नाड्यः पञ्च समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 79 ।।
त्रिदोषैरपि शल्येन-
नाड़ीव्रण पाँच प्रकार के कहे गये हैं-वात, पित्त और
कफ से तीन, त्रिदोष से एक तथा शल्य (तीर, भाला आदि)
से एक।
वक्तव्य-नाड़ीव्रण को ही 'नासूर' कहते हैं।
भगन्दर-गणना
-तथाऽष्टौ स्युर्भगन्दराः ।
शतपोनस्तु पवनादुष्ट्रग्रीवश्च पित्ततः ।। 80 ।।
परिस्रावी कफाज्ज्ञेय ऋजुर्वातकफोद्भवः ।
परिक्षेपी मरुत्पित्तादशोर्जः कफपित्ततः ।। 81 ।।
आगन्तुजातश्चोन्मार्गी शङ्खावर्त्तस्त्रिदोषजः ।
भगन्दर नामक व्रण आठ होते हैं-1. शतपोनक (चलनी
या छलनी के समान बहुत से छिद्रों वाला) वायु से, 2.
उष्ट्रग्रीव (ऊँट की गर्दन के आकार का) पित्त से, 3. परिस्रावी
कफ से, 4. ऋजु (सीधा) वात-पित्त से, 5. परिक्षेपी (पीब
को जोर से निकालने वाला) वातपित्त से, 6. अर्शोज (अर्श
के कारण होने वाला) कफपित्त से, 7. उन्मार्गी (उलटे मार्ग
वाला), आगन्तुज अर्थात् शल्य आदि के लगने से होने वाला
तथा 8. शंखावर्त्त (शंख की भाँति आवर्तों वाला) त्रिदोष से।
वक्तव्य-गुद-द्वार के आस-पास होने वाला नासूर ही
'भगन्दर' कहा जाता है।
उपदंश-गणना
मेढ्रे पञ्चोपदंशाः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 82 ।।
सन्निपातेन रक्ताच्च-
मूत्रमार्ग पर पाँच 'उपदंश' होते हैं-वात, पित्त तथा कफ
से तीन, सन्निपात से चौथा एवं रक्त से पाँचवाँ।
वक्तव्य-उपदंश स्त्री एवं पुरुष दोनों का होता है। यह
प्रायः संसर्ग या संपर्क से होता है। इसका विवेचन सु० नि०
अ० 12 में तथा च० चि० अ० 30 में देखें। चरक ने इसे
'ध्वजभङ्ग' कहा है।
72 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
[ बायाँ स्तम्भ / Left Column ]
शूकरोग-गणना
-मेढ़े शूकामयास्तथा।
चतुर्विंशतिराख्याता लिङ्गार्शो ग्रथितं तथा।। 83 ।।
निवृत्तमवमन्थश्च मृदितं शतपोनकः।
अष्ठीलिका सर्षपिका त्वक्पाकश्चावपाटिका।। 84 ।।
मांसपाकः स्पर्शहानिर्निरुद्धमणिरुत्तमा।
मांसार्बुदं पुष्करिका सम्मूढपिडिकालजी।। 85 ।।
रक्तार्बुदं विद्रधिश्च कुम्भिका तिलकालकः।
निरुद्धप्रकशः प्रोक्तस्तथैव परिवर्त्तिका।। 86 ।।
लिङ्ग पर होने वाले 'शूक रोग' चौबीस कहे जाते हैं-1.
लिङ्गार्श, 2. ग्रथित, 3. निवृत्त, 4. अवमन्थ, 5. मृदित, 6.
शतपोनक, 7. अष्ठीलिका, 8. सर्षपिका, 9. त्वक्पाक, 10.
अवपाटिका, 11. मांसपाक, 12. स्पर्शहानि, 13. निरुद्धमणि,
14. उत्तमा, 15. मांसार्बुद, 16. पुष्करिका 17. सम्मूढपिडिका,
18. अलजी, 19. रक्तार्बुद, 20. विद्रधि, 21. कुम्भिका, 22.
तिलकालक, 23. निरुद्धप्रकश तथा 24. परिवर्त्तिका।
वक्तव्य- लिङ्गवृद्धिकर उपायों का नाम 'शूक' है, जिसे
'तिला' भी कहते हैं। उक्त रोग प्रायः 'शूक' के प्रयोगों से हो
जाया करते हैं। अतएव इन्हें 'शूकोमय' या 'शूकरोग' कहते
हैं। इनमें कुछ ऐसे भी रोग हैं, जो करमर्दन या हस्तमैथुन
आदि कारणों से भी हो जाते हैं।
कुष्ठरोग-गणना
कुष्ठान्यष्टादशोक्तानि वातात्कपालिकं भवेत्।
पित्तेनोदुम्बरं प्रोक्तं कफान्मण्डलचर्चिके।। 87 ।।
मरुत्पित्तादृक्षजिह्वं श्लेष्मवाताद्विपादिका।
तथा सिध्मैककुष्ठं च किटिभं चालसं तथा।। 88 ।।
कफपित्तात् पुनर्दर्दः पामा विस्फोटकं तथा।
महाकुष्ठं चर्मदलं पुण्डरीकं शतारुकम्।। 89 ।।
त्रिदोषैः काकणं ज्ञेयं तथान्यच्छ्वित्रसंज्ञितम्।
तथा वातेन पित्तेन श्लेष्मणा च त्रिधा भवेत्।। 90 ।।
कुष्ठरोग अठारह कहे गये हैं-1. कापालिक वायु से, 2.
औदुम्बर पित्त से, 3. मण्डल एवं 4. विचर्चिका कफ से, 5.
ऋष्यजिह्व वातपित्त से, 6. विपादिका, 7. सिध्म, 8. एककुष्ठ,
9. किटिभ एवं 10. अलस भी कफवात से और 11. दद्रु
(दाद), 12. पामा (खुजली), 13. विस्फोट, 14. महाकुष्ठ, 15.
[ दायाँ स्तम्भ / Right Column ]
चर्मदल (चम्मल), 16. पुण्डरीक, 17. शतारुक, ये कफपित्त
से एवं 18. काकण सन्निपात् से। तथा 'श्वित्र' या फुलबहरी
नामक एक दूसरा रोग होता है, जो तीन प्रकार का होता है-1.
वात से, 2. पित्त से तथा 3. कफ से।
वक्तव्य- कुष्ठ 'कोढ़' नाम से प्रसिद्ध है। इसे आयुर्वेद में
पापरोग भी कहा गया है।
क्षुद्ररोग-गणना
क्षुद्ररोगाः षष्टिसङ्ख्यास्तेष्वादौ शर्कराम्बुदम्।
इन्द्रवृद्धा पनसिका विवृतान्थालजी तथा।। 91 ।।
वराहदंष्ट्री वल्मीकं कच्छपी तिलकालकः।
गर्दभी रकसा चैव यवप्रख्या विदारिका।। 92 ।।
कदरं मषकश्चैव नीलिका जालगर्दभः।
इरिवेल्ली जतुमणिर्गदभ्रंशोऽग्निरोहिणी।। 93 ।।
सन्निरुद्धगुदः कोठः कुनखोऽनुशयी तथा।
पद्मिनीकण्टकश्चिप्यमलसो मुखदूषिका।। 94 ।।
कक्षा वृषणकच्छूश्च गन्धः पाषाणगर्दभः।
राजिका च तथा व्यङ्गश्चतुर्था परिकीर्तितः।। 95 ।।
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तादित्युक्तं व्यङ्गलक्षणम्।
विस्फोटाः क्षुद्ररोगेषु तेऽष्टधा परिकीर्तिताः।। 96 ।।
पृथग्दोषैस्त्रयो द्वन्द्वैस्त्रिविधः सप्तमोऽसृजः।
अष्टमः सन्निपातेन क्षुद्ररुक्षु मसूरिका।। 97 ।।
चतुर्दशप्रकारेण त्रिभिर्दोषैस्त्रिधा च सा।
द्वन्द्वजा त्रिविधा प्रोक्ता सन्निपातेन सप्तमी।। 98 ।।
अष्टमी त्वग्गता ज्ञेया नवमी रक्तजा स्मृता।
दशमी मांसजा ख्याता चतस्रोऽन्याश्च दुस्तराः।। 99 ।।
मेदोऽस्थिमज्जाशुक्रस्थाः क्षुद्ररोगा इतीरिताः।
क्षुद्ररोग साठ होते हैं-1. शर्करार्बुद, 2. इन्द्रवृद्धा, 3.
पनसिका, 4. विवृता, 5. अन्थालजी, 6. वराहदंष्ट्र, 7. वल्मीक,
8. कच्छपी, 9. तिलकालक, 10. गर्दभी, 11. रकसा, 12.
यवप्रख्या, 13. विदारिका, 14. कदर, 15. मसक, 16. नीलिका
(झाँई), 17. जालगर्दभ, 18. इरिवेल्ली, 19. जतुमणि, 20.
गुदभ्रंश (काँच निकलना), 21. अग्निरोहिणी, 22.
सन्निरुद्धगुद, 23. कोठ (धप्पड़ या चकत्ता), 24. कुनख,
25. अनुशयी, 26. पद्मिनीकण्टक, 27. चिप्प, 28. अलस,
29. मुखदूषिका (मुँहासे), 30. कक्षा, 31. वृषणकच्छू
सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 73
[वाम स्तम्भ]
(अण्डकोष की खुजली), 32. गन्ध (बगलगन्ध), 33.
पाषाणगर्दभ, 34. राजिका और (4) चार प्रकार के व्यंग,
(8) आठ प्रकार के विस्फोट (बड़ी माता) भी क्षुद्र रोगों में
गिने जाते हैं। यथा-पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों
से तीन, सन्निपात से एक तथा रक्त से एक। (14) चौदह
प्रकार की मसूरिका (छोटी माता) भी क्षुद्र रोगों में गिनी
जाती है। यथा-तीनों दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन
सन्निपात से सातवीं, त्वचागत आठवीं, रक्तगत नौवीं, मांसगत
दसवीं और चार बड़ी ही भयंकर होती हैं, जो कि मेदा में,
अस्थि में, मज्जा में एवं शुक्र में व्याप्त होती हैं। इस प्रकार
यहाँ 60 क्षुद्र रोगों की गणना की गयी है।
वक्तव्य-क्षुद्र रोग वे कहे जाते हैं, जिनका वर्णन
आयुर्वेदिक-ग्रन्थों में सामान्य रूप से या संक्षेप से किया
गया है।
विसर्परोग-गणना
विसर्परोगो नवधा वातपित्तकफैस्त्रिधा।।100।।
त्रिधा स द्वन्द्वभेदेन सन्निपातेन सप्तमः।
अष्टमो वह्निदाहेन नवमश्चाभिघातजः।।101।।
विसर्प रोग नौ प्रकार का होता है-वात, पित्त तथा कफ
से तीन, दो-दो दोषों से तीन, सन्निपात से सातवाँ, अग्नि द्वारा
जलने से आठवाँ तथा अभिघात से नौवाँ।
वक्तव्य-कुछ विद्वान् तीन और विसर्प मानते हैं। यथा-1.
अग्निविसर्प, 2. ग्रन्थिविसर्प तथा 3. कर्दमविसर्प। इस रोग
में शरीर पर किसी एक स्थान में फफोले या छाले उठते हैं
और फूटते हैं। जहाँ-जहाँ उनका पानी लगता है, वहाँ-वहाँ
और फफोले उठते जाते हैं, पहिले वाले शान्त होते जाते हैं।
बस यही विसर्प का सामान्य लक्षण है। इसे 'मकड़ी' भी
कहते हैं।
उदर्द एवं शीतपित्त-गणना
तथैकः श्लेष्मपित्ताभ्यामुदर्दः परिकीर्तितः।
वातपित्तेन चैकस्तु शीतपित्तामयः स्मृतः।।102।।
'उदर्द' एक होता है, जो कि कफ-पित्त से होता है तथा
'शीतपित्त' भी एक ही होता है, जो कि वात-पित्त से होता है।
वक्तव्य-उक्त रोगों को 'जुलपित्ती', 'रक्तपित्ती' या
'पित्ती' भी कहते हैं।
[दक्षिण स्तम्भ]
अम्लपित्त-गणना
अम्लपित्तं त्रिधा प्रोक्तं वातेन श्लेष्मणा तथा।
तृतीयं श्लेष्मवाताभ्यां वातरक्तं तथाऽष्टधा।।103।।
अम्लपित्त रोग तीन प्रकार का होता है-1. वायु से, 2.
कफ से तथा 3. कफवात से।
वक्तव्य-इसका सामान्य लक्षण है-छाती में जलन तथा
खट्टे डकारों का आना।
वातरक्तरोग-गणना
वाताधिक्येन पित्ताच्च कफाद् दोषत्रयेण च।
रक्ताधिक्येन दोषाणां द्वन्द्वेन त्रिविधः स्मृतः।।104।।
वातरक्त आठ प्रकार का होता है। यथा-1. वायु से, 2.
पित्त से, 3. कफ से 4, त्रिदोष से, 5. रक्त तथा दो-दो दोषों
से तीन=8।
वक्तव्य-यह कुष्ठ जैसा ही होता है, किन्तु इसमें वात
दोष की प्रधानता होती है।
वातज रोग-गणना
अशीतिर्वातजा रोगाः कथ्यन्ते मुनिभाषिताः।
आक्षेपको हनुस्तम्भ ऊरुस्तम्भः शिरोग्रहः।।105।।
बाह्यायामोऽन्तरायामः पार्श्वशूलं कटिग्रहः।
दण्डपातानकः खल्ली जिह्वास्तम्भस्तथार्दितम्।।106।।
पक्षाघातः क्रोष्टुशीर्षो मन्यास्तम्भश्च पङ्गुता।
कलायखञ्जता तूनी प्रतितूनी च खञ्जता।।107।।
पादहर्षो गृध्रसी च विश्वाची चापबाहुकः।
अपतानो व्रणायामो वातकण्टोऽपतन्त्रकः।।108।।
अङ्गभेदोऽङ्गशोषश्च मिन्मिनत्वं च गद्गदः।
प्रत्यष्ठीलाऽष्ठीलिका च वामनत्वं च कुब्जता।।109।।
अङ्गपीडाऽङ्गशूलं च सङ्कोचस्तम्भरूक्षता।
अङ्गभङ्गोऽङ्गविभ्रंशो विड्ग्रहो बद्धविट्कता।।110।।
मूकत्वमतिजृम्भा स्यादत्युद्गारोऽन्त्रकूजनम्।
वातप्रवृत्तिः स्फुरणं शिराणां पूरणं तथा।।111।।
कम्पः कार्श्यं श्यावता च प्रलापः क्षिप्रमूत्रता।
निद्रानाशः स्वेदनाशो दुर्बलत्वं बलक्षयः।।112।।
अतिप्रवृत्तिः शुक्रस्य कार्श्यं नाशश्च रेतसः।
अनवस्थितचित्तत्वं काठिन्यं विरसास्यता।।113।।
कषायवक्त्रताऽऽध्मानं प्रत्याऽऽध्मानं च शीतता।
रोमहर्षश्च मरुतस्तोदः कण्डूरसाज्ञता।।114।।
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
74 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
शब्दाज्ञता प्रसुप्तिश्च गन्धाज्ञत्वं दृशः क्षयः।
मुनियों द्वारा कहे हुये वायु के अस्सी रोग (वातव्याधि)
कहे जाते हैं-1. आक्षेपक, 2. हनुस्तम्भ, 3. ऊरुस्तम्भ, 4.
शिरोग्रह, 5. बाह्यायाम, 6. अन्तरायाम, 7. पार्श्वशूल, 8.
कटिग्रह (हूक, चूक), 9. दण्डपतानक, 10. खल्ली, 11.
जिह्वास्तम्भ, 12. अर्दित (मुख का लकवा), 13. पक्षाघात
(अर्द्धाङ्ग), 14. क्रोष्टुशीर्षक (घुटने की सूजन), 15.
मन्यास्तम्भ, 16. पंगुता, 17. कलायखंजता, 18. तूनी, 19.
प्रतितूनी, 20. खँजता (लँगड़ा होना), 21. पादहर्ष, 22.
गृध्रसी (टाँग का अकड़ना), 23. विश्वाची (बाँह का
अकड़ना), 24. अपबाहुक, 25. अपतानक (हिस्टीरिया),
26. व्रणायाम, 27. वातकण्टक (पैर की मोच), 28.
अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), 29. अंगभेद, 30. अंगशोष, 31.
मिन्मिनत्त्व (मिन्मिनापन), 32. गद्गद (हकलापन), 33.
प्रत्यष्ठीला, 34. अष्ठीला, 35. वामनत्व (बौनापन), 36.
कुब्जता (कुबड़ापन), 37. अंगपीड़ा, 38. अंगशूल, 39.
अंगसंकोच, 40. अंगस्तम्भ, 41. अंगरूक्षता, 42. अंगभंग,
43. अंगविभ्रंश, 44. विड्ग्रह (कब्जियत), 45. बद्धविट्कता,
46. मूकता (गूँगापन), 47. अतिजृम्भा, 48. अत्युद्गार,
49. अन्त्रकूजन, 50. वातप्रवृत्ति, 51. स्फुरण (फड़कन),
52. सिरापूरण, 53. कम्प, 54. कार्श्य, 55. श्यावता, 56.
प्रलाप, 57. क्षिप्रमूत्रता, 58. निद्रानाश, 59. स्वेदनाश, 60.
दुर्बलता, 61. बलक्षय, 62. शुक्रातिप्रवृत्ति, 63. शुक्राल्यता,
64. शुक्रनाश, 65. चञ्चलचित्तता, 66. कठिनता, 67.
मुखविरसता, 68. कषायवक्त्रता, 69. आध्मान (अफारा),
70. प्रत्याध्मान, 71. शीतता, 72. रोमहर्ष, 73. भीरुता (भय),
74. तोद, 75. कण्डू, 76. रसाज्ञता (रसज्ञान का अभाव),
77. शब्दाज्ञता (बधिरता), 78. प्रसुप्ति (अंग विशेष का सो
जाना), 79. गन्धाज्ञत्त्व (घ्राणनाश), और 80. दृष्टिनाश
(अन्धापन)।
वक्तव्य-ये अस्सी रोग वायु के प्रकोप के बिना हो ही
नहीं सकते, अतः इन्हें 'वातरोग' या 'वातव्याधि' कहते हैं।
पित्तज रोग-गणना
अथ पित्तभवा रोगाश्चत्वारिंशदिहोदिताः ।। 115 ।।
धूमोद्गारो विदाहः स्यादुष्णाङ्गत्वं मतिभ्रमः ।
कान्तिहानिः कण्ठशोषो मुखशोषोऽल्पशुक्रता ।। 116 ।।
तिक्तास्यताम्लवक्त्रत्वं स्वेदस्रावोऽङ्गपाकता ।
क्लमो हरितवर्णत्वमतृप्तिः पीतकायता ।। 117 ।।
रक्तस्रावोऽङ्गदरणं लोहगन्ध्यास्यता तथा ।
दौर्गन्ध्यं पीतमूत्रत्वमरतिः पीतविट्कता ।। 118 ।।
पीतावलोकनं पीतनेत्रता पीतदन्तता ।
शीतेच्छा पीतनखता तेजोद्वेषोऽल्पनिद्रता ।। 119 ।।
कोपश्च गात्रसादश्च भिन्नविट्कत्वमन्धता ।
उष्णोच्छ्वासत्वमुष्णत्वं मूत्रस्य च मलस्य च ।। 120 ।।
तमसो दर्शनं पीतमण्डलानां च दर्शनम् ।
निःसरत्वं च पित्तस्य चत्वारिंशद्रुजः स्मृताः ।। 121 ।।
आयुर्वेद में पित्त रोग चालीस कहे गये हैं-1. धूमोद्गार
(धुआँ जैसा डकार आना), 2. विदाह (जलन होना), 3.
उष्णांगत्व (अंगों का गर्म होना), 4. मतिभ्रम (बुद्धिभ्रम
होना या चक्कर आना), 5 कान्तिहानि (शरीर की छवि का
कम होना), 6. कण्ठशोष (गले का सूखना), 7. मुखशोष
(मुँह का सूखना), 8. अल्पशुक्रता (शुक्र की कमी), 9.
तिक्तास्यता (मुख का कड़वापन), 10. अम्लवक्त्रत्व (मुख
का खट्टा होना), 11. स्वेदस्राव (पसीना आना), 12.
अंगपाकता (अंगों में पाक होना), 13 क्लम (सुस्ती), 14.
हरितवर्णत्व (वर्ण का हरा होना), 15. अतृप्ति (तृप्ति न
होना), 16. पीतकायता (शरीर का पीला होना), 17. रक्तस्राव
(खून का पतला होना), 18. अंगदरण (अंगों का फटना),
19. लोहगन्ध्यास्यता (मुख से बुताये हुये लोहे की-सी गन्ध
का आना), 20. दौर्गन्ध्य (दुर्गन्धित्ता), 21. पीतमूत्रत्व (मूत्र
का पीला होना), 22. अरति (बेचैनी), 23. पीतविट्कता
(पुरीष का पीला होना), 24. पीतावलोकन (सभी वस्तुएँ
पीली दिखलाई देना), 25. पीतनेत्रता (आँखें पीली होना),
26. पीतदन्तता (दाँतों का पीला होना), 27. शीतेच्छा (शीत
की अभिलाषा), 28. पीतनखता (नाखूनों का पीला होना),
29. तेजोद्वेष (प्रकाश का अच्छा न लगना), 30. अल्पनिद्रता
(नींद कम आना), 31. कोप (क्रोध), 32. गात्रसाद (शरीर
की शिथिलता), 33. भिन्नविट्कत्व (दस्त होना), 34. अन्धता
(अन्धा होना), 35. उष्णोच्छ्वासत्व (साँस का गर्म होना),
36. उष्णमूत्रता (मूत्र का गर्म होना), 37. उष्णमलत्ता (पुरीष
का गर्म होना), 38. तमोदर्शन (आँखों के आगे अँधेरा आना),
सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 75
39. पीतमण्डल दर्शन (आकाश में पीले मण्डल दिखलायी
पड़ना) तथा 40. पित्तनिःसरत्व (पित्त निकलना) -ये चालीस
पित्त के रोग कहे गये हैं।
वक्तव्य-उक्त रोग पित्तप्रकोप के बिना हो ही नहीं सकते,
अतः इन्हें 'पित्तरोग' कहते हैं।
कफज रोग-गणना
कफस्य विंशतिः प्रोक्ता रोगास्तन्द्रातिनिद्रता।
गौरवं मुखमाधुर्यं मुखलेपः प्रसेकता।। 122।।
श्वेतावलोकनं श्वेतविट्कत्वं श्वेतमूत्रता।
श्वेताङ्गवर्णता शैत्यमुष्णेच्छा तिक्तकामिता।। 123।।
मलाधिक्यं च शुक्रस्य बाहुल्यं बहुमूत्रता।
आलस्यं मन्दबुद्धित्वं तृप्तिर्घर्घरवाक्यता।। 124।।
अचैतन्यं च गदिता विंशतिः श्लेष्मजा गदाः।
कफ के बीस रोग कहे जाते हैं-1. तन्द्रा (उंघाई), 2.
अतिनिद्रता (अधिक नींद आना), 3. गौरव (शरीर में
भारीपन), 4 मुखमाधुर्य (मुख का मीठा होना), 5. मुखलेप
(मुख में चिपचिपाहट), 6 प्रसेकता (मुख आदि से पानी
जाना), 7. श्वेतावलोकन (सभी वस्तुएँ सफेद दिखलायी
देना), 8. श्वेतविट्कत्व (सफेद पुरीष होना), 9. श्वेतमूत्रता
(सफेद मूत्र होना), 10. श्वेताङ्गवर्णता (शरीर के वर्ण का
सफेद होना), 11. शैत्य (शीत लगना), 12. उष्णेच्छा (गर्म
की अभिलाषा), 13. तिक्तकामिता (कडुये पदार्थों की इच्छा),
14. मलाधिक्य (मलों की अधिकता), 15. शुक्रबाहुल्य
(शुक्र की अधिकता), 16. बहुमूत्रता (मूत्र का अधिक होना),
17. आलस्य, 18. मन्दबुद्धित्व (बुद्धि का मन्द होना), 19.
तृप्ति (भूख न लगना), 20. घर्घर-वाक्यता (बोलने में
घरघराहट), एवं 21. अचैतन्य (जड़ता) -ये बीस कफज
रोग होते हैं।
वक्तव्य-उक्त रोग कफ-प्रकोप के बिना हो ही नहीं
सकते, अतः इन्हें 'कफ रोग' कहते हैं। उक्त रोग बीस कहकर
इक्कीस गिनाये गये हैं।
रक्तज रोग-गणना
रक्तस्य च दश प्रोक्ता व्याधयस्तेषु गौरवम्।। 125।।
रक्तमण्डलता रक्तनेत्रत्वं रक्तमूत्रता।
रक्तष्ठीनवता रक्तपिडकानां च दर्शनम्।। 126।।
औष्ण्यं च पूतिगन्धत्वं पीडा पाकश्च जायते।
रक्त के दस रोग कहे जाते हैं-1. गौरव (भारीपन), 2.
रक्तमण्डलता (लाल चकत्ते निकलना), 3. रक्तनेत्रत्व (आँखों
में सुर्खी), 4. रक्तमूत्रता (मूत्र में सुर्खी), 5. रक्तष्ठीवन (थूक
में खून आना), 6. रक्तपिडका-दर्शन (लाल फुन्सियाँ
निकलना), 7. औष्ण्य (गर्मी), 8. पूतिगन्धत्व (दुर्गन्ध
आना), 9. पीड़ा (छूने पर भी कष्ट होना) तथा 10. पाक
(पक जाना)।
वक्तव्य-उक्त सभी रोग रक्त की विकृति से होते हैं।
वात, पित्त, कफ तथा रक्त के रोगों का भली-भाँति परिचय
प्राप्त कर लेने पर निदान करने में बहुत सहायता मिलती है।
मुखरोग-गणना
चतुःसप्ततिसङ्ख्याका मुखरोगास्तथोदिताः।। 127।।
मुखरोग चौहत्तर कहे गये हैं।
वक्तव्य-ओष्ठ, दन्त, दन्तमूल या दन्तवेष्ट, जिह्वा, तालु
तथा गले के रोग 'मुखरोग' कहे जाते हैं। स्मरण रहे कि यहाँ
पर 'मुख' का अर्थ है-मुखगुहा अर्थात् ओठों से गले तक का
स्थान।
ओष्ठरोग-गणना
तेष्वोष्ठरोगा गणिता एकादशमिता बुधैः।
वातपित्तकफैस्त्रेधा त्रिदोषैरसृजा तथा।। 128।।
क्षतं मांसाबुर्दं चैव खण्डौष्ठं च जलार्बुदम्।
मेदोऽर्बुदं चार्बुदं च रोगा एकादशौष्ठजाः।। 129।।
विद्वानों ने मुखरोगों में ग्यारह 'ओष्ठरोग' माने हैं। यथा-
वात, पित्त एवं कफ से तीन, सन्निपात से एक, रक्त से एक,
क्षत (अभिघात) से एक, मांसाबुर्द (मांस दोष से) एक,
खण्डौष्ठ (ओठ फटना) एक, जलार्बुद एक, मेदोर्बुद (मेदा
से) एक तथा अर्बुद (रसौली) एक-इस प्रकार ओठों के
ग्यारह रोग होते हैं।
वक्तव्य-अर्बुद एक ऐसा व्यापक रोग है, जो शरीर के
किसी अवयव में उत्पन्न हो सकता है। इस विवेचन पर ध्यान
दें।
दन्तरोग-गणना
दन्तरोगो दशाख्यातो दालनः कृमिदन्तकः।
76 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
[ वाम स्तम्भः ]
दन्तहर्षः करालश्च दन्तचालश्च शर्करा ।। 130 ।।
अधिदन्तः श्यावदन्तो दन्तभेदः कपालिका।
दन्तरोग दस होते हैं-1. दालन (दाँत-दुखना), 2.
कृमिदन्तक (दाँत में कीड़ा लगना 'दन्तादा:'-सु० उ० अ०
54), 3. दन्तहर्ष (शीत एवं अम्ल आदि के स्पर्श को न
सहना), 4. कराल (दाँतों का आगे-पीछे हो जाना), 5.
दन्तचाल (दाँतों का हिलना), 6. शर्करा (दाँतों पर से बालू
जैसे कण गिरना), 7. अधिदन्त (दाँत के आगे-पीछे अधिक
दाँत निकलना), 8. श्यावदन्त (दाँत का नीला या काला हो
जाना), 9. दन्तभेद (दाँत का टूटना) तथा 10. कपालिका
(दाँत पर से पपड़ी उतरना)।
दन्तमूलगत रोग-गणना
तथा त्रयोदशमिता दन्तमूलामयाः स्मृताः ।। 131 ।।
शीतादोपकुशौ द्वौ तु दन्तविद्रधिपुप्पुटौ।
अधिमांसो विदर्भश्च महासौषिरसौषिरौ ।। 132 ।।
तेष्वेव गतयः पञ्च वातात्पित्तात्कफादपि।
सन्निपाताद् गतिश्चान्या रक्तनाडी च पञ्चमी ।। 133 ।।
दन्तमूल या मसूड़ों के रोग तेरह होते हैं-1. शीताद
(खून जाना, दाँत की जड़ का पक जाना), 2. उपकुश (मसूड़े
में दाह, पाक एवं दाँत का हिलना), 3. दन्तविद्रधि (फुड़िया
निकलना), 4. पुप्पुट (मसूड़ा फूलना), 5. अधिमांस (पिछली
दाढ़ का जड़ में सूजन होना), 6. विदर्भ (मसूड़ों पर रगड़
लगने से सूजन होना), 7. महासौषिर (दाँतों का हिलना एवं
तालु का फटना), 8. सौषिर (मसूड़ों में पीड़ा तथा सूजन
होना) तथा मसूड़ों में पाँच प्रकार के नासूर होना, यथा-1.
वात, 2. पित्त, 3. कफ, 4. सन्निपात तथा 5. रक्त से।
जिह्वागत रोग-गणना
तथा जिह्वामयाः षट् स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा।
अलसश्च चतुर्थः स्यादधिजिह्वश्च पञ्चमः ।। 134 ।।
षष्ठश्चैवोपजिह्वः स्यात्-
जिह्वा (जीभ) के छः रोग होते हैं-वात, पित्त तथा कफ
से तीन, अलस चौथा, अधिजिह्वा पाँचवीं और उपजिह्वा छठीं।
तालुगत रोग-गणना
-तथाष्टौ तालुजा गदाः।
अर्बुदं तालुपिडका कच्छपी तालुसंहतिः ।। 135 ।।
[ दक्षिण स्तम्भः ]
गलशुण्डी तालुशोषस्तालुपाकश्च पुप्पुटः।
तालु रोग आठ होते हैं-1. अर्बुद, 2. तालुपिड़का, 3.
कच्छपी, 4. तालुसंहति, 5. गलशुण्डी, 6. तालुशोष, 7.
तालुपाक तथा 8. तालुपुप्पुट।
कण्ठगत रोग-गणना
गलरोगास्तथाख्याता अष्टादशमिता बुधैः ।। 136 ।।
वातरोहिणिका पूर्वं द्वितीया पित्तरोहिणी।
कफरोहिणिका प्रोक्ता त्रिदोषैरपि रोहिणी ।। 137 ।।
मेदोरोहिणिका वृन्दो गलौघो गलविद्रधिः।
स्वरहा तुण्डिकेरी च शतघ्नी शालुकोऽर्बुदम् ।। 138 ।।
गलायुर्वलयश्चापि वाताद् गण्डः कफात् तथा।
मेदोगण्डस्तथैव स्यादित्यष्टादश कण्ठजाः ।। 139 ।।
विद्वानों ने गले के अठारह रोग माने हैं-1. वातरोहिणिका,
2. पित्तरोहिणी, 3. कफरोहिणी, 4. सन्निपातरोहिणी, 5.
मेदोरोहिणी, 6. वृन्द, 7. गलौघ, 8. गलविद्रधि, 9. स्वरहा
(स्वरयन्त्र का नाश), 10. तुण्डिकेरी, 11. शतघ्नी, 12.
शालूक, 13. अर्बुद, 14. गलायु, 15. वलय, 16. वातगण्ड,
17. कफगण्ड तथा 18 मेदोगण्ड।
मुखगत रोग-गणना
मुखान्तःसम्भवा रोगा अष्टौ ख्याता महर्षिभिः।
मुखपाको भवेद् वातात्पित्तात् तद्वत् कफादपि ।। 140 ।।
रक्ताच्च सन्निपाताच्च पूत्यास्योर्ध्वगदावपि।
अर्बुदं चेति मुखजाश्चतुःसप्ततिरामयाः ।। 141 ।।
महर्षियों ने मुख की भीतरी दीवार के आठ रोग कहे हैं।
पाँच प्रकार का 'मुखपाक' यथा-1. वात से, 2. पित्त से, 3.
कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त से तथा, 6. पूत्यास्य (मुख
से दुर्गन्ध आना), 7. ऊर्ध्वगद (तालु का लाल हो जाना)
और 8. अर्बुद। इस प्रकार कुल मिलाकर 'चौहत्तर' रोग मुख
के कहे गये हैं।
कर्णगत रोग-गणना
कर्णरोगाः समाख्याता अष्टादशमिता बुधैः।
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् सन्निपाताच्च विद्रधिः ।। 142 ।।
शोथोऽर्बुदं पूतिकर्णः कर्णार्शः कर्णहल्लिका।
बाधिर्यं तन्त्रिका कण्डूः शष्कुली कृमिकर्णकः ।। 143 ।।
कर्णनादः प्रतीनाह इत्यष्टादश कर्णजाः।
सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 77
विद्वानों ने कर्ण (कान) के अठारह रोग कहे हैं-1. वात
से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. रक्त से, 5. सन्निपात से, 6.
विद्रधि (कान के भीतर जो फुन्सी हो जाती है), 7. कर्णशोथ,
8. अर्बुद, 9. पूतिकर्ण (कान में दुर्गन्धि युक्त पीब बहना),
10. कर्णार्श (कान में मांसांकुर होना), 11. कर्णहल्लिका
(कान में पतंगा या सलाई आदि का चला जाना), 12.
बाधिर्य (बहरा होना), 13. तन्त्रिका (सितार की-सी ध्वनि
सुनायी पड़ना), 14. कण्डू (खुजली), 15. शष्कुली (कान
में से 'कर्णगूथ' का निकलना), 16. कृमिकर्णक (कान में
कीड़े पड़ना-सु० उ० अ० 54 श्लोक 14), 17. कर्णनाद
(अनेक प्रकार के शब्द सुनायी पड़ना) तथा 18. प्रतिनाह,
यह कर्णगूथ का ही अवस्थान्तर है। इसमें 'आधासीसी' नामक
शिरोरोग भी हो जाता है।
वक्तव्य-उक्त रोग कान के भीतरी अवयवों में होते हैं।
कर्णपालीगत रोग-गणना
कर्णपालीसमुद्भूता रोगाः सप्त इहोदिताः ।। 144 ।।
उत्पातः पालिशोषश्च विदारी दुःखवर्धनः ।
परिपोटश्च लेही च पिप्पली चेति संस्मृताः ।। 145 ।।
कर्णपाली (बाह्यकर्ण या कर्णशष्कुली) के रोग सात
कहे जाते हैं-1. उत्पात, 2. पालिशोष, 3. विदारी, 4.
दुःखवर्धन, 5. परिपोट, 6. परिलेही तथा 7. पिप्पली।
वक्तव्य-उक्त रोग कान के बाहरी अवयव के हैं। विशेष
जानने के लिए सु० उ० अ० 20 देखें।
कर्णमूलगत रोग-गणना
कर्णमूलामयाः पञ्च वातात्पित्तात्कफादपि ।
सन्निपाताच्च रक्ताच्च-
कर्णमूलगत रोग पाँच होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से,
3. कफ से, 4. सन्निपात से तथा 5. रक्त से।
वक्तव्य-कान के मूल में शोथ प्रायः सन्निपातज ज्वरों
के अन्त में होता है।
नासारोग-गणना
-तथा नासाभवा गदाः ।। 146 ।।
अष्टादशैव सङ्ख्याताः प्रतिश्यायास्तु तेष्वपि।
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् सन्निपातेन पञ्चमः ।। 147 ।।
अपीनसः पूतिनासो नासार्शो भ्रंशथुः क्षवः ।
नासानाहः पूतिरक्तमर्बुदः दुष्टपीनसम् ।। 148 ।।
नासाशोषो घ्राणपाकः पूयस्रावश्च दीप्तकः ।
नासा में होने वाले रोग अठारह कहे जाते हैं। इनमें पाँच
'प्रतिश्याय' होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3 कफ से, 4
रक्त से तथा 5. सन्निपात से, 6. अपीनस (जुकाम), 7.
पूतिनास (नाक से दुर्गन्ध आना), 8. नासार्श (नाक में अर्श
होना), 9. भ्रंशथु (नाक से बहुत अधिक मैल जाना), 10.
क्षव (छींक), 11. नासानाह (नाक का बन्द हो जाना), 12
पूतिरक्त (दुर्गन्धियुक्त रक्त का जाना), 13 अर्बुद, 14. दुष्टपीनस
(जुकाम बिगड़ना), 15. नासाशोष, 16. घ्राणपाक, 17.
पूयस्राव (पीब जाना) तथा 18. दीप्तक (दाह या जलन
होना)।
शिरोरोग-गणना
तथा दश शिरोरोगा वातेनार्धावभेदकः ।। 149 ।।
शिरस्तापश्च वातेन पित्तपीडा तृतीयका ।
चतुर्थी कफजा पीडा रक्तजा सन्निपातजा ।। 150 ।।
सूर्यावर्त्ताच्छिरःकम्पात् कृमिभिः शङ्खकेन च ।
शिरोरोग दस कहे जाते हैं-1. वात से अर्द्धावभेदक या
आधासीसी, 2. शिरस्ताप-वात से सिर दुखना, 3. पित्त से
सिर दुखना, 4. कफ से सिर दुखना, 5. रक्त तथा 6. सन्निपात
से सिर दुखना, 7. सूर्यावर्त्त (प्रातःकाल से दोपहर तक बढ़ता
है, सायंकाल तक घटता है और रात्रि में शान्त रहता है), 8.
शिरःकम्पः (इसको 'अनन्तवात' कहना उचित होगा-'गण्डस्य
पार्श्वे तु करोति कम्पं' सु० उ० अ० 25), 9. कृमिज शिरोरोग
(सिर में कृमि पड़ने से होने वाला) तथा 10 शंखक (यह
बहुत भयंकर सिर-दर्द है)।
शिरःकपालगत रोग-गणना
तथा कपालरोगाः स्युर्नव तेषूपशीर्षकम् ।। 151 ।।
अरुषिका विद्रधिश्च दारुणं पिडकाऽर्बुदम् ।
इन्द्रलुप्तं च खलितं पलितं चेति ते नव ।। 152 ।।
शिरःकपाल के नौ रोग होते हैं-1. उपशीर्षक (शिर का
बड़ा हो जाना-'कपाले पवने दुष्टे गर्भस्थस्यापि जायते । सवर्णो
नीरुजः शोफस्तं विद्यात् उपशीर्षकम् ।।', 2. अरुषिका (इसमें
अनन्त फुन्सियाँ निकल कर उनमें से पीला पंछा निकलता है,
जो वहीं जम जाता है), 3. विद्रधि, 4. दारुण, (रूसी), 5.
पिडका, 6. अर्बुद, 7. इन्द्रलुप्त. (शिर-पर से बालों का
उखड़ना), 8. खलिति (जो सदा के लिए चाँद के बाल
उखड़ जाते हैं) तथा 9. पलित (अकाल में बालों का सफेद
होना)।
वक्तव्य—ये शिर के बाहरी भाग के रोग हैं।
नेत्ररोग-गणना
तथा नेत्रभवाः ख्याताश्चतुर्नवतिरामयाः।
नेत्र में होने वाले रोग 'चौरानवे' होते हैं।
नेत्रवर्त्म रोग
तेषु वर्त्मगदाः प्रोक्ताश्चतुर्विंशतिसंज्ञकाः ।। 153 ।।
कृच्छ्रोन्मीलः पक्ष्मपातः कफोत्क्लिष्टश्च लोहितः।
अरुङ्निमेषः कथितो रक्तोत्क्लिष्टः कुकूणकः ।। 154 ।।
पक्ष्मार्शः पक्ष्मरोधश्च पित्तोत्क्लिष्टश्च पोथकी।
क्लिष्टवर्त्मा च बहलः पक्ष्मोत्सर्गस्तथार्बुदम् ।। 155 ।।
कुम्भिका सिकतावत्र्म लगणोऽञ्जननामिका।
कर्दमः श्याववत्र्मा च बिसवर्त्मा तथाऽलजी ।। 156 ।।
उत्क्लिष्टवर्मेति गदाः प्रोक्ता वर्त्मसमुद्भवाः।
उनमें वर्त्म या बरौनी के रोग 'चौबीस' होते हैं-1.
कृच्छ्रोन्मील (आँख खोलने में कष्ट होना), 2. पक्ष्मपात
(बरौनियों का उखड़ना), 3. कफोत्क्लिष्ट (कीचड़ आना),
4. लोहित (बरौनी लाल होना), 5 अरुङ्निमेष (बार-बार
आँख फड़कना), 6. रक्तोत्क्लिष्ट (शोणितार्श), 7. कुकूणक,
8. पक्ष्मार्श (बालों की जड़ में मांसांकुर का होना), 9. पक्ष्मरोध
(शोथ के कारण बरौनी को चला न सकना), 10. पित्तोत्क्लिष्ट
(पित्तवृद्धि से होने वाला), 11. पोथकी (बरौनी में कण्डूयुक्त
अनेक फुन्सियाँ होना), 12. क्लिष्टवर्त्मा (लाल होना), 13.
बहलवर्त्म (बरौनी पर अनेक फुन्सियाँ निकलना), 14.
पक्ष्मोत्सर्ग (बिलनी), 15. अर्बुद (रसौली), 16 कुम्भिका
(एक प्रकार का फुन्सी), 17. सिकतावत्र्म (वर्त्म शर्करा),
18. लगण (बरौनी में एक प्रकार का गाँठ), 19. अञ्जननामिका
(लाल फुन्सी), 20. कर्दम (बरौनी का सड़ना),
21. श्याववर्त्म (बरौनियों का काला या नीला हो जाना),
22. बिसवर्त्मा (पानी जाना), 23. अलजी तथा 24. उत्क्लिष्ट-
वर्त्म (निमेषोन्मेष का न होना)।
नेत्रसन्धिगत रोग-गणना
नेत्रसन्धिसमुद्भूता नव रोगाः प्रकीर्तिताः ।। 157 ।।
जलस्रावः कफस्रावो रक्तस्रावश्च पर्वणी।
पूयस्रावः कृमिग्रन्थिरुपनाहस्तथाऽलजी ।। 158 ।।
पूयालस इति प्रोक्ता रोगा नयनसन्धिजाः।
नेत्रसन्धि (बरौनी तथा नेत्रबुद्बुद की सन्धि) के नौ रोग
कहे गये हैं-1. जलस्राव, 2. कफस्राव, 3 रक्तस्राव, 4.
पर्वणी (शुक्ल तथा कृष्णमण्डल की सन्धि में), 5. पूयस्राव,
6. कृमिग्रन्थि, 7. उपनाह, 8. अलजी तथा 9. पूयालस।
वक्तव्य-आँख में छः सन्धियाँ होती हैं। यथा-1. पक्ष्म
(बाल) तथा वर्त्म (बरौनी) की, 2. वर्त्म तथा शुक्लमण्डल
की, 3. शुक्लमण्डल तथा कृष्णमण्डल की, 4. कृष्णमण्डल
तथा दृष्टिमण्डल की, 5. कनीनिका (आँख का अवयव जो
नाक की ओर होता है) तथा 6. अपाङ्ग (जो पुटीपुटी की
ओर होता है) का सन्धि। देखें-सु० उ० अ० 1।
नेत्रशुक्ल-भागगत रोग-गणना
तथा शुक्लगतो रोगा बुधैः प्रोक्तास्त्रयोदश ।। 159 ।।
सिरोत्पातः सिराहर्षः सिराजालं च शुक्तिका।
शुक्लार्म चाधिमांसार्म प्रस्तार्यर्म च पिष्टकः ।। 160 ।।
शिराजपिडका चैव कफग्रन्थितकोऽर्जुनः।
स्नाय्वर्म शोणितार्मं स्यादिति शुक्लगतो गदाः ।। 161 ।।
विद्वानों ने नेत्र-शुक्लभाग के तेरह रोग कहे हैं-1.
सिरोत्पात, 2. सिराहर्ष, 3. सिराजाल, 4. शुक्तिका, 5.
शुक्लार्म, 6. अधिमांसार्म, 7. प्रस्तार्यर्म, 8. पिष्टक, 9.
शिराजपिडका, 10. कफग्रन्थितक (कफग्रन्थि), 11. अर्जुन,
12. स्नायु-मर्म तथा 13. शोणितार्म (रक्तार्म)।
नेत्रकृष्ण-भागगत रोग-गणना
तथा कृष्णसमुद्भूताः पञ्च रोगाः प्रकीर्तिताः।
शुद्धशुक्रं शिराशुक्रं क्षतशुक्रं तथाऽजका ।। 162 ।।
शिरासङ्गश्च सर्वेऽपि प्रोक्ताः कृष्णगता गदाः।
नेत्र-कृष्णमण्डल के पाँच रोग हैं-1. शुद्धशुक्र, 2.
शिराशुक्र, 3. क्षतशुक्र, 4. अजका तथा 5. सिरासंग।
काचरोग-गणना
काचं तु षड्विधं ज्ञेयं वातात्पित्तात्मकफादपि ।। 163 ।।
सन्निपाताच्च रक्ताच्च षष्ठं संसर्गसम्भवम्।
सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 79
[ बायाँ स्तम्भ ]
काच (मोतिया) छः प्रकार का होता है-1. वात से, 2.
पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त से, तथा 6.
संसर्ग से (परिम्लयी)।
वक्तव्य- मोतियाबिन्द के उक्त छः भेद वर्ण (रंग) के
कारण होते हैं। देखें-सु० उ० अ० 7।
तिमिररोग-गणना
तिमिराणि षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 164 ।।
संसर्गेण च रक्तेन षष्ठं स्यात् सन्निपाततः।
तिमिर (धुन्ध) छः प्रकार के होते हैं-1. वात से, 2.
पित्त से, 3. कफ से, 4. संसर्ग से, 5. रक्त से एवं, 6. सन्निपात
से।
वक्तव्य- तिमिर को 'धुन्ध' भी कहा जाता है।
लिङ्गनाश रोग-गणना
लिङ्गनाशः सप्तधा स्याद्वातात्पित्तात्कफेन च ।। 165 ।।
त्रिदोषै रुपसर्गेण संसर्गेणासृजा तथा।
लिङ्गनाश (दृष्टिनाश) सात होते हैं-1. वात से, 2. पित्त
से, 3. कफ से, 4. त्रिदोष से, 5. उपसर्ग से, 6. संसर्ग से तथा
7. रक्त से।
वक्तव्य- इस रोग से दृष्टि या दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती
है। (उक्त 5वाँ तथा 6ठा लिंगनाश निमित्तज तथा अनिमित्तज
नाम से प्रसिद्ध है)।
दृष्टिगत रोग-गणना
अष्टधा दृष्टिरोगाः स्युस्तेषु पित्तविदग्धकम् ।। 166 ।।
अम्लपित्तविदग्धं च तथैवोष्णविदग्धकम्।
नकुलाख्यं धूसरान्ध्यं रात्र्यान्ध्यं ह्रस्वदृष्टिकः ।। 167 ।।
गम्भीरदृष्टिरित्येते रोगा दृष्टिगता मताः।
दृष्टि के रोग आठ होते हैं-1. पित्तविदग्धक (दिवान्ध्य),
2. अम्लपित्तविदग्ध (अम्लपित्त से होने वाला दृष्टिदोष),
3. उष्णविदग्ध (धूप में तथा आग के सामने बैठने से होने
वाला), 4. नकुलांध्य (नेवले की-सी आँखें होकर कम
दिखलायी देना), 5. धूसरांध्य (साफ-साफ न दिखलायी
देना) 6. रात्र्यांध्य (कफविदग्धक या रतौंधी), 7. ह्रस्वदृष्टिक
(बारीक वस्तुएँ न दिखलायी देना) और 8. गम्भीरदृष्टि
(दृष्टिमण्डल का संकुचित होना या सिकुड़ जाना)।
[ दायाँ स्तम्भ ]
वक्तव्य- उक्त रोगों में दृष्टि विकृत हो जाती है, नष्ट नहीं
होती। अम्लपित्त के रोगी की दृष्टि मन्द हो जाती है।
अधिमन्थ रोग-गणना
(चत्वारश्चाधिमन्थाः स्युर्वातपित्तकफास्रतः ।। 168 ।।)
अधिमंथ नामक रोग चार होते हैं-1. वात से, 2. पित्त
से, 3. कफ से तथा 4. रक्त से।
वक्तव्य- अभिष्यन्द रोग के बिगड़ जाने से 'अधिमन्थ'
रोग हो जाता है।
अभिष्यन्द रोग-गणना
अभिष्यन्दाश्च चत्वारो रक्ताद्दोषैस्त्रिभिस्त्रिधा।
अभिष्यन्द चार होते हैं-रक्त से एक तथा वात आदि
तीनों दोषों से तीन।
वक्तव्य- अभिष्यन्द को ही 'आँख दुखना' या 'आँख
आना' कहते हैं।
सर्वनेत्ररोग-गणना
सर्वाक्षिरोगाश्चाष्टौ स्युस्तेषु वातविपर्ययः ।। 169 ।।
अल्पशोफोऽन्यतोवातस्तथा पाकात्ययः स्मृतः।
शुष्काक्षिपाकश्च तथा शोफोऽध्युषित एव च ।। 170 ।।
हताधिमन्थ इत्येते रोगाः सर्वाक्षिसम्भवाः।
सम्पूर्ण आँख के आठ रोग होते हैं-1. वातविपर्यय, 2.
अल्पशोफ, 3. अन्यतोवात, 4. पाकात्यय, (नेत्रबुद्बुद का
पक जाना, इसमें अन्त में आँख बैठ जाती है), 5. शुष्काक्षिपाक
(इसमें बुद्बुद छोटा हो जाता है), 6. शोफ, 7. अध्युषित
(अम्लाध्युषित खटाई खाने या आँख में पड़ने से होता है)
एवं 8. हताधिमन्थ (अधिमन्थ से आँख का नष्ट हो जाना)।
वक्तव्य- उक्त रोगों का प्रभाव आँख के सम्पूर्ण भागों
पर पड़ता है।
पुंस्त्वरोग-गणना
पुंस्त्वदोषास्तु पञ्चैव प्रोक्तास्तत्रेर्ष्याकः स्मृतः ।। 171 ।।
आसेक्यश्चैव कुम्भीकः सुगन्धिः षण्डसंज्ञकः।
पुंस्त्व (पुरुषत्व या मर्दानगी) के पाँच दोष होते हैं।
जिनसे पाँच प्रकार के पुरुष पाये जाते हैं-1. ईर्ष्यक,
2. आसेक्य, 3 कुम्भीक, 4. सुगन्धि तथा 5. षण्ड नामक।
वक्तव्य- उक्त प्रकार के मनुष्य पूर्ण पुरुष नहीं होते अर्थात्