शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो वहीं जम जाता है), 3. विद्रधि, 4. दारुण, (रूसी), 5.
पिडका, 6. अर्बुद, 7. इन्द्रलुप्त. (शिर-पर से बालों का
उखड़ना), 8. खलिति (जो सदा के लिए चाँद के बाल
उखड़ जाते हैं) तथा 9. पलित (अकाल में बालों का सफेद
होना)।
वक्तव्य—ये शिर के बाहरी भाग के रोग हैं।
नेत्ररोग-गणना
तथा नेत्रभवाः ख्याताश्चतुर्नवतिरामयाः।
नेत्र में होने वाले रोग 'चौरानवे' होते हैं।
नेत्रवर्त्म रोग
तेषु वर्त्मगदाः प्रोक्ताश्चतुर्विंशतिसंज्ञकाः ।। 153 ।।
कृच्छ्रोन्मीलः पक्ष्मपातः कफोत्क्लिष्टश्च लोहितः।
अरुङ्निमेषः कथितो रक्तोत्क्लिष्टः कुकूणकः ।। 154 ।।
पक्ष्मार्शः पक्ष्मरोधश्च पित्तोत्क्लिष्टश्च पोथकी।
क्लिष्टवर्त्मा च बहलः पक्ष्मोत्सर्गस्तथार्बुदम् ।। 155 ।।
कुम्भिका सिकतावत्र्म लगणोऽञ्जननामिका।
कर्दमः श्याववत्र्मा च बिसवर्त्मा तथाऽलजी ।। 156 ।।
उत्क्लिष्टवर्मेति गदाः प्रोक्ता वर्त्मसमुद्भवाः।
उनमें वर्त्म या बरौनी के रोग 'चौबीस' होते हैं-1.
कृच्छ्रोन्मील (आँख खोलने में कष्ट होना), 2. पक्ष्मपात
(बरौनियों का उखड़ना), 3. कफोत्क्लिष्ट (कीचड़ आना),
4. लोहित (बरौनी लाल होना), 5 अरुङ्निमेष (बार-बार
आँख फड़कना), 6. रक्तोत्क्लिष्ट (शोणितार्श), 7. कुकूणक,
8. पक्ष्मार्श (बालों की जड़ में मांसांकुर का होना), 9. पक्ष्मरोध
(शोथ के कारण बरौनी को चला न सकना), 10. पित्तोत्क्लिष्ट
(पित्तवृद्धि से होने वाला), 11. पोथकी (बरौनी में कण्डूयुक्त
अनेक फुन्सियाँ होना), 12. क्लिष्टवर्त्मा (लाल होना), 13.
बहलवर्त्म (बरौनी पर अनेक फुन्सियाँ निकलना), 14.
पक्ष्मोत्सर्ग (बिलनी), 15. अर्बुद (रसौली), 16 कुम्भिका
(एक प्रकार का फुन्सी), 17. सिकतावत्र्म (वर्त्म शर्करा),
18. लगण (बरौनी में एक प्रकार का गाँठ), 19. अञ्जननामिका
(लाल फुन्सी), 20. कर्दम (बरौनी का सड़ना),
21. श्याववर्त्म (बरौनियों का काला या नीला हो जाना),
22. बिसवर्त्मा (पानी जाना), 23. अलजी तथा 24. उत्क्लिष्ट-
वर्त्म (निमेषोन्मेष का न होना)।
नेत्रसन्धिगत रोग-गणना
नेत्रसन्धिसमुद्भूता नव रोगाः प्रकीर्तिताः ।। 157 ।।
जलस्रावः कफस्रावो रक्तस्रावश्च पर्वणी।
पूयस्रावः कृमिग्रन्थिरुपनाहस्तथाऽलजी ।। 158 ।।
पूयालस इति प्रोक्ता रोगा नयनसन्धिजाः।
नेत्रसन्धि (बरौनी तथा नेत्रबुद्बुद की सन्धि) के नौ रोग
कहे गये हैं-1. जलस्राव, 2. कफस्राव, 3 रक्तस्राव, 4.
पर्वणी (शुक्ल तथा कृष्णमण्डल की सन्धि में), 5. पूयस्राव,
6. कृमिग्रन्थि, 7. उपनाह, 8. अलजी तथा 9. पूयालस।
वक्तव्य-आँख में छः सन्धियाँ होती हैं। यथा-1. पक्ष्म
(बाल) तथा वर्त्म (बरौनी) की, 2. वर्त्म तथा शुक्लमण्डल
की, 3. शुक्लमण्डल तथा कृष्णमण्डल की, 4. कृष्णमण्डल
तथा दृष्टिमण्डल की, 5. कनीनिका (आँख का अवयव जो
नाक की ओर होता है) तथा 6. अपाङ्ग (जो पुटीपुटी की
ओर होता है) का सन्धि। देखें-सु० उ० अ० 1।
नेत्रशुक्ल-भागगत रोग-गणना
तथा शुक्लगतो रोगा बुधैः प्रोक्तास्त्रयोदश ।। 159 ।।
सिरोत्पातः सिराहर्षः सिराजालं च शुक्तिका।
शुक्लार्म चाधिमांसार्म प्रस्तार्यर्म च पिष्टकः ।। 160 ।।
शिराजपिडका चैव कफग्रन्थितकोऽर्जुनः।
स्नाय्वर्म शोणितार्मं स्यादिति शुक्लगतो गदाः ।। 161 ।।
विद्वानों ने नेत्र-शुक्लभाग के तेरह रोग कहे हैं-1.
सिरोत्पात, 2. सिराहर्ष, 3. सिराजाल, 4. शुक्तिका, 5.
शुक्लार्म, 6. अधिमांसार्म, 7. प्रस्तार्यर्म, 8. पिष्टक, 9.
शिराजपिडका, 10. कफग्रन्थितक (कफग्रन्थि), 11. अर्जुन,
12. स्नायु-मर्म तथा 13. शोणितार्म (रक्तार्म)।
नेत्रकृष्ण-भागगत रोग-गणना
तथा कृष्णसमुद्भूताः पञ्च रोगाः प्रकीर्तिताः।
शुद्धशुक्रं शिराशुक्रं क्षतशुक्रं तथाऽजका ।। 162 ।।
शिरासङ्गश्च सर्वेऽपि प्रोक्ताः कृष्णगता गदाः।
नेत्र-कृष्णमण्डल के पाँच रोग हैं-1. शुद्धशुक्र, 2.
शिराशुक्र, 3. क्षतशुक्र, 4. अजका तथा 5. सिरासंग।
काचरोग-गणना
काचं तु षड्विधं ज्ञेयं वातात्पित्तात्मकफादपि ।। 163 ।।
सन्निपाताच्च रक्ताच्च षष्ठं संसर्गसम्भवम्।