शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 79
[ बायाँ स्तम्भ ]
काच (मोतिया) छः प्रकार का होता है-1. वात से, 2.
पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त से, तथा 6.
संसर्ग से (परिम्लयी)।
वक्तव्य- मोतियाबिन्द के उक्त छः भेद वर्ण (रंग) के
कारण होते हैं। देखें-सु० उ० अ० 7।
तिमिररोग-गणना
तिमिराणि षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 164 ।।
संसर्गेण च रक्तेन षष्ठं स्यात् सन्निपाततः।
तिमिर (धुन्ध) छः प्रकार के होते हैं-1. वात से, 2.
पित्त से, 3. कफ से, 4. संसर्ग से, 5. रक्त से एवं, 6. सन्निपात
से।
वक्तव्य- तिमिर को 'धुन्ध' भी कहा जाता है।
लिङ्गनाश रोग-गणना
लिङ्गनाशः सप्तधा स्याद्वातात्पित्तात्कफेन च ।। 165 ।।
त्रिदोषै रुपसर्गेण संसर्गेणासृजा तथा।
लिङ्गनाश (दृष्टिनाश) सात होते हैं-1. वात से, 2. पित्त
से, 3. कफ से, 4. त्रिदोष से, 5. उपसर्ग से, 6. संसर्ग से तथा
7. रक्त से।
वक्तव्य- इस रोग से दृष्टि या दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती
है। (उक्त 5वाँ तथा 6ठा लिंगनाश निमित्तज तथा अनिमित्तज
नाम से प्रसिद्ध है)।
दृष्टिगत रोग-गणना
अष्टधा दृष्टिरोगाः स्युस्तेषु पित्तविदग्धकम् ।। 166 ।।
अम्लपित्तविदग्धं च तथैवोष्णविदग्धकम्।
नकुलाख्यं धूसरान्ध्यं रात्र्यान्ध्यं ह्रस्वदृष्टिकः ।। 167 ।।
गम्भीरदृष्टिरित्येते रोगा दृष्टिगता मताः।
दृष्टि के रोग आठ होते हैं-1. पित्तविदग्धक (दिवान्ध्य),
2. अम्लपित्तविदग्ध (अम्लपित्त से होने वाला दृष्टिदोष),
3. उष्णविदग्ध (धूप में तथा आग के सामने बैठने से होने
वाला), 4. नकुलांध्य (नेवले की-सी आँखें होकर कम
दिखलायी देना), 5. धूसरांध्य (साफ-साफ न दिखलायी
देना) 6. रात्र्यांध्य (कफविदग्धक या रतौंधी), 7. ह्रस्वदृष्टिक
(बारीक वस्तुएँ न दिखलायी देना) और 8. गम्भीरदृष्टि
(दृष्टिमण्डल का संकुचित होना या सिकुड़ जाना)।
[ दायाँ स्तम्भ ]
वक्तव्य- उक्त रोगों में दृष्टि विकृत हो जाती है, नष्ट नहीं
होती। अम्लपित्त के रोगी की दृष्टि मन्द हो जाती है।
अधिमन्थ रोग-गणना
(चत्वारश्चाधिमन्थाः स्युर्वातपित्तकफास्रतः ।। 168 ।।)
अधिमंथ नामक रोग चार होते हैं-1. वात से, 2. पित्त
से, 3. कफ से तथा 4. रक्त से।
वक्तव्य- अभिष्यन्द रोग के बिगड़ जाने से 'अधिमन्थ'
रोग हो जाता है।
अभिष्यन्द रोग-गणना
अभिष्यन्दाश्च चत्वारो रक्ताद्दोषैस्त्रिभिस्त्रिधा।
अभिष्यन्द चार होते हैं-रक्त से एक तथा वात आदि
तीनों दोषों से तीन।
वक्तव्य- अभिष्यन्द को ही 'आँख दुखना' या 'आँख
आना' कहते हैं।
सर्वनेत्ररोग-गणना
सर्वाक्षिरोगाश्चाष्टौ स्युस्तेषु वातविपर्ययः ।। 169 ।।
अल्पशोफोऽन्यतोवातस्तथा पाकात्ययः स्मृतः।
शुष्काक्षिपाकश्च तथा शोफोऽध्युषित एव च ।। 170 ।।
हताधिमन्थ इत्येते रोगाः सर्वाक्षिसम्भवाः।
सम्पूर्ण आँख के आठ रोग होते हैं-1. वातविपर्यय, 2.
अल्पशोफ, 3. अन्यतोवात, 4. पाकात्यय, (नेत्रबुद्बुद का
पक जाना, इसमें अन्त में आँख बैठ जाती है), 5. शुष्काक्षिपाक
(इसमें बुद्बुद छोटा हो जाता है), 6. शोफ, 7. अध्युषित
(अम्लाध्युषित खटाई खाने या आँख में पड़ने से होता है)
एवं 8. हताधिमन्थ (अधिमन्थ से आँख का नष्ट हो जाना)।
वक्तव्य- उक्त रोगों का प्रभाव आँख के सम्पूर्ण भागों
पर पड़ता है।
पुंस्त्वरोग-गणना
पुंस्त्वदोषास्तु पञ्चैव प्रोक्तास्तत्रेर्ष्याकः स्मृतः ।। 171 ।।
आसेक्यश्चैव कुम्भीकः सुगन्धिः षण्डसंज्ञकः।
पुंस्त्व (पुरुषत्व या मर्दानगी) के पाँच दोष होते हैं।
जिनसे पाँच प्रकार के पुरुष पाये जाते हैं-1. ईर्ष्यक,
2. आसेक्य, 3 कुम्भीक, 4. सुगन्धि तथा 5. षण्ड नामक।
वक्तव्य- उक्त प्रकार के मनुष्य पूर्ण पुरुष नहीं होते अर्थात्