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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 356 में से

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पृष्ठ 100

64 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
(लीख) बाह्य या 'बहिर्श्वर' (बाहरी त्वचा पर घूमने वाले)
कहे जाते हैं। शेष सब अन्तश्चर (भीतर घूमने वाले) होते
हैं। यथा-1. हृदयादक (हृदय को खाने वाले 'कृमिज हृद्रोग'
के उत्पादक), 2. अन्नाद (आँतड़ियों को खाने वाले 'आन्त्रिक
ज्वर' के उत्पादक), 3. उदरावेष्ट (आमाशय में लिपटने वाले)
4. चुरु 5. महागुहा (महास्रोतस् या आँतड़ियों में होने वाले)
6. सुगन्धा (नाक तथा शिर में उत्पन्न होने वाले) और 7.
दर्भकुसुम (फुफ्फुसों में उत्पन्न होने वाले या यक्ष्मा रोग के
उत्पादक), ये सब कफ से होते हैं। तथा-1. मातृ (जन्तु
माता) 2. सौरस (तरुणास्थियों को खाने वाले), लोमविध्वंस
(रोमनाशक), 4. रोमद्वीप (रोमों की जड़ में रहने वाले), 5.
उदुम्बर (गूलर के फल जैसा शोथ उत्पन्न करने वाले, उसमें
अनन्त कृमि होते हैं) और 6. केशाद (शिर के बालों की जड़
को खा जाने वाले)। ये छः रक्त से होते हैं, जो कुष्ठरोगियों के
रक्त में पाये जाते (कुष्ठैककर्माणः) हैं। और दूसरे पुरीष
(मल) में उत्पन्न होते हैं। यथा-1. मकेरुक, 2. लेलिह, 3.
ससूना (सशूलाः, च० वि० अ० 7), 4. सौसुराद तथा 5.
ककेरुक। तथा एक और कृमि जो कफ एवं रक्त से उत्पन्न
होता है, उसे 'स्नायुक' या 'नहरुआ' कहते हैं। व्रणों या घावों
में छोटे-बड़े कृमि उत्पन्न हो जाते हैं, वे बाहरी कारणों से
(किरौनी नामक मक्खी के बैठने से) उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य-उक्त कृमियों में से कुछ तो आँखों से देखे जाते
हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी हैं, जो 'अणुवीक्षण' यन्त्र द्वारा देखे जा
सकते हैं। मेरे विचार से आजकल जो पाश्चात्य चिकित्सकों
में कृमियों की चर्चा चल रही है, उसको इन बीस प्रकार के
कृमियों से मिलान करने का कष्ट करें तो इस विषय को
समझने में आपको बड़ी सहायता मिलेगी। 'स्नायुक' प्रायः
शरीर की शाखाओं (टाँगों और बाँहों) में होता है और सफेद
डोरे जैसा निकलता है। आचार्य शार्ङ्गधर ने व्रण के कृमियों
को अलग गिना है, किन्तु चरक में वे 'जन्तुमातरः' (जन्तुः
माता येषां ते=जन्तुमातरः) के नाम से कहे गये हैं। कृमियों के
विवेचन के लिए सु० उ० अ० 54 को पूर्ण जानकारी के लिए
अवश्य देखें।
पाण्डुकामला-कुम्भकामला-हलीमक-गणना
पाण्डुरोगाश्च पञ्च स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा।
त्रिदोषैर्मृत्तिकाभिश्च तथैका कामला स्मृता।। १९।।
स्यात् कुम्भकामला चैका तथैकं च हलीमकम्।
पाण्डुरोग पाँच प्रकार का होता है-1. वायु से, 2. पित्त
से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, और 5. मिट्टी खाने से।
कामला एक ही होता है, कुम्भकामला एक होता है और
'हलीमक' भी एक होता है।
वक्तव्य-रक्त में रक्तकणों की कमी हो जाने से शरीर
पीलापन लिये सफेद हो जाता है। इस रोग को 'पाण्डुरोग'
कहते हैं। यदि रक्त में पित्त का अधिक मिश्रण हो जाता है, तो
शरीर का रंग हल्दी का-सा हो जाता है, आँखें और मूत्र
अधिक पीले हो जाते हैं। इसे 'कामला' या 'पीलिया' कहते
हैं। उक्त रोगों का यदि कुम्भ (उदर) में (यकृत्-प्लीहा पर)
अधिक प्रभाव पड़ता है, तो उसे 'कुम्भकामला' कहा जाता है
और जब रोगी का वर्ण काला या हरापन लिये पीला होता है,
तो उसे 'हलीमक' कहते हैं। हलीमक को ही 'कालाजार'
कहते हैं। इन सबमें यकृत् और प्लीहा की विकृति ही कारण
होता है।
रक्तपित्त-गणना
रक्तपित्तं त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वगं कफसम्भवम् ।। २० ।।
अधोगं मारुतं ज्ञेयं तद्द्वयेन द्विमार्गगम्।
रक्तपित्त तीन प्रकार का होता है-1. ऊर्ध्वगामी नाक,
मुख आदि ऊपर के स्रोतों से निकलने वाला, जो कफ से
होता है, 2. अधोगामी लिंग एवं योनिमार्ग से निकलने वाला,
जो वायु से होता है और 3. द्विमार्गगामी, ऊपर एवं नीचे के
स्रोतों से, जो कि वायु एवं कफ के प्रकोप से होता है।
वक्तव्य-पित्त की वृद्धि से रक्त इतना पतला हो जाता है
कि वह केशिकाओं से रिसकर (चूकर) निकलने लगता है।
यह रक्तपित्त का असाध्य स्थिति कही जाती है।
कास-गणना
कासाः पञ्च समुद्दिष्टास्ते त्रयः स्युस्त्रिभिर्मलैः ।। २१ ।।
उरः क्षताच्चतुर्थः स्यात् क्षयाद्धातोश्च पञ्चमः।
कास पाँच प्रकार का होता है-वातादि दोषों से तीन, उरः
(फुफ्फुस एवं श्वासमार्ग) में क्षत या घाव होने से चौथा और
धातुक्षय से पाँचवाँ।
क्षय-गणना
क्षयाः पञ्चैव विज्ञेयास्त्रिभिर्दोषैस्त्रयश्च ते ।। २२ ।।