शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 73
[वाम स्तम्भ]
(अण्डकोष की खुजली), 32. गन्ध (बगलगन्ध), 33.
पाषाणगर्दभ, 34. राजिका और (4) चार प्रकार के व्यंग,
(8) आठ प्रकार के विस्फोट (बड़ी माता) भी क्षुद्र रोगों में
गिने जाते हैं। यथा-पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों
से तीन, सन्निपात से एक तथा रक्त से एक। (14) चौदह
प्रकार की मसूरिका (छोटी माता) भी क्षुद्र रोगों में गिनी
जाती है। यथा-तीनों दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन
सन्निपात से सातवीं, त्वचागत आठवीं, रक्तगत नौवीं, मांसगत
दसवीं और चार बड़ी ही भयंकर होती हैं, जो कि मेदा में,
अस्थि में, मज्जा में एवं शुक्र में व्याप्त होती हैं। इस प्रकार
यहाँ 60 क्षुद्र रोगों की गणना की गयी है।
वक्तव्य-क्षुद्र रोग वे कहे जाते हैं, जिनका वर्णन
आयुर्वेदिक-ग्रन्थों में सामान्य रूप से या संक्षेप से किया
गया है।
विसर्परोग-गणना
विसर्परोगो नवधा वातपित्तकफैस्त्रिधा।।100।।
त्रिधा स द्वन्द्वभेदेन सन्निपातेन सप्तमः।
अष्टमो वह्निदाहेन नवमश्चाभिघातजः।।101।।
विसर्प रोग नौ प्रकार का होता है-वात, पित्त तथा कफ
से तीन, दो-दो दोषों से तीन, सन्निपात से सातवाँ, अग्नि द्वारा
जलने से आठवाँ तथा अभिघात से नौवाँ।
वक्तव्य-कुछ विद्वान् तीन और विसर्प मानते हैं। यथा-1.
अग्निविसर्प, 2. ग्रन्थिविसर्प तथा 3. कर्दमविसर्प। इस रोग
में शरीर पर किसी एक स्थान में फफोले या छाले उठते हैं
और फूटते हैं। जहाँ-जहाँ उनका पानी लगता है, वहाँ-वहाँ
और फफोले उठते जाते हैं, पहिले वाले शान्त होते जाते हैं।
बस यही विसर्प का सामान्य लक्षण है। इसे 'मकड़ी' भी
कहते हैं।
उदर्द एवं शीतपित्त-गणना
तथैकः श्लेष्मपित्ताभ्यामुदर्दः परिकीर्तितः।
वातपित्तेन चैकस्तु शीतपित्तामयः स्मृतः।।102।।
'उदर्द' एक होता है, जो कि कफ-पित्त से होता है तथा
'शीतपित्त' भी एक ही होता है, जो कि वात-पित्त से होता है।
वक्तव्य-उक्त रोगों को 'जुलपित्ती', 'रक्तपित्ती' या
'पित्ती' भी कहते हैं।
[दक्षिण स्तम्भ]
अम्लपित्त-गणना
अम्लपित्तं त्रिधा प्रोक्तं वातेन श्लेष्मणा तथा।
तृतीयं श्लेष्मवाताभ्यां वातरक्तं तथाऽष्टधा।।103।।
अम्लपित्त रोग तीन प्रकार का होता है-1. वायु से, 2.
कफ से तथा 3. कफवात से।
वक्तव्य-इसका सामान्य लक्षण है-छाती में जलन तथा
खट्टे डकारों का आना।
वातरक्तरोग-गणना
वाताधिक्येन पित्ताच्च कफाद् दोषत्रयेण च।
रक्ताधिक्येन दोषाणां द्वन्द्वेन त्रिविधः स्मृतः।।104।।
वातरक्त आठ प्रकार का होता है। यथा-1. वायु से, 2.
पित्त से, 3. कफ से 4, त्रिदोष से, 5. रक्त तथा दो-दो दोषों
से तीन=8।
वक्तव्य-यह कुष्ठ जैसा ही होता है, किन्तु इसमें वात
दोष की प्रधानता होती है।
वातज रोग-गणना
अशीतिर्वातजा रोगाः कथ्यन्ते मुनिभाषिताः।
आक्षेपको हनुस्तम्भ ऊरुस्तम्भः शिरोग्रहः।।105।।
बाह्यायामोऽन्तरायामः पार्श्वशूलं कटिग्रहः।
दण्डपातानकः खल्ली जिह्वास्तम्भस्तथार्दितम्।।106।।
पक्षाघातः क्रोष्टुशीर्षो मन्यास्तम्भश्च पङ्गुता।
कलायखञ्जता तूनी प्रतितूनी च खञ्जता।।107।।
पादहर्षो गृध्रसी च विश्वाची चापबाहुकः।
अपतानो व्रणायामो वातकण्टोऽपतन्त्रकः।।108।।
अङ्गभेदोऽङ्गशोषश्च मिन्मिनत्वं च गद्गदः।
प्रत्यष्ठीलाऽष्ठीलिका च वामनत्वं च कुब्जता।।109।।
अङ्गपीडाऽङ्गशूलं च सङ्कोचस्तम्भरूक्षता।
अङ्गभङ्गोऽङ्गविभ्रंशो विड्ग्रहो बद्धविट्कता।।110।।
मूकत्वमतिजृम्भा स्यादत्युद्गारोऽन्त्रकूजनम्।
वातप्रवृत्तिः स्फुरणं शिराणां पूरणं तथा।।111।।
कम्पः कार्श्यं श्यावता च प्रलापः क्षिप्रमूत्रता।
निद्रानाशः स्वेदनाशो दुर्बलत्वं बलक्षयः।।112।।
अतिप्रवृत्तिः शुक्रस्य कार्श्यं नाशश्च रेतसः।
अनवस्थितचित्तत्वं काठिन्यं विरसास्यता।।113।।
कषायवक्त्रताऽऽध्मानं प्रत्याऽऽध्मानं च शीतता।
रोमहर्षश्च मरुतस्तोदः कण्डूरसाज्ञता।।114।।