शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः] रोगगणना ६९
अश्मरी-गणना
-चतुर्धा चाश्मरी मता।
वातात्पित्तात्कफाच्छुक्रात् -
अश्मरी (पथरी) चार प्रकार की होती है-१. वायु से, २. पित्त से, ३. कफ से तथा ४. शुक्र से।
वक्तव्य- अश्मरी या पथरी वस्ति या मूत्राशय में तथा वृक्कों में होती है और शुक्राश्मरी (शुक्र की पथरी) शुक्राशय में होती है।
प्रमेह-गणना
-तथा मेहाश्च विंशतिः ॥५९॥
इक्षुमेहः सुरामेहः पिष्टमेहश्च सान्द्रकः।
शुक्रमेहोदकाख्यौ च लालामेहश्च शीतकः॥६०॥
सिकताख्यः शनैर्मेहो दशैते कफसम्भवाः।
मञ्जिष्ठाख्यो हरिद्राख्यो नीलमेहश्च रक्तकः॥६१॥
कृष्णमेहः क्षारमेहः षडेते पित्तसम्भवाः।
हस्तिमेहो वसामेहो मज्जामेहो मधुप्रभः॥६२॥
चत्वारो वातजा मेहा इति मेहाश्च विंशतिः।
प्रमेह बीस होते हैं-१. इक्षुमेह, २. सुरामेह, ३. पिष्टमेह, ४. सान्द्रमेह, ५. शुक्रमेह, ६. उदकमेह, ७. लालामेह, ८. शीतमेह, ९. सिकतामेह तथा १०. शनैर्मेह, ये दस प्रमेह कफ से होते हैं; ११. मञ्जिष्ठामेह, १२. हरिद्रामेह, १३. नीलमेह, १४. रक्तमेह, १५. कृष्णमेह (मसीमेह) तथा १६. क्षारमेह, ये छः प्रमेह पित्त से होते हैं; १७. हस्तिमेह, १८. वसामेह, १९. मज्जामेह और २०. मधुमेह, ये चार प्रमेह वातदोष से होते हैं।
वक्तव्य- धातुओं के उपादान (धातुपोषक पदार्थ, जो कि आहार रस के रूप में रक्त में पहुँचते हैं) वृक्कों द्वारा छन जाते हैं और मूत्र में मिलकर निकलते हैं (अतएव मूत्र अधिक एवं गाढ़ा आने लगता है), बस इसी को 'प्रमेह' कहते हैं। प्रमेहों के नामों पर ध्यान देने से ज्ञात हो सकता है कि उन-उन में मूत्र कैसा होता है और उसमें क्या-क्या घुला रहता है।
सोमरोग-गणना
सोमरोगस्तथा चैकः-
सोम रोग एक होता है।
वक्तव्य- इस रोग में निर्मल या केवल जल जैसा मूत्र होता है और मात्रा में बहुत अधिक। उक्त रोग स्त्रियों को अधिक होता है।
प्रमेहपिड़का-गणना
-प्रमेहपिडका दश॥६३॥
शराविका कच्छपिका पुत्रिणी विनताऽलजी।
मसूरिका सर्षपिका जालिनी च विदारिका॥६४॥
विद्रधिश्च दशैताः स्युः पिडका मेहसम्भवाः।
प्रमेहपिड़काएँ दस होती हैं-१. शराविका, २. कच्छपिका, ३. पुत्रिणी ४. विनता, ५. अलजी, ६. मसूरिका, ७. सर्षपिका, ८. जालिनी, ९. विदारिका और १०. विद्रधि-ये दस पिड़काएँ (फुन्सियाँ या फोड़े) प्रमेह के कारण होती हैं।
वक्तव्य- उक्त पिड़काएँ प्रायः प्रमेह रोगियों को होती हैं और बहुत कष्टप्रद होती हैं। 'विनता' नाम का वह प्रसिद्ध फोड़ा है, जिसे 'अदीठ' या 'कार्बकल' कहते हैं।
मेडोरोग-गणना
मेदोदोषस्तथा चैकः-
मेदोरोग एक होता है।
वक्तव्य- अनावश्यक रूप से मोटा होना 'मेदो-दोष' या 'मोटापा' कहलाता है।
शोथ-गणना
-शोथरोगा नव स्मृताः॥६५॥
दोषैः पृथग्द्वयैः सर्वैरभिघाताद् विषादपि।
शोथ (सूजन) नौ प्रकार का होता है-पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन, सब दोषों (सन्निपात) से एक, अभिघात (चोट लगने) से एक तथा विष-सेवन से एक।
वृद्धिरोग-गणना
वृद्धयः सप्त गदिता वातात्पित्तात्कफेन च॥६६॥
रक्तेन मेदसा मूत्रादन्त्रवृद्धिश्च सप्तमी।
वृद्धिरोग सात प्रकार का कहा गया है-१. वायु से, २. पित्त से, ३. कफ से, ४. रक्त से, ५. मेदा से, ६. मूत्र से और ७. अन्त्रवृद्धि से।
वक्तव्य- यह अण्डकोष (पोतों) का रोग है। इसमें उक्त अंग बढ़ जाता है और 'अन्त्रवृद्धि' अँतड़ी या आँत के उतरने से हो जाती है।