शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें66 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
वक्तव्य-आवश्यकता से अधिक प्यास लगना 'तृष्णा
रोग' होता है उपसर्ग-घाव आदि होने पर जब शरीर से रक्त
धातु अधिक निकल जाता है, तो प्यास बहुत लगती है। इसी
को 'उपसर्गजा तृष्णा' कहते हैं।
मूर्च्छादि-गणना
मूर्च्छा चतुर्विधा ज्ञेया वातपित्तकफैः पृथक् ।। 31 ।।
चतुर्थी सन्निपातेन तथैकश्च भ्रमः स्मृतः।
निद्रा तन्द्रा च संन्यासो ग्लानिंश्चैकैकशः स्मृताः ।। 32 ।।
मूर्च्छा चार प्रकार की होती है-वात, पित्त तथा कफ से
तीन और सन्निपात से चौथी। भ्रम रोग एक ही प्रकार का होता
है। निद्रा (नींद), तन्द्रा, संन्यास एवं ग्लानि ये रोग एक-एक
प्रकार के ही होते हैं।
वक्तव्य-बेहोशी को ही मूर्च्छा कहा जाता है। संन्यास
उस मूर्च्छा को कहते हैं, जिससे रोगी चिकित्सा के बिना होश
में नहीं आता और मर भी जाता है। मूर्च्छा का रोगी तो कुछ
समय के बाद स्वयं होश में आ जाता है।
मद-मदात्ययादि-गणना
मदाः सप्त समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रयः।
त्रिदोषैरसृजा मद्याद्विषादपि च सप्तमः ।। 33 ।।
मदात्ययश्चतुर्था स्याद् वातपित्तकफादपि।
त्रिदोषैरपि विज्ञेय एकः परमदस्तथा ।। 34 ।।
पानाजीर्णं तथा चैकं तथैकः पानविभ्रमः।
पानात्ययस्तथा चैको-
मद सात कहे गये हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन,
सन्निपात से एक, रक्त से एक, मद से एक एवं विष से
सातवाँ। 'मदात्यय' चार प्रकार का होता है-वात से, पित्त से,
कफ से तथा सन्निपात से। 'परमद' एक ही प्रकार का होता
है, 'पानाजीर्ण' एक प्रकार का होता है, 'पानविभ्रम' एक
होता है और 'पानात्यय' भी एक होता है।
वक्तव्य-'मद' उस अवस्था का नाम है, जो शराब,
भाँग आदि मादक द्रव्यों के सेवन करने पर हो जाता है।
'मदात्यय' मद से होने वाली हानि को कहते हैं। 'परमद' मद
की अधिकता का नाम है। सेवन किये हुये मादक द्रव्यों का
न पचना 'पानाजीर्ण' है और उन्हीं मादक द्रव्यों के विकार से
होने वाली हानि को 'पानविभ्रम' तथा मादक द्रव्यों का अधिक
सेवन करने पर होने वाली हानि को 'पानात्यय' कहा जाता है।
दाह-गणना
-दाहाः सप्त मतास्तथा ।। 35 ।।
रक्तपित्तात्तथा रक्तात्तृष्णायाः पित्ततस्तथा।
धातुक्षयान्मर्मघाताद् रक्तपूर्णोदरादपि ।। 36 ।।
'दाह' सात माने जाते हैं-1. रक्तपित्त से, 2. रक्त से, 3.
प्यास रोकने से, 4. पित्त से, 5. धातुक्षय से, 6. मर्मस्थानों पर
चोट आने से और 7. रक्त से उदर भर जाने से।
वक्तव्य-दाह उस जलन को कहते हैं, जिसका अनुभव
केवल रोगी ही करता है।
उन्माद-गणना
उन्मादाः षट् समाख्यातास्त्रिभिर्दोषैस्त्रयश्च ते।
सन्निपाताद् विषाज्ज्ञेयः षष्ठो दुःखेन चेतसः ।। 37 ।।
उन्माद छः कहे जाते हैं-तीनों दोषों से तीन, सन्निपात से
चौथा, विष से पाँचवाँ और मानसिक दुःख से छठा।
वक्तव्य-'उन्माद' पागलपन का नाम है। बुद्धि का बिगड़
जाना ही पागलपन है।
भूतोन्माद-गणना
भूतोन्मादा विंशतिः स्युस्ते देवाद्वानवादपि ।
गन्धर्वात् किन्नराद्यक्षात् पितृभ्यो गुरुशापतः ।। 38 ।।
प्रेताच्च गुह्यकाद् वृद्धात्सिद्धाद्भूतात्पिशाचतः।
जलाधिदेवतायाश्च नागाच्च ब्रह्मराक्षसात् ।। 39 ।।
राक्षसादपि कूष्माण्डात् कृत्यावेतालयोरपि।
भूतोन्माद बीस होते हैं-1. देवता से, 2. दानव से, 3.
गन्धर्व से, 4. किन्नर से, 5. यक्ष से, 6, पितर से, 7. गुरुजन
के शाप से, 8. प्रेत से, 9. गुह्यक से, 10. वृद्ध को कष्ट देने
से, 11. सिद्धों से, 12. भूत से, 13. पिशाच से, 14. वरुण से,
15. नाग से, 16. ब्रह्मराक्षस से, 17. राक्षस से, 18. कूष्माण्ड
से, 19. कृत्या (तान्त्रिकक्रिया-विशेष) से और 20. वेताल से।
वक्तव्य-गुरु तथा वृद्ध को छोड़कर शेष सभी अलौकिक
आत्माएँ हैं। इन आत्माओं का किन्हीं कारणों से मानव-शरीर
में आवेश होता है और मनुष्य पागल हो जाता है। कृत्या के
साहित्य तथा उसके उपचारों को तान्त्रिक लोगों से समझें।